Thursday, 25 June 2026

मृत्‍यु अंत नहीं है लेकिन वह सिर्फ समस्‍त जीवन का चरम बिंदु है, पराकाष्‍ठा है। ऐसा नहीं है कि तुम समाप्‍त हो गए, बल्कि तुम दूसरे शरीर में चले गए। पूर्व के लोग इसी को चक्र कहते है। यह घूमता रहता है, घूमता रहता है। हां, इसको रोका जा सकता है, लेकिन इसको रोकने का उपाय मरते समय नहीं किया जा सकता।
नाना की मृत्‍यु से मैंने सब‍से बड़ा पाठ यहीं सीखा। वे रो रहे थे और आंखों में आंसू भर कर वे हमें चक्र को रोकने के लिए कह रह रहे थे। हमें समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें, चक्र को कैसे रोके। अब उनका चक्र तो उनका चक्र था। हमें तो वह दिखाई भी नहीं दे रहा था। यह तो उनकी अपनी चेतना थी और वे ही इसे करा सकते थे। इसलिए उनके आंसू बह रहे थे और उसे रोकने को हमसे बार-बार कह रहे थे। जैसे कि हम ब‍हरे हो, हमने उनसे कहा: ‘नाना आपकी बात को सुन लिया है और हम समझ रहे है। कृपया आप चुप हो जाइए।’

उस क्षण कुछ हुआ, कुछ घटा। मैंने इसके बारे में कभी किसी को कुछ नहीं बताया। शायद इससे पहले समय उपयुक्‍त नहीं था। मैं उनसे कह रहा था, ‘आप चुप हो जाइए।’…उस कच्‍ची ऊबड़-खाबड़ सड़क पर बैलगाड़ी खड़खड़ करती हुई चल रही थी और वे कह रहे थे, राजा, चक्र को रोको, तुम सुन रहे हो। चक्र को रोको।‘

मैं भी उनसे बार-बार कह रहा था, कृपया आप चुप हो जाइए और मैं आपकी सहायता करने की कोशिश करूंगा।

मेरी नानी तो हैरान हो गई। उन्‍होंने अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से आश्‍चर्यचकित होकर मुझे देखा कि मैं क्‍या कह रहा हूं। और मैं कैसे उनकी सहायता कर सकता हैं?

मैंने कहा: ‘इतना हैरान होने की कोई बात नहीं है। अचानक मुझे अपने पिछले एक जीवन की याद आ गई है। इस मृत्‍यु को देख‍ कर मुझे अपनी एक मृत्‍यु की याद आ गई है।’

मेरा वह जन्‍म और मृत्‍यु तिब्‍बत में हुआ था। वही एकमात्र ऐसा देश है जो वैज्ञानिक ढंग से जानता हे कि इस चक्र को कैसे रोका जा सकता है। इसके बाद मैंने कुछ जपना आरंभ कर दिया। न तो मेरी नानी समझ सकी, न मरते हुए नाना और न मेरा नौकर भूरा जो बहार बैठा हुआ बड़े ध्‍यान से सुन रहा था। बारह-तेरह वर्ष के बाद मेरी समझ में आया कि वह क्या था। इतना समय लगा उसको खोजने में। तिब्‍बत के इस कर्मकांड को ‘’बारदो-थोड़ाल’’ कहते है।

तिब्‍बत में जब कोई आदमी मरता है तो वे लोग एक विशेष मंत्र का जाप करते है। उस मंत्र को बारदो कहते है। वह मंत्र  उस मरते हुए आदमी से कहता है, ‘शांत हो जाओ, मौन हो जाओ, अपने केंद्र पर जाओ और वहीं रहो। शरीर को कुछ भी हो, तुम केंद्र से मत हटो। केवल साक्षी बने रहो। जो हो रहा है उसे होने दो, बीच में बाधा मत ड़़ालो। याद रखो, याद रखो, कि तुम केवल साक्षी हो और वही तुम्‍हारा सच्‍चा स्‍वभाव है। अगर उसे याद रखते हुए तुम मरोगे तो यह चक्र रू‍क जाएगा।’

मैंने अपने मरते हुए नाना को बारदो-थोड़ाल का जाप किया, बिना यह जाने कि मैं क्‍या कर रहा हूं। अजीब बात तो यह थी की मैं जब इस मंत्र का जप रहा था तो मेरे नाना इसको सुन कर बिलकुल शांत हो गए। शायद तिब्‍बत भाषा का एक शब्‍द भी इससे पहले न सुना हो । उनको तो शायद यह भी नहीं मालूम था कि तिब्‍बत नाम को कोई देश भी है। मृत्‍यु के समय में भी वे चुप और एकाग्र हो गए। बारदो ने अपना काम किया, हालांकि वे उसे समझ नहीं सके। कभी-कभी वे बातें काम कर देती है जो समझ में नहीं आती, क्‍योंकि तुम उन्‍हें नहीं समझ पाते इसलिए वे काम कर देती है।

