Monday, 27 April 2026

स्वप्न और यथार्थ

जीवन का सूक्ष्म रूप स्वप्न है और स्थूल रूप यथार्थ। जीवन की धारा सूक्ष्म से स्थूल की ओर बढ़ती है। बिना स्वप्न के यथार्थ की सत्ता नहीं हो सकती। इसे इस तरह से भी कह सकते हैं कि विचार करने के बाद उसे कार्य रूप में तब्दील करना स्वप्न से यथार्थ बनने जैसा है। जो जितना बड़ा स्वप्नदर्शी होता है उसके जीवन का उद्देश्य उतना ही बड़ा होता है, लेकिन यह उद्देश्य तब पूरा होता है जब वह यथार्थ में परिवर्तित हो जाता है। स्वप्न और यथार्थ के मध्य जो सेतु का कार्य करता है, वह है साधना। ज्ञान-विज्ञान, गणित, व्यवहार, दर्शन और साहित्य जितने भी विषय हैं सभी स्वप्न और यथार्थ के साथ आगे बढ़ते हैं, लेकिन ये तब पूरा होते हैं जब कठोर श्रम साथ में किया जाए। समझना यह भी है कि बेहतर जिंदगी, बेहतर समाज और उच्च मानव मूल्यों के लिए किस तरह के स्वप्न देखे जाएं और इन्हें किस तरह यथार्थ में परिवर्तित करें। अच्छे शब्दों, अच्छे विचारों वाले वाक्यों और भावों को मन में बार-बार दोहराते रहिए। देखिएगा किस तरह शुभत्व का प्रवाह होने लगता है। कहा गया है जो व्यक्ति जैसा स्वप्न देखता है, फिर उस स्वप्न को साकार करने के लिए जैसा प्रयास करता है वैसा वह यथार्थ में परिवर्तित हो जाता है। यानी स्वप्न और यथार्थ दोनों का बराबर महत्व है।
ब्रह्मा के दो लाड़ले पुत्र हैं। एक स्वप्न और दूसरा यथार्थ। दोनों में लड़ाई हुई। दोनों ब्रह्मा के पास पहुंचे और बोले-भगवन! आज आप निर्णय कर दीजिए कि हम दोनों में से किसकी महिमा अधिक है? ब्रह्मा को बेटों की नादानी पर हंसी आ गई। वह बोले-दोनों जमीन पर खड़े हो जाओ, जमीन पर खड़े-खड़े ही जो आकाश छू लेगा उसकी महिमा सबसे बड़ी है। दोनों परीक्षा देने को तैयार हो गए। स्वप्न ने आकाश तो छू लिया, लेकिन उसके पैर जमीन तक नहीं पहुंच सके। अब यथार्थ की बारी थी। जमीन पर तो वह स्थिर हो गया, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद भी आकाश नहीं छू सका। दोनों को परीक्षा में फेल देख ब्रह्मा हंसे और बोले, 'देख लिया न, तुम दोनों की महिमा एक दूसरे के पूरक होने में है अकेले में नहीं। ' यह कथानक यह संदेश देता है कि हमारे जीवन में स्वप्न और यथार्थ में पूरकता होनी चाहिए। किसी एक से जीवन की सफलता नहीं है।

