Thursday, 17 April 2014

जाते जाते वह कड़वा सच राष्ट्र को बता दीजिये मनमोहन सिंह जी !

श्रद्धेय मनमोहन सिंह जी,
एक संवैधानिक पद से विदाई या एक परिवार की सेवा से सेवानिवृति के पूर्व संजय बारु और पीसी पारेख ने आपको दो गुलदस्तें भेंट किये हैं। इस भेंट को पा कर निश्चय ही आप आहत हुए होंगे, क्योंकि दुनियां अब तक जो कहती थी, उसका जवाब तो आपके पास था, पर आपके अपनो ने ही जो चोट पहुंचाई है, उसकी पीड़ा आप सहन नहीं कर पाये होंगे। इसलिए उनकी बातों का कोई जवाब आप नहीं दे पाये हैं। यह जरुर है कि कभी अकेले में बैठे होंगे, तब आपकी आंखें भर आयी होगी। आपसे जो पहाड़ जैसा पाप हो गया है, उसे ले कर आपके अन्तःकरण ने अवश्य ही धिक्कारा होगा। कठोर कर्म और तप से जीवन में जो कमाया, उसे इन दस वर्षों में गवां दिया। अपने स्वाभिमान को गिरवी रख कर प्रधानमंत्री पद की गरिमा को गिराने से आपका उज्जवल जीवन कलंकित हुआ है। जीवन के जो बचे खुचे पल है, वे हमेशा आपको अपनी गलतियों की याद दिलाते रहेंगे, परन्तु पूरा राष्ट्र  एक सवाल पूछना चाहता है- यदि आपमें उस पद की पात्रता नहीं थी, तो डमी प्रधानमंत्री बनने की क्या आवश्यकता थी ? कहा जाता है कि सत्ता के दो शक्ति केंन्द्र थे, पर वास्तव में एक ही शक्ति केन्द्र था, जो राह में निर्विकार प्रतिमा बैठी थी, वही शक्ति केन्द्र नहीं हो कर मात्र एक मूर्ति थी। सभी उसकी अवमानना करते हुए वास्तविक शक्ति केन्द्र से जुड़े हुए थे। राष्ट्र आपसे दूसरा प्रश्न पूछना चाहता है- आपको ऐसी भूमिका अभिनित करने की क्या आवश्यकता थी ?
भारत के संविधान ने प्रधानमंत्री पद को असिमित शक्तियां दी है। आप उस पद पर आरुढ़ जरुर थे, पर शक्तिविहिन थे। आपके पास निर्णय करने का अधिकार नहीं था। आप सिर्फ एक परिवार को सेवाएं दे रहे थे। आप उस परिवार की कृपा से गदगद थे। क्योंकि आपको मालूम था कि आप अपने बलबूते लोकसभा का चुनाव नहीं जीत सकते। अपनी साम्मर्थय से दो सांसदों को जीतवा कर लोकसभा में नहीं बिठा सकते। प्रभावशाली भाषण से आप जनता को नहीं बांध सकते। अपने तार्किक व सारगर्भित भाषण से आप संसद को मंत्रमुग्ध नहीं कर सकते, परन्तु भाग्य की विडम्बना देखिये कि आप दस वर्ष तक प्रधानमंत्री पद पर आरुढ़ रहें। एक डमी प्रधानमंत्री का इतना लम्बा कार्यकाल भारत के संसदीय लोकतांत्रिक इतिहास का रिकार्ड है। हम सभी भारतीय नागरिक आपकी सेवानिवृति पर भगवान से यही प्रार्थना करते हैं कि भविष्य में देश को कभी डमी प्रधानमंत्री नहीं दें। हमे शक्तिशाली प्रधानमंत्री चाहिये, जो भारत की तकदीर बदलने की क्षमता रखता हों।
राजनेता बनने के लिए आपने अपने भीतर बैठे हुए अर्थशास्त्री का कत्ल कर दिया, जिसकी भारी कीमत इस देश की जनता को चुकानी पड़ी है, क्योंकि भारत की जनता ने 2009 में ईमानदार अर्थशास्त्री के पक्ष में इस आशा के साथ वोट दिया था कि वे आर्थिक सुधारों के जरिये देश को प्रगति और खुशहाली की डगर पर ले जायेंगे, किन्तु आपने देश की जनता के साथ दगाबाजी की है। जिस व्यक्ति को अर्थिक सुधारों का जनक कहा जाता है, वह व्यक्ति ने राजनेता बन अर्थव्यवस्था की बरबादी का कारक बन गया। यदि आपके भीतर का अर्थशास्त्री जिंदा होता, तो आपकी नाक के नीचे हुए कई लाख करोड़ के घोटालों को आप चुपचाप नहीं देखते। भारत की गरीब जनता के हित के लिए प्रधानमंत्री पद को ठोकर मार कर सत्ता से बाहर आ जाते।
यदि आपके भीतर का अर्थशास्त्री जिंदा होता, तो बरबादी के मंजर को चुपचाप नहीं देखता। वह आठ दस लाख करोड रुपयों को घटलों-घोटालों में नहीं उड़ने देता। बैंको के करोड़ो रुपये कोयले के अभाव में अधुरी पड़ी बिजली परियोजनाओं में नहीं फंसते। सरकारी खजाने के कई लाख करोड़ रुपये उन खैरात योजनाओं में नहीं लुटाये जाते, जिससे वोट मिलते हैं, किन्तु जनता का पैसा जनता को राहत कम देता हैं और अधिकांश पैसा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। औद्योगिक विकास अवरुद्ध नहीं होता। युवाओं के मुहं से रोजगार का निवाला नहीं छीना जाता। यह देश का दुर्भाग्य ही था कि वह अर्थ विशेषज्ञ, जिसे 1991 की बीमार अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का श्रेय जाता है, बेबस हो, आंखे बंद किये लाचारी सब कुछ नहीं देखता रहा।
