Friday, 16 August 2013

सरकार अपनी उपल​ब्धियों पर जश्न मनायेगी, देश की जनता मातम मनायेगी

 भारतीय इतिहास की सर्वाधिक भ्रष्ट व निकम्मी सरकार अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा पीट कर जश्न मनाने की तैयारी कर रही है। किन्तु अभावों और परे​शानियां से जूझ रही जनता इस सरकार के अस्तित्व में आने के दिन को काला दिवस मानते हुए, मातम मनायेगी। सरकार के चेहरे पर घोटालों की कालिख पुती हुई  है, किन्तु इस पर झूठ और फरेब का लेप लगा कर चमकाने की कोशिश की जायेगी। जनता इस आडम्बर को स्वीकार नहीं करेगी, क्योंकि वह सरकार की असली सूरत देख चुकी है। अब वह उसे पहचानने में धोखा नहीं खायेगी।
अब उन्हें कौन समझाए कि बरबादी पर जश्न नहीं मनाते, आंसू बहाते हैं। एक निकम्मी व निर्लज्ज सरकार जिसकी अंटी में कुछ नहीं है, किन्तु ढोल पीट कर कह रही है- हमारे पास खजाना है। जबकि उसके खाते में नाकामियां ज्यादा और उपलब्धियां कम है। जनता का धन, जनता को ही लूटा कर वाह-वाही बटोरना चाहती है। जनता की ही  एक जेब से धन निकाल कर दूसरी जेब में डाला गया है। सरकारी धन से जितनी लोकलुभावन योजनाओं में पैसा लगाया गया, उसका कुछ भाग भष्टाचार की भेंट भी चढ़ा है। सरकार शाबासी पाने की  हकदार तब बनती, जब उसकी योजनाओं को लागू होने के बाद महंगाई काबू में रहती। सरकार के कार्यकाल में महंगाई ने जो रौद्र रुप धारण किया है, वह उसकी नाकामी की दास्तां बयां कर रही है।
सरकारी धन से जनता को उपकृत करने का मतलब है- उसके एक गाल पर पप्पी दो और महंगाई बढ़ा कर दूसरे गाल पर तमाचा मारो। मनरेगा से एक चुनाव तो जीत लिया, अब उसी बहाने दूसरा चुनाव जीतना सम्भव नहीं लगता। मनरेगा से ग्रामीण क्षेत्र में अस्थायी रोजनगार पैदा किये गये, स्थायी नहीं। यदि गांवों में इसी धन से कुटिर और लघु उद्योगों का जाल बिछाया जाता, तो स्थायी रोजगार उत्पन्न होते। सरकारी धन अनउत्पदाक की जगह उत्पादक बनता। सरकार की खर्चिली योजनाओं के प्रतिकूल प्रभाव से औद्योगिक उत्पादन गिरता गया। नये रोजगार का सृजन नहीं हो पाया। बेरोजगारी बढ़ी।  देश की आर्थिक रफ्तार धीमी पड़ गयी। अर्थव्यवस्था की सेहत, किसी सरकार की सफलता का पैमान होता है। क्या सरकार के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री देश की जनता को समझाने की स्थिति में है कि हमारे कार्यकाल में देश एक आर्थिक ताकत बना है।
पहाड़ सी नाकामियों को ढंक कर, थोड़ी बहुत उपलब्धियों  का बढ़-चढ़ बताने का उपक्रम- इस तथ्य की पष्टि करता है कि सरकार इस देश की जनता को मूर्ख समझती है। झूठ और फरेब का जाल बुन कर उसे ठगना चाहती है। उसके साथ जानबूझ कर छल कर रही है।
क्या देश में सर्वत्र अमन-चेन है? क्या सरकार यह दावा कर सकती है कि जनता सुखी और खुशहाल है। भारत आर्थिक ताकत बन गया है। औद्योगिक उत्पादन निरन्तर बढ़ रहा है।  करोड़ो बेराजगार युवकों को सरकार ने रोजगार मुहैया करवाये हैं। देश भर में अपराध नहीं हो रहे है। अपराधों पर सरकार का अंकुश है। आतंकी घटनाओं पर विराम लग गया है। देश भर में अपने घृणित कारनामों को अंजाम देने में लगे आतंकवादी अब सलाखों के पीछे है। सरकारी कार्यालयों में रिश्वत पर पूर्ण प्रतिबंध लागू हो गया है।  सरकारी कर्मचारी जनता का काम करने में रोड़े नहीं अटकाते, वरन सहयोग करते हैं।