डॉ सुशील कश्यप 

Friday, 16 January 2026

व्यवहार कुशल

मनुष्य की पहचान उसकी बोलचाल, रहन-सहन और उसके व्यवहार से होती है। मनुष्य अच्छा है या बुरा है, इसके लिए वह कोई सर्टिफिकेट लेकर नहीं घूमता, उसका व्यवहार ही उसके चरित्र का प्रमाण-पत्र है। सच कहूं तो विश्वविद्यालय की पढ़ाई के लिए सर्टिफिकेट की जरूरत पड़ती है, लेकिन जीवन के विश्वविद्यालय में उसका व्यवहार ही प्रमाण-पत्र होता है। इसलिए जो व्यक्ति व्यवहार कुशल होता है, उसके पास जीवन का सबसे बड़ा प्रमाण-पत्र होता है और जो व्यक्ति व्यवहार कुशल नहीं है, जिसे कुछ भी पता नहीं हो कि हमें किससे कैसा व्यवहार करना चाहिए, बड़े-छोटों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए तो वह व्यक्ति मनुष्य दिखता जरूर है, लेकिन वह मनुष्य है ही नहीं। इसलिए जीवन में व्यवहार कुशल होना बहुत ही महत्वपूर्ण है।
व्यवहार कुशल होना एक विज्ञान है, जीवन जीने की विधि है। इसे अभ्यास से सीखा जाता है। उदंड होने में कोई परेशानी नहीं होती। उदंड होना आसान है, सुशील, सज्जन और व्यवहार कुशल होना कठिन है। मां के गर्भ से न तो कोई व्यवहार कुशल होकर आता है और न ही कोई उदंड होकर। सभी लोग सामान्य स्थिति में ही पैदा होते हैं। जिनके घर का वातावरण सुंदर होता है, जिनके घरों में बड़े-छोटों को लिहाज किया जाता है, जिनके घरों में अनैतिक कार्य नहीं होते हैं, उनके ही घरों में बच्चे सुशील, सुंदर और अनुशासन प्रिय होते हैं।
इसलिए बच्चों का चरित्र निर्माण बहुत कुछ उसके घर का वातावरण और दोस्तों की संगत पर निर्भर करता है। व्यवहार कुशल होना सफल जीवन का एक सुखद मार्ग है। जो व्यक्ति व्यवहार कुशल होता है, वह जीवन में कभी असफल नहीं होता, उसके जीवन में पग-पग पर सफलता मिलती रहती है। वह जहां कहीं भी जाता है, अपने व्यवहार से दूसरों को प्रभावित कर लेता है और उससे अपना काम निकाल लेता है। अगर आप किसी को सफल व्यक्ति मानते हैं तो भी मान लेना चाहिए कि निश्चित रूप से वह व्यक्ति दूसरों की अपेक्षा अधिक व्यवहार कुशल है और जो लोग असफल हैं, उनके संबंध में मान लेना चाहिए कि यह व्यक्ति आचरण और व्यवहार से उदंड है या फिर हीन भावना से ग्रस्त हैं और इसे अपनी काबलियत पर भरोसा नहीं है।

