Tuesday, 16 July 2013

पुन: सता पाने के लिए समाज में विष घोलने के बजाय अपनी नाकामियों का जवाब दीजिये !

जनता को विष पिला कर स्वयं सता का अमृत पीने का लालच अब छोड़ दीजिये। आखिर कब तक विष बांट कर अपने लिए अमृत का जुगाड़ करते रहेंगे। प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल के नेताओं द्वारा कही जा रही बातों का  बतंगड बनाने और उनके द्वारा दिये गये भाषणों की तरह-तरह से व्याख्या करने के बजाय आप यह बताएं कि आपकी उपलब्धियां क्या हैं?  उन्होंने जो कुछ कहा है, जनता के समक्ष कहा है और जनता को केन्द्र बिन्दु बना कर अपनी बात कही है। अत: यह जनता पर ही छोड़ दीजिये कि वे सही है या गलत। आप तो अपने बारें में बताईये कि आप क्या हैं? आप यह भी बताएं  कि आपने इन चार वर्षों में देश को क्या दिया है, जिससे आप पुन: सता पाने का हक मांग रहें हें?
जिनकी झोली में उपलब्धियों के नाम पर कंकर भरे हों, वे उन्हें मोती बना कर जनता को दिखा नहीं सकते, इसलिए कंकरों को छुपा रहे हैं और अपने प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल के नेताओं के चरित्र की विद्रुपता के बारें में जनता को समझा रहे हैं। उन्हें भयभीत कर रहे हैं। कह रहे हैं- इनसे दूर ही रहो, ये बहुत ही खतरनाक लोग हैं। जबकि ये स्वयं विषैले हैं, विष बांट रहे हैं और कह यह रहें है कि इनसे दूर रहो, ये विषैले हैं।
निरन्तर साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता का राग अलापने से सारे पाप नहीं धुल जाते। भारत की युवा पीढ़ी आपकी नीयत और चरित्र को समझ रही है। इस पीढ़ी के निर्णायक वोट आपके सारे चुनावी स्टंट को निष्फल कर देंगे। आपको यह भी समझा देगी कि शासन करने का अधिकार चाहिये तो आपके पिछले कार्यकाल का हिसाब दों। यदि आपके हिसाब में गड़बड़ी पायी जायेगी, तो वह स्पष्ट रुप से कह देगी- ‘ अब क्षमा करें, आप उपयुक्त नहीं हैं, दूसरों को मौका देंगे।
परन्तु आपका हिसाब तो पूरा गड़बड़ है। इसे दिखा कर तो आप जनता का विश्वास नहीं जीत सकते। सुशासन के मानक होते हैं-जवाबदेय और पारदर्शी प्रशासन। कुशल वितप्रबन्धन, राजकोष के कार्यनिष्पादन में पूर्ण ईमानदारी और निष्ठा। मुद्रास्फिति पर नियंत्रण, ताकि जनता को महंगाई के कष्ट से बचाया जा सके। सुदृढ़ आंतरिक सुरक्षा, ताकि नागरिकों के जीवन की रक्षा की जा सके। विवेकपूर्ण विदेशनीति, जिसे विश्व में देश की प्रतिष्ठा बढ़े।
इन सारे मानक में आप खरे नहीं उतरे हैं। देश का शीर्षस्थ नेतृत्व यदि भ्रष्ट आचारण में लिप्त पाया जाता है, तो वह देश को स्वच्छ प्रशासन क्या दे पायेगा? वित्त प्रबन्धन आपका सही नहीं रहा है। देश की अर्थव्यवस्था कंगाली के कगार पर है। भारतीय मुद्रा का निरन्तर अवमूल्यन हो रहा है। औद्योगिक उत्पादन गिर रहा है। प्रति व्यक्ति आय घट रही है। बजट घाटा बढ़ने से महंगाई निरन्तर बढ़ रही है, जिससे जनता के कष्ट बढ़ रहे हैं। देश का विकास अवरुद्ध हो गया है।
आपके कार्यकाल में कई घपले चर्चित हुए हैं, जिनसे राजकोष को कई लाख करोड़ का चूना लगा है। यदि आप पर लगे हुए आरोप सही है, तो आपने राजकोष के धन को चुराने का अक्षम्य अपराध किया है। आप अपराधी साबित नहीं किये जा सकते और आपको सजा नहीं हो सकती, क्योंकि सभी जांच एजेंसिया आपके नियंत्रण में है। अत: जब तक सता की कमान आपके हाथ में हैं, पूरा सच जनता के सामने नहीं आ सकता। किन्तु आपके संदिग्ध चरित्र को देखते हुए आखिर किस आधार पर जनता आप पर विश्वास करें? यदि बैंक के कर्मचारी बैक में रखे जनता के धन को चुराने लगे, तो बैंक तो दिवालिया हो जायेंगे। परन्तु बैंक कर्मचारी ऐसा नहीं करते। यदि करते हैं, तो उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाता है। उन्हें सजा होती है। राजकोष भी जनता का बैंक ही है। यदि इसमें रखे गये पैसे की चोरी होती हैं, तो चोरों को माफ कर उन्हें पुन: सरकार बनाने का क्यों मौका दें दें? क्यों इस तथ्य को नज़र अंदाज कर दें कि राजकोष के धन की लूट से ही राजकोषीय घाटे पर नियंत्रण नहीं पाया जा सका। इसी कारण जनता पर महंगाई का बोझ पड़ा है। अभाव बढ़े हैं। जीवन गुजारना दिन प्रति दिन कठिन होता जा रहा है?
