Tuesday, 8 March 2016

प्रश्न और मन



मानव जीवन प्रश्नों से जुड़ा है। प्रश्न मन की लहरों के साथ उपजते हैं। मन की हर हिलोर-प्रत्येक लहर एक नया प्रश्न खड़ा करती है। जीवन की प्रत्येक घटना, जो मन को स्पंदित करती है, अनायास ही नए प्रश्न या प्रश्नों को जन्म दे देती है। इसी तरह परिस्थितियां व परिवेश (जो विचार व भावों में लहरें पैदा करने में समर्थ हैं) स्वाभाविक तौर पर अंतश्चेतना में प्रश्नों को जन्म देते हैं। यह क्रम न तो रुकता है, न थमता है, बस नित्य-निरंतर-अविराम चलता रहता है। वस्तुत: प्रश्न कई प्रकार के होते हैं। जिज्ञासावश मन में उठने वाला भाव प्रश्न है, प्रश्न के बाद पुन: पूछने का क्रम प्रतिप्रश्न है, तो कुछ लोग किसी विषय पर इतने प्रश्न पूछते हैं कि मूल विषय से ध्यान ही भटक जाए। ऐसा करना अतिप्रश्न है और अनावश्यक किसी दुर्भावनावश अप्रासंगिक प्रश्न पूछना कुप्रश्न कहलाता है। प्रश्नकर्ता का भाव विकसित करने के लिए सर्वप्रथम ‘इगो’ को त्यागकर विनम्रता और जिज्ञासु भाव को विकसित करना आवश्यक है। ऐसा इसलिए, क्योंकि प्रत्येक प्रश्न मन के मौन को तोड़ता है। मन में अशांति, बेचैनी व तनाव को जन्म देता है। ये प्रश्न जितने अधिक, जितने गहरे व जितने व्यापक होते हैं, मन की अशांति, बैचेनी व तनाव भी उतना ही ज्यादा गहरा, घना और व्यापक होता जाता है।
इसी अशांति, बेचैनी व तनाव में अपनी ही कोख में उपजे प्रश्न या प्रश्नों के उत्तर खोजने की कोशिश करता है। उसे अपने इस प्रयास में सफलता मिलती है। उत्तर मिलते भी हैं, पर नए प्रश्नों के साथ कोई न कोई प्रश्न चिपक ही जाता है। साथ ही बढ़ जाती है बैचेनी व अशांति, क्योंकि जो भी घटना, फिर वह चाहे प्रश्न की हो या उत्तर की, मन में लहरें व हिलोरें पैदा करेगी, मन को तनाव, बैचेनी व अशांति से ही भरेगी। इस समस्या का समाधान तभी है, जब मन की लहरें मिटें, हिलोरें हटें। फिर न कोई प्रश्न उभरेंगे और न किसी उत्तर की खोज होगी। इसके लिए मन को मौन होना होगा। इसी को समाधि कहते हैं जहां सभी प्रश्न स्वाभाविक रूप से समाप्त हो जाते हैं, जहां अशांति अपने आप ही मिट जाती है। बस, बनी रहती है तो केवल प्रश्नविहीन अमिट शांति। आध्यात्मिक शक्ति के विकास से इस शांति की प्राप्ति की जा सकती है और जीवन के सभी प्रश्नों का उत्तर स्वत: प्राप्त या अनुभूत हो जाता है।

Monday, 7 March 2016

बुद्धि का बल


विश्व के महानतम दार्शनिकों में से एक सुकरात एक बार अपने शिष्यों के साथ बैठे कुछ चर्चा कर रहे थे। तभी वहां अजीबो-गरीब वस्त्र पहने एक ज्योतिषी आ पहुंचा।

वह सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हुए बोला ,” मैं ज्ञानी हूँ ,मैं किसी का चेहरा देखकर उसका चरित्र बता सकता हूँ। बताओ तुममें से कौन मेरी इस विद्या को परखना चाहेगा?”
शिष्य सुकरात की तरफ देखने लगे।
सुकरात ने उस ज्योतिषी से अपने बारे में बताने के लिए कहा।
अब वह ज्योतिषी उन्हें ध्यान से देखने लगा।
सुकरात बहुत बड़े ज्ञानी तो थे लेकिन देखने में बड़े सामान्य थे , बल्कि उन्हें कुरूप कहना कोई अतिश्योक्ति न होगी।
ज्योतिषी उन्हें कुछ देर निहारने के बाद बोला, ” तुम्हारे चेहरे की बनावट बताती है कि तुम सत्ता के विरोधी हो , तुम्हारे अंदर द्रोह करने की भावना प्रबल है। तुम्हारी आँखों के बीच पड़ी सिकुड़न तुम्हारे अत्यंत क्रोधी होने का प्रमाण देती है ….”
ज्योतिषी ने अभी इतना ही कहा था कि वहां बैठे शिष्य अपने गुरु के बारे में ये बातें सुनकर गुस्से में आ गए और उस ज्योतिषी को तुरंत वहां से जाने के लिए कहा।
पर सुकरात ने उन्हें शांत करते हुए ज्योतिषी को अपनी बात पूर्ण करने के लिए कहा।
ज्योतिषी बोला , ” तुम्हारा बेडौल सिर और माथे से पता चलता है कि तुम एक लालची ज्योतिषी हो , और तुम्हारी ठुड्डी की बनावट तुम्हारे सनकी होने के तरफ इशारा करती है।”
इतना सुनकर शिष्य और भी क्रोधित हो गए पर इसके उलट सुकरात प्रसन्न हो गए और ज्योतिषी को इनाम देकर विदा किया। शिष्य सुकरात के इस व्यवहार से आश्चर्य में पड़ गए और उनसे पूछा , ” गुरूजी , आपने उस ज्योतिषी को इनाम क्यों दिया, जबकि उसने जो कुछ भी कहाँ वो सब गलत है ?”
” नहीं पुत्रों, ज्योतिषी ने जो कुछ भी कहा वो सब सच है , उसके बताये सारे दोष मुझमें हैं, मुझे लालच है , क्रोध है , और उसने जो कुछ भी कहा वो सब है , पर वह एक बहुत ज़रूरी बात बताना भूल गया , उसने सिर्फ बाहरी चीजें देखीं पर मेरे अंदर के विवेक को नही आंक पाया, जिसके बल पर मैं इन सारी बुराइयों को अपने वष में किये रहता हूँ , बस वह यहीं चूक गया, वह मेरे बुद्धि के बल को नहीं समझ पाया !” , सुकरात ने अपनी बात पूर्ण की।