Tuesday, 6 January 2026

मन

मन भटकने के तमाम संसाधनों के बीच यह पोस्ट आपको भटकाव से उबारने के लिए है।।
जीवन का आनंद भोग नहीं त्याग में है।
कोई कितना महान है इसका पैमाना है कि वह कितना संयमित है। संयमी ही पराक्रमी होता है। देहबल से शक्तिशाली प्राणबल है।
प्राणबल से शक्तिशाली मनोबल है।
मनोबल से शक्तिशाली बुद्धिबल है।
आत्मबल सबसे अधिक बलशाली होता है।
मध्यकाल में एक एक यौद्धा, एक एक परिवार, भीड़ बनकर आ चुके लुटेरों से लड़ रहे थे।
एक तरफ उत्सर्ग की परंपरा का गौरव था दूसरी तरफ भुक्खड़ और नंगे लुटेरों की सेना थी।
यह भोग और संयम की लड़ाई थी।
शरीरबल से आत्मबल जीत जाता था।
जिनका अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण है, उन्हीं महात्माओं ने संसार को कुछ दिया है।
त्यागपूर्वक भोग ने ही संसार की सुव्यवस्थाओं का नियमन कर रखा है।
ब्रह्मचर्य संयम की ही देन है। मन मारकर मुदित रहना और भोग के संसाधनों से विरक्त रहना आपके मानसिक शांति के मार्ग का अवलम्बन है।
भोगेच्छाओं के दमन का पश्चाताप न करना आपकी सक्रियता को बनाये रखता है। यही सक्रियता सृजन का द्वार है।
यह अकर्मण्यता से दूर रखती है।
परोपकार का संचार करती है।
कृषि और पशुपालन, गौपालन जैसे कुछ व्यवसाय स्वाभाविक रूप से धैर्य और संयम की शिक्षा देते हैं।
मनुष्य को संवेदनशील और परोपकारी बनाते हैं।
स्वयं के अंतःकरण को प्रकृति से जोड़ते हैं और वहाँ से मोक्ष का द्वार, किंवा न्यूनतम अध्यात्म समझने योग्य बुद्धि देते हैं।
यही तो पुरुषार्थ है।
पुरुषार्थ केवल परिश्रमशीलता नहीं है।
पुरुषार्थ मन के दमन की सामर्थ्य है।
पुरुषार्थ इच्छाओं पर नियंत्रण है।
वही संयमी पुरुष पुरूष है बाकी सब तो पशुवत कीड़े मकोड़े का जीवन जी रहे हैं।
भोग और इंद्रियों के पीछे खिंचता मन, विषयों की तरफ बार बार उन्मुख होती वृत्तियां मनुष्य को अंततः तबाह करती हैं।
मन को #कोमलशिशु की तरह धीरे धीरे फुसलाकर साधो।
छोटे छोटे आश्वासन देकर बार बार उसके साथ छल करो।
उसे यह आश्वासन दो कि तेरा सोचा होगा पर अभी नहीं, अभी मुझे यह करने दो।
घनघोर शोक, दुश्चिंता और श्मशान में मन दुर्बल हो जाता है।
वैसी वैराग्य वृत्ति बनाये रखिये।
फिर मन को कहिए, चलो कुछ और करते हैं।
सृजनात्मक बनते हैं।
धन व्यय न करके संचय करते हैं।
स्वयं के लिए नहीं, पुत्र पुत्रियों के लिए। परिवार के लिए। कुटुंब के लिए। क्रमशः विस्तार करो। परोपकार तक ले जाओ।
मन को धन्यवाद दो। तूने साथ दिया। तू साथ था तो यहाँ तक की यात्रा सम्पन्न हुई।
धन्यवाद मन। धन्यवाद शरीर।

सब्र

खामोशी से सब्र करना कोई नैतिक उपदेश नहीं है बल्कि यह जीवन को समझने से उपजा हुआ व्यवहार है।।दर्द होना स्वाभाविक है पर दर्द को कहाँ, कैसे और कितनी बार व्यक्त किया जाए यही व्यक्ति की परिपक्वता तय करता है।।दुनिया सहानुभूति पर नहीं, परिणाम पर प्रतिक्रिया देती है।।लोग आपके संघर्ष को तब तक गंभीरता से नहीं लेते,जब तक वह किसी ठोस निष्कर्ष में न बदल जाए।।
बार-बार अपनी पीड़ा को सार्वजनिक करना
करुणा नहीं,बल्कि जिज्ञासा और आलोचना को जन्म देता है।।दुनिया आँसू नहीं, परिणाम को सम्मान देती है।।
जब कोई व्यक्ति हर मंच पर अपने दुःख का विवरण देने लगता है,तो धीरे-धीरे वही दुःख उसकी पहचान बन जाता है अतः लोग उसे व्यक्ति नहीं,एक समस्या के रूप में देखने लगते हैं।।
यह स्थिति इसलिए खतरनाक है क्योंकि तब लोग मदद नहीं,मूल्यांकन करने लगते हैं।।सब्र ऊर्जा को भीतर संचित करता है,और सार्वजनिक रोना ऊर्जा को बाहर बहा देता है।।
खामोशी व्यक्ति को सोचने का अवसर देती है,अपने निर्णयों को परखने का अवसर देती है,और भावनाओं के स्थान पर रणनीति गढ़ने की क्षमता देती है।।जो व्यक्ति शोर नहीं करता,वह भीतर तैयारी करता है।।सब्र आत्म-सम्मान की रक्षा करता है।।दुःख निजी होता है,पर जैसे ही वह सार्वजनिक होता है,व्यक्ति अनजाने में अपने आत्म-सम्मान को दूसरों के निर्णय पर छोड़ देता है।।
आज लोग सुनेंगे,कल वही लोग तुलना करेंगे,ताने देंगेऔर आपके अतीत को आपके विरुद्ध प्रयोग करेंगे।।खामोशी इस सामाजिक शोषण से रक्षा करती है।।खामोशी कमजोरी नहीं है अपितु यह नियंत्रण का संकेत है।।
जो हर बात कह देता है,वह अपने ऊपर नियंत्रण खो देता है और जो सहकर भी चुप रहता है,वह यह दर्शाता है कि
परिस्थितियाँ उस पर हावी नहीं हैं।।बार-बार रोनासमाधान नहीं देता अपितु आदत देता है।।फिर व्यक्ति समस्या का हल खोजने के बजाय सहानुभूति का आदी हो जाता है।।
सब्र व्यक्ति को उत्तरदायित्व की ओर ले जाता है और उत्तरदायित्व ही जीवन में परिवर्तन लाता है।।इतिहास शोर करने वालों से नहीं बनता बल्किइतिहास उन लोगों से बनता है जिन्होंने चुपचाप सहा,चुपचाप काम कियाऔर सही समय पर परिणाम सामने रखा।।खामोशी तैयारी का काल है और जब तैयारी पूर्ण हो जाती है,तो शब्दों की आवश्यकता नहीं रहती।।अंततः यह व्यक्ति को कमजोर नहीं,अधिक स्थिर बनाता है।।यह समाज से नहीं बल्कि स्वयं से प्रश्न करवाता है।।और यह आँसू नहीं बल्कि समाधान पैदा करता है।।हर पीड़ा दिखाने योग्य नहीं होती।।कुछ युद्ध चुपचाप लड़े जाते हैं और वही युद्ध वास्तव में जीते जाते हैं।।

