Saturday, 10 August 2013

गीता का विरोध किसलिए ?

अभी कुछ दिनो से मध्य प्रदेश सरकार ने गीता को सभी स्कूलों में पढ़ाने की बात की तो लोगों ने हाय तौबा मचाना शुरू कर दिया | जिसमे कुछ लोगों ने तो खुलकर विरोध करने का मन बनाया | और यह विरोध उन लोगों के माध्यम से हो रहा है जिन्होंने बन्दे मातरम का भी विरोध किया | दरअसल बात है की जिनकी बृत्ति बन गयी की हिन्दू कुछ भी करे हमें उसका विरोध करना है, अब इसमें कुछ भी हो भला बुरा देखना नहीं, हिन्दु ने किया, इसका हमें विरोध करना है | कल दिनांक 6 अगस्त को रात्रि 8-30–से 9 बजे तक मुझे बुलाया गया, सुदर्शन टी० वी० चेनल पर बोलने के लिए, कि गीता पढ़ाना उचित है या नहीं ? मैंने जो बोला, कि हम लोग आज सही और गलत पर विचार करना ही नहीं चाहते, सिर्फ इस भारत जैसे राष्ट्र को अस्थिर करना मानव समाज में फुट डालना असली मुद्दे पर बात न कर सिर्फ लोगों को उलझाना ही चाहते हैं |
गीता पाठ का विरोध मुसल मानो ने किया, या इस्लाम वालों ने किया, इस सन्दर्भ में मै इस्लाम वालों से पूछना चाहूँगा की स्कूल में पढने की अनुमति इस्लाम में है ? इसका जवाब इस्लामी शरियत के मुताबिक नहीं है | इस्लाम की मान्यता है, हदीस बताता है 'तलिबुलइल्मे फरिज़तुम अला कुल्लो मुस्लेमीन वल मुस्लेम:' | अर्थ =इल्म [विद्या] का ढूँढना फ़र्ज़ [कर्तब्य ] है हर मुस्लमान मर्द और औरत के लिये | अब विद्या अगर मुस्लमान मर्द व औरत, के लिए है ? तो जो मुस्लमान नहीं क्या वह विद्या न सीखे ? इससे स्पष्ट हुवा की मुस्लमानो की विद्या ही अलग है | अर्थात यह स्कूल की विद्या नहीं | कारन स्कूल की जो विद्या है वह सम्पूर्ण मानव मात्र के लिए है. हिन्दू के लिए नहीं और न किसी सम्प्रोदय के लिए | पर जिस विद्या में सिर्फ मुस्लमान मर्द और औरत का नाम हो, वह मानव मात्र के लिए नहीं होसकता | इसको समझना ज़रूरी है, तो जब मुस्लमान स्त्री और पुरुष की शिक्षा कहा जाये तो वह कुछ अलग ही है जो सम्पूर्ण मानव मात्र के लिए नहीं | विशेष कर इस्लाम की महिलावो को घर से बाहर निकलना ही माना है, कुरान कहता है की मुबैयना तौर पर बदकारी न हो जाये तुम घर से बाहर न निकलो | तो मुस्लिम घर की लड्किवों को स्कूल जाना ही नहीं चाहिए, कुरान अनुसार | अब समझ ने की बात है की जब मुसलमानों की शिक्षा ही अलग है तो वह स्कूल में किसलिए गये पढने को ?
दर असल भारतीय मुस्लमान दोनों हाथ में लड्डू लेना चाहते की मुसलमानं भी बने रहे और भारतीय भी जिसका विरोध इस्लाम में है | पर इस्लाम को हर किसीके न समझने से यह सारा मामला उलझ रहा है जो की इस्लाम का जानना ज़रूरी है | इस्लाम की असली चेहरा है की इस्लाम को छोड़ दूसरा कोई धर्म ही नहीं जो कुरान में अल्लाह ने कही, सूरा अलइमरान, आयत 19 –और 85 को देखें साफ लिखा है इस्लाम को छोड़ दूसरा कोई दीन नहीं है | अब इस दशा में इस्लाम वालों को आप गीता कैसे पढ़ा सकते हैं भला, वह विरोध तो करेगा, किन्तु मै ऊपर बता चूका हूँ इस्लाम की यही मानसिकता होने हेतु इनको विद्यालय पढने को जाना ही नहीं चाहिय अगर आप इस्लाम वाले विद्यालय पढने को गये तो कुरान की खिलाफ वर्जी की, कुरान की खिलाफ वर्जी कर भी भारतीय परम्परा पर दोष लगाना चाह रहे ,यह तो पैर पर पैर रख कर झगडा करने वाली बात हो रही है |
गीता जैसे ग्रन्थ अगर भारत में न पढाई जाये तो बताव क्या हमें यह गीता पाकिस्तान में जा कर पढ़ाना होगा ? जिसके मनमे हो वह पढ़े जिसके मनमे न हो वह न पढ़े किसीपर जबर दस्ती तो नहीं की जा रही है | किन्तु इसी भारत के और प्रान्तों में सरकारी खर्चे से ही अरबी पढाई जा रही है| सरकारी स्कूलों में, और सर्कार ने इस काम को करने के लिए मदरसा बोर्ड जो मात्र कोल्कता में ही थी अब सारा भारत में लागु करने की बात की है | यह सभी मानवता विरोधी बातें हो रही है, मानव ज्ञान प्राप्त करने के लिए न मालूम कहाँ कहाँ जाता है , और क्या क्या पढता है ज्ञान प्राप्त करने के लिए | किन्तु इस्लाम की कट्टरता को समझने का प्रयास ही नहीं करते भारत के लोग | जो गीता मानव का जीवन दर्शन है, मानवता का पाठ है, मानव जीवन में जीने की कला सिखाई गयी है , जन्मसे लेकर मरण तक मानव को क्या करना क्या नहीं करना सिखाया बताया गया हो, लोग उसे पढ़ाने देना नहीं चाहते ,क्या यह मनवता विरोधी नही ?