Monday, 22 June 2026

मेरी आत्मकथा

सच कहूं तो मुझे अकेले रहना बेहद पसंद है। ये कोई मजबूरी नहीं, कोई असफलता नहीं और न ही किसी से भागने का उपक्रम है। ये मेरी चुनी हुई स्थिति और सहज ज़रूरत है। न किसी से बातचीत, न औपचारिक हालचाल, न बेवजह का मेल-जोल। एक बंद कमरा, कुछ खामोशी, और खुद के साथ रहने का पूरा अधिकार बस इतना ही तो चाहिए मुझे।

इस बंद कमरे में मैं खुद से झूठ नहीं बोलता। बाहर की दुनिया में जहां हर मुस्कान के पीछे कोई भूमिका निभानी पड़ती है, यहां मुझे किसी को प्रभावित नहीं करना होता। यहां न अच्छा दिखने का दबाव है, न समझदार साबित होने की हड़बड़ी। यहां मैं जैसा हूं, वैसा ही रह सकता हूं, थका हुआ, उलझा हुआ, चुप या कभी-कभी बिल्कुल खाली।

अकेलापन मुझे डराता नहीं, बल्कि सुकून देता है। भीड़ में रहकर जो घुटन होती है, वह इस खामोशी में नहीं होती। यहां मेरी सांसें मेरी होती हैं, मेरे विचार बिना रोक-टोक बहते हैं। यहां कोई बीच में टोकता नहीं, कोई सलाह नहीं देता, कोई ये नहीं पूछता कि “ऐसा क्यों सोचते हो?” इस कमरे में मेरे सवाल भी मेरे हैं और उनके जवाब न मिलने की आज़ादी भी।

मुझे लोगों से शिकायत नहीं है, बस उनसे थकान है। हर बातचीत में खुद को थोड़ा-थोड़ा समझौता करते देखना, हर रिश्ते में उम्मीदों का बोझ उठाना ये सब धीरे-धीरे भीतर कुछ तोड़ देता है। अकेले रहने में कम से कम ये डर नहीं रहता कि कोई मुझे गलत समझ लेगा, क्योंकि यहां मुझे समझने वाला और कोई नहीं सिवाय मेरे खुद के।

इस बंद कमरे में समय अलग तरह से चलता है। यहां घड़ी की सुइयां उतनी निर्दयी नहीं लगतीं। कभी घंटों यूं ही बीत जाते हैं, बिना किसी उपलब्धि के, बिना किसी अपराधबोध के, तो कभी खिड़की से आती रौशनी दीवार पर गिरती है और मैं उसे देखते हुए सोचता हूं कि जीवन भी शायद इतना ही साधारण है। आता है, ठहरता है, और फिर चला जाता है।

यहां मैं अपनी कमजोरियों से भागता नहीं। उन्हें चुपचाप सामने बैठा देखता हूं। कभी-कभी वे डराती हैं, कभी हंसाती हैं, और कभी सिर्फ थका देती हैं। लेकिन कम से कम वे सच्ची होती हैं। बाहर की दुनिया में जिन ताकतों का दिखावा करना पड़ता है, उनकी यहां कोई ज़रूरत नहीं।

अकेले रहने का मतलब ये बिल्कुल नहीं कि मुझे किसी की ज़रूरत नहीं। ज़रूरत तो होती है, बहुत होती है। लेकिन हर ज़रूरत को किसी इंसान पर थोप देना भी ठीक नहीं। कुछ खालीपन ऐसे होते हैं जिन्हें बस स्वीकार किया जा सकता है, भरा नहीं जा सकता। ये समझ मुझे इस अकेलेपन ने दी है।

इस कमरे में बैठकर मैं अपने बीते हुए कल से भी मिलता हूं। वे यादें जो लोगों के बीच रहते हुए दब जाती हैं, यहां खुद-ब-खुद सामने आ जाती हैं। कुछ अच्छी, कुछ कड़वी, कुछ अधूरी। मैं उन्हें ठीक करने की कोशिश नहीं करता, बस उन्हें रहने देता हूं। शायद यही परिपक्वता है, हर चीज़ को सुधारने की ज़िद छोड़ देना।

मुझे पता है, बहुत से लोग इसे उदासी कहेंगे, कुछ इसे अवसाद समझेंगे, और कुछ इसे असामाजिकता का नाम देंगे। लेकिन मेरे लिए ये शांति है। एक ऐसी शांति जो बाहर की हंसी-ठहाकों में नहीं मिलती। ये शांति मुझे खुद के करीब ले जाती है, और शायद यही सबसे ईमानदार रिश्ता है खुद के साथ।

मैं जानता हूं कि जीवन यूं ही बंद कमरे में नहीं गुजरेगा। बाहर निकलना पड़ेगा, बोलना पड़ेगा, निभाना पड़ेगा। लेकिन जब भी मौका मिलेगा, मैं फिर इसी खामोशी में लौट आऊंगा। क्योंकि यहीं मैं खुद को बिना किसी शर्त के स्वीकार कर पाता हूं।

और सच कहूं तो इस अकेलेपन में मैं टूटा हुआ नहीं हूं। मैं बस शांत हूं। थोड़ा थका हुआ, थोड़ा समझदार, और बहुत हद तक वास्तविक। यही मेरी डायरी का सबसे सच्चा पन्ना है जहां कोई दर्शक नहीं, कोई जज नहीं, सिर्फ मैं हूं और मेरी खामोशी...!