जितना जान पाया उतना बताने का प्रयास किया शेष सब भगवान शिव के अधीन है क्योंकि आदि से अंत तक अंत से अनंत तक सब शिव हैं।।
सबके अंदर विराजमान भगवान शिव को सादर प्रणाम करता हूं।।

Tuesday, 6 December 2016

ब्रह्मज्ञान

उपनिषद के ऋषि जिसे ब्रह्मज्ञान कहते हैं, उसी को महर्षि पतंजलि द्रष्टा का अनुभव कहते हैं। भगवान महावीर आत्मज्ञान और भगवान बुद्ध निर्वाण ज्ञान कहते हैं। ओशो ने इसी को बुद्धत्व कहा है। इस आंतरिक अनुभूति की व्याख्या नहीं की जा सकती है। हमारा मन है शब्दों का भंडार, भाषा का जानकार, स्मृतियों का संग्रह, भावी योजनाओं का स्वप्नदर्शी। समाधि में यह चंचल मन शेष नहीं बचता। मात्र चेतना रहती है-भविष्य और भूतकाल से सर्वथारहित। शुद्ध वर्तमान में स्थित चेतना को बस चेतना का ही ज्ञान होता है। अन्य समस्त ज्ञान द्वैत पर आधारित होते हैं। चेतना ज्ञाता होती है और बाहर संसार का या फिर भीतर मन का कोई विषय ज्ञेय होता है। ये 'आब्जेक्टिव नॉलेज' हैं। संबोधि में 'सब्जेक्टिव नॉलेज' होता है। आत्मा केवल स्वयं आत्मा को ही जानती है, किसी अन्य को नहीं। इसलिए उसे अद्वैतज्ञान या कैवल्यज्ञान कहना भी उचित है। यह द्वंद्वरहित अवस्था ध्यान से मिलती है, न कि तन या मन की क्रियाओं से। ध्यान है-क्रियाओं और बुद्धि की सूक्ष्म क्रियाओं को द्रष्टा बनकर देखना,उनके साक्षी होना। ध्यान एकाग्रता नहीं, बल्कि समग्र जागरूकता है। विचारों के प्रवाह को ऐसे देखें, जैसे किसी सड़क से गुजरते लोगों को देख रहे हैं आप। किसी से कुछ लेना-देना नहीं है। न ही अच्छे-बुरे का निर्णय करें। सामने जो विषय है, उसमें रस न लेने के कारण, धीरे-धीरे चेतना पूरी तरह अपने पर ही लौट आती है। महावीर इसे प्रतिक्रमण और पतंजलि इसे प्रत्याहार कहते हैं। मौन, शांत, चुपचाप देखते-देखते आप दूर खड़े द्रष्टा बन जाएंगे। साधना में डूबते-डूबते कालांतर में कामना के सारे बीज नष्ट हो जाते हैं, तब निर्बीज समाधि घटती है। ऐसे ज्ञानी फिर जीवन-मुक्त हो जाते हैं, आवागमन के बंधन से छूट जाते हैं। संबोधि का अर्थ है-बोध का स्वयं में ठहर जाना, ज्ञान की शक्ति का आत्म-रमण। बहिर्मुखता के बंधन से छूटकर, अंतर्मुखता में या अपने स्वभाव में स्थिति। भगवान कृष्ण इसे ही स्थित-प्रज्ञ होना कहते हैं। दुनिया के सभी धर्म सच्चिदानंद की इस दशा को पाना ही मानव-जीवन का परम लक्ष्य बताते हैं। आनंद का यह खजाना बाहर नहीं, हमारे भीतर है। वस्तुत: यह उपलब्धि, कोई नया अन्वेषण नहीं, बल्कि शाश्वत सत्य का अनावरण है।
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लोभ की प्रवृत्ति

