Thursday, 25 June 2026

मृत्‍यु अंत नहीं है लेकिन वह सिर्फ समस्‍त जीवन का चरम बिंदु है, पराकाष्‍ठा है। ऐसा नहीं है कि तुम समाप्‍त हो गए, बल्कि तुम दूसरे शरीर में चले गए। पूर्व के लोग इसी को चक्र कहते है। यह घूमता रहता है, घूमता रहता है। हां, इसको रोका जा सकता है, लेकिन इसको रोकने का उपाय मरते समय नहीं किया जा सकता।
नाना की मृत्‍यु से मैंने सब‍से बड़ा पाठ यहीं सीखा। वे रो रहे थे और आंखों में आंसू भर कर वे हमें चक्र को रोकने के लिए कह रह रहे थे। हमें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें, चक्र को कैसे रोके। अब उनका चक्र तो उनका चक्र था। हमें तो वह दिखाई भी नहीं दे रहा था। यह तो उनकी अपनी चेतना थी और वे ही इसे करा सकते थे। इसलिए उनके आंसू बह रहे थे और उसे रोकने को हमसे बार-बार कह रहे थे। जैसे कि हम ब‍हरे हो, हमने उनसे कहा: ‘नाना आपकी बात को सुन लिया है और हम समझ रहे है। कृपया आप चुप हो जाइए।’

उस क्षण कुछ हुआ, कुछ घटा। मैंने इसके बारे में कभी किसी को कुछ नहीं बताया। शायद इससे पहले समय उपयुक्‍त नहीं था। मैं उनसे कह रहा था, ‘आप चुप हो जाइए।’…उस कच्‍ची ऊबड़-खाबड़ सड़क पर बैलगाड़ी खड़खड़ करती हुई चल रही थी और वे कह रहे थे, राजा, चक्र को रोको, तुम सुन रहे हो। चक्र को रोको।‘

मैं भी उनसे बार-बार कह रहा था, कृपया आप चुप हो जाइए और मैं आपकी सहायता करने की कोशिश करूंगा।

मेरी नानी तो हैरान हो गई। उन्‍होंने अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से आश्‍चर्यचकित होकर मुझे देखा कि मैं क्‍या कह रहा हूं। और मैं कैसे उनकी सहायता कर सकता हैं?

मैंने कहा: ‘इतना हैरान होने की कोई बात नहीं है। अचानक मुझे अपने पिछले एक जीवन की याद आ गई है। इस मृत्‍यु को देख‍ कर मुझे अपनी एक मृत्‍यु की याद आ गई है।’

मेरा वह जन्‍म और मृत्‍यु तिब्‍बत में हुआ था। वही एकमात्र ऐसा देश है जो वैज्ञानिक ढंग से जानता हे कि इस चक्र को कैसे रोका जा सकता है। इसके बाद मैंने कुछ जपना आरंभ कर दिया। न तो मेरी नानी समझ सकी, न मरते हुए नाना और न मेरा नौकर भूरा जो बहार बैठा हुआ बड़े ध्‍यान से सुन रहा था। बारह-तेरह वर्ष के बाद मेरी समझ में आया कि वह क्या था। इतना समय लगा उसको खोजने में। तिब्‍बत के इस कर्मकांड को ‘’बारदो-थोड़ाल’’ कहते है।

तिब्‍बत में जब कोई आदमी मरता है तो वे लोग एक विशेष मंत्र का जाप करते है। उस मंत्र को बारदो कहते है। वह मंत्र  उस मरते हुए आदमी से कहता है, ‘शांत हो जाओ, मौन हो जाओ, अपने केंद्र पर जाओ और वहीं रहो। शरीर को कुछ भी हो, तुम केंद्र से मत हटो। केवल साक्षी बने रहो। जो हो रहा है उसे होने दो, बीच में बाधा मत ड़़ालो। याद रखो, याद रखो, कि तुम केवल साक्षी हो और वही तुम्‍हारा सच्‍चा स्‍वभाव है। अगर उसे याद रखते हुए तुम मरोगे तो यह चक्र रू‍क जाएगा।’

