Thursday, 22 August 2013

उन्हें भारत निमार्ण का हक है, किन्तु भारत की बरबादी का हक कौन ले रहा है ?

गम में जब आंसू बहते हैं, खुशी के गीत नहीं गाये जाते । मातमी धुन बजायी जाती है, फुलझडि़या नहीं छोड़ी जाती। विकट परिस्थितियों में संघर्ष  करने के लिए हौंसला बढ़ाया जाता है, ढ़ोल बजा कर नृत्य नहीं किया जाता । जब आग लग रही हो, तब उसको बुझाने के उपाय सोचे जाते हैं, आग के समीप खड़े रह कर ढंड़ नहीं उड़ायी जाती।
देश भयानक आर्थिक संकट में फंस गया है। स्थिति दिन प्रति दिन विकट होती जा रही है। यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो यह दुष्चक्र करोड़ो जिंदगियों को तबाह कर देगा। महंगाई ने पहले से भारत की जनता की कमर तोड़ दी है, किन्तु और अधिक भार डाला जायेगा, तो वह सहन नहीं कर पायेगी। इतने भारी भरकम बोझ के नीचे दब कर मर जायेगी। परन्तु बोझ डाला जाना लगभग तय माना जा रहा है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं की रुपया सतक लगा दें, और पेट्रोल उसके पहले ही सैंकड़ा जड़ दें। इस आसन्न संकट को झेलने के लिए भारत की जनता अब तैयार नहीं है।
किन्तु भारत सरकार निश्चिंत है। इस संकट में भारत निमार्ण के गीत गा रही है।
देश आर्थिक संकट में फंसा है। ऐसे समय में जब एक-एक पैसा सोच समझ कर खर्च करना चाहिये, किन्तु विज्ञापनबाजी पर करोड़ो लुटायें जा रहे हैं। प्रत्येक टीवी चेनल पर हर पांच मिनिट में एक गीत बज रहा है- ‘भारत निमार्ण का हक है मेरा’। देश भर के सभी समाचार पत्रों में बड़े-बड़े विज्ञापनों में सरकार की उपलब्धियों के गीत गाये जा रहे हैं। विषेशकर उन प्रदेशों मे जहां कांग्रेस की सरकारे है और विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, वहां सरकारी खजाने के पैसों से विज्ञापनो की बाढ आ गयी है। अगर यही सिलसिला कुछ महीनों तक चलता रहा, तो अरबो रुपये खर्च हो जायेंगे । सरकार का एक ही ध्येय है- किसी भी तरह अगला चुनाव जीतना है। देश जाये भाड़ में। जनता तकलीफे उठा कर कल मरती हो तो आज मरे। उन्हें सिर्फ सत्ता चाहिये और सत्ता प्राप्त करने के लिए कुछ भी करना पड़े, करेंगे। इस बात पर न तो वे धबरायेंगे और न ही संकोच करेंगे।
बढ़ते राजकोषीय घाटे ने ही देश की आर्थिक हालात खराब कर दी है। यही कारण है कि विदेशी भारत में पैसा नहीं लगा रहे हैं और जो पैसा लगा हुआ है, वो निकाल कर ले जा रहे हैं। अफरातफरी का मौहोल हैं, क्योंकि सरकार अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है। ऐसी विकट परिस्थितियों में सरकार की निश्चिंतता यह दर्शाती हैं कि वह जानबूझ कर उपाय करना ही नहीं चाहती, जिससे स्थिति सुधरें। निश्चय ही देश दिवालियां नहीं हुआ है, परन्तु यह कोशिश की जा रही है कि दिवालिया हो जाय। सरकार के इस रवैये से इस आशंका  को भी बल मिलता है कि एक पार्टी विदेशो में जमा काले धन को चुनावों के समय भारत में लाने के पहले रुपये का अधिकाधिक अवमूल्यन चाहती है, ताकि उसके डालर ज्यादा रुपयों में बदल जाय और वह चुनावों में अधिक काला धन खर्च कर सकें।
2008 में जब योरोप और अमेरिका आर्थिक संकट में फंसे थे, तब वहां की सरकारों ने इसे बहुत गम्भीरता से लिया था । राश्ट्राध्यक्ष जनता के समक्ष संचार माध्यमों से जुड़ कर जनता का हौंसला बढ़ाते थे । संकट से निपटने के लिए उन्होंने कड़े आर्थिक फैंसलें लिये थे। सरकारों ने अपने प्रशासनिक खर्च घटाने के कई उपाय किये थे। जबकि उन देशों की जनता की आर्थिक स्थिति इतनी खराब नहीं थी, जितनी आज भारत की जनता की है। समृद्ध और खुशहाल नागरिक आर्थिक झटकों को सहने की क्षमता रखते थे, किन्तु सरकारे संकट से निपटने के लिए बहुत अधिक गम्भीर हो गयी थी।