घोटालों, खैरात योजनाओं, बैंको की उधारी डूबने और औद्योगिक उत्पादन घटने और टेक्स वसूली कम होने से जो राजस्व घाटा हुआ, उसका सारा भार जनता पर डाल दिया गया। जनता की जेब से टेक्स के रुप में पैसा निकाल कर सरकारी खर्चा तो चल गया, परन्तु इस सारे गड़बडजाल से भारत की गरीब जनता को महंगाई की असहनीय पीड़ा झेलनी पड़ रही है। दस वर्षों में एक सत्ता शक्तिकेन्द्र ने अनियंत्रित, बेबाक और खुली लूट से देश की गरीब जनता को बीस लाख करोड़ की चपत लगाई है। भारत की जनता को अपनी बरबादी का कारण समझ में आ गया है। जनता खून के आंसू रो रही है। लुटेरे सत्ता में आने के लिए चाहे जितने हाथ पांव मारे। चाहे जितने सत्ता षड़यंत्र करें। धर्म के आधार बना लोगो को भयभीत करें, किन्तु जनता के पेट पर जो महंगाई की लात मारी है, उसकी पीड़ा इतनी अधिक है कि भारत की जनता सब कुछ भूल कर लुटेरों को ठुकराने का पूरा मानस बना चुकी है।
आपको डमी प्रधानमंत्री बना जिन्होंने इस देश की जनता के साथ छल किया है, उसका दंड उन्हें भुगतना पड़ेगा। सत्ता से हटने के बाद आप डमी प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे। आपके आगे भूतपूर्व विशेषण लग जायेगा। घोटालों की जब भी जांच होंगी, न्यायिक पक्रिया आपको ही बुलायेगी। एक परिवार के प्रति वफादारी निभाने और उन्हें सेवा देने के कारण आपको अपमानित होना पड़ सकता है। वे क्षण आपके लिए बहुत तक़लीफदायक होंगे। मात्र प्रधानमंत्री के वस्त्र पहनने और कुर्सी पर बैठने की ललक के कारण आपको जीवन के संध्याकाल में भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। चाहे आर्थिक अपराधियों ने कई लाख करोड़ डकारे हैं और आपकी तरफ एक ढ़ेला भी नहीं फैंका हो, किन्तु जो कुछ किया है, आपकी आड़ ले कर ही किया है।
आपका रोल डमी प्रधानमंत्री का ही रहा हों, किन्तु उस सरकार का नाम तो मनमोहन सिंह सरकार ही होगा। अभी तो दो किताबें ही आयी है, सम्भव है सत्ता जाने के बाद और कई किताबे सामने आयें। कोई भूतपूर्व सीबीाआई अधिकारी भी प्रामणिक पुस्तक बजार में फैंक सकता है। निश्चय ही आपकी बहुत किरकिरी होने वाली है। रहस्यों पर से जब पर्दे उठने लगेंगे तो यह सिलसिला थमेगा नहीं।
प्रधानमंत्री जी, एकांत के क्षणों में जब आपको सारा घटनाक्रम याद आता होगा और वे खलपात्र भी आपके सामने आते होंगे, जो अपराधी हैं और जिन्होंने देश की अर्थव्यवस्था का जानबूझ कर कबाड़ा किया है। निश्चय ही आपका अंतःकरण आपको झकझोरता होगा। आप तिलमिला जाते होंगे। हो सकता हैं सार्वजनिक रुप से सबकुछ प्रकट नहीं करना चाहते हों। अतः मेरे साथ पूरा देश आपसे एक छोटी सी अर्ज कर रहा है-जाते-जाते या जाने के बाद वह सच बता दीजिये, जो देश जानना चाहता है। आप जानते हैं कि किसने जनता का कितना धन लूटा है और लूटा हुआ धन कहां है ? आपने एक परिवार को जो सेवाएं दी है, उसका भरपूर लाभ तो उन्हें मिल गया, पर अब देश को भी उपकृत कर वह सच उगल दीजिये जिसे देश जानना चाहता है। निश्चय ही यदि ऐसा करने का आप साहस कर पायेंगे, तो आपका सारा बोझ हल्का हो जायेगा। जनता आपको क्षमा कर देगी। संजय बारु और पीसी पारेख की कीताबों की कड़ी में आप भी एक किताब लिख दीजिये। इस किताब का शीर्षक रख सकते हैं- एक कडवा सच, जिसके लिए मैं प्रायश्चित कर रहा हूं।

Monday, 14 April 2014

जो हमदर्द बनने का ढोंग कर रहे हैं, वे ही दर्द की सौगात दे रहे हैं

आंखों पर मजहबी जुनून की पट्टी बांध कर जिन्हें अंधेरे में ठोकरे खाने के लिए छोड़ दिया है, वे तब तक अपनी तक़लीफों के बारें में उन्हें ही दोषी समझते रहेंगे, जिनके बारें में उनके कानों में जहर भरा जाता है। कान तो महज सुन सकते हैं, देख नहीं सकते, इसलिए कहने वालें की नीयत भांप नहीं पाते। काश ! वे आंखों पर बंधी पट्टी खोल पाते और आपने आस-पास के चेहरों को समझ पाते, तो अपनी बद से बदत्तर हुई हालत का रहस्य जान पाते। उन्हें समझ आ जाता कि उनकी गरीबी, बदहाली, पिछड़ापन के जिम्मेदार कौन है। वे ही लोग हैं, जो दर्द की सौगात दे रहें हैं, किन्तु हमदर्द बनने का ढ़ोग कर रहे हैं।
सियासी चौसर के बेजान मोहरों की तरह मुसलमानों का उपयोग मात्र बाजिया जीतने के लिए किया जाता रहा है। जो बाजियां जीतते रहें, वे तो मालामाल होते रहें, परन्तु उन्हें बदलें में कुछ नहीं दे पायें। वे देना भी नहीं चाहते, क्योंकि उनकी नज़़रों में उनकी औकात थोक वोटों के अलावा कुछ नहीं हैं। यदि आंखों की पर बंधी पट्टी खोल पाते, तो वे सही और गलत की पहचान कर पाते। जीवन खुशहाल बनाने के लिए बच्चों को अच्छी तामिल दे पातें। अच्छी ज़िदगी जीने के लिए बेहतर नौकरियां तलाशते। उनके जीवन में उजाला हो जाता, तो वे महज वोट बैंक नहीं रह पाते। दरअसल मुस्लिम समुदाय के मन में उजाले की ललक तो हैं, परन्तु वे आंखों पर बंधी पट्टी हटाने का साहस नहीं कर पा रहे हैं।