मित्रों , यह प्रेरक प्रसंग बताता है कि बड़े से बड़े इंसान में भी कमियां हो सकती हैं, पर यदि हम अपनी बुद्धि का प्रयोग करें तो सुकरात की तरह ही उन कमियों से पार पा सकते हैं

महान क्रांतकारी मंगल पांडे

महान क्रांतिकारी मंगल पांडे
Mangal Pandey Biography in Hindi

कोलकाता में हुगली नदी के किनारे बैरकपुर नगर में अंग्रेज सेना की बंगाल छावनी थी। सेना की वर्दी में सिपाही परेड करते रहते थे। यहाँ एक बहुत शांत और गंभीर स्वभाव का सिपाही भर्ती हुआ था। उसे केवल सात रूपये महीना वेतन मिलता था। उसके एक सिपाही मित्र ने एक दिन कहा, ” अरे ! अधिक धन कमाना है तो अपना देश छोड़कर अंग्रेज सेना में भर्ती हो जाओ।”
उस सिपाही ने उत्तर दिया -” नहीं, नहीं ! मैं अधिक धन कमाने के लालच में अपना देश छोड़कर कभी नहीं जाऊंगा।”
देश के लिए अपने निजी स्वार्थ को त्यागने वाला यह देशभक्त सिपाही प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम यौद्धा बना। इस सिपाही का नाम मंगल पांडे था।क्रांतकारी मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई सन 1827 को फ़ैजाबाद जिले के नागवा बलिया गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम दिवाकर पांडे और माता का नाम अभय रानी था। मंगल पांडे बहुत ही साधारण परिवार के थे। उनकी वाणी में अवधि भाषा की मिठास थी। वे अपने माता-पिता का बहुत आदर व सम्मान करते थे।
मंगल पांडे जैसे शांत और सरल स्वभाव का व्यक्ति प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम यौद्धा कैसे बना, इसके पीछे एक कहानी है।
एक बार मंगल पांडे किसी काम से अकबरपुर आये थे। उसी समय कम्पनी की सेना बनारस से लखनऊ जा रही थी। मंगल पांडे सेना का मार्च देखने के लिए कौतुहलवश सड़क के किनारे आकर खड़े हो गये। एक सैनिक अधिकारी ने मंगल पांडे को हृष्टपुष्ट और स्वस्थ देखकर सेना में भर्ती हो जाने का आग्रह किया, और वे राजी हो गये।
वे 10 मई सन 1846 में 22 वर्ष की आयु में ईस्ट इंडिया कम्पनी की सेना में भर्ती हुए।जब वे बंगाल छावनी में थे तो एक दिन सिपाही ने बताया की ऐसी चर्चा है कि बन्दूक में जो कारतूस भरने के लिए दी जाती है उसके खोल में गाय और सूअर की चर्बी लगी है। कारतूस भरने से पहले उन्हें मुँह से खीच कर खोलना पड़ता था। यह हिन्दुओ और मुसलमानों दोनों के लिए धर्म के विरुद्ध कार्य था। इस सूचना से सभी सिपाहियों के ह्रदय में घृणा भर गयी। इसी रात बैरकपुर की कुछ इमारतों में आग की लपटें देखी गयी।
वह आग किसने लगायी थी, कुछ पता न चल सका। बन्दूक की कारतूस में गाय व सूअर की चर्बी होने की बात सैनिक छावनियो तक ही सीमित नहीं रही बल्कि सारे उत्तर भारत में फ़ैल गयी। सभी स्थानों में इसकी चर्चा होने लगी। ईस्ट इंडिया कम्पनी की नीतियों को लेकर भारतीयों में असंतोष की भावना पहले से ही थी