देश की कानून व्यवस्था लच्चर है और आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था बेहद कमज़ोर। भ्रष्ट, बर्बर व निकम्मी पुलिस के विरुद्ध पूरे देश में आक्रोश है। उसके हैवानियत के किस्से जग जाहिर है। आतंकवादी देश में खुले घूम रहे हैं। उन्हे जानबूझ कर पकड़ा नहीं जा रहा है। देश के कई शहरों में बम विस्फोट हुए हैं, किन्तु आतंकी पकड़े नहीं जाते। क्या आतंकवादियों के प्रति नरम रुख रखने वाली सरकार का पुन: सता में आना, देश की जनता के जीवन को असुरक्षित नहीं बना देंगा?
विदेश नीति इतनी कमजोर है कि पड़ोसी देश चीन हमारी सीमाओं पर दादागिरि से अतिक्रमण कर रहा है, किन्तु सरकार कुछ नहीं कर पा रही है। पाकिस्तान तो अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है किन्तु छोटे-छोटे पड़ोसी देश भी भारत को आंखें दिखा रहे हैं। निश्चय ही हमे ऐसी सरकार पुन: सता में नहीं लानी है, जो देश के हित के बारें में किंचित भी संवेदशीलता नहीं दिखायें।
आप पहले पांच वर्ष कुछ भी नहीं कर पाये, फिर भी जनता ने आपको पांच वर्ष और दिये, ताकि आप इस देश की तस्वीर बदल सकें। परन्तु आपने इन पांच वर्षों में देश की जनता के साथ दग़ाबाजी की है। उसके साथ विश्वासाघात किया है। अब अपनी दुर्बलताओं को छुपाने के लिए तरह-तरह के स्वांग कर रहे हैं, ताकि किसी भी तरह सता पर पुन: नियंत्रण स्थापित किया जा सके। निश्चय ही, सता का आपके लिए विशेष महत्व है। सता के बिना आप रह नहीं सकते। जनता के हितों का और समस्यओं से आपका कोई लेना देना नहीं है। आप मात्र जनता के वोट पाने के लिए नीतियां बनाते हैं। कानून बनाते हैं। परन्तु यह छल है। कपट है। आपकी कलुषित मानिसकता को दर्शाता है।
देश की जनता को मालूम हैं आप पुन: सत्ता पर नियंत्रण क्यों चाहते हैं। यदि सता आपके हाथ से चली जायेगी, तो आपके ढंके हुए पाप उजागर हो जायेंगे। वह सच्चाई जनता के सामने आ जायेगी, जिसे छुपाने की कोशिश की जा रही है। सीबीआई पर आपका अंकुश हटते ही सही जांच रिपोर्ट न्यायालय में जायेगी। आपके अपराध इतने गम्भीर है कि आप सजा से बच नहीं सकते। सम्भवत: आप इसीलिए  बहुत भयभीत हैं। आप जनता को मूर्ख बना कर पुन: सत्ता पाने के लिए आत्मविश्वास से लबालब हैं, क्योंकि साम्प्रदायिकता के बहाने आपको उन चोरों का समर्थन भी मिल जायेंगा, जिन के मामले न्यायालय में सीबीआई की शिथिल जांच के कारण लंबित है।
पर अब देश की जनता जाग गयी है। आपकी तिकड़मों को सफल नहीं होने नहीं देगी। पुन: सता सुख भोगने का आपका ख्बाब अधुरा ही रह जायेगा। देश की जनता को सुशासन चाहिये। खुशहाली चाहिये। महंगाई से निज़ात चाहिये। युवाओं को रोजगार चाहिये। मात्र साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता की मीठी गोलियां खिला कर ज्यादा समय तक मूर्ख नही बनाया जा सकता।