आंखों की पट्टी खुल जाती तो इतिहास की इबारत पढ़ी जा सकती है। इतिहास के पन्नों पर उन खलनायकों के कारनामें दर्ज हैं, जिन्हें अब भी रहनुमा बताया जाता है। मसलन पंड़ित जी जिन्ना के कंधे पर हाथ रख कर और उनकी आंखों में आंखें डाल कर इतना भर बोल देते – ‘’ मैं पंड़ित जवाहर लाल नेहरु, मोहम्मद अलि जिन्ना को आज़ाद भारत का पहला मुस्लिम प्रधानमंत्री घोषित करता हूं। यदि ऐसा होता तो आकाश में घुमड़ रही अविश्वास की घटाएं बरस जाती। पाकिस्तान नहीं बनता। लाखों जीवन बरबाद नहीं होते। करोड़ो तबाह नहीं होते। किन्तु नेहरु ऐसा नहीं कह पाये। उनका गरुर, उनकी अतृप्त महत्वाकांक्षा करोड़ो जीवन से बड़ी थी। उन्होंने जिन्ना को जानबूझ कर अपमानित किया था, उसकी भारी कीमत भारत राष्ट्र को चुकानी पड़ी।
कश्मीर समस्या शतप्रतिशत पंड़ित जी की देन है। पाकिस्तान का जीवन ही कश्मीर के तोते में कैद है। कश्मीर समस्या नहीं पैदा होती, तो चार-पांच युद्ध नहीं होते। नफरत की दीवार मजबूत होने के बजाय ढ़ह जाती। रावी और चिनाब का पानी दोनो देशों को एक कर देता। पंड़ित जी की गम्भीर भूल से आज़ादी के बाद की पांच पीढ़िया को अनचाहे कष्ट नहीं भोगने पड़ते।
राजीव गांधी ने रामजन्म भूमि के ताले खुलवा कर बर्र के छज्जे पर जानबूझ कर पत्थर फैंका था। बाईस बरस बाद आज एक कोबरें में जहर भर कर स्टिंग आपरेशन करने वाले यह क्यों भूल जाते हैं कि राम मंदिर का शिलान्यास कांग्रेस सरकार के प्रधानमंत्री ने किया था। उन्होंने पूजा कर वहां राम मंदिर बनाने का संकल्प लिया था। यह क्यो भूल जाते हैं कि विवादित ढ़ांचा ढहाये जाने के समय प्रधानमंत्री कांग्रेस सरकार का था, जो यदि चाहते तो इस दुखद घटना को रोक सकते थे। परन्तु सियासी नाटक का मंचन प्रारम्भ करने वाले अंत में हट जाते हैं और सार दोष उन पर डाल देते हैं, जिन्होंने नाटक का अंत एक क्लाइमेक्स के साथ किया था। अपने सियासी लाभ के लिए अपनी भूमिका को भूल कर जनता के जेहन में उन कलाकारों की याद दिलाते हैं, जिन्होंने उस नाटंक का अंत किया था। यह कपट नीति हैं। जनता का मूर्ख बनाने का कुत्सित प्रयास है।
गोधरा में रेल की बोगियां में लोगों को ज़िदा नहीं जलाया जाता, तो गोधरा की लपटे पूरे गुजरात को नहीं झुलसाती। दस वर्ष से गुजरात की बुझी हुई आग पर सियासी रोटियां सेकने की कोशिश की जा रही है। गुजरात तो गोधरा की लपटों से झुलसा था, किन्तु मुजफ्फर नगर में तो कोई आग ही नहीं लगी थीं। मामलूी घटना थी। इस घटना को जानबूझ कर थोक वोटों पर अनुकम्पा दर्शाने के लिए बड़ा किया गया। सुनियाजित तरीके से दंगा भड़काया गया। प्रशासन कई दिनों तक तमाशबीन बना रहा, इसलिए दंगाईयों के हौंसले बढ़ते गये। दंगा करवाया। लोगों को रुलाया। उनके घरों को उजाडने में मदद की। अब पीड़ितों पर पंद्रह हजार करोड़ खर्च कर उनसे वोट मांगे जा रहे हैं। पर अनुकम्पा भी दोनो समुदाय के पीड़ितो के प्रति नहीं, एक समुदाय पर ही, ताकि नफरत अधिक बढ़े। गुस्सा बढ़े। लोग अकारण ही पुनः आवेशित हो जाय, जिसका सियासी लाभ बटोरा जाय। क्या यह सियासत का सबसे घटिया और निकृष्ट रुप नहीं है ? पहले नागरिकों को धर जलने दों। लोगों को मरने दों। थोड़े दिन बाद उन रोते हुए लोगों के पास जाओं और कहो- ये रुपये लों, अपना घर बना लों और जो मर गये उनको भूल जाओ। पर याद रखों वोट हमे ही देना। यदि नहीं दोगे तो भविष्य में न तो कोई बचायेगा और न ही सरकारी सहायता मिलेगी।
गुजरात त्रासदी एक दुखद घटना के प्रतिकार में यकायक भड़की आग थी, जिसे काबू पाने में देर लगी थी, तब तक यह बहुत कुछ जला चुकी थी, किन्तु मुजफ्फरनगर में तो आग एक सुनियोजित षड़यंत्र के तहत लगायी गयी थी। प्रश्न उठता है कि केन्द्र की एक सरकार और उसकी सारी मशीनरी, मानवाधिकार पिछले दस वर्ष से गुजरात सरकार के मुखियां को अपराधी घोषित करने में अपनी सारी शक्ति खर्च कर रहे हैं, वे मुजफ्फरनगर त्रासदी पर क्यों मौन है ? जांच एंजेसियों को हकीकत जानने के लिए और उन षडयंत्रंत्रकारियों के काले कारनामें उजागर करने के लिए जानबूझ क्यों नहीं लगाया जा रहा है ? क्योंकि वे जानते हैं यदि नंगा सच सामने आ जायेगा, तो सभी पार्टियों की धर्मनिरपेक्षता संकट में पड़ जायेगी। समझ में नहीं आता गुजरात दंगो की रट लगाते हुए नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध बराबर कुछ न कुछ बोलने वाली सियासी पार्टियां मुजफ्फर नगर त्रासदी और अखिलेश सरकार की दंगो में संलिल्पतता की याद दिलाने में क्यों हिचक महसूस होती हैं ? क्या वहां दंगे नहीं हुए थे ? क्या वहां बेकसूर लोगों की हत्या सियासी षड़यंत्र के तहत नहीं हुई थी ?