इस खबर ने आग में घी का काम किया। बैरकपुर छावनी में भारतीय सैनिको ने संघर्ष छेड़ दिया। बैरकपुर की 16 नवम्बर की पलटन को नए कारतूस प्रयोग करने के लिए दिए गये। सिपाहियों ने उन्हें प्रयोग करने से इंकार कर दिया। अंग्रेज अधिकारियो ने तुरंत ही उस पलटन के हथियार रखवा लिए और सैनिको को बर्खास्त कर दिया। कुछ ने तो चुपचाप हथियार अर्पित कर दिए किन्तु अधिकतर सैनिक क्रांति के लिए तत्पर हो उठे। 26 मार्च सन 1857 को परेड के मैदान में मंगल पांडे ने खुले रूप से अपने साथियों के समक्ष क्रांति का आह्वान किया।
इस पर अंग्रेज सार्जेन्ट मेजर ह्यूसन ने मंगल पांडे को गिरफ्तार करने की आज्ञा दी, परन्तु कोई भी सिपाही आज्ञा पालन करने के लिए आगे न बढ़ा। इतने में मंगल पांडे ने अपने बन्दुक की गोली से तुरंत सार्जेन्ट मेजर ह्यूसन को वहीं पर ढेर कर दिया। इस पर एक दूसरा अफसर लेफ्टिनेन्ट बाघ अपने घोड़े पर आगे लपका तभी मंगल पाण्डे ने एक ऐसा निशाना साधा की एक ही गोली पर घोडा और सवार दोनों जमीन पर आ गिरे। मंगल पांडे ने तीसरी बार अपनी बंदूक भरने का इरादा किया। लेफ्टिनेन्ट बाघ ने उठकर पांडे पर गोली चलायी पर पाण्डे बच गये। मगर यह अंग्रेज अफसर पाण्डे की तलवार की वार से बच न सका। पांडे ने उसे भी समाप्त कर दिया। अंग्रेज अधिकारियो में दहशत फ़ैल गयी। अंत में ज़नरल हियरसे ने चालाकी से मंगल पांडे के पीछे से आकर उसकी कनपटी पर अपनी पिस्तौल तान दी। जब उन्होंने अनुभव किया की अंग्रेजो से बचना मुश्किल है, तब उन्होंने अंग्रेजो का कैदी बनने के बजाय स्वयं को गोली मारना बेहतर समझा और अपनी छाती पर गोली चला दी। लेकिन वे बच गये और मूर्छित होकर गिर पड़े। अंत में घायलावस्था में उन्हें गिरफ्तार किया गया।
मंगल पाण्डे पर सैनिक अदालत में मुकदमा चला। 8 अप्रैल का दिन फांसी के लिए नियत किया गया। किन्तु बैरकपुर भर में कोई भी मंगल पाण्डे को फाँसी देने के लिए राजी न हुआ। अंत में कोलकाता से चार आदमी इस काम के लिए बुलाये गये। 8 अप्रैल सन 1857 को अंग्रेजो ने पूरी रेजिमेन्ट के सामने मंगल पांडे को फाँसी दे दी।
अंग्रेज लेखक चार्ल्स बॉल और रोबर्ट्स दोनों ने लिखा है की उसी दिन से सन 1857-58 के समस्त क्रांतकारी सिपाहियों को ”पाण्डे” के नाम से पुकारा जाने लगा। मंगल पांडे के इस बलिदान से क्रांति की अग्नि और भड़क उठी। उसकी लपटें सारे देश में फ़ैल गयी।
एक अंग्रेज लेखक मार्टिन ने लिखा है-
मंगल पाण्डे को जब से फाँसी दे दी गयी तब से समस्त भारत की सैनिक छावनियो में जबरदस्त विद्रोह प्रारम्भ हो गया है।
बैरकपुर के अलावा मेरठ, दिल्ली, फिरोजपुर, लखनऊ, बनारस, कानपूर, फ़ैजाबाद आदि स्थानों पर भारतीय सैनिको ने विद्रोह किया जो 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नाम से प्रसिद्ध है। इस क्रांति का नेतृत्व बहादुरशाह जफ़र, नाना साहब, तात्या टोपे, रानी लक्ष्मीबाई, राजा कुंवर सिंह, मौलवी लियाकत अली, बेगम जीनत महल व बेगम हजरत महल जैसे नेताओ ने अलग-अलग स्थानों पर किया। इस संग्राम ने अंग्रेजी हुकूमत की नीव हिला दी और उन्हें भारतीय क्रांतिकारियों की शक्ति का एहसास करा दिया।
धन्यवाद !