मैंने अपने मरते हुए नाना को बारदो-थोड़ाल का जाप किया, बिना यह जाने कि मैं क्‍या कर रहा हूं। अजीब बात तो यह थी की मैं जब इस मंत्र का जप रहा था तो मेरे नाना इसको सुन कर बिलकुल शांत हो गए। शायद तिब्‍बत भाषा का एक शब्‍द भी इससे पहले न सुना हो । उनको तो शायद यह भी नहीं मालूम था कि तिब्‍बत नाम को कोई देश भी है। मृत्‍यु के समय में भी वे चुप और एकाग्र हो गए। बारदो ने अपना काम किया, हालांकि वे उसे समझ नहीं सके। कभी-कभी वे बातें काम कर देती है जो समझ में नहीं आती, क्‍योंकि तुम उन्‍हें नहीं समझ पाते इसलिए वे काम कर देती है।

Monday, 22 June 2026

मेरी आत्मकथा

सच कहूं तो मुझे अकेले रहना बेहद पसंद है। ये कोई मजबूरी नहीं, कोई असफलता नहीं और न ही किसी से भागने का उपक्रम है। ये मेरी चुनी हुई स्थिति और सहज ज़रूरत है। न किसी से बातचीत, न औपचारिक हालचाल, न बेवजह का मेल-जोल। एक बंद कमरा, कुछ खामोशी, और खुद के साथ रहने का पूरा अधिकार बस इतना ही तो चाहिए मुझे।

इस बंद कमरे में मैं खुद से झूठ नहीं बोलता। बाहर की दुनिया में जहां हर मुस्कान के पीछे कोई भूमिका निभानी पड़ती है, यहां मुझे किसी को प्रभावित नहीं करना होता। यहां न अच्छा दिखने का दबाव है, न समझदार साबित होने की हड़बड़ी। यहां मैं जैसा हूं, वैसा ही रह सकता हूं, थका हुआ, उलझा हुआ, चुप या कभी-कभी बिल्कुल खाली।

अकेलापन मुझे डराता नहीं, बल्कि सुकून देता है। भीड़ में रहकर जो घुटन होती है, वह इस खामोशी में नहीं होती। यहां मेरी सांसें मेरी होती हैं, मेरे विचार बिना रोक-टोक बहते हैं। यहां कोई बीच में टोकता नहीं, कोई सलाह नहीं देता, कोई ये नहीं पूछता कि “ऐसा क्यों सोचते हो?” इस कमरे में मेरे सवाल भी मेरे हैं और उनके जवाब न मिलने की आज़ादी भी।

मुझे लोगों से शिकायत नहीं है, बस उनसे थकान है। हर बातचीत में खुद को थोड़ा-थोड़ा समझौता करते देखना, हर रिश्ते में उम्मीदों का बोझ उठाना ये सब धीरे-धीरे भीतर कुछ तोड़ देता है। अकेले रहने में कम से कम ये डर नहीं रहता कि कोई मुझे गलत समझ लेगा, क्योंकि यहां मुझे समझने वाला और कोई नहीं सिवाय मेरे खुद के।

इस बंद कमरे में समय अलग तरह से चलता है। यहां घड़ी की सुइयां उतनी निर्दयी नहीं लगतीं। कभी घंटों यूं ही बीत जाते हैं, बिना किसी उपलब्धि के, बिना किसी अपराधबोध के, तो कभी खिड़की से आती रौशनी दीवार पर गिरती है और मैं उसे देखते हुए सोचता हूं कि जीवन भी शायद इतना ही साधारण है। आता है, ठहरता है, और फिर चला जाता है।

यहां मैं अपनी कमजोरियों से भागता नहीं। उन्हें चुपचाप सामने बैठा देखता हूं। कभी-कभी वे डराती हैं, कभी हंसाती हैं, और कभी सिर्फ थका देती हैं। लेकिन कम से कम वे सच्ची होती हैं। बाहर की दुनिया में जिन ताकतों का दिखावा करना पड़ता है, उनकी यहां कोई ज़रूरत नहीं।

अकेले रहने का मतलब ये बिल्कुल नहीं कि मुझे किसी की ज़रूरत नहीं। ज़रूरत तो होती है, बहुत होती है। लेकिन हर ज़रूरत को किसी इंसान पर थोप देना भी ठीक नहीं। कुछ खालीपन ऐसे होते हैं जिन्हें बस स्वीकार किया जा सकता है, भरा नहीं जा सकता। ये समझ मुझे इस अकेलेपन ने दी है।

इस कमरे में बैठकर मैं अपने बीते हुए कल से भी मिलता हूं। वे यादें जो लोगों के बीच रहते हुए दब जाती हैं, यहां खुद-ब-खुद सामने आ जाती हैं। कुछ अच्छी, कुछ कड़वी, कुछ अधूरी। मैं उन्हें ठीक करने की कोशिश नहीं करता, बस उन्हें रहने देता हूं। शायद यही परिपक्वता है, हर चीज़ को सुधारने की ज़िद छोड़ देना।