परन्तु हमारी सरकार ने प्रशासनिक खर्च घटाने के लिये कोई बड़े आर्थिक फैंसले नहीं लिये। नेताओं और अफसरों की विदेश यात्राएं जारी है। इन यात्राओं में पूरा कुनबा जाता है और करोड़ो रुपये खर्च कर के आता है। पूरे देश  के सरकारी कार्यालयों में मित्व्ययता बरतने के कोई निर्देष नहीं दिये जा रहे है। सरकारों को अपने खर्च घटाने के कोई उपाय नहीं सुझाये जा रहे हैं। देश भर के सरकारी अफसर अपनी निजी यात्राओं में सरकारी पैसे का पैट्रोल फूंक रहे हैं। जबकि देश में आर्थिक आपातकाल लगाने जैसी स्थिति है। सरकार और सरकार से जुड़े महकमे कोई तकलीफ उठाने के लिए तैयार नहीं है। क्योंकि उन्हे मालूम है, जो कुछ भार पड़ेगा, अतंतः वह भार जनता को ही उठाना है। जनता रो कर भार उठाये या हंस कर, दुख तो उसे झेलने ही हैं। मतलब साफ है- वे सदैव अपने घोड़े को छाया में बंधा हुआ देखना चाहते हैं।
सरकार को इस देश की जनता और की परवाह नहीं है, यह एक उदाहरण से स्पष्ट है- कठिन आर्थिक परिस्थितियों में जब धन बचाना बहुत जरुरी है, धन लूटाना आत्मघाती होता है। परन्तु खाली सरकारी खजाने को और खाली करने के लिए खैरात बांटी जा रही है, ताकि अधिकाधिक वोट मिल सकें। सरकार बन जाने के बाद महंगाई की मार तो जनता को खानी ही है, फिर चुनावों के पूर्व जनता को मूर्ख बनाने में क्या फर्क पड़ता है। कुल मिला कर यही निष्कर्ष   निकाला जा सकता है कि एक पार्टी को चला रहे लोगों की नीयत में खोट है।
देश की 67 प्रतिशत आबादी को भूख से बचाने के लिए जो उपाय चुनावों के ठीक पहले किये जा रहे हैं, वे पहले क्यों नहीं किये गये? जब आपको मालूम है कि इस देश की अधिकांश  जनता भूखी रहती है, तो उसे अब खाद्य की सुरक्षा देने की क्या आवश्यकता पड़ी, जब सरकारी खजाना खाली है। देश भयानक आर्थिक संकट में फंसा है। कमाई है नहीं और उधार ला कर घी पीने का क्या औचित्य है? बिल पास हुआ नहीं। सकरकारी गोदानों से निकल कर अनाज जनता तक पहुंचा नहीं । जनता में बंटा नहीं। उसके पेट में पहुंचा नहीं, उसके पहले ही ढोल पीट-पीट कर प्रचार करने का आखिर क्या मकसद है? इसके प्रचार पर करोड़ो रुपये खर्च करने से क्या यह मतलब नहीं निकाला जा सकता कि सरकार को भूखी जनता की कोई परवाह नहीं है, उसे तो वोट प्राप्त करने के लिए केवल स्वांग रचाना है।
जो देश की रक्षा के लिए सीमाओं पर खडे़ हैं। जो तपती दोपहरी में खेतों मे अपना पसीना बहा रहे हैं। जो भारतीय नागरिक, वैज्ञानिक और इंजीनियर विभिन्न क्षेत्रों में पूरी कर्मठता और समर्पण में लगे हुए हैं, वे निश्चय ही भारत निमार्ण कर रहे हैं। भारत निमार्ण का श्रेय उन उद्याोगपतियों को भी दिया जा सकता है, जो अपनी उद्यमशीलता से भारतीय उद्योगो को प्रतिकूल परिस्थितियों में आगे बढ़ा रहे हैं। किन्तु ये सभी भारत निमार्ण के गीत नहीं गा रहे हैं। जो गीत गा रहे हैं, वे भारत निमार्ण नहीं कर रहे हैं, भारत को बरबाद और बदहाल करने पर तुले हुए हैं। उन्हें भारत निमार्ण के गीत गाने का कोई हक नहीं है।
निरर्थक विज्ञापनबाजी पर देश की निर्धन जनता के धन का अपव्यय करना, दरअसल अपराध माना जाना चाहिये और पूरे देश की जनता को एक हो कर जनता के धन की इस तरह बरबादी को रोकने के लिए जन आंदोलन छेड़ना चाहिये।