बोटी बोटी काटने जैसे दुर्भावना वाले बयान देने वाले शख्स की पीठ थपथपाना और प्रत्युत्तर में दी गयी प्रतिक्रिया पर बवंडर करने के उपक्रम को किस प्रकार की धर्मनिरपेक्षता कहा जा सकता है ? बर्र के छज्जे पर पत्थर फैंको और जब मधु मक्खियां काटने दौड़े तब सारा दोष अपनी प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दल पर डाल कर भाग जाओ, यही छल नीति है। थोक वोट पाने की धूर्त कोशिश है।
आप गरीब, पिछडे़ हैं, अभावों में बहुत तक़लीफ दायक ज़िंदगी जी रहे हैं, तो जियों। आपकी हालात हम नहीं बदलेंगे, क्योंकि यह हमारे लिए लाभ का सौदा नहीं है। हम तो यही चाहते हैं कि आपकी हालत इससे भी ज्यादा खराब हों, ताकि आपकी आंखों पर बंधी पट्टी खोलने का प्रयास नहीं करें। आपके हाथों में धर्मनिरपेक्षता का तंबुरा थमा रखा है, इसे बजाते रहों, साम्प्रदायिक शक्तियों के भय से बचने के लिए कव्वाली गाते रहो। हम सदा आपके साथ रहेंगे जब तक आपके थोक वोट हमें मिलते रहेंगे। क्योंकि हमारी नीति यह है कि हिंदुओं को जातियों के आधार पर बांटों, पिछड़े और दलित हिदुंओं के साथ मुस्लिम वोटों का समीकरण बिठा, चुनाव जीतों। यह सत्ता तक पहुंचने का शार्ट कट है। खुदा न करें आपकी आंखों पर पट्टी खुल जाय और आप नग्न आंखों से सारी हकीकत समझ जायें। जब ऐसी होगा, हमारी सियासत खत्म हो जायेगी। हमारा अस्तित्व मिट जायेगा। परन्तु हम ऐसा होने नहीं देंगे। हमे भारत की जनता की तकलींफो से कोई मतलब नहीं हैं। देश के विकास से कोई मतलब नहीं हैं। हमें सिर्फ सत्ता चाहिये। अधिकार चाहिये, ताकि जनता को मूर्ख बना कर लूटते रहें।

हमे भारत को बरबाद करने का हक है, क्योंकि हम सेक्युलर हैं !

हमने देश के संसाधनों का लूटा। रिकार्ड घोटाले-घपले किये। जम कर भ्रष्टाचार किया। गरीब जनता के पैसे को लूट कर काला धन बनाया। इसे विदेशी बैंकों में जमा कराया। हम मालामाल हुए, देश कंगाल हुआ, पर ऐसा करने का हमें हक है, क्योंकि हम सेक्युलर हैं। भारत में सेक्युलरिजम का नकाब पहन कर आप कुछ भी कर सकते हैं। आपको गलत काम करने के लिए हमारी तरह घबराना नहीं चाहिये, क्योंकि सेक्युलिरिजम वह कवच है, जिसमें सारे पाप छुपाये जा सकते हैं।
सेक्युलिरिजम के नाम पर हम जनता से कुशासन देने के लिए पुनः पांच वर्ष का अधिकार मांग रहे हैं। माना कि हमने जनता को दस वर्षों तक महंगाई के दर्द की तकलीफ के कारण रुलाया। माना कि हमने जनता की ऐसी हालत कर दी कि भर पेट भोजन करने की उसकी आदत ही नहीं रही। परन्तु उसको सेक्युलिरिजम के नाम पर इतना त्याग तो करना ही होगा। आप गरीब ही तो होंगे। भूखे ही तो रहेंगे, पर दुनियां में जिंदा तो रहेंगे। अभावों की पीड़ा सहते-सहते सांसे टूट जाय, तो कोई बात नहीं, पर हमेशा सेक्युलरिजम के भजन करते रहेंगे, तो आपका अगला जनम सुधर जायेगा।
एक शख्स कहता है कि मैं प्रधानमंत्री बनुंगा। क्यों बनेगा वह ? क्यों जमीन से उठ कर पर आकाश में उड़ने की कोशिश कर रहा है ? प्रधानमंत्री बनने का उसको क्या हक है ? जबकि हमारे परिवार का वजूद मौजूद हैं। हम कैसे भी हैं, चाहे नौसिखियें हैं, अयोग्य है, भ्रष्ट हैं, पर इस देश पर राज करने का हमारा ही हक हैं, क्योंकि हमारा परिवार लोकतांत्रिक देश में राजतंत्रीय शासन को स्थापित करने का अधिकार ले कर आया है। हमारा परिवार सेक्युलर है। हमारे परिवार के मुखिया ने देश का विभाजन करवाया। लाखों को दुनियां से कूच करवाया। करोड़ो को तबाह किया। हमने पैंसठ वर्षों में सैंकड़ों दंगे करवाये। 1984 में सिखों का कत्लेआम करवाया। हमे यह सब करवाना जरुरी था, क्योंकि हमे कम्युनल ताकतों को रोकना था।
हम जानते हैं, इस देश की जनता हमसे खफा है। हमसे छुटकारा चाहती है। पर हम ऐसा होने नहीं देंगे। हमने भारत की गरीब जनता को खूब रुलाया, अब खून के आंसू रुलायेंगे। देश को आर्थिक रुप से तबाह किया, पर तबाही अभी पूरी नहीं हुई है। देश के संसाधनों को जम कर लूटा, पर अभी और लूटना बाकी है। देश को पूरी तरह बरबाद करने के लिए दस वर्ष की अवधि कम होती है, इसलिए पांच वर्ष और मांग रहे हैं। भारत पर शासन करने का हमे हक है। कोई हमारा अधिकार छीनने की कितनी ही कोशिश क्यों न करें, हम उसे कामयाब होने नहीं देंगे, क्योंकि हम सेक्युलर हैं और वे कम्युनल है। हम कम्युनल ताकतों को रोकने के लिए सेक्युलरिजम का झंड़ा उठा कर दौड़ेंगे और सभी से कहेंगे- हमारे मिशन में शामिल हो जाओ। यदि वे कम्युनल आ गये, तो हम सब बरबाद हो जायेंगे। हमारी सियासी हसरते अधुरी रह जायेगी।