शहीद दिवस: जरा याद करो कुर्बानी


भारत के वीर सपूत
भारत की स्वतंत्रता में तीन ऐसे वीर सपूत हैं, जिनकी शहादत ने देश के नौजवानों में आजादी के लिए अभूतपूर्व जागृति का शंखनाद किया। देशभक्त सुखदेव, भगतसिंह और राजगुरू को अंग्रेज सरकार ने 23 मार्च को लाहौर षडयंत्र केस में फाँसी पर चढा दिया था। इन वीरों को फाँसी की सजा देकर अंग्रेज सरकार समझती थी कि भारत की जनता डर जाएगी और स्वतंत्रता की भावना को भूलकर विद्रोह नही करेगी। लेकिन वास्तविकता में ऐसा नही हुआ बल्की शहादत के बाद भारत की जनता पर स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने का रंग इस तरह चढा कि भारत माता के हजारों सपूतों ने सर पर कफन बाँध कर अंग्रेजों के खिलाफ जंग छेङ दी।
1928 के प्रारंभ में ब्रिटिश सरकार द्वारा गठित साइमन कमिशन भारत आया था। जिसमें एक भी भारतीय नही थे, अतः उसके विरोध में भारत के उन सभी शहरों में उसका बहिष्कार किया गया, जहाँ-जहाँ साइमन कमिशन गया था। उसे काले झंडे दिखाए गये। साइमन कमिशन को व्यापक जन विरोधी आन्दोलन का सामना करना पङा। इसी क्रम में जब साइमन कमिशन लाहौर पहुँचा तो वहाँ पंजाब केसरी लाला लाजपत राय के नेतृत्व में इस कमिशन का व्यापक रूप से बहिष्कार किया किया गया। अंग्रेज सैनिकों ने इस बहिष्कार को रोकने के लिए जनता पर लाठी चार्ज किया, जिसमें लाला लाजपत राय गम्भीर रूप से घायल हो गये और कुछ दिनो बाद उनकी चोट के कारण मृत्यु हो गई। इस हादसे से पंजाब के नौजवान बैचेन हो गये। क्रान्तिकारी संगठन ‘हिन्दुस्तान सोशलिष्ट रिपब्लिक आर्मी’ जिसके सर्वोच्च कमांडर चन्द्रशेखर आजाद थे, उन्होने इस राष्ट्रीय अपमान का बदला लेने का निर्णय लिया। जिस अंग्रेज अफसर (सांडर्स) की मार से लाला जी की मृत्यु हुई उसे मारने की योजना बनाई गयी। इस योजना को कार्यान्वित करने के लिए क्रान्तिकारियों एक दल गठित किया गया।
यह एक बङे पुलिस अधिकारी की हत्या करने की योजना थी, इसलिए इस योजना के हर पहलु पर बारिकी से अध्ययन किया गया एवं किसको क्या कार्य करना है, इसके लिए उनका कार्यक्षेत्र निर्धारित किया गया। लाला जी की मृत्यु के एक महीने पश्चात अर्थात 17 दिसम्बर को इस योजना को व्यवहारिक रूप से अंजाम देने का दिन निश्चित किया गया। पुलिस सुपरिटेंडन सांडर्स का ऑफिस डी.ए.वी. कॉलेज के सामने था, अतः वहाँ योजना से जुङे क्रान्तिकारी तैनात कर दिये गये। राजगुरू को सांडर्स पर गोली चलाने का संकेत देने का कार्य सौंपा गया। जैसे ही सांडर्स ऑफिस से बाहर निकला तभी राजगुरू से संकेत मिलते ही भगत सिंह ने उसपर गोलियाँ चला दी जिससे वह वहीं ढेर हो गया। भगत सिंह को पकङने के लिए हेड कांस्टेबल चानन सिंह ने उनका पीछा करने की कोशिश की किन्तु तभी चन्द्रशेखर आजाद ने उसपर गोली चला दी, जिससे सभी क्रान्तिकारी भागने में कामयाब हुए। इस हत्या काण्ड से पूरे देश में सनसनी फैल गई। सभी अखबारों ने इस खबर को प्रभुता से प्रकाशित किया। अंग्रेज सरकार की तरफ से इन क्रान्तिकारियों को पकङने की व्यापक कोशिश की गई। कुछ समय पश्चात लाहौर केस के लगभग सभी क्रान्तिकारी पकङे गये। तीन न्यायाधिशों की अदालत में देशभक्त क्रान्तिकारियों पर केस चला।
जेल से अदालत आते समय ये देशभक्त इंनकलाब जिन्दाबाद और अंग्रेज मुरदाबाद के नारे लगाते। सुखदेव और भगत सिंह की योजना थी कि इसतरह से वे अपनी कार्यशैली का प्रचार करेंगे और लोगों को स्वतंत्रता के प्रति जागृत करेगें। अदालती कार्यवाही को जनता तक पहुँचाने का कार्य सामाचार पत्र करते थे, जिससे पूरे देश की जनता सुखदेव, भगत सिंह और राजगुरू एवं अन्य क्रान्तिकारियों के पक्ष में थी। अदालती कार्यवाही के दौरान अपार जन समूह इक्कठा हो जाता था। अदालती कार्यवाही को बाधित देखकर भारत सरकार ने एक आर्डिनेंस जारी किया जिसके अनुसार उन लोगों की अनुपस्थिती में भी कारवाही जारी करते हुए मुकदमा समाप्त कर दिया गया। देशभक्तों ने काफी दिनों तक भूख हङताल भी की। 