मुझे पता है, बहुत से लोग इसे उदासी कहेंगे, कुछ इसे अवसाद समझेंगे, और कुछ इसे असामाजिकता का नाम देंगे। लेकिन मेरे लिए ये शांति है। एक ऐसी शांति जो बाहर की हंसी-ठहाकों में नहीं मिलती। ये शांति मुझे खुद के करीब ले जाती है, और शायद यही सबसे ईमानदार रिश्ता है खुद के साथ।

मैं जानता हूं कि जीवन यूं ही बंद कमरे में नहीं गुजरेगा। बाहर निकलना पड़ेगा, बोलना पड़ेगा, निभाना पड़ेगा। लेकिन जब भी मौका मिलेगा, मैं फिर इसी खामोशी में लौट आऊंगा। क्योंकि यहीं मैं खुद को बिना किसी शर्त के स्वीकार कर पाता हूं।

और सच कहूं तो इस अकेलेपन में मैं टूटा हुआ नहीं हूं। मैं बस शांत हूं। थोड़ा थका हुआ, थोड़ा समझदार, और बहुत हद तक वास्तविक। यही मेरी डायरी का सबसे सच्चा पन्ना है जहां कोई दर्शक नहीं, कोई जज नहीं, सिर्फ मैं हूं और मेरी खामोशी...! 

Friday, 22 May 2026

कर्म और भाग्य



कर्मवादी कहते हैं कि भाग्य कुछ नहीं होता, जबकि भाग्यवादी कहते हैं कि किस्मत में लिखा ही सब कुछ होता है, भले ही कर्म कुछ भी करते रहो। सच यह है कि भाग्य और कर्म दोनों के बीच एक रिश्ता जरूर है। यानी भाग्य के बगैर कर्म अधूरा है और कर्म के बगैर भाग्य अधूरा है। अब यह बात अलग है कि कर्म से भाग्य बनता है या हम भाग्य से कर्म करते हैं। श्रीराम को वनवास हो चुका है। श्रीराम, सीता और लक्ष्मण, तीनों वन के लिए रवाना हो चुके हैं। राजा दशरथ इस पूरी घटना को भाग्य का लिखा मान रहे हैं, लेकिन श्रीराम के जाने के बाद जब वे कौशल्या के कक्ष में अकेले होते हैं तो उन्हें अपनी गलतियां नजर आने लगती हैं। युवावस्था में जाने-अनजाने श्रवण कुमार की हत्या की थी, बूढ़े मां-बाप से उनका इकलोता सहारा छिन लिया था। यह सब उसी का परिणाम था। जैसी करनी-वैसी भरनी का नियम मनुष्य के कर्म और भाग्य का समीकरण बनाता है। मनुष्य अपने ही कर्मों के कारण सुख-दुख, लाभ-हानि, जन्म-मरण प्राप्त करता है। संक्षेप में कहें, तो भाग्य हमारे कर्मों का वह हिस्सा है, जो हमारे भावी जीवन का निर्माता बनता है और नियंत्रक भी होता है, जबकि कर्म जान-बूझकर किया गया हो या अनजाने में, उसका फल कर्ता को जरूर मिलता है।

कर्म रूपी बीज से ही भाग्य रूपी वृक्ष बनता है। एक गाय दलदल में फंसी हुई थी। एक चोर वहां से गुजरा, लेकिन गाय को उसी हाल में छोड़कर वह आगे बढ़ गया। कुछ दूर चलने पर उसे सोने की मोहरों से भरी थैली मिली। थोड़ी देर बाद एक वृद्ध साधु उसी मार्ग से गुजरा। गाय को दलदल में फंसा देखकर साधु ने उसकी मदद की। साधु ने गाय को बचा लिया, लेकिन साधु आगे बढ़ा तो एक गड्ढेे में गिर गया। नारद ने इस घटना पर भगवान से पूछा, यह कौन-सा न्याय हुआ? भगवान मुस्कराते हुए बोले, नारद यह सही ही हुआ। जो चोर गाय को बचाए बगैर आगे बढ़ गया, उसे इस पाप के कारण केवल कुछ मोहरे ही मिलीं, जबकि उस वृद्ध साधु को गड्ढे में इसलिए गिरना पड़ा, क्योंकि उसके भाग्य में मृत्यु लिखी थी, लेकिन गाय को बचाने के कारण उसके पुण्य बढ़ गए और उसकी मृत्यु एक छोटी-सी चोट में बदल गई।

