Thursday, 11 July 2013

रस्म अदा करने से आतंकवाद पर नियंत्रण नहीं पाया जा सकता, गृहमंत्री जी !

रस्म अदा करने से आतंकवाद पर नियंत्रण नहीं पाया जा सकता, गृहमंत्री जी !
आपके गृहमंत्री बनने के बाद यह तीसरी आतंकी घटना है। प्रत्येक आतंकी घटना के बाद आप रस्म अदायगी के लिए घटनास्थल पर जाते हैं और वही वाक्य दोहरा देते हैं, जो पहले बोले गये थे। मसलन हमारे हाथ महत्वपूर्ण सुराग लगे हैं। हम  शीघ्र उन्हें पकड़ लेंगें। परन्तु अभी मैं आपको डिटेल जानकारी नहीं दूंगा, क्योंकि इससे जांच प्रभावित होती है।
दरअसल, घटना के तुरन्त बाद आप देश को दिखाने के लिए जांच एजेंसियों को सक्रिय कर देते हैं, जो आते ही हवा में तीर चलाना आरम्भ कर देती है। परन्तु आज तक ये जांच एजेंसियां गुनहगारों तक पहुंच नहीं पायी है। इनके तीर ही वे सुराग होते हैं, जो बाद में निरर्थक साबित होते हैं। बोद्धिगया मंदिर के बाहर पर्ची मिली थी, उसमें फोन नम्बर लिखे थे, जिसमें एक किसी विनोद नाम के आदमी का था। बस विनोद नाम का नाम संदिग्ध होते ही। नेताओं की बांछियां खिल गयी। दिग्विजय सिंह जी तपाके से बयान दे दिया, जिसका आशय हिन्दू आतंकवाद से मामले को जोड़ना था। सारा पाप का ढिकरा नरेन्द्र मोदी और अमित शाह पर फोड़ना था। मामले को मोड़ दे दिया गया। मीडिया को चटपटी खबर हाथ लग गयी। अब विनोद को छोड़ दिया गया है। क्योंकि वह संदीग्ध नहीं था, उसे बनाया गया था। जनता का ध्यान बंटाने के लिए यह सब करना जरुरी था। अब दिग्विजय सिंह जी चुप हैं। असली गुनहगार पकड़े जाये, इस बात को ले कर उनके मन में कोई दिलचस्पी नही है। एक पार्टी की घृणित मंशा का यह एक ज्वलन्त उदाहरण है।
आप जानते हैं कि भारतीय नागरिक गरीब, मूर्ख अज्ञानी हैं, उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं रहता कि कहां ब्लास्ट हुआ है और कितने लोग मरे हैं। कहीं वे पढ़ते और सुनते हैं, थोड़ी देर के लिए चर्चा करते हैं और फिर भूल जाते हैं। उनकी स्वयं की इतनी समस्याएं है कि वे बैचारे दुनियां के बारें में कहां सोच पाते हैं। बहरहाल आपकी मजबूरी यह है कि मीडिया घेर लेता है और सवालों की झड़ी लगा देता है, इसलिए कुछ न कुछ तो बोलना ही पड़ता है, ताकि अखबरों में आपके फोटो छप जाय और टीवी पर आपके जलवे दिखा दिये जाय।
परन्तु आपको शायद ध्यान नहीं रहता कि जब आप बोलते हैं तब आपके चेहरे पर मुस्काराहट बिखर जाती है, जो आपके आतंरिक भावों को प्रकट करती है। आपकी मुस्काराहट यह बता देती है कि आप किसी आतंकी घटना को ले कर गम्भीर नहीं हैं। हम भारतीय समझ जाते हैं कि कुछ नहीं होगा। कोई आतंकी पकड़ा नहीं जायेगा। यदि आतंकियों को पकड़ने की कोशिश की जायेगी, तब वे आत्मरक्षा के लिए पुलिस पर हमला कर देंगे। ऐसी परिस्थितियों में पुलिस को बचाव में उन पर गोली चलानी होगी। ऐसा पुलिस नहीं कर सकती। क्योंकि यदि वे मर गये, तो अनर्थ हो जायेगा। हमारे ऊपर कलंक लग जायेगा। हमारी धर्मनिरपेक्ष छवि दागदार हो जायेगी। वोटो के समीकरण घड़बड़ा जायेंगे।  हमारी मेडम की आंखों में आंसू आ जायेंगे। सलमान साहब को उनके घर जा कर माफी मांगनी होगी और कहना होगा-हमसे अनर्थ हो गया। अब ऐसा गुनाह कभी नहीं करेंगे।
दिल्ली में हुई बाटला हाऊस घटना के बाद जितनी भी  आतंकी घटनांए हुई हैं, उसके गनुहगार पकड़े नहीं गये। प्रत्येक घटना के बाद आतंकवादियों को हौंसले बढ़े हैं और पुलिस का मनोबल गिरा है। इशरत जहां केस का बतंगड़ बनाने के बाद आईबी भी अपने बचाव में सर्तक हो गयी है। वह गृहमंत्रालय को सूचना भेज कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर देती है। वास्तव में इस देश की बेबस जनता को भगवान पर ही भरोसा है। वह ही उसको बचा सकता है। सरकार से किसी भी तरह की आशा रखना उसने छोड़ दिया है। यह भगवान का ही चमत्कार है कि बुद्धिगया मंदिर में दस बम फटे,  किन्तु भगवान की कृपा से जनहानि नहीं हुई। आतंकवादियों के इरादे बहुत खतरनाक थे। प्रदेश और केन्द्र सरकार निष्क्रिय थी। भगवान ने ही लोगों को बचाया।