63 दिनों की भूख हङताल के दौरान जितेंद्र नाथ का निधन भी हो गया। जन आक्रोश के डर से अदालत की सजा जेल में ही सुनाई गयी, जिसके अनुसार भगत सिहं, राजगुरू और सुखदेव को 23 मार्च को फांसी की सजा की सजा मुकर्र की गई। कुछ लोगों को आजीवन काले पानी की सजा दी गई। इस फैसले के विरोध में देशभर में हङतालें हुई। इस केस के विरोध में पी.वी. कौंसिल में अपील की गई परन्तु देशभक्तों ने वायसराय से माफी माँगने से इंकार कर दिया। अतः राजगुरू, सुखदेव तथा भगतसिंह को 23 मार्च 1931 को सायंकाल 7 बजे लाहौर जेल में फांसी दे दी गई, अमूमन फांसी का वक्त प्रातःकाल का होता है किन्तु लोगों में भयव्याप्त करने हेतु इन्हे शाम को फांसी दी गई। उस दौरान जेल में हजारों कैदी थे, उन्होने भी डरने के बजाय पूरे जोश के साथ इंकलाब जिनंदाबाद, भारत माता की जय का आगाज किया। इंकलाब की गूंज पूरे लाहौर शहर में फैल गई। उनके शहादत की खबर से हजारो की संख्या में लोग जेल के बाहर इक्कठा होने लगे तथा इंकलाब जिन्दाबाद के नारे लगाने लगे। उग्र प्रर्दशन से बचने के लिए पुलिस ने शवों को रातो-रात फिरोजपुर शहर में सतुलज नदी के किनारे ले जाकर जला दिया। जब लाहौर के निवासियों को ये पता चला तो अनगिनत लोग इन भारत माता के वीर शहीदों को श्रद्धांजली देने वहाँ पहुँच गये और लौटते समय इस पवित्र स्थल से स्मृति स्वरूप एक-एक मुठ्ठी मिट्टी अपने साथ ले गये। वहाँ पर शहीदों की याद में एक विशाल स्मारक बनाया गया है। जहाँ प्रतिवर्ष 23 मार्च को लोग उन्हे श्रद्धांजली अर्पित करते हैं। ऐसे वीर सपूत जिन्होने अपनी शहादत से स्वतंत्रता का आगाज किया उनके परिचय को शाब्दिक रूप देकर उनकी वीरता को नमन करने का प्रयास कर रहे हैः-
भगत सिंह- भगत सिंह का जन्म 28 सितम्बर 1907 को जिला लायल पुर के बंगा गाँव में हुआ था। पिता सरदार किशन और चाचा भी महान क्रान्तिकारी थे। अंग्रेज विरोधी गतिविधियों के कारण कई बार जेल गये थे। भगत सिहं के दादा भी स्वतंत्रता के पक्षधर थे। सिख होने के बावजूद भी वे आर्यसमाज की विचारधारा से प्रभावित थे। परिवार वाले भगत सिहं का विवाह करवाकर घर बसाना चाहते थे किन्तु भगत सिहं का मुख्य उद्धेश्य भारत माता को गुलामी की जंजीर से मुक्त कराना था। भगत सिंह ने बटुकेश्वर दत्त के साथ केंद्रीय असेम्बली में 2 बम फेंके थे, जिसके कारण उन्हे लाहौर केस के पूर्व कालेपानी की सजा भी मिली थी। प्रताप अखबार के कार्यलय में काम करते हुए वे सदा देश की स्वतंत्रता के लिए काम करते हुए हँसते-हँसते फाँसी पर चढ गये।
सुखदेव- सुखदेव का जन्म 15 मई 1907 को लुधियाना में हुआ था। पिता का नाम रामलाल और माता का नाम श्रीमति रल्ली देई था। तीन वर्ष की अल्पआयु में ही पिता का साया सर से उठ गया था। ताया श्री चिन्तराम के संरक्षण में आपका बचपन बीता। चिन्तराम और सुखदेव के विचारों में काफी अंतर था। चिन्तराम राष्ट्रीय कांग्रेस से जुङे हुए थे जबकि सुखदेव क्रान्तिकारी विचारधारा के थे। सुखदेव पंजाब में क्रान्तिकारी संघटन का संचालन करते थे। सुखदेव को बम बनाने की कला में महारथ हासिल थी। वे सदैव अपनी जरूरतों को दरकिनार करते हुए अपने साथियों की जरूरतों पर विशेष ध्यान देते थे। जब वे जेल में थे तब उन्होने गाँधी जी को एक पत्र लिखा था, जिसमें उन्होने गाँधी इरविन पैक्ट का विरोध किया था। गाँधी जी के उत्तर से पहले ही सुखदेव को फाँसी की सजा दे दी गई थी। गाँधी जी का पत्र नवजिवन पत्रिका में प्रकाशित किया गया था।
राजगुरू- क्रान्तिकारियों के गढ, बनारस में जन्में राजगुरू का पूरा नाम राजगुरू हरि था। चंद्रशेखर के सबसे विश्वशनीय राजगुरू की परवरिश कट्टर हिन्दुओं के मध्य हुई थी किन्तु बाद में उनका मन क्रान्तिकारी विचारधारा से प्रभावित हो गया। राजगुरू निशानेबाजी में भी सिद्धस्त थे। लाहौर केस में मुख्य अभियुक्त के रूप में उन्हे 30 सितंबर 1929 को पूना से गिरफ्तार किया गया था।
सुखदेव, राजगुरू और भगत सिंह की शहादत ने आजदी के लिए जन-जन में जो जागृति का संचार किया वो इतिहास में अविस्मरणिय है। जनमानस के ह्रदय में इंकलाब की गूंज को पहुचाने वाले देश के इन अमर वीर सपूतों को उनकी शहादत पर हम श्रद्धांजलि सुमन अर्पित करते हैं।