जब कि हक़ीकत यह है कि भारत गरीबी और भ्रष्टाचार में नये कीर्तिमान बना रहा है। इसकी स्थिति दुनियां के अन्य देशों में अग्रणी बनी हुई है। गरीबी और तंगहाली बेबस नागरिकों को आत्महत्याएं करने को बाध्य करती है। महंगाई इतनी अधिक बढ़ गयी है कि देश के अधिकांश बच्चे दूध पीने के लिए मोहताज हो गये हैं। महंगाई से भूखमरी बढ़ रही है। खाद्य पदार्थ और आवश्यक उपभोग की वस्तुएं आम आदमी की पहुंच से बाहर जा रही है। किन्तु वास्तविकता से अनजान, हमेशा हवा में तेरने वाले और अपनी विदेश यात्राओं पर करोड़ो फूंकने वाले  सरकार के आर्थिक विशेषज्ञ, मांटोकसिंह कहते हैं- भारत के लोग ज्यादा खातें है, इसलिए महंगाई बढ़ रही है। जब सरकार की डोर ऐसे अर्थशास्त्री के हाथों में हो, तो उनसे अपेक्षा ही क्या की जा सकती है।
देश की दुर्दशा के लिए उसके आर्थिक घोटालों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। इन घोटालों के परिणामस्वरुप राजस्व घटा और राजकोषीय घाटा बढ़ा। फलत: महंगाई अनियंत्रित हो गयी। कोयला घाटाले से अधिकांश बिजली परियोजनाएं पूर्ण नहीं हो पायी। वही बिजली उद्योगों को  पर्याप्त कोयला नहीं मिलने से उनके उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। औद्योगिक उत्पादन गिर रहा है और देश भयानक बिजली संकट से जूझ रहा है। वहीं महाराष्ट्र के सिंचाई घोटालें के कारण जनता बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रही है। महराष्ट्र का अभूतपूर्व जलसंकट सरकारी भ्रष्टाचार का उत्कृष्ट उदाहरण है।
देश की आंतरिक सुरक्षा संतोषजनक नहीं है। देश भर में अपराध बढ़ रहे हैं। अपराधियों को सरंक्षण मिला हुआ है और अपराधों को रोकने में पुलिस की संदीग्ध भूमिका बनी हुई है। आतंकी घटनाएं रुक नहीं रही है। देश आंतकियों के लिए स्वच्छन्द अभयारण्य बन गया है। जब चाहें इस देश में आ सकते हैं और जब चाहे यहां से जा सकते हैं।  देश में कहीं भी बैठ कर आतंकवादी अपनी घ्रणित योजनाओं को अंजाम देने में लगे हुए हैं। वे आराम से कही पर भी बम विस्फोट कर के भाग सकते हैं। पुलिस उन्हें पकड़ नहीं पाती। कुछ दिनों तक हवा में तीर चलाती है। फिर सो जाती है। अगला बम विस्फोट होने के बाद पुलिस और सरकार फिर जाग कर बयान बाजी करने लगती है।
हमारी लच्चर विदेश नीति के कारण चीन ने हमे कूटनीति में मात दे दी। अपने स्वार्थ साध लिए। हम उसके समक्ष नतमस्तक होने के अलावा कुछ नहीं कर पाये। पाकिस्तान हमेशा अपनी करतूतों से चिढ़ाता ही है और हमारी सरकार उसके सामने मिमियाने के अलावा कुछ नहीं कर पाती। छोटे-छोटे पड़ोसी देश भी हमें कोई अहमियत नहीं देते।
सरकार की नाकामियां बहुत है। अब क्या-क्या गिनाये। हम सब उसकी नाकामियों से अच्छी तरह परिचित है। फिर भी अपनी उपलब्धियों को गिनाना  उसका अधिकार है। उसके पास सूचना प्रसारण मंत्रालय है। दबा हुआ, बिका हुआ- लालची मीडिया है। सरकार द्वारा खरीदे गये आर्थिक विशेषज्ञ और लेखक है। सरकार के पास अधिकार है। अपनी छवि को सुन्दर और चमकदार बनाने के लिए कुछ भी कर सकती है। परन्तु यह आवश्यक नहीं कि सरकार जो कुछ दिखाये और समझाये,  जनता अपने विवेक का उपयोग किये बिना ही उसे स्वीकार कर लें।