Tuesday, 12 May 2026

जीवन का संघर्ष

सनातन धर्म की कुछ कथाओं की सार्थकता हर युग में पाई जाती है। जैसे राम-रावण युद्ध, महाभारत और सागर मंथन। सागर मंथन हर मनुष्य पूरी जिंदगी करता है। यदि देवताओं की तरह उसके प्रयास और कार्यप्रणाली सत्मार्गी है तो उसे अमृत की प्राप्ति होती है। अन्यथा अनैतिक मार्गों के द्वारा किए मंथन के द्वारा अहंकार रूपी मदिरा प्राप्त होती है, जिसे पीकर वह पतन को प्राप्त होता है। इसी प्रकार राम-रावण युद्ध भी हर समय लड़ा जा रहा है। जो प्राणी सुग्रीव और विभीषण की तरह भगवान के पक्ष में युद्ध करते हैं उन्हें भवसागर को पार करने में विजय प्राप्त होती है और रावण की सेना के राक्षस जीवन मरण रूपी भवसागर में डूबते, उतरते रहते हैं और बार-बार अपने कर्मों के अनुसार निम्नतर योनियों में जन्म लेकर नर्क का दुख भोगते हैं। इसी प्रकार महाभारत की कथा का चित्रण भी किया गया है। गुरुनानक देव के अनुसार केवल मनुष्य ही ऐसा प्राणी है, जिसे बुद्धि और विवेक के अनुसार कर्म करने का अधिकार प्राप्त होता है। जिस प्रकार बुद्धि और विवेक मनुष्य को सत्कर्मों की तरफ प्रेरित करते हैं, उसी प्रकार अंधी इच्छाएं उसे मानसिक व्याधियां प्रदान करती हैं। महाभारत के कथानक के अनुसार धृतराष्ट्र की इच्छाएं अंधी थीं। इन अंधी इच्छाओं से उत्पन्न संतानें भी उसी प्रकार ईष्र्या, लोभ, मोह रूपी पुत्रों-दुर्योधन और दुशासन आदि कहलाती हैं।
बुद्धि और विवेक रूपी पांडव और धृतराष्ट्र और उनके पुत्रों रूपी बुराइयां हर मनुष्य में होती हैं, परंतु कृष्णरूपी अच्छे पथ-प्रदर्शक और मनुष्य की अपनी मेहनत और विवेक के जरिये कुछ जीवनरूपी महाभारत को जीत लेते हैं और शेष लोग अपनी इच्छाओं की पूर्ति करते-करते कौरवों की तरह जीवनरूपी संग्राम में मारे जाते हैं। ज्यादातर लोग अपनी बुराइयों के कारण असफल होने पर कहते हैं कि इस युग में कृष्णरूपी सारथी कहां तलाशें, परंतु ऐसे लोगों को यदि कोई अच्छा पथप्रदर्शक मिलता भी है तो ये उसके दिखाए मार्ग की खिल्ली उड़ाकर उस पर नहीं चलते हैं। भगवान कृष्ण ने दुर्योधन और धृतराष्ट्र को समझाकर सद्मार्ग पर चलने के लिए कहा था उसी प्रकार दुर्योधन ने भगवान का मजाक उड़ाकर उनके दिखाए मार्ग पर चलने से मना कर दिया था।
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Monday, 27 April 2026

