Wednesday, 28 August 2013

जागिये, मनमोहन जी ! भारतीय अर्थव्यवस्था का जहाज डूब रहा है

जागिये, मनमोहन जी ! भारतीय अर्थव्यवस्था का जहाज डूब रहा है
मनमोहन जी ! यह क्या हो रहा है ? आप तो अर्थव्यवस्था के अच्छे नाविक है, फिर भारतीय अर्थव्यवस्था का जहाज क्यो डूब रहा है ? हम कब से आपको जगा रहे हैं, फिर भी आपकी नींद ही नहीं टूट रही है। हर बार आप उनींदे रहते हैं और उबासी लेते हुए एक ही जवाब देते हैं -‘ घबराने की कोई बात नहीं है। स्थिति में जल्दी ही सुधार हो जायेगा।’ परन्तु सुधार होगा कैसे? यह बात आप आज तक नहीं समझा पाये। शायद आपको इस बात का अहसास है कि सुधार होने की सम्भावना नज़र नहीं आती। अब घर में रखी पूंजी अपने ही लोगो ने चुरा ली हो। घर में पैसे की आवक घट गयी हो। खर्चे बढ़ गये हो और कमाई घट गयी हो तो हालत सुधरेंगे ही नहीं।
आप लाचार है। आप कुछ कर भी नहीं सकते। एक अनुबंध के तहत आपको काम करना पड़ रहा है। अनुबन्ध की अवधि खत्म होने तक आपको ज्यों त्यों समय गुजारना है। आपका अनुबंध खत्म होने के बाद भले ही भारतीय अर्थव्यवस्था का जहाज डूब जाय, आपको क्या फर्क पड़ने वाला है। आपने अपना अच्छा समय निकाल लिया। अर्थशास्त्री से राजनेता बन गये। भारत के वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री बन गये। जो कुछ भाग्य से मिला है, उसे पा कर आप गद गद है।
परन्तु जहाज में पानी बढ़ता जा रहा है। पूरा देश चिंतित है, किन्तु आप निश्चिंत  हो कर नींद निकाल रहे है। क्या आप अगले चुनाव की घोषणा तक सोये ही रहेंगे ? आप शायद अर्थशास्त्र भूल रहे हैं या जानबूझ कर भुलने की कोशिश कर रहे हैं। आपको मालूम है अर्थव्यवस्था की हालत खराब हाने से इसका कहां-कहां प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। जनता के कष्ट बढ़ जायेंगे। आपकी सरकार नागरिकों को गेहूं तो खिला देगी, परन्तु जीवन गुजारने के लिए आवश्यक वस्तुएं खरीदने का मोहताज बना देगी। भाव इतने बढ़ जायेंगे कि सामान्य भारतीय नागरिक छोटी-छोटी चीजो का मोहताज हो जायेगा, क्योंकि ये सभी उसकी पहुंच के बाहर चली जायेगी।
खाद्य सुरक्षा बिल पास होने के बाद आपके सहयोगी मोंटेग सिंह जी भारत की गरीबी के आंकड़े बदल देंगें, क्योंकि दो रुपये किलो अनाज उपलब्ध हो जाने के बाद भारत मे कोई गरीब रहेगा ही नहीं। मोंटेक सिंह जी कहेंगे- भारत की अर्थव्यवस्था खराब होने से क्या फर्क पड़ता है। भारत में अब कोई भूखा नहीं सोयेगा। जो भारतीय, सरकार द्वारा उपलब्ध कराया गया अनाज दो रुपये किलों में खरीदने की क्षमता जुटा लेगा, वह गरीब नहीं माना जायेगा। वे कहेंगे-‘ दाल, सब्जी खाना कोई आवश्यक नहीं है। दूध,दही,घी की भी कोई जरुरत नहीं है। गेहूं खा लो, इसमें पर्याप्त प्रोटीन होता है, जो भूख से नहीं मरने देगा और कुपोषण को भी खत्म कर देगा।