Sunday, 6 March 2016

जिन्हें शहीदों के शवों पर फूल चढ़ाने की फुर्सत नहीं, वे देशद्रोहियों को हार पहना रहे हैं


पिछले दो वर्षों में आतंकियों और नक्सलियों से संघर्ष करते हुए करीब दो हजार सेना और पुलिस के जवान तथा अफसर शहीद हुए। राहुल गांधी, केजरीवाल और वामपंथी नेताओं में से एक भी नेता किसी एक जवान के शव पर पुष्पांजलि अर्पित करने नहीं गया। उनके घर जा कर परिजनो के आंसू पौंछने और उन्हें ढाढ़स बंधाने की तकलीफ किसी ने नहीं की। किन्तु आज बड़ी ही बेशर्मी से देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तदार हुए कन्हैया के जमानत पर छुटने पर उसका स्वागत इस तरह कर रहे हैं जैसे कोर्इ महान देशभक्त नेता जेल से छूटा हो।
कन्हैया को न्यायालय ने देशद्रोह के आरोपों से बरी नहीं किया, वरन उसे सुधरने के लिए जमानत पर छोड़ा है। परन्तु घटिया सोच और संदिग्ध चऱित्र के राजनेता अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए उसे जानबूझ कर हीरो बना रहे हैं। अठार्इस वर्ष की उम्र होने तक पढ़ार्इ पूरी नहीं करने वाला कन्हैया देशद्रोही गतिविधियों लिप्त हो कर अब नरेन्द्र मोदी और आरएसएस को गालियां दे, अपने पापों को धोने का असफल प्रयास कर रहा है। उसके मन में यह बात बिठा दी गर्इ है कि नरेन्द्र मोदी और आरएसएस की जितनी आलोचना करोंगे तुम्हारा राजनीतिक कद बढ़ता जायेगा। यह भारतीय राजनीति का निकृष्टतम रुप है, जिसे देख कर अब घिन्न आने लगी है।
हर छोटी मोटी बात को ले कर आरएसएस और मोदी सरकार को कठघरें में खड़ा करने वाले यह क्यों भूल जाते हैं कि देश की सारी समस्यओं की जिम्मेदार मोदी सरकार और आरएसएस नहीं है। गरीबी, अशिक्षा, बैरोजगारी, पिछड़़ेपन, आतंकवाद और किसानों की आत्महत्याओं के जिम्मेदार वे लोग हैं, जिनकी नीतियों के कारण देश के ऐसे हालात बने। जिन्होंने इस देश पर वर्षों तक राज किया, वे ही देश की दुर्दशा के जिम्मेदार है। इन्हीं लोगों ने भारत की प्रशासनिक व्यवस्था को भ्रष्ट और अकर्मण्य बनाया। जिनकी भ्रष्ट नीतियों के कारण ही कालेधन का प्रभाव बढ़ा और काला धन देश से बाहार गया। यह सही है कि मोदी सरकार ने देश की जनता को इन समस्याओं से निज़ात दिलाने का वादा किया था। हो सकता है कि सरकार जनता की अपेक्षाओं पर पूरी तरह खरी नहीं उतरी हों, किन्तु जो सारी समस्याओं के जनक हैं, वे अपने पापों का भार मोदी सकार पर डाल कर कन्हैया कुमार जैसे देशद्रोही छात्र नेता से सरकार के विरुद्ध आग उगलवाने से आखिर क्या हांसिल कर लेंगे ?
जहरीले नारों से पूरे देश को आहत करो, देशद्रोह के आरोप में जेल जाओ और जमानत पर छूट कर बाहर आते ही मोदी सरकार को कोसो। बोलने की आज़ादी को ले कर लम्बा चौड़ा भाषण दों। आपके सारे पाप धुल जायेंगे। राष्ट्र आपको खलनायक की जगह नायक स्वीकार कर लेगा। यदि कन्हैया अपने मन में यह भ्रांति पाले हुए हैं तो वह खुशफहमी में जी रहा है। राहुल-केजरीवाल ने पहले हार्दिक पटेल को मोहरा बनाया और अब कन्हैया को दांव पर लगाया है। ऐसी ही राजनीति कर ये दोनों नेता प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं और उन्हें मोहरों की तलाश रहती है। भारत की राजनीति को गंदा कर रहे ये दोनो शख्स चाहे लाख सर पटक लें, उनकी हसरते पूरी होने वाली नहीं है। राहुल-केजरीवाल ने कन्हैया पर दांव लगा कर भारी भूल की है, जिसकी कीमत उन्हें चुकानी पड़ेगी। देश की जनता न तो देशद्रोहियों के अपराध को क्षमा करेगी और न ही देशद्रोहियों को हीरो बनाने वालों को बख्सेगी।