स्वप्न और यथार्थ

जीवन का सूक्ष्म रूप स्वप्न है और स्थूल रूप यथार्थ। जीवन की धारा सूक्ष्म से स्थूल की ओर बढ़ती है। बिना स्वप्न के यथार्थ की सत्ता नहीं हो सकती। इसे इस तरह से भी कह सकते हैं कि विचार करने के बाद उसे कार्य रूप में तब्दील करना स्वप्न से यथार्थ बनने जैसा है। जो जितना बड़ा स्वप्नदर्शी होता है उसके जीवन का उद्देश्य उतना ही बड़ा होता है, लेकिन यह उद्देश्य तब पूरा होता है जब वह यथार्थ में परिवर्तित हो जाता है। स्वप्न और यथार्थ के मध्य जो सेतु का कार्य करता है, वह है साधना। ज्ञान-विज्ञान, गणित, व्यवहार, दर्शन और साहित्य जितने भी विषय हैं सभी स्वप्न और यथार्थ के साथ आगे बढ़ते हैं, लेकिन ये तब पूरा होते हैं जब कठोर श्रम साथ में किया जाए। समझना यह भी है कि बेहतर जिंदगी, बेहतर समाज और उच्च मानव मूल्यों के लिए किस तरह के स्वप्न देखे जाएं और इन्हें किस तरह यथार्थ में परिवर्तित करें। अच्छे शब्दों, अच्छे विचारों वाले वाक्यों और भावों को मन में बार-बार दोहराते रहिए। देखिएगा किस तरह शुभत्व का प्रवाह होने लगता है। कहा गया है जो व्यक्ति जैसा स्वप्न देखता है, फिर उस स्वप्न को साकार करने के लिए जैसा प्रयास करता है वैसा वह यथार्थ में परिवर्तित हो जाता है। यानी स्वप्न और यथार्थ दोनों का बराबर महत्व है।
ब्रह्मा के दो लाड़ले पुत्र हैं। एक स्वप्न और दूसरा यथार्थ। दोनों में लड़ाई हुई। दोनों ब्रह्मा के पास पहुंचे और बोले-भगवन! आज आप निर्णय कर दीजिए कि हम दोनों में से किसकी महिमा अधिक है? ब्रह्मा को बेटों की नादानी पर हंसी आ गई। वह बोले-दोनों जमीन पर खड़े हो जाओ, जमीन पर खड़े-खड़े ही जो आकाश छू लेगा उसकी महिमा सबसे बड़ी है। दोनों परीक्षा देने को तैयार हो गए। स्वप्न ने आकाश तो छू लिया, लेकिन उसके पैर जमीन तक नहीं पहुंच सके। अब यथार्थ की बारी थी। जमीन पर तो वह स्थिर हो गया, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद भी आकाश नहीं छू सका। दोनों को परीक्षा में फेल देख ब्रह्मा हंसे और बोले, 'देख लिया न, तुम दोनों की महिमा एक दूसरे के पूरक होने में है अकेले में नहीं। ' यह कथानक यह संदेश देता है कि हमारे जीवन में स्वप्न और यथार्थ में पूरकता होनी चाहिए। किसी एक से जीवन की सफलता नहीं है।

डॉ सुशील कश्यप 

Friday, 16 January 2026

व्यवहार कुशल

मनुष्य की पहचान उसकी बोलचाल, रहन-सहन और उसके व्यवहार से होती है। मनुष्य अच्छा है या बुरा है, इसके लिए वह कोई सर्टिफिकेट लेकर नहीं घूमता, उसका व्यवहार ही उसके चरित्र का प्रमाण-पत्र है। सच कहूं तो विश्वविद्यालय की पढ़ाई के लिए सर्टिफिकेट की जरूरत पड़ती है, लेकिन जीवन के विश्वविद्यालय में उसका व्यवहार ही प्रमाण-पत्र होता है। इसलिए जो व्यक्ति व्यवहार कुशल होता है, उसके पास जीवन का सबसे बड़ा प्रमाण-पत्र होता है और जो व्यक्ति व्यवहार कुशल नहीं है, जिसे कुछ भी पता नहीं हो कि हमें किससे कैसा व्यवहार करना चाहिए, बड़े-छोटों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए तो वह व्यक्ति मनुष्य दिखता जरूर है, लेकिन वह मनुष्य है ही नहीं। इसलिए जीवन में व्यवहार कुशल होना बहुत ही महत्वपूर्ण है।
व्यवहार कुशल होना एक विज्ञान है, जीवन जीने की विधि है। इसे अभ्यास से सीखा जाता है। उदंड होने में कोई परेशानी नहीं होती। उदंड होना आसान है, सुशील, सज्जन और व्यवहार कुशल होना कठिन है। मां के गर्भ से न तो कोई व्यवहार कुशल होकर आता है और न ही कोई उदंड होकर। सभी लोग सामान्य स्थिति में ही पैदा होते हैं। जिनके घर का वातावरण सुंदर होता है, जिनके घरों में बड़े-छोटों को लिहाज किया जाता है, जिनके घरों में अनैतिक कार्य नहीं होते हैं, उनके ही घरों में बच्चे सुशील, सुंदर और अनुशासन प्रिय होते हैं।
इसलिए बच्चों का चरित्र निर्माण बहुत कुछ उसके घर का वातावरण और दोस्तों की संगत पर निर्भर करता है। व्यवहार कुशल होना सफल जीवन का एक सुखद मार्ग है। जो व्यक्ति व्यवहार कुशल होता है, वह जीवन में कभी असफल नहीं होता, उसके जीवन में पग-पग पर सफलता मिलती रहती है। वह जहां कहीं भी जाता है, अपने व्यवहार से दूसरों को प्रभावित कर लेता है और उससे अपना काम निकाल लेता है। अगर आप किसी को सफल व्यक्ति मानते हैं तो भी मान लेना चाहिए कि निश्चित रूप से वह व्यक्ति दूसरों की अपेक्षा अधिक व्यवहार कुशल है और जो लोग असफल हैं, उनके संबंध में मान लेना चाहिए कि यह व्यक्ति आचरण और व्यवहार से उदंड है या फिर हीन भावना से ग्रस्त हैं और इसे अपनी काबलियत पर भरोसा नहीं है।

