Friday, 30 August 2013

आओ, हम सब मिल कर नये भारत का निमार्ण करें !

वह आडम्बर युक्त भारत निमार्ण नहीं, जो अखबारी कागजो में चमक रहा है। टीवी पर्दे पर चहक रहा है। झूठ को महिमामंडि़त कर के व्यापक रुप से प्रचारित किया जा रहा है। अपने पापों को धोने के लिए छल व प्रपंच का सहारा लिया जा रहा है। इस भारत निमार्ण का घृणित मकसद स्पष्ट है-जनता से वोट चाहिये। सत्ता चाहिये। राजस्व और प्राकृतिक संसाधनों को लूटने का मौका चाहिये।
किन्तु हमारा उद्धेश्य  पवित्र है। हमें ऐसा नया भारत चाहिये, जो निर्धनता, अशिक्षा, असमानता के श्राप से मुक्ति पा, नैराश्य के अंधकार को चीर कर समृद्धि के आलोक से जगमगा उठे। विकास के ऊंचे पायदानों पर चढ़ने के लिए व्यग्र हो उठे। विश्वमंच पर सम्मानित स्थान पा सके।
नये भारत का निमार्ण असम्भव नहीं है। हम अपनी सम्मिलित शक्ति व दृढ़संकल्प से सारी बाधाओं को पार कर लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं। क्योंकि हमारे पास विपुल मानवीय श्रम व प्राकृतिक संपदा है। जीवट ऊर्जा की धनी, विश्व में अपनी मेघा का परचम लहराने वाली युवाशक्ति है। जीवन के हर क्षेत्र में अपनी कुशलता व कर्मठता की छाप छोड़ने वाले भारतीय नागरिक है। अपनी उद्यमशीलता से विश्व विजय को आतुर उद्यमी है।
परन्तु हम पिछड़े, निर्धन, अभावग्रस्त इसलिए हैं, क्योंकि हमारा राजनीतिक वातावरण विषाक्त है। विषाणुओं ने लोकतंत्र को रुग्ण बना दिया है, जिससे हमें कुशल व सक्षम नेतृत्व नहीं मिल रहा है। निष्ठावान व समर्पित राजनीतिक नेत्त्व के अभाव के कारण भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी औपनिवेशिक प्रशासनिक व्यवस्था को बदल नहीं पाये हैं। नये भारत के निमार्ण में सब से बड़ा अवरोध यही है।
रुग्ण भारतीय लोकतंत्र मृत्यु शैया पर पड़ा है और उसके सिरहाने खड़ा दैत्याकार भ्रष्टतंत्र अपने आपको वास्तविक लोकतंत्र घोषित कर रहा है। हमे भ्रष्टतंत्र की विकरालता का आभास है। हम इसके स्वरुप को देख कर क्रुध भी हैं। किन्तु असहाय है। क्योंकि हमने अपने आपको पूर्णतया उन राजनेताओं का पराधिन बना दिया है, जो भ्रष्टतंत्र के पुरोधा है। जिन्होंने इसे पल्लवित और पोषित कर ऐसा विकराल रुप दिया हैं। यह हमारा दुर्भाग्य है। हमारी सभी समस्याओं की जड़ यही है।
नये भारत के निमार्ण का पहला चरण होगा- उन विषाणुओ के प्रतिरोध की औषधि के लिए शोध करना, जिन्होंने भारतीय लोकतंत्र को रुग्ण बना रखा है। रोगमुक्त स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था से ही भ्रष्टाचार के दैत्य से मुकाबला किया जा सकता है। विषाणुओं की प्रतिरोधात्मक औषधि का प्रयास तभी सफल होगा, जब हम भारतीय नागरिक यह सुनिश्चित कर ले कि सार्वजनिक जीवन में किस व्यक्ति को प्रवेश दिया जाय और किसका प्रवेश निषेध किया जाय।
सार्वजनिक जीवन में किसे रहना चाहिये, उसका निर्धारण भारत की जनता करेगी, राजनीतिक दल नहीं। इसी तरह कौन व्यक्ति जनप्रतिनिधि बनने के लिए उपयुक्त है, उसका मापदंड़ जनता करेगी, राजनीतिक दल नहीं। हम उन्हें ही चुनेंगे, जो जनता द्वारा निर्धारित किये गये मापदंड़ पूरा करेंगे। जनता राजनीतिक दलों को सही प्रत्यासी घोषित करने के लिए बाध्य कर सकती है। यह तभी सम्भव है जब जनमानस को संगठित किया जाय। उन्हें लोकतांत्रिक अधिकारों के उपयोग के लिए जागृत किया जाय। उन्हें समझाया जा सकता है कि सार्वजनिक जीवन में अतिचालाक, धूर्त, निकृष्टतम चारित्रिक विशेषताओं वाले व्यक्तियों के प्रवेश से हमारे जीवन पर क्या कलुषित प्रभाव पड़ा है। जो धनार्जन का घृणित उद्धेश्य  ले कर सार्वजनिक जीवन में आते हैं, वे पूरी व्यवस्था को बिगाड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे हैं। इस समय भारत के सभी राजनीतिक दलों में इस तरह के व्यक्तियों का बाहुल्य है।