लोभ-लालच से आच्छादित मन, मृग-मरीचिका में भटकता रहता है, पर वह दूसरों को नहीं, बल्कि स्वयं को ठगता है। धोखा देने के चक्कर में स्वयं धोखा खाता है। दूसरों को छलने से स्वयं की आत्मा में छाले पड़ जाते हैं और वे रिसते रहते हैं। जहां लालच और लोभ की वृत्ति ज्ञात होने पर स्वजन और मित्रों का स्नेह भंग हो जाता है, वहीं लालच की विसंगति खुलने से स्वयं को भी आत्म-ग्लानि के साथ लच्जित होना पड़ता है। लालची और लोभी व्यक्ति अपने कपट-व्यवहार को कितना ही छिपाये देर-सबेर प्रकट हो ही जाता है। आज का मानव बहुरूपिया बन गया है, उसका स्वभाव जटिलताओं का केंद्र बन गया है। हर किसी के साथ और हर स्थान पर लोभ और लालच से पेश आता है। यहां तक कि भगवान के आगे भी वह अपनी लोभी बुद्धि का कमाल दिखाए बगैर बाज नहीं आता। एक व्यक्ति देवी के मंदिर में जाकर मनौती मांग रहा था, नि:संतान था। इसलिए उसने प्रार्थना की हे देवी! मुझे पुत्र की प्राप्ति हो जाए, मैं सोने की पोशाक चढ़ाऊंगा। कालांतर में पुत्र की प्राप्ति हो गई, उसका लोभ-लालच प्रबल हुआ। उसने बच्चे का नाम ही ‘सोने लाल’ रख लिया। एक कपड़े का टुकड़ा ला ‘झबला’ सिलकर बच्चे को पहनाया। फिर वही देवी को भेंट करते हुए कहा-देवी मां वायदे के अनुसार ‘सोने की पोशाक दे रहा हूं, बच्चे पर कृपा-दृष्टि रखना।’ यह मात्र एक दृष्टांत है, परंतु आज व्यक्ति हर समय, हर क्षण लोभ-लालच में लिप्त है।
कहा जाता है सर्प टेढ़ा-मेढ़ा वक्रता में चलता है, परंतु अपने ‘बिल’ में वह सीधा जाता है, परंतु मानव अपनी वक्रता, कूटनीति कभी नहीं छोड़ता। वह मायाजाल बुनता ही रहता है। धर्मात्मा का नाटक कर दो नंबर में अर्थोपार्जन करना अब सामान्य सी बात है। ऐसे ही व्यक्तियों को ‘बगुला भगत’ कहा गया है। मायाचारी और लोभी बदल-बदल कर छल-कपट के व्यवहार से पाप कमाता है। वह अपनी कुटिलता, छल, कपट, धोखेबाजी से क्षणिक सफलता पा भी ले, परंतु अंततोगत्वा कष्ट ही उठाता है। ऐसे व्यक्ति शंकाशील रहने के कारण भयभीत रहते हैं। वैसे कहावत भी है-काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती। अर्थात मायाचार, लोभ-लालच स्थायी सफलता नहीं दे सकते और जब बेईमानी का भांडा फूटता है, तो अपयश की चिंगारी दूर-दूर तक तपन से झुलसाती है। यह कुटिलता लोक-परलोक दोनों में ही दुखद है।
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Monday, 5 December 2016

