Friday, 22 May 2026

कर्म और भाग्य



कर्मवादी कहते हैं कि भाग्य कुछ नहीं होता, जबकि भाग्यवादी कहते हैं कि किस्मत में लिखा ही सब कुछ होता है, भले ही कर्म कुछ भी करते रहो। सच यह है कि भाग्य और कर्म दोनों के बीच एक रिश्ता जरूर है। यानी भाग्य के बगैर कर्म अधूरा है और कर्म के बगैर भाग्य अधूरा है। अब यह बात अलग है कि कर्म से भाग्य बनता है या हम भाग्य से कर्म करते हैं। श्रीराम को वनवास हो चुका है। श्रीराम, सीता और लक्ष्मण, तीनों वन के लिए रवाना हो चुके हैं। राजा दशरथ इस पूरी घटना को भाग्य का लिखा मान रहे हैं, लेकिन श्रीराम के जाने के बाद जब वे कौशल्या के कक्ष में अकेले होते हैं तो उन्हें अपनी गलतियां नजर आने लगती हैं। युवावस्था में जाने-अनजाने श्रवण कुमार की हत्या की थी, बूढ़े मां-बाप से उनका इकलोता सहारा छिन लिया था। यह सब उसी का परिणाम था। जैसी करनी-वैसी भरनी का नियम मनुष्य के कर्म और भाग्य का समीकरण बनाता है। मनुष्य अपने ही कर्मों के कारण सुख-दुख, लाभ-हानि, जन्म-मरण प्राप्त करता है। संक्षेप में कहें, तो भाग्य हमारे कर्मों का वह हिस्सा है, जो हमारे भावी जीवन का निर्माता बनता है और नियंत्रक भी होता है, जबकि कर्म जान-बूझकर किया गया हो या अनजाने में, उसका फल कर्ता को जरूर मिलता है।

कर्म रूपी बीज से ही भाग्य रूपी वृक्ष बनता है। एक गाय दलदल में फंसी हुई थी। एक चोर वहां से गुजरा, लेकिन गाय को उसी हाल में छोड़कर वह आगे बढ़ गया। कुछ दूर चलने पर उसे सोने की मोहरों से भरी थैली मिली। थोड़ी देर बाद एक वृद्ध साधु उसी मार्ग से गुजरा। गाय को दलदल में फंसा देखकर साधु ने उसकी मदद की। साधु ने गाय को बचा लिया, लेकिन साधु आगे बढ़ा तो एक गड्ढेे में गिर गया। नारद ने इस घटना पर भगवान से पूछा, यह कौन-सा न्याय हुआ? भगवान मुस्कराते हुए बोले, नारद यह सही ही हुआ। जो चोर गाय को बचाए बगैर आगे बढ़ गया, उसे इस पाप के कारण केवल कुछ मोहरे ही मिलीं, जबकि उस वृद्ध साधु को गड्ढे में इसलिए गिरना पड़ा, क्योंकि उसके भाग्य में मृत्यु लिखी थी, लेकिन गाय को बचाने के कारण उसके पुण्य बढ़ गए और उसकी मृत्यु एक छोटी-सी चोट में बदल गई।

Tuesday, 12 May 2026

जीवन का संघर्ष

सनातन धर्म की कुछ कथाओं की सार्थकता हर युग में पाई जाती है। जैसे राम-रावण युद्ध, महाभारत और सागर मंथन। सागर मंथन हर मनुष्य पूरी जिंदगी करता है। यदि देवताओं की तरह उसके प्रयास और कार्यप्रणाली सत्मार्गी है तो उसे अमृत की प्राप्ति होती है। अन्यथा अनैतिक मार्गों के द्वारा किए मंथन के द्वारा अहंकार रूपी मदिरा प्राप्त होती है, जिसे पीकर वह पतन को प्राप्त होता है। इसी प्रकार राम-रावण युद्ध भी हर समय लड़ा जा रहा है। जो प्राणी सुग्रीव और विभीषण की तरह भगवान के पक्ष में युद्ध करते हैं उन्हें भवसागर को पार करने में विजय प्राप्त होती है और रावण की सेना के राक्षस जीवन मरण रूपी भवसागर में डूबते, उतरते रहते हैं और बार-बार अपने कर्मों के अनुसार निम्नतर योनियों में जन्म लेकर नर्क का दुख भोगते हैं। इसी प्रकार महाभारत की कथा का चित्रण भी किया गया है। गुरुनानक देव के अनुसार केवल मनुष्य ही ऐसा प्राणी है, जिसे बुद्धि और विवेक के अनुसार कर्म करने का अधिकार प्राप्त होता है। जिस प्रकार बुद्धि और विवेक मनुष्य को सत्कर्मों की तरफ प्रेरित करते हैं, उसी प्रकार अंधी इच्छाएं उसे मानसिक व्याधियां प्रदान करती हैं। महाभारत के कथानक के अनुसार धृतराष्ट्र की इच्छाएं अंधी थीं। इन अंधी इच्छाओं से उत्पन्न संतानें भी उसी प्रकार ईष्र्या, लोभ, मोह रूपी पुत्रों-दुर्योधन और दुशासन आदि कहलाती हैं।
बुद्धि और विवेक रूपी पांडव और धृतराष्ट्र और उनके पुत्रों रूपी बुराइयां हर मनुष्य में होती हैं, परंतु कृष्णरूपी अच्छे पथ-प्रदर्शक और मनुष्य की अपनी मेहनत और विवेक के जरिये कुछ जीवनरूपी महाभारत को जीत लेते हैं और शेष लोग अपनी इच्छाओं की पूर्ति करते-करते कौरवों की तरह जीवनरूपी संग्राम में मारे जाते हैं। ज्यादातर लोग अपनी बुराइयों के कारण असफल होने पर कहते हैं कि इस युग में कृष्णरूपी सारथी कहां तलाशें, परंतु ऐसे लोगों को यदि कोई अच्छा पथप्रदर्शक मिलता भी है तो ये उसके दिखाए मार्ग की खिल्ली उड़ाकर उस पर नहीं चलते हैं। भगवान कृष्ण ने दुर्योधन और धृतराष्ट्र को समझाकर सद्मार्ग पर चलने के लिए कहा था उसी प्रकार दुर्योधन ने भगवान का मजाक उड़ाकर उनके दिखाए मार्ग पर चलने से मना कर दिया था।
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