Friday, 23 August 2013

भारतीय जनता की सहनशक्ति अब जवाब दे रही है

यह देश भगवान भरोसे चल रहा है। कुछ भी ठीक-ठाक नहीं है। सब कुछ अस्तव्यस्त है। चारों ओर गड़-बड़ है। देश के हालात अत्यधिक विकट और जनता के लिए बेहद कष्टदायक बन गये हैं, परन्तु जनता आक्रोशित हो कर भी हालात से समझौता कर रही है। उसकी सब्र का बांध फूटना चाहता है, किन्तु किसी चमत्कार से ही रुक हुआ है। हांलाकि उसकी सहनशक्ति अब जवाब दे चुकी है।
देश में एक सरकार का अस्तित्व है। सरकार का मुखिया मौन है। अपने भाग्य व ईश्वर  कृपा से वे प्रफुलित हैं। देश व जनता की उन्हें कभी चिंता नहीं रही। वे शरीर से राजनेता और मन से नौकरशाह ही बने रहे। राजनीति में अनाड़ी खिलाड़ी को दस बार लालकिले से झंड़ा फहराने का मौका मिल गया, यह किसी चमत्कार से कम नहीं है। अरबों रुपये की धन संपदा एकत्रित कर चुके उनके सहयोगी अगला चुनाव जीतने की रणनीति में उलझे हुए हैं। शासन चलाने की फुर्सत किसी के पास नहीं है। पूरे देश को भ्रष्ट  व अकर्मण्य नौकरशाही के हवाले कर रखा है। किसी गम्भीर प्राकृतिक आपदा या बड़ी आकस्मिक घटना के दौरान नौकराशाही जागती है। फिर अपने आकाओं को जगाती है। उतराखंड तीन दिन तक भयावह प्राकृतिक आपदा में फंसा रहा। हज़ारों नागरिकों का जीवन संकट में पड़ गया। टीवी चेनलों के हाहाकार को सुन कर नौकरशाही की तंद्रा टूटी। तब तक हज़ारों जिंदगिया काल कलवित हो चुकी थी।
चीन की दादागिरी सभी सीमाएं पार कर चुकी है। पाकिस्तान अपनी करतूतों से बाज नहीं आ रहा है, किन्तु सरकार पर पड़ोसी की किसी भी चुनौती और हरकत का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। जनता क्रुध हो जाती है। किन्तु सरकार चुप्पी साधे रहती है। देश में मीडिया यदि प्रभावी भूमिका नहीं अदा करता, तो भारत की जनता बड़ी-बड़ी घटनाओं से अनजान ही बनी रहती।
मुद्रास्फिति, महंगाई, राजकोषीय घाटा, रुपये की निरन्तर गिरती सेहत और बढ़ता निर्यात बजट, सिकुड़ता विदेशी मुद्रा भंड़ार, गिरता औद्योगिक उत्पादन, बढ़ती बैरोजगारी देश की अर्थव्यवस्था की एक विद्रुप तस्वीर पेश कर रही है। किन्तु सरकार बिगडे़ आर्थिक हालात पर पलीता लगाने के लिए सरकारी खजाने को खाली करने पर तुली हुई है। चुनाव जीतने के लिए जनता में लाखों करोड़ रुपये की खैरात बांटी जा रही है। देश चाहे बरबाद हो जाय। जनता महंगाई और अभावों के बोझ के तले दब कर तड़फ-तड़फ कर अपने प्राण त्याग दें, पर सरकार को इसकी कोई चिंता नहीं है। उसे चिंता सिर्फ इस बात की है कि कैसे चुनाव जीता जाय और कैसे अगली सरकार बनायी जाय।
दरअसल देश की राजनीति भारतीय जनता की सहनशीलता की परीक्षा ले रही है। अधिकांश भारतीयों की भोजन की थाली से भोज्य पदार्थ धीरे-धीरे लुप्त हो रहे हैं। सब्जी, दाल, तेल, मसाले, चीनी सब अब विलासिता की वस्तुए बनती जा रही हैं। अलबता घी, दूध, दही तो बहुत पहले ही अधिकांश भारतीयों के बजट में नहीं समा रहा है। देश की एक चैथाई आबादी को भरपेट भोजन नहीं मिलता। बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। वे सूखी रोटी को बिना सब्जी और दाल के पानी के साथ गटकने की आदत डाल रहे हैं।