कन्हैया अपनी भाषणबाजी से चाहे कितनी भी कोशिश करे, उसके दामन पर लगा देशद्राही का दाग़ धुल नहीं सकता। यह सौ प्रतिशत सही है कि जेएनयू परिसर में अफजल गुरु की बरसी मनायी गर्इ थी, जिसका विरोध कन्हैया ने नहीं किया था। जिस भीड़ ने भारत विरोधी नारे लगाये थे, उस भीड़ में कन्हैया खड़ा था। जिन लोगों ने भारत से बदला लेने और उसके टूकड़े-टूकड़ करने की कसम खार्इ थी, वे सभी उसके साथी थे। फिर वह कैसे कह रहा है कि वह देशद्रोही नही है ? अफजल गुरु उसका आदर्श नहीं है ? उसने कश्मीर की आज़ादी के पक्ष में नारे नहीं लगाये थे ? क्या मोदी सरकार के विरुद्ध आक्रामक भाषण देने से उसकी देशद्रोहिता प्रमाणित नहीं होगी ?
मोदी विदेशों में जमा भारतीयों का कालाधन स्वदेश नहीं ला पाये इसकी चिंता अब कन्हैया को हो रही है, किन्तु शायद उसे नहीं मालूम की जिस राहुल गांधी के कंधों पर चढ़ कर वह राजनीति में उतरना चाहता है वह कालेधन का सब से बड़ा जमाखोर है। मोदी सरकार सोनिया परिवार के कालेधन का पत्ता लगाने की भरसक कोशिश कर रही है और देश की जनता को विश्वास है कि एक न एक दिन मोदी सरकार कालेधन के काले चेहरों को देश के समाने नंगा कर देगी। जब राहुल का राजनीतिक भविष्य ही अंधकारमय है तो वह कन्हैया का क्या भविष्य चमकायेगा ? बोलने की आज़ादी की गुहार लगाने वाला कन्हैया क्या इस तथ्य से वाकिब नहीं है कि केजरीवाल ने उन सभी लोगों को पार्टी से धक्के मार कर बाहर कर दिया, जिन्होंने बोलने की आज़ादी मांगी थी ? और वे वामपंथी उसका क्या भविष्य संवारेंगे जो अपने अस्तित्व की लड़ार्इ के लिए बंगाल में अपना आखिरी दांव खेल रहे हैं ?
कन्हैया छात्र नहीं है, छात्र नेता है। राजनेताओं के मोहरे बने ऐसे कर्इ छात्र नेता विश्वविद्यालय परिसर को गंदा कर रहे हैं। उम्र बीत जाती है, पर उनकी पढ़ार्इ पूरी नहीं होती। कैरियर उनका चौपट हो जाता है। उनका मकसद सिर्फ राजनेताओं को तुष्ट करने के लिए विश्वविद्यालयों में धमाचौकड़ी मचाना है। जो छात्र एक निश्चित उद्धेश्य ले कर पढ़ने आते हैं, वे ऐसे लोगों के प्रभाव में नहीं नहीं आते। जिन्हें अपना भविष्य संवारना है, माता-पिता के सपनों को पूरा करना है, ऐसे मेधावी छात्र कभी कन्हैया कुमार को अपना आदर्श नहीं मानते। अत: पूरे देश के अभिभावकों को सरकार से यह मांग करनी चाहिये कि विद्या के मंदिर को अपवित्र कर रहे ऐसे तत्वों को विश्वविद्यालय परिसर से बाहर निकालने की कोर्इ सार्थक नीति बनायें, ताकि विद्या के मंदिरों का शुद्धिकरण हो जाय।
मीडिया और राजनेता चाहे कन्हैयाकुमार को नायक बनाने का प्रयास करें, किन्तु जनता यदि एकजुट हो कर ऐसे लोगों को तिरस्कृत कर देगी, तो देशद्रोहियों की वकालात करने वालों को अच्छा सबक मिलेगा। कोर्इ भी व्यक्ति जनता का हीरो तभी बनता है, जब जनता उसे हीरो बनाती है। मुट्ठीभर लोगों की समझ को राष्ट्रीय विचार नहीं माना जा सकता। अत: कन्हैया को नहीं, देशद्रोह को महिमामंड़ित करने वाले नेताओं को हमे सजा देनी होगी, ताकि कभी भी कन्हैया कुमार जैसा व्यक्ति हीरो बनने की कोशिश करने का साहस ही नहीं कर पाये।