अर्थव्यवस्था का जहाज तो पहले ही डूब रहा था, परन्तु खाद्य सुरक्षा बिल के चक्रपात ने चिंताएं और बढ़ा दी है। रुपया छलांगे लगाने लगा और शेयर बाज़ार गोते लगाने लगा। पहली बार भारत की जनता ने सौम्य वित्तमंत्री के चेहरे पर मुस्कान की जगह घबराहट देखी। वे देश की जनता को ढाढस बंधा रहे थे, किन्तु आवाज़ में पहले जैसा आत्मविश्वास  नदारद था। बहरहाल रुपया और कमज़ोर होगा। डिजल के भाव बढे़गे। जनता की जेबे कटेगी। जनता गम के आंसू बहायेगी। मीडिया भारत निमार्ण के गीत गायेगा। देश चाहे बर्बाद हो जाये। भारतीय अर्थव्यवस्था रसातल में चली जायें, परन्तु भारत निर्माण के गीत सुनों और वोट दों।
परन्तु मनमोहन सिंह जी जाते जाते अपनी पार्टी को नसीहत दे सकते थे कि डूबते हुए जहाज को बचाना हमारी पहली प्राथमिकता होनी चाहिये। खाद्य सुरक्षा जैसी नीतियों का अतिरिक्त भार इस जहाज पर डालने से इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। पर वे कुछ कह नहीं पाये। सदा की तरह अपने भीतर की आवाज को दबाने में सफल रहें और बेखबर हो कर नींद निकालने लगे। इसके अलावा वे कर भी क्या सकते हैं।
पर वित्तमंत्री के साहस को दाद देनी होगी। वे फिर कहने लगे- उभरती हुई अर्थव्यवस्था में ऐसा दौर आता है। घबरायें नहीं, रुपया अपनी वास्तविक स्थिति में आ जायेगा। अब हम यह कैसे माने कि हमारी अर्थव्यवस्था उभरती हुई है या डूबती हुई है। आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपया -कंगाली का सूचक है या खुशहाली का यह तो वे ही अच्छी तरह समझा सकते हैं।
राजस्व घट रहा है। औद्योगिक उत्पादन घटता जा रहा है। अर्थात आमदनी घट रही है। आयात बढ़ रहा है और निर्यात घट रहा है। अर्थात खर्चे बढ़ रहे हैं। कमजोर रुपया हैसियत घटा रहा है। पास में पैसा है नहीं और खर्चो पर नियंत्रण कर नहीं पा रहे हैं। कर्जदारी का भार बढ़ता जा रहा है। फिर हम यह कैसे कह सकते हैं कि हम समृद्धि की ओर बढ़ रहे हैं, इसलिए ऐसा होना सम्भव है। जबकि हक़ीकत यह है कि घोटालों के कारण हमारी अर्थव्यवस्था कंगाली के कगार पर पहुंच गयी है। जिस अर्थशास्त्र के निष्णात  नाविक के हाथ में देश की बागड़ोर थी, वे सब कुछ जानते और समझते हुए भी नींद निकाल रहे थे। सम्भवतः इसलिए भारतीय अर्थव्यव्था का बंढाढार हो रहा है। चुनाव होने तक और नयी सरकार के अस्तित्व में आने तक यह सब कुछ चलता रहेगा।
परन्तु देश की आर्थिक हालत को बरबाद कर जो वोट पाने की आशाएं संजोयें हुए हैं, उनकी आशाओं पर तुषारापात होगा। खाद्य सुरक्षा बिल लागू होने के बाद यह नीति के क्रियान्वयन के लिए भ्रष्ट  और अकर्मण्य नौकरषाही के हाथों में आयेगा और सार्वजनिक धन की व्यापक बरबादी का आधार बनेगा।
सरकार की प्रत्येक नीति का भार तो भारत की जनता को ही ढ़ोना है। जनता के नसीब में आंसू ही लिखे हैं, जिन्हें टपकाती रहेगी और भारत निमार्ण के गीत सुनती रहेगी। वह यह भी तो नहीं कह सकती । यह बकवास बंद कर दो। गम में खुशी के गीत नहीं गाये जाते।  बर्बादी पर जश्न  नहीं मनाया जाता।