जो भारतीय नागरिक पेट भरने में सक्षम हैं, किन्तु स्वास्थय और बच्चों की शिक्षा का खर्च से परेशान है। पेट्रोल -डिजल और रसोई गेस की कीमते डेढ़ी से दो गुणी हो गयी। अब भी इनमे विराम लगने की सम्भावना नहीं है। कहीं भी जाने पर अब सिर चकराने लगता हैं, क्योंकि आटों और बसों का किराया बहुत अधिक बढ़ गया है। महंगाई ने भारतीय जन को इस तरह व्यथीत कर दिया है कि गरीब भी रो रहा है। साधन-सम्पन्न भी रो रहा है। चारों ओर असंतोष का ज्वार उफन रहा है। परन्तु भारत सरकार जनता की इस पीड़ा में भी अपने नफे-नुकसान का आंकलन कर रही है।
प्रश्न  उठता है फिर यह देश  कैसे चल रहा है? सर्वथा प्रतिकूल परिस्थितियों में इस देश को कौन चला रहा है? इस देश को सरकारें नहीं, प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, सहनशील नागरिक चला रहे हैं। नागरिकों ने अपने सब्र के बांध को फूटने से रोक रखा है। यदि वह कभी फूट गया तो कोई भी सरकार इसको सम्भाल नहीं पायेगी। कोई और देश होता तो ऐसी परिस्थितियों में खूनी क्रांति हो जाती, किन्तु भारत की जनता की महानता है कि वह अन्याय को सहती जा रही है।
किन्तु अब भारत की जनता भर गयी है। अन्याय को सहने की भी एक सीमा होती है। सरकार के निकम्मेपन का इससे अच्छा उदाहरण क्या हो सकता है कि पिछले साल से मात्र पांच प्रतिशत प्याज की फसल कम हुई है, किन्तु कीमते पिछले वर्ष की तुलना में तीन से चार गुणा बढ़ गयी। चारों तरफ प्याज की कीमतों को ले कर त्राहि-त्राहि मच रही है, किन्तु सरकार जमाखोरों पर कार्यवाही करने से हिचकिचा रही है।
परन्तु सब से आश्चर्य की बात यह है कि कुशासन और भ्रष्टाचार में कीर्तिमान स्थापित कर चुका एक राजनीति दल फिर चुनाव जीतने के सपने संजो रहा है। उसके नेताओं को भरोसा है कि भारत की जनता उसके शरण में ही आयेगी। चाहे लाख दुःख भारतीय जनता को इस सरकार ने बांटें होंगे, किन्तु जनता उसे ही चुनेगी। इस खुश फहमी के तीन कारण है- एक:चुनावों में धन खर्च करने की अपूर्व क्षमता दोः अशिक्षित व गरीब जनता में खैरात बांट कर उनके वोट एनकेस करना। तीनः मुस्लिम तुष्टिकरण।
किन्तु यह खुशफहमी शीघ्र ही काफूर हो जायेगी, क्योंकि पूरे देश की जनता में व्यापक असंतोष है। खैरात बांटने का प्रतिकूल प्रभाव पड़ने वाला है, क्योंकि गांव की पिचहतर प्रतिशत जनता को दो रुपये किलों गेहूं दिया जायेगा, जबकि गांव के किसान तो स्वयं गेहूं पैदा करते हैं। भारतीय किसान बीस रुपये किलों में सरकार को गेहूं बेचेगा और सरकार से वापस दो रुपये किलों में गेहूं खरीदेगा। यह पूर्णतय हास्यास्पद स्थिति होगी। सरकारी धन के अपव्यय का अनूठा उदाहरण बनेगा। चाहे सरकार पिचयासी करोड़ जनता को दो रुपये किलों बांटे, उसे जनता के वोट नहीं मिलेंगे।
भारतीय जनमानस बाहर से शांत दिखाई दे रहा है, किन्तु भीतर से भरा हुआ है। मतदान के दौरान उसके असंतोष का विस्फोटक होगा। जब चुनाव परिणाम आयेंगे, तब मालूम पड़ेगा जनता के साथ छल करने के क्या दुष्परिणाम होते हैं।