शिवत्व

संसार सुख और दुख, दोनों का मिला-जुला रूप है। कोई इसे अपनी सोच से सुखदाई बनाता है तो कोई दुखदाई। सच देखा जाए तो दोनों स्थितियां सिक्के के चित-पट की तरह है। सिक्के को किसी तरह रखा जाए, उसकी कीमत नहीं घटती। इसी तरह जीवन को भी लेना चाहिए। हमारे आध्यात्मिक ग्रंथों में शिव को बहुत सरल देवता के रूप में दर्शाया गया है। लोकहित के लिए समुद्रमंथन के वक्त वे खुद आगे बढ़कर विष पीते हैं। जब व्यक्ति सहजता से विसंगतियों के जहर को आत्मसात करता है तो उससे भयाक्रांत नहीं होता और जब विपरीत हालात को सच में जहर मान लेता है तो वह घबरा जाता है। विपरीतता प्राय: असफलता, धोखा आदि से आती है। यदि कोई छल-छद्म करे, अप्रिय स्थिति उत्पन्न करे और उसे जहर की तरह पीने की स्थिति बन जाए तब उस जहर को भगवान शंकर की तरह कंठ में ही रोक लेना चाहिए। यदि जहर हृदय में उतरा तो मन क्षुब्ध होगा, बदला लेने का भाव जाग्रत होगा, जिसका अंततोगत्वा नुकसान उसी का होगा। इतने बड़े त्याग के बावजूद भगवान शंकर सिर्फ एक लोटा जल चढ़ाने से प्रसन्न हो जाते हैं। जीवन में जो भी प्राप्त हो रहा है, वह मनुष्य के प्रयत्न का परिणाम है। इससे संतुष्ट होने की आदत डालनी चाहिए।
भगवान शिव की स्तुति करते समय हमारे ऋषियों ने लिखा है कि काले पत्थर को स्याही, समुद्र को दवात, कल्पद्रुम को लेखनी और पूरी पृथ्वी को कागज बनाकर साक्षात् माता सरस्वती उनकी महिमा लिखें तब भी भगवान की महिमा नहीं लिखी जा सकेगी। इसके निहितार्थ पर ध्यान देना होगा कि हमें भी जिंदगी की विसंगतियों को काले पत्थर की स्याही, सकारात्मक चिंतनधारा को समुद्र की तरह दवात, दृढ़ संकल्पों को कल्पद्रुम की लेखनी, जीवनपथ को धरती की तरह कागज बनाकर बुद्धि रूपी सरस्वती भी महाकाल की व्याख्या करें तो जीवन में आनंद के इतने अवसर हैं कि उनकी व्याख्या नहीं हो सकती। इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए कि जब व्यक्ति नकारात्मक जीवन जीता है, तो अज्ञात भय चुपके से उसके जीवन में प्रवेश कर जाता है और यह भय मन को कमजोर करने के साथ शरीर के अवयवों को क्षतिग्रस्त करता है।

असली शिक्षा



आखिर शिक्षा हम क्यों प्राप्त करते हैं? शिक्षा प्राप्त करने का हमारा उद्देश्य क्या है? हम विद्यालयों या विश्वविद्यालयों में जाकर क्यों पढ़ते हैं? क्यों अपने जीवन के महत्वपूर्ण सालों को विश्वविद्यालय की चहारदीवारी में कुर्बान करते हैं? ऐसा इसलिए, क्योंकि हम अपने शेष जीवन में फूल खिलाना चाहते हैं। हम अपने जीवन-उद्यान को सुरभित और आनंदित करना चाहते हैं और अपनी भावी पीढ़ी को भी उसी सुगंध में सराबोर करना चाहते हैं। इसलिए हमें इस बात की खोज करनी चाहिए कि वह कौन-सी शिक्षा है जो हमारे जीवन को सफलताओं से भर सकती है और हमारी जीवन-बगिया को सुरभित और पुष्पित कर सकती है। क्या हमारी वर्तमान शिक्षा वैसी है, क्या वह हमारी आशाओं और अपेक्षाओं की कसौटी पर खरी उतरती है? यदि नहीं तो उसके स्थान पर किसी दूसरी शिक्षा पद्धति की बात हमें अवश्य सोचनी चाहिए। ऐसा इसलिए, क्योंकि शिक्षा का अर्थ ही होता है-प्रकाश, सफलता और उत्कृष्टता। तभी तो हमारे मनीषियों ने 'तमसो मा ज्योतिर्गमयÓ की परिकल्पना की थी, जो आज के परिवेश में कहीं भी साकार होती हुई नहीं दिखती। शिक्षा का संबंध ज्ञान से और ज्ञान का संबंध हमारे विवेक से है। ये तीनों शब्द सदैव एक ही पंक्ति में खड़े प्रतीत होते हैं।

आज हम लोगों ने शिक्षा को केवल विषयों से जोड़ दिया है। अब आप ही बताएं कि किसी एक विषय का स्नातक व्यक्ति भला शिक्षाविद् कैसे हो सकता है। शिक्षाविद् तो वह व्यक्ति कहलाएगा जिसे जीवनोपयोगी तमाम विद्याओं की समझ हो, क्योंकि शिक्षा का अर्थ कभी भी भौतिकी, रसायन, हिंदी, अंगे्रजी व गणित की पुस्तकों का पढऩा मात्र नहीं होता। ये तो सिर्फ विषय हैं, न कि संपूर्ण शिक्षा। इस दृष्टि से हम उस शिक्षा को अपने जीवन में उतारें जिससे तमाम विषयों और व्यवहारों का एक सुंदर स्वरूप तैयार हो सके। आत्म-ज्ञान एक ऐसी शिक्षा है, जिससे आप अपने आंतरिक व्यक्तित्व के बारे में जान सकते हैं। आपको शायद यह मालूम है कि आपके आंतरिक व्यक्तित्व में ऊर्जा का अक्षय भंडार निहित है। सद्गुरु के सानिध्य में रहकर आत्म-ज्ञान रूपी शिक्षा प्राप्त की जा सकती है। ध्यान (मेडिटेशन) के निरंतर अभ्यास से भी आप आत्मज्ञान को उपलब्ध हो सकते हैं।