नये भारत निमार्ण का यह सर्वाधिक कठिन चरण है। रुग्णलोकतंत्र के उपचार की औषधि खोजने का भी यह सबसे कठिन प्रयास है। इस समय जो व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में छाये हुए हैं, वे काफी शक्तिशाली हैं। बाहुबल और धन के प्रभाव से भारतीय राजनीति को इन्होंने अपने नियंत्रण में ले रखा है। सार्वजनिक जीवन से उनका प्रवेश निषेध अत्यधिक दुष्कर कार्य है। किन्तु यदि ऐसा सम्भव हो पाया तो भारत के अधिकांश राजनीतिक दलों का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा। यह भारतीय जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों की सबसे बड़ी जीत होगी।
यदि भारतीय जनता संगठित हो जाय, तो इस मुशिकल काम को सरल बनाया जा सकता है। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे शक्तिशाली जनमत ही होता है। यदि वह अपनी शक्ति पहचान लें, तो नये भारत निमार्ण की सभी बाधाओं को पार किया जा सकता है। किन्तु यक्ष प्रश्न यह है कि जनमत कैसे संगठित किया जाय ? कैसे उन्हें राजनीतिक दलों के अवलम्बन से मुक्त कराया जाय ?
इस गुरुतर कार्य के लिए भारतीय युवाओं को जिम्मेदारी ओढ़नी होगी। जिन भारतीयों ने अपनी आधी या दो तिहाई जिंदगी गुजार ली, वे तो इस व्यवस्था का भार ढो़ते-ढ़ोते टूट चुके हैं। किन्तु जो युवा है उन्हें अपना पूरा जीवन इस व्यवस्था के आगे समर्पित नहीं करना है। कुछ प्रलोभन पा कर पूरी जिंदगी बिताना असम्भव है। हमे स्थायी रोजगार चाहिये। सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार चाहिये। यह तभी सम्भव है जब एक ईमानदार, सुसंस्कृत, सुव्यवस्थित, समर्पित व जवाबदेय शासन व्यवस्था का अस्तित्व सम्भव हो पाये।
सार्वजनिक जीवन में वे ही व्यक्ति रहने चाहिये, जो अपना जीवन समाज को समर्पित करने का वचन दें। जिनके म न में शासन का नहीं सेवा का भाव हो। सार्वजनिक जीवन में आने के बाद उनकी निजता समाप्त करने की घोषणा कर दें। उनका चरित्र श्रेष्ठ हो। जो संसार में सन्यासी बन कर रहें, अर्थात जिन्होंने अपनी क्षुद्र मानवीय दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त कर ली हो। जिनके मन में सेवा के प्रतिकार में कुछ भी पाने की लालसा नहीं हों। वे सारी निजी सम्पति का परित्याग कर दें या सार्वजनिक जीवन में आने के पूर्व अपने संबंधियों के नाम कर दें। साथ ही, अपने परिवार की सम्मिलित संपति की सार्वजनिक घोषणा कर दें।
एक विधानसभा एंव लोकसभा क्षेत्र की अनुमानित जनसंख्या क्रमशः चार से पंद्रह लाख तक होती है। भारतीय समाज में इतनी जनसंख्या में चार-पांच तपस्वी व्यक्ति ढूंढ़ना असम्भव नहीं है। किन्तु ऐसे व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में आयेंगे नहीं, क्योंकि भारत का कोई भी राजनीतिक दल उन्हें प्रवेश नहीं देगा । यदि आ भी गये तो चुनाव जीत कर जनप्रतिनिधि नहीं बन सकते।
परन्तु भारत के युवा यदि यह सोच लें कि वे ऐसे व्यक्तियों का मार्ग प्रशस्त करेंगे, तो यह कार्य सुगम बन सकता है। युवाओं को पहले अपने आस-पास ही रह रहे ऐसे व्यक्तित्व को ढूंढना होगा। राजनीतिक दलों को बाध्य करना होगा कि वे इन्हें अपना प्रत्यासी घोषित करें। इन व्यक्तियों का प्रचार युवाओं को स्वयं करना होगा। अपने घर, मोहल्ले, गांव या शहर के प्रत्येक व्यक्ति को राजनीतिक व्यवस्था को सुधारने के लिए प्रोत्साहित करना होगा।