जीवन का संघर्ष

सनातन धर्म की कुछ कथाओं की सार्थकता हर युग में पाई जाती है। जैसे राम-रावण युद्ध, महाभारत और सागर मंथन। सागर मंथन हर मनुष्य पूरी जिंदगी करता है। यदि देवताओं की तरह उसके प्रयास और कार्यप्रणाली सत्मार्गी है तो उसे अमृत की प्राप्ति होती है। अन्यथा अनैतिक मार्गों के द्वारा किए मंथन के द्वारा अहंकार रूपी मदिरा प्राप्त होती है, जिसे पीकर वह पतन को प्राप्त होता है। इसी प्रकार राम-रावण युद्ध भी हर समय लड़ा जा रहा है। जो प्राणी सुग्रीव और विभीषण की तरह भगवान के पक्ष में युद्ध करते हैं उन्हें भवसागर को पार करने में विजय प्राप्त होती है और रावण की सेना के राक्षस जीवन मरण रूपी भवसागर में डूबते, उतरते रहते हैं और बार-बार अपने कर्मों के अनुसार निम्नतर योनियों में जन्म लेकर नर्क का दुख भोगते हैं। इसी प्रकार महाभारत की कथा का चित्रण भी किया गया है। गुरुनानक देव के अनुसार केवल मनुष्य ही ऐसा प्राणी है, जिसे बुद्धि और विवेक के अनुसार कर्म करने का अधिकार प्राप्त होता है। जिस प्रकार बुद्धि और विवेक मनुष्य को सत्कर्मों की तरफ प्रेरित करते हैं, उसी प्रकार अंधी इच्छाएं उसे मानसिक व्याधियां प्रदान करती हैं। महाभारत के कथानक के अनुसार धृतराष्ट्र की इच्छाएं अंधी थीं। इन अंधी इच्छाओं से उत्पन्न संतानें भी उसी प्रकार ईष्र्या, लोभ, मोह रूपी पुत्रों-दुर्योधन और दुशासन आदि कहलाती हैं।
बुद्धि और विवेक रूपी पांडव और धृतराष्ट्र और उनके पुत्रों रूपी बुराइयां हर मनुष्य में होती हैं, परंतु कृष्णरूपी अच्छे पथ-प्रदर्शक और मनुष्य की अपनी मेहनत और विवेक के जरिये कुछ जीवनरूपी महाभारत को जीत लेते हैं और शेष लोग अपनी इच्छाओं की पूर्ति करते-करते कौरवों की तरह जीवनरूपी संग्राम में मारे जाते हैं। ज्यादातर लोग अपनी बुराइयों के कारण असफल होने पर कहते हैं कि इस युग में कृष्णरूपी सारथी कहां तलाशें, परंतु ऐसे लोगों को यदि कोई अच्छा पथप्रदर्शक मिलता भी है तो ये उसके दिखाए मार्ग की खिल्ली उड़ाकर उस पर नहीं चलते हैं। भगवान कृष्ण ने दुर्योधन और धृतराष्ट्र को समझाकर सद्मार्ग पर चलने के लिए कहा था उसी प्रकार दुर्योधन ने भगवान का मजाक उड़ाकर उनके दिखाए मार्ग पर चलने से मना कर दिया था।
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