Tuesday, 6 January 2026

मन

मन भटकने के तमाम संसाधनों के बीच यह पोस्ट आपको भटकाव से उबारने के लिए है।।
जीवन का आनंद भोग नहीं त्याग में है।
कोई कितना महान है इसका पैमाना है कि वह कितना संयमित है। संयमी ही पराक्रमी होता है। देहबल से शक्तिशाली प्राणबल है।
प्राणबल से शक्तिशाली मनोबल है।
मनोबल से शक्तिशाली बुद्धिबल है।
आत्मबल सबसे अधिक बलशाली होता है।
मध्यकाल में एक एक यौद्धा, एक एक परिवार, भीड़ बनकर आ चुके लुटेरों से लड़ रहे थे।
एक तरफ उत्सर्ग की परंपरा का गौरव था दूसरी तरफ भुक्खड़ और नंगे लुटेरों की सेना थी।
यह भोग और संयम की लड़ाई थी।
शरीरबल से आत्मबल जीत जाता था।
जिनका अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण है, उन्हीं महात्माओं ने संसार को कुछ दिया है।
त्यागपूर्वक भोग ने ही संसार की सुव्यवस्थाओं का नियमन कर रखा है।
ब्रह्मचर्य संयम की ही देन है। मन मारकर मुदित रहना और भोग के संसाधनों से विरक्त रहना आपके मानसिक शांति के मार्ग का अवलम्बन है।
भोगेच्छाओं के दमन का पश्चाताप न करना आपकी सक्रियता को बनाये रखता है। यही सक्रियता सृजन का द्वार है।
यह अकर्मण्यता से दूर रखती है।
परोपकार का संचार करती है।
कृषि और पशुपालन, गौपालन जैसे कुछ व्यवसाय स्वाभाविक रूप से धैर्य और संयम की शिक्षा देते हैं।
मनुष्य को संवेदनशील और परोपकारी बनाते हैं।
स्वयं के अंतःकरण को प्रकृति से जोड़ते हैं और वहाँ से मोक्ष का द्वार, किंवा न्यूनतम अध्यात्म समझने योग्य बुद्धि देते हैं।
यही तो पुरुषार्थ है।
पुरुषार्थ केवल परिश्रमशीलता नहीं है।
पुरुषार्थ मन के दमन की सामर्थ्य है।
पुरुषार्थ इच्छाओं पर नियंत्रण है।
वही संयमी पुरुष पुरूष है बाकी सब तो पशुवत कीड़े मकोड़े का जीवन जी रहे हैं।
भोग और इंद्रियों के पीछे खिंचता मन, विषयों की तरफ बार बार उन्मुख होती वृत्तियां मनुष्य को अंततः तबाह करती हैं।
मन को #कोमलशिशु की तरह धीरे धीरे फुसलाकर साधो।
छोटे छोटे आश्वासन देकर बार बार उसके साथ छल करो।
उसे यह आश्वासन दो कि तेरा सोचा होगा पर अभी नहीं, अभी मुझे यह करने दो।
घनघोर शोक, दुश्चिंता और श्मशान में मन दुर्बल हो जाता है।
वैसी वैराग्य वृत्ति बनाये रखिये।
फिर मन को कहिए, चलो कुछ और करते हैं।
सृजनात्मक बनते हैं।
धन व्यय न करके संचय करते हैं।
स्वयं के लिए नहीं, पुत्र पुत्रियों के लिए। परिवार के लिए। कुटुंब के लिए। क्रमशः विस्तार करो। परोपकार तक ले जाओ।
मन को धन्यवाद दो। तूने साथ दिया। तू साथ था तो यहाँ तक की यात्रा सम्पन्न हुई।
धन्यवाद मन। धन्यवाद शरीर।