आप सभी के जानकारी के लिए एक बात और बताना चाहूँगा ,की लोग लिखते पढ़ते किसलिए ? दिमागी विकास के लिए, बुद्धिमान बनने के लिए ,मेधा ,सुमेधा प्रज्ञा ,ऋतंभरा तक बुद्धि को बनाने या पोहुचाने के लिए ,पर बंधुयों याद रखना, इस्लाम में इसके लिए कोई गुंजाईश नहीं | आप बुद्धि से काम नहीं ले सकते, जो बात कुरान में लिखी गई है उसी को ही मानना पड़े गा, उस से बाहर इस्लाम जा ही नहीं सकता | यही कारन है की इस्लाम और किसी शिक्षा को नहीं मानता, कुरान सूरा बकर के प्रथम में ही कहा है, जालिकल किताबु लारैबफिः , अर्थात कोई शक व शुबा की गुंजाईश नहीं. इस किताब में, अब अगर उसमे शक हो भी फिरभी उसपर शक नहीं कर सकते, आखें बन्द कर ही मानना पड़ेगा | जैसा अल्लाह का सातवां आसमान पर सिंहासन[अर्श] पर बैठना ,फरिश्तों से काम लेना, हर एक के कन्धों पर दो फ़रिश्ता नेकी और बदी लिखने को नियुक्त करना , मरने के बाद सबकी अरबी जुबान होजाना,[अर्बिमे बोलना] आदम के बाएं पस्लि से आदम पत्नी को बनाना, किसी के अंगुली की ईशारे से चाँद का टुकड़ा होजाना, सूरज कीचड़ वाला तालाब में डूब जाना, आसमान को कागज जैसा लपेट लेना, कपडा जैसा तैय लगाना,चटाई जैसा गुठा लेना | किसी पैयगम्बर का लाठी का सांप बनजाना, कहीं किसी की हलाक होने की दुवा कुबूल करना,किसीको दरिया में डुबोकर मारना, कुवारी से संतान बनादेना,किसीका निकाह करादेना अल्लाह का,किसी की पत्नी बदचलन है या नहीं ,अल्लाह से गवाही दिलाने को सच मानना,इस प्रकार की बातों पर बिस्वास करना क्या यही पढ़ने लिखने का मोहत्त्व है ? हाय रे मानव कहलाने वाले, पढ़ने लिखने का यही नतीजा है की दिमाग से सोचना बन्द करदे ?
इस प्रकार अनेक विज्ञानं विरुद्ध बातें कुरान में है जिसको सत्य मानना, क्या यह पढ़े लिखों का काम है ? अब भारत वासी ही विचार करें की स्कूल की पढ़ाई इस्लाम में किस लिए माना है ? आज की दुनिया में जहाँ लोग चाँद तक पहुच चुके हों,सिर्फ और सिर्फ पढ़ लिख कर ही तो, इस काम को अंजाम दिया गया, उसी पढ़ाई को इस्लाम ने नहीं माना , भारत के मुस्लमान 99% प्रतिशत नहीं जानते इस्लाम को , इसलिए सारा मामला बिगड़ रहा है हठ और दुरागग्रह ही इनका काम है | तो मैंने कल सुदर्शन चेनल में कहा की गीता के साथ कुरान भी पढ़ाना चाहिए मध्य प्रदेश सरकार को, जिससे की लोग जाने आखिर कुरान क्या है | कुरान को अनुबाद सहित पढ़ाने पर सभी लोग जान सकते है की कुरान में विज्ञानं सम्मत बातें है अथवा विज्ञानं विरुद्ध बातें है जो आज के दिनोमे बोहुत ज़रूरी है ? कुरान मानव कृत है या ईश्वर कृत, गीता जैसे मानवता वादी बातें है अतवा मानवता विरुद्ध |