अंग्रेज़ो से मिल कर हमने मुसलमानों के लिए पाकिस्तान बनाया। हम जानते थें बंटवारा अव्यवहारिक और बेतुका था। मुसलमान भारत के हर गांव और शहर में हिन्दुओं के साथ रहता है, वह भाग कर पाकिस्तान जा नहीं सकता था, इसलिए हमने उसे अपने सियासी फायदे के लिए मोहरा बना दिया। उसे कहा हमारे साथ रहो, हमे वोट देते रहों, क्योंकि हम सेक्युलर हैं याने कि मुसलमानों के हितैषी और जो इस देश में हिन्दुओं के हितैशी है, वे कम्युनल हैं। अपने सियासी लाभ के लिए मुसलमानो की गरीबी को बढ़ाया। उसे पिछड़ा बनाया। उसकी समस्याओं के समाधान के बजाय उसे और अधिक बढ़ाया, ताकि मुसलमान अपने बच्चों की शिक्षा पर खर्च करने की हैसियत नहीं जुटा पाये। उनके बच्चे पढ़ कर अच्छी नौकरी नहीं पा सके। उनकी आमदनी नहीं बढ़े और वे हमेशा तंगहाली में गुजर-बसर करें। पैसठ वर्षों तक यही सब करते रहने से हमे लाभ यह हुआ कि मुसलमानों के मन में जो असुरक्षा और गलतफहमिलयां हमने बिठा दी थी, वह आसानी बाहर नहीं निकल सकी। क्योंकि हम जानते हैं कि मुसलमान युवक यदि पढ़ लिख कर अच्छी नौकरी पा लेगा और हिन्दुओं के साथ रहेगा, तो उसकी सारी गलतफहमियां दूर हो जायेगी। उसे यह मालूम हो जायेगा कि हमे अपने सियासी लाभ के लिए अब तक मूर्ख बनाया जाता रहा है।
2014 के लोकसभा चुनावों के पूर्व पूरे देश में हमे एकजुटता दिखी। जनता मजहब और जाति की संकीर्णता को तोड़ कर हमे हराने के प्रतिबद्ध दिखाई दी। गुजरात के नरेन्द्र मोदी, जो भारत का प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहा है पूरे पूरे देश में घूम-घूम कर हमारी कमजोरियों और कारगुजारियों को उजागर कर रहे है। समचमुच हमारे लिए यह खतरे की घंटी थी। हमे अपने शाशन पर खतरा मंडराता हुआ दिखाई दिया। हमने एक स्वार्थी और चालाक शख्स -अरविन्द केजरीवाल, जिसे नौटंकी करने और झूठ बोलने में महारथ हांसिल है, को उनके पीछे लगा दिया। वह और उसकी मंड़ली हाथ धो कर नरेन्द्र मोदी के पीछे पड़ गयी। हमे लग रहा है अरविन्द केजरीवाल अपना कुछ असर दिखायेगा। हम तो हारेंगे ही, किन्तु मोदी को आगे बढ़ने से रोक देंगे।
परन्तु हमे लग रहा है कि दस वर्ष के कुशासन की पीड़ा को जनता भूल नहीं पा रही है। वह हमारे विरुद्ध लामबंद हो रही है। हमने नरेन्द्र मोदी को गालियां देने और उनके विरुद्ध जहर उगलने के लिए कई मोर्चे खोल रखे हैं, किन्तु उसका कोई खास असर दिखाई नहीं दे रहा है। अतः हार कर हमे मुसलमानों का हितैषी बनने का प्रमण पत्र लेने के लिए इमाम बुखारी के पास जाना पड़ा। इमाम बुखारी ने देश के मुसलमानों को समझ दिया है कि कम्युनल ताकतों को सत्ता में आने से रोकने के लिए हमारी कांग्रेस को वोट दें। जबकि इतिहास गवाह है कि मुसलमानों को हमने बरबाद करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है। उनकी गरीबी और तंगहाली के हम ही जिम्मेदार है। हम कम्युनल ताकतों का कृत्रिम भय दिखा कर उन्हें डराते रहें हैं, किन्तु यह करना हमारे लिए आवश्यक है, क्योंकि भारत के मुसलमान ही तो हमारी सियासी ताकत हैं। जब यह ताकत चली जायेगी, हम कहीं के नहीं रहेंगे। हम सात जनम तक हिन्दुस्ताान पर शासन करने का अधिकार नहीं पा सकेंगे।
हम जानते है कि हिन्दुओं को तो वैसे ही जातियों के आधार पर बांट रखा हैं। अतः यदि हमे मुसलमानों के थोक वोट मिल जाये, तो नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने से रोका जा सकता है। यह सही है कि हम सरकार बनाने की औकात नहीं रखेंगे, किन्तु किसी महत्वाकांक्षी नेता, जिसने सेक्युलर का नकाब ओढ़ रखा हो, कुछ दिनों या महीनों के लिए शाशन करने का अधिकार दें देगें, पर उसकी नकेल अपने हाथ में रखेंगे। जब देश की जनता कुशासन से त्राहि-त्राहि करने लगेगी हम नकेल खींच लेंगे। फिर चुनाव करायेंगे। चुनाव जीतेंगे और भारत को लूटने का पुनः अधिकार पा लेंगे।
हम भारत को न समझ पाये हैं और न ही इसको समझने की कोशिश कर रहे हैं। हमारे अपने कोई विचार ही नहीं है। दूसरे का लिखा हुआ भाषण पढ़ कर ही जनता को मूर्ख बना सकते हैं। पूरी दुनियां हमारे साथ है, क्योंकि दुनियां के अधिकांष देश नहीं चाहते कि हिन्दुस्तान के शासन की कमान किसी ऐसे व्यक्ति के हाथ आ जाये, जिसके विचार शुद्ध रुप से भारतीय हों। जो हिन्दी बोलता हो। जो प्रगति और खुशहाली की कामना मन में रखता हो। जो देश को सुशासन देने का दृढ़ निश्चय रखता हो। जो काला अंग्रेज बन कर विदेशी शासकों की स्वार्थी नीतियों में उलझ कर देश की जनता के हितों को दांव पर नहीं लगाता हो। विदेशी सरकारें भारत में स्थायी और जवाबदेय सरकारे नहीं चाहती, क्योंकि इससे उनके व्यापारिक हित प्रभावित होते हैं। हम मन से उन विदेशियों के शुभ चिंतक हैं। क्योंकि हमारा शरीर इस देश में हैं, परन्तु आत्मा विदेशी है।
हम भारतीय लोकतंत्र की दुर्बलताओं को समझते हैं। यही हमारी सफलता का राज है। इस देश की जनता चाहें शासक के अत्याचारों से दुखी होगी, परन्तु जाति और धर्म की संकीर्णता के आधार पर बांट कर हम भारत पर शासन करते रहेंगे। जब तक सम्भव होगा, लुटने का क्रम जारी रखेंगे।