वर्तमान सरकार के पिछले नो वर्षों के कार्यकाल में हुई आतंकी घटनाओं में सैंकड़ो निर्दोष नागरिकों की जान गयी है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी केन्द्र सरकार और भारत के गृहमंत्रालय की है, क्योंकि उन्होने राजधर्म नहीं निभाया। आतंकवाद पर नियंत्रण करने में हददर्जे की निष्क्रियता बरती। परन्तु सरकार को इससे कभी श​िर्मंदगी नहीं महसूस हुई। सरकार के सारे नेता जब भी कोई बात की जाती है, तब गुजरात के 2002 के दंगों की याद दिलाते हैं, ताकि अपने गुनाहों को छुपाने के लिए नरेन्द मोदी को कठघरे में खड़ा रखने का मौका हाथ से नहीं जा पाये। असम दंगों में हजारों नागरिक मारे गये हैं। उसके बारें में हमेशा सही जानकारी देश से छुपायी गयी। असम के समाचारों को अखबारों और टीवी चेनलों की सुर्खिया नहीं बनने दी। असम सरकार के मंत्रियों पर और मुख्यमंत्री पर कोई अपाधिक केस नहीं चल रहे हैं। मानवाधिकार मंव असम में सक्रिय नहीं रहा। वजह साफ है- देश के हिन्दू नागरिक यदि प्रताड़ित किये जाते हैं और हिंसा में मारे जाते हैं, उनके लिए कुछ नहीं बोला जाय, क्योंकि इससे साम्प्रदायिक सदभाव बिगड़ने का खतरा रहता है।
अब तो हालात यह हो गये हैं कि हिन्दुओं को अपने त्यौहार मनाने और धार्मिक परम्पराओं का निर्वाह करने के लिए भी सुरक्षा का सहारा लेना पड़ता है। हर बड़े त्यौहार पर आतंकवादी किसी बड़ी वारदात को अंजाम देने के लिए सक्रिय होते हैं और बहुधा वे अपने मकसद में सफल भी हो जाते हैं। क्योंकि उन्हें इस देश में प्रवेश करने, ठहरने, स्थानीय नागरिकों को आतंकवादी गतिविधियों के लिए उकसाने, उन्हें आवश्यक प्रशिक्षण और आर्थिक मदद देने की छूट मिली हुई है। सरकारी मशीनरी जानबूझ कर आंखें बंद किये रहती है। निश्चय ही, देश भर मे हुई आतंकी घटनाओं में निर्दोष नागरिकों की हत्याएं हुई है, उसका दोषी भारत सकरार  का गृहमंत्राल और गृहमंत्री है, जिन पर गुनहगारों के प्रति नरम रुख अपनाने का प्रथमदृष्टया दोष बनता है। निश्चित रुप से उन पर अपराधिक मुकदमा चलाया जाना चाहिये। साथ ही, असम में नागरिकों की योजनाबद्धरुप से सामूहिक हत्याएं हुई है, उसके लिए असम सरकार के मुख्यमंत्री पर अपराधिक केस दर्ज होना चाहिये। क्योंकि जो नरेन्द्र मोदी ने किया था, वो पाप था, फिर आपने जो किया है, वह पुण्य कैसे हो सकता है?
अत: मेरा भारत के गृहमंत्री से विनम्र आग्रह है कि दूसरों को राजधर्म निभाने की नसीहत देने के पहले स्वयं भी राजधर्म निभायें। हत्यारें यदि निरन्तर अपने घृणित मकसद में कामयाब होते रहते हैं, तो इसका पूरा दोष प्रशासनिक व्यवस्था का होता है। ये घटनाएं इस तथ्य को पुष्ट करती है कि आतंकवादियों से निपटने के लिए सरकार के पास दृढ़ इच्छा शक्ति नहीं है। या वह जानबूझ कर निष्क्रिय बनी हुई है। यदि ऐसा है तो किसी सार्वभौमिक देश के लिए यह दुर्भाग्यजनक स्थिति है। क्योंकि जिस सरकार को अपने नागरिकों के जीवन की रक्षा करने की चिंता नहीं है, उसको शासन करने का नैतिक अधिकार भी नहीं है।
वोटों के लिए एक ही देश के नागरिकों के लिए दोहरामापदंड अपनाना छोड़ दीजिये, क्योंकि कभी पीड़ित जन आपकी नीयत को समझ जायेंगे और एक हो जायेंगे, तब आपके सारे राजनीतिक समीकरण असफल हो जायेंगे। रात-दिन सांम्प्रदायिक शक्तियां का राग अलापना भी बंद कर दीजिये, क्योंकि एक धर्म को मानने वाले नागरिकों के प्रति सहानुभूति रखने वाले साम्प्रदायिक कहलाते हैं, तो वे भी साम्प्रदायिक ही होते हैं, जो वोट पाने के लिए दूसरे धर्म को मानने वाले नागरिकों के रहनुमा बन जाते हैं।