मृत्यु अंत नहीं है लेकिन वह सिर्फ समस्त जीवन का चरम बिंदु है, पराकाष्ठा है। ऐसा नहीं है कि तुम समाप्त हो गए, बल्कि तुम दूसरे शरीर में चले गए। पूर्व के लोग इसी को चक्र कहते है। यह घूमता रहता है, घूमता रहता है। हां, इसको रोका जा सकता है, लेकिन इसको रोकने का उपाय मरते समय नहीं किया जा सकता।
नाना की मृत्यु से मैंने सबसे बड़ा पाठ यहीं सीखा। वे रो रहे थे और आंखों में आंसू भर कर वे हमें चक्र को रोकने के लिए कह रह रहे थे। हमें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें, चक्र को कैसे रोके। अब उनका चक्र तो उनका चक्र था। हमें तो वह दिखाई भी नहीं दे रहा था। यह तो उनकी अपनी चेतना थी और वे ही इसे करा सकते थे। इसलिए उनके आंसू बह रहे थे और उसे रोकने को हमसे बार-बार कह रहे थे। जैसे कि हम बहरे हो, हमने उनसे कहा: ‘नाना आपकी बात को सुन लिया है और हम समझ रहे है। कृपया आप चुप हो जाइए।’
उस क्षण कुछ हुआ, कुछ घटा। मैंने इसके बारे में कभी किसी को कुछ नहीं बताया। शायद इससे पहले समय उपयुक्त नहीं था। मैं उनसे कह रहा था, ‘आप चुप हो जाइए।’…उस कच्ची ऊबड़-खाबड़ सड़क पर बैलगाड़ी खड़खड़ करती हुई चल रही थी और वे कह रहे थे, राजा, चक्र को रोको, तुम सुन रहे हो। चक्र को रोको।‘
मैं भी उनसे बार-बार कह रहा था, कृपया आप चुप हो जाइए और मैं आपकी सहायता करने की कोशिश करूंगा।
मेरी नानी तो हैरान हो गई। उन्होंने अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से आश्चर्यचकित होकर मुझे देखा कि मैं क्या कह रहा हूं। और मैं कैसे उनकी सहायता कर सकता हैं?
मैंने कहा: ‘इतना हैरान होने की कोई बात नहीं है। अचानक मुझे अपने पिछले एक जीवन की याद आ गई है। इस मृत्यु को देख कर मुझे अपनी एक मृत्यु की याद आ गई है।’
मेरा वह जन्म और मृत्यु तिब्बत में हुआ था। वही एकमात्र ऐसा देश है जो वैज्ञानिक ढंग से जानता हे कि इस चक्र को कैसे रोका जा सकता है। इसके बाद मैंने कुछ जपना आरंभ कर दिया। न तो मेरी नानी समझ सकी, न मरते हुए नाना और न मेरा नौकर भूरा जो बहार बैठा हुआ बड़े ध्यान से सुन रहा था। बारह-तेरह वर्ष के बाद मेरी समझ में आया कि वह क्या था। इतना समय लगा उसको खोजने में। तिब्बत के इस कर्मकांड को ‘’बारदो-थोड़ाल’’ कहते है।
तिब्बत में जब कोई आदमी मरता है तो वे लोग एक विशेष मंत्र का जाप करते है। उस मंत्र को बारदो कहते है। वह मंत्र उस मरते हुए आदमी से कहता है, ‘शांत हो जाओ, मौन हो जाओ, अपने केंद्र पर जाओ और वहीं रहो। शरीर को कुछ भी हो, तुम केंद्र से मत हटो। केवल साक्षी बने रहो। जो हो रहा है उसे होने दो, बीच में बाधा मत ड़़ालो। याद रखो, याद रखो, कि तुम केवल साक्षी हो और वही तुम्हारा सच्चा स्वभाव है। अगर उसे याद रखते हुए तुम मरोगे तो यह चक्र रूक जाएगा।’
मैंने अपने मरते हुए नाना को बारदो-थोड़ाल का जाप किया, बिना यह जाने कि मैं क्या कर रहा हूं। अजीब बात तो यह थी की मैं जब इस मंत्र का जप रहा था तो मेरे नाना इसको सुन कर बिलकुल शांत हो गए। शायद तिब्बत भाषा का एक शब्द भी इससे पहले न सुना हो । उनको तो शायद यह भी नहीं मालूम था कि तिब्बत नाम को कोई देश भी है। मृत्यु के समय में भी वे चुप और एकाग्र हो गए। बारदो ने अपना काम किया, हालांकि वे उसे समझ नहीं सके। कभी-कभी वे बातें काम कर देती है जो समझ में नहीं आती, क्योंकि तुम उन्हें नहीं समझ पाते इसलिए वे काम कर देती है।
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