चुनावी समंदर में लुटेरों को डूबोने का यह सही मौका हैं

संजय बारु ने अपनी पुस्तक- एक्सीडेंटल प्राइमिनिस्टर मे एक दुखद सच के दस्तावेजी प्रमाण दिये हैं। भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे भद्दा मजाक- “पुतले को प्रधानमंत्री बना, देश के संसाधनों को जम कर लूटा गया।” इस तथ्य की साक्षी की अगली कड़ी- पीसी पारेख की एक और पुस्तक- “क्रूसेडर ओर कांस्पिटेटर काॅलगेट एंड अदर ट्रूथ “में यह दर्शाया है कि काॅलगेट जैसे बड़े घोटाले के समय प्रधानमंत्री ने अपनी भूमिका महज एक पुतले के रुप में ही निभायी थी। इन दोनो किताबों ने भारत की राजनीति मेे भूचाल ला दिया है।
एक खुली, बेबाक और बेशर्म लूट को पूरा सरकारी तंत्र, सत्ताधारी गठबंधन के सभी नेता, सरकार को बाहर से समर्थन देने वाले राजनीतिक दल एक गम्भीर और देशद्रोही अपराध को खामोशी से देखते रहें। यह आत्मा को झकझोर देने वाला प्रसंग है। क्या इसे ही लोकतंत्र कहते हैं, जिसमें एक शख्सियत सारी प्रशासनिक शक्तियों का अधिग्रहण कर लेती है। योजनाबद्ध तरीके से शक्तियों का उपयोग कर खुली और निर्बाध लूट को अंजाम देती है। पूरा देश मूक दर्शक बन कर सबकुछ देखता रहता है। वह विदेशी शख्यिसयत, जिसके मन में किंचित मात्र भी देश प्रेम नहीं, गरबी जनता के प्रति कोई सहानुभूति नहीं, सवा सौ करोड़ हिन्दुस्तानियों के साथ दगा करती है, फिर भी उसकी राजनीतिक हैसियत और हैकड़ी बरकार है। भरकसक कोशिश करने के बाद भी सच न छुपाया जा सका और न ही दबाया जा सका, परन्तु मन में काई अपराध बोध नहीं। अपने कृत्य पर कोई पछतावा नहीं। सौ रुपये की चोरी करने पर पकड़े जाना वाला चोर अपना सिर शर्म से झुका देता है। चेहरा ढंक देता है। किन्तु अरबो रुपये की हेराफेरी करने वाले अपराधी का सिर अभी भी उठा हुआ है, क्योंकि वे जानती है, ये मूर्ख हिन्दुस्तानी फिर राजनीतिक ताकत दे देंगे, जिससे सारे अपराध आसानी से छुपाये जा सकेंगे।
संजय बारु ने अपनी पुस्तक एक्सीडेंटल प्राइममिनिस्टर मे वस्तुतः भारत के संसदीय लोकतंत्र को दुर्घटनाग्रस्त किया है। आज भारतीय लोकतंत्र लहूलुहान है। उपचार के लिए किसी सशक्त, सुदृढ़ व देशभक्त सरकार की ओर आशापूर्ण दृष्टि देख रहा है। किन्तु एक लुटेरी पार्टी और उसके तथा कथित सहायोगी सेक्युलर राजनीतिक दल इस विपदा घड़ी में तुष्टीकरण का जाप करते हुए ऐसी सरकार की सम्भावनाओं के मार्ग में अवरोध खड़े कर रहे हैं। जबकि सभी राजनीतिक दलों को भ्रष्ट सरकार को पुनः सत्ता में नहीं आने देने के लिए एक होना चाहिये, वे नरेन्द्र मोदी को सत्ता में नहीं आने के लिए एक हो रहे है। यह भारतीय संसदीय लोकतंत्र की दुर्भाग्यजनक स्थिति है। एक दुर्घटनाग्रस्त लोकतंत्र का उपचार के लिए संवेदनशील होने के बजाय अपने क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ के लिए सेक्युलिरिजम के नाम पर जनता को एक काल्पनिक भय से भयभीत कर रहे हैं। यह सब वे इसलिए कर रहे हैं ताकि एक समुदाय विशेष के थोक वोट उनकी झोली में गिर जाये।
नरेन्द्र मोदी के वैवाहिक जीवन को ले कर बवाल मचाने वाला समाचार और प्रिन्ट मीडिया संजय बारु  की पुस्तक पर महज औपचारिक खानापूर्ति कर रहे हैं। कुछ अखबार व समाचार चेनलों ने तो आश्चर्यजनक रुप से चुप्पी साध रखी है। जबकि कुछ समाचार चेनल दरबारियों को ला कर हल्ला मचा रहे हैं, जो अपने मालिक के विरुद्ध कुछ भी लिखना और बोलना पसंद नहीं करते। परन्तु इस गम्भीर विषय पर सार्थक और सारगर्भित बहस से सभी कतरा रहे हैं। ऐसा लग रहा जैसे कांग्रेसियों के अलावा इन्हें भी सांप सूंघ गया है। यह भारतीय लोकतंत्र को राजतंत्र में तब्दील करने का प्रयास है, जो यह आभास दिला रहा है कि यदि हम जागरुक नहीं रहें और ऐसे देशद्रोही तत्वों को जाने अनजाने समर्थन देते रहें तो एक दिन धीमी गति से चल कर आ रहा अधिनायकतंत्र भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को कुचल कर रख देगा।
लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में जनता किसी पार्टी पर विश्वास  कर शासन के साथ-साथ देश के खजाने की चाबी और प्राकृतिक संसाधन सौंपती है। परन्तु यदि कोई सरकार जनता के विश्वास के साथ छल करते हुए खजाने में रखे हुए जनता के धन की चोरी करती है और प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग देश हित में करने के बजाय इसकी बंदरबाट करती है, तो इसका सीधा मतलब हैं, शासको की नीयत में खोट हैं। उन्होने शासन का अधिकार मांग कर जनता के साथ विश्वासघात किया है। वे राजनेता नहीं, बल्कि राजनेता के वेश में लुटरे हैं। वे राजधर्म निभाने नहीं, अपितु एक संगठित गिरोह बना कर सार्वजनिक धन को लूटने आये हैं। खुली और बेशर्म लूट ने दस वर्षों में देश को कंगाली के कगार पर पहुंचा दिया। देशवासियों को महंगाई की ऐसी दुखद पीड़ा झेलनी पड़ रही है, जिसकी कभी किसी ने कल्पना ही नहीं की थी।
देश के नागरिकों के साथ भारत के लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे भ्रष्ट सरकार इसलिए दगा करती रही, क्योंकि यह सरकार उन तथाकथित सेक्युलर और तुष्टीकरण की राजनीति को महत्व देने वाले राजनीतिक दलों की बैसाखी के सहारे टिकी हुई थी, जिनके लिए राजनीति और सत्ता देश से बढ़ कर है। तुष्टीकरण और सेक्युलिरिजम केें नकाब के नीचे लुटेरे अपने सारे पापों को छुपा कर फिर सत्ता में आने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं। उन्हें अपने भावी सहयोगियों से भी पूरा समर्थन मिल रहा है। देश के दुश्मन राष्ट्र भी ढुलमुल और कमज़ोर भारत सरकार चाहते हैं, ताकि उनके घृणित मकसद पूरे होते रहें। वहीं योरोपियन देश व अमेरिका भी सक्षम भारत सरकार के पक्षधर नहीं है, क्योंकि इससे उनके व्यापारिक हित प्रभावित होते हैं। देश के अधिकांश मीडिया समूह पर विदेशी व्यापारियों का नियंत्रण है और वे भी एक लुटेरी सरकार का मौन समर्थक बने हुए हैं। भारत की जनता को जागरुक हो कर अपने मत का सही प्रयोग करना चाहिये और उस पार्टी को आंशिक ही नहीं पूरी तरह ठुकरा देना चाहिये, जिसने देश की गरीब जनता का अरबों रुपया लूटा है और भविष्य में सता में आ कर अपने इसी उपक्रम को जारी रखना चाहती है।
भारत की जनता हक़ीकत को समझ गयी है। वह अपने साथ छल करने वाले अपराधियों को पहचान गयी है। लोकसभा के चुनावों के दौरान जो भारी मतदान हो रहा है, उससे लगता है, आक्रोश से भरा हुआ गुब्बारा फूट रहा है। अब तक हुए मतदान में जन आक्रोश की आंधी की झलक दिखाई दे रही है। इसे सुनामी कहें या लहर, पर यह जरुर है कि जनपवन के तीव्र वेग से सत्ता तम्बु उखड़ जायेंगे। अपने आपको बचाने की लाख कोशिश करें, प्रतिद्वंद्वियों पर चाहे जितने झूठे, अर्नगल वे बेहुदे आरोप लगायें, उनके सारे हथकंड़े बेअसर हो रहे हैं। जो तिकड़म से सेक्युरिजम के नाम पर एकजुट हो कर नरेन्द्र मोदी को रोकने का प्रयास कर रहे हैं, वे सभी एक ही थेल्ली के चट्टे बट्टे हैं और सभी लुटेरों को बचाने में लगे हैं। इनकी कोशिश निष्फल करने के लिए यह जरुरी है कि अब चुनावों के अगले चरण में इन्हें इतने जोर का धक्का दिया जाय कि ये गहरे समंदर में डूब जाय और फिर कभी भारत को लुटने के लिए राजनीति के तंबू गाड़ने की कोशिश नहीं करें। साथ ही, उनके उन सहयोगियों को भी सबक सिखाना चाहिये, ताकि वे समझ जायें कि वे कितनी भी चालाकी क्यों न करें, देश के संसाधनों को लूटने वालें लुटेरों का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से सहयोग दे कर उन्होंने अपनी भी साख गवांई है। और जो भ्रष्टव्यवस्था को बदलने का नारा लगाते हुए राजनीति करने आयें थे, लुटेरों के सहयोगी बन कर उन्होंने देश की जनता को धोखा दिया है, उनकी नयी खुली राजनीति की दुकान को उनके विरुद्ध मतदान कर बंद करवानी चाहिये।

Friday, 4 April 2014

तुष्टीकरण नहीं, हमे बेहतर कल की गारन्टी चाहिये

गुजरात के घाव अब सूख गये हैं, किन्तु वोटों के लिए अब भी उन्हें कुरेदने से बाज नहीं आ रहे हैं। जबकि मुजफ्फरनगर के ताजा घाव तो रिस रहें हैं, उन पर मरहम लगाने के लिए परहेज कर रहे हैं ? सरेआम बोटी-बोटी काटने वाले को क्षमादान और न्यायालय द्वारा नरेन्द्र मोदी को निर्दोष साबित करने पर भी अपराधी ठहराने की हठधर्मिता, यह किस प्रकार की धर्मनिरपेक्षता है ? कब तक तुष्टीकरण के बहाने सच को सच और झूठ को झूठ कहने से परहेज किया जाता रहेगा ? क्या धर्मनिरपेक्षता का मतलब सिर्फ वोटों की सियासत ही है ? यदि इसका उत्तर ‘हां’ है, तो निश्चित रुप से सियासी लाभ के लिए एक समुदाय विशेष को देश की समस्याओं से अलग किया जा रहा हैं। क्या महंगाई की पीड़ा सभी नागरिकों को नहीं झेलनी पड़ रही है ? क्या सरकारी भ्रष्टाचार से सभी को मुक्ति नहीं चाहिये ? क्या सभी को देश का विकास नहीं चाहिये ? बेहतर भविष्य की गारन्टी नहीं चाहिये। कब तक नागरिकों की अहमियत को केवल वोट बैंक से ज्यादा नहीं समझा जायेगा ? क्या भारतीय अल्मपंसख्यक थोक वोटों की मंड़ी है, जिन्हें जनावरों की तरह अपने पक्ष में वोट देने के लिए हमेशा हांका जाता रहेगा ? जब पूरा देश व्यवस्था परिवर्तन के लिए उत्कंठित है, तब ऐसा क्यों माना जा रहा है कि कुशासन व भ्रष्ट शासन से पीडि़त होने के बाद भी वह विकास और बेहतर भविष्य के नाम पर भारत का अल्पसंख्यक समुदाय अन्य पार्टी को वोट नहीं देगा ? यह क्यों माना जा रहा है कि अलपसंख्यक समुदाय हमारी जागीरी हैं और ये हमेशा हमे ही वोट देते रहेंगे ?
दुर्भाग्य से आज़ादी के छियांसठ वर्ष बाद भी अपने क्षुद्र सियासी लाभ के लिये अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक विशेषण लगा कर भारतीय नागरिकों की नागरिकता के विभाजन को अक्षुण्ण रखा जा रहा है। क्यों धर्म के आधार पर नागरिकों की पहचान को विभाजित रखा जा रहा है ? जबकि भारतीय संस्कृति तो विश्व को ही अपना कुटुम्ब मानती है, फिर उपासना पद्धति के आधार पर नागरिकों का कैसे विभाजन किया जा सकता है ? लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में जब तक देश के नागरिकों की नागरिकता विभाजित की जाती रहेगी, उसके सुफल नहीं मिल पायेंगे। अयोग्य और निकृष्ट लोग वोट बैंक के आधार पर राजनेता बनते रहेंगे, क्योंकि बेहतर कार्यों से नहीं, जवाबदहेही निभाने से नहीं, वरन तुष्टीकरण के बहाने उन्हें राजनीतिक शक्ति मिलती रहेगी।
हम इस मिथक को तोड़ सकते हैं। हमे उन्हें कह सकते हैं, ‘तुष्टीकरण नहीं, बेहतर भविष्य की गारन्टी दीजिये । हमें अपनी समस्याओं से निज़ात दिलाने का वचन दीजिये। सुशासन का वादा कीजिये। अतः सियासत भले ही हमे अपने मतलब के लिए अलग करती रहे, परन्तु अब हमारे बीच खड़ी की गयी नफरत और अविश्वास की दीवारों को तोड़ कर राष्ट्रहित में एक होना होगा। क्योंकि सामुहिक निर्णय से ही भ्रष्ट शासन व्यवस्था बदली जा सकती है। अपने सियासी लाभ के लिए कोई राजनीतिक दल सुरक्षा के नाम पर जानबूझ कर भ्रमित कर भयभीत करने का प्रयास करेगा, हम एकजुट हो कर उसके घृणित प्रयास को निष्फल कर देंगे।
क्योंकि हम सब एक हैं। न अल्पसंख्यक हैं, न बहुसंख्यक हैं, हम एकसंख्यक भारतीय हैं। हमारे पुुरखे यहीं जनमे। इसी माटी में उन्हें दफनाया या जलाया गया। हमारा जन्म भी यहीं हुआ। हमे एक साथ यहीं जीना और मरना है। यह देश हमारा है। हम सभी भारतीय नागरिक हैं। हमारे दुख-सुख एक से हैं। हमारी समस्याएं साझा हैं। हम मिल कर ही अपनी समस्याओं का समाधान खोज सकते हैं। यदि हम एक हो कर अपने बेहतर भविष्य के लिए निर्णय लेंगे, तो भारत की राजनीतिक व्यवस्था बदल जायेगी। अपनी काबलियत के बाजय वोट बैंक के सहारे चुनाव जीतने की निकृष्ट कोशिश समाप्त हो जायेगी। भारत की राजनीति की फिज़ा बदल जायेगी।
आज़ादी के बाद कांग्रेस पार्टी ने मुसलमानों की रहनुमा बन कर पांच तोहफे दिये- ‘ असुरक्षा, अशिक्षा, गरीबी, पिछड़ापन और मजहबी जुनून। ये तोहफे कांग्रेस के लिए वरदान साबित हुए, जिससे वर्षों तक उसे मुसलममानों के थोक वोट मिलते रहें और वह सत्ता सुख भोगती रही। अपनी अर्कमण्यता को छुपा कर चुनाव जीतने का आसान नुस्खा हाथ लग गया था। परन्तु जब उन्हें अहसास हुआ कि जो तोहफे उन्हें दिये गये थे, वे दरअसल श्राप थे, जिसके कारण उनकी हालत बद से बदत्तर हो गयी है। कांग्रेस से जब तक मोहभंग हुआ तब तक बहुत देर हो चुकी थी। कुछ प्रदेशों में उनके आंसू पौंछने के लिए नये रहनुमा आ गये, परन्तु पूरे देश में मजबूरन उन्हें कांग्रेस पर ही भरोसा करना पड़ा।
पिछले बीस वर्षों से नये रहनुमाओं को भी परखा जा चुका है। उन्हें अपने श्रापों से मुक्ति नहीं मिली है। अलबता श्राप भी नये रहनुमाओं की सियासत के लिए आवश्यक हो गये। उनकी निगाहों में भी मुसमानों की अहमितयत वोट बैंक से ज्यदा नहीं हैं। पूरे देश में जब शांति हैं और कहीं पर साम्प्रदायिक तनाव नहीं हैं, तब अपनी अकर्मण्यता को छुपाने के लिए जानबूझ कर अखिलेश सरकार ने मुजफ्फर नगर के घाव दिये, ताकि अगले चुनावों में मुस्लिम समुदाय के मन में असुरक्षा के भाव जगा गर उनके थोक वोट लिये जा सकें। मुजफ्फर नगर त्रासदी यह नसहीहत देती है कि सियासत किसी की सगी नहीं होती। नागरिक तो सियासी  चौसर के बेजान मोहरे हैं, जिनका उपयोग बाजियां जीतने के लिए किया जाता है।
साम्प्रदायिक विद्वेस की आग जलाना, भड़काना और नागरिकों को आग में झुलसने के लिए छोड़ देन कीे कोशिश भारतीय सियासत की सबसे गंदी तस्वीर है। अखिलेश सरकार ने जो पाप किया है, वह अक्षम्य है, किन्तु फिर भी बड़ी बेशर्मी से अपने गुनाहों को कबूल करने के बजाय अपने आपको अब भी मुसलमानों का सबसे बड़ा रहनुमा घोषित करने की अभद्र कोशिश की जा रही है। परन्तु अखिलेश सरकार अपना असली रुप उजागर कर चुकी है, जो राजनैताओं से सावधान रहने की चेतावनी देते हुए कहती हैं, उन्हें चुनों जो योग्य हो, सक्षम हो, जिम्मेदारी निभाने की क्षमता रखते हों, उन्हें नहीं, जो वोट बैंक के सहारे ही सता सुख का लुत्फ उठाने के लिए प्रतिबद्ध हों।
अब समय आ गया है, जब मुस्लिम समुदाय को सियासी चैसर का मात्र मोहरा नहीं बने रहना है, अपितु सभी के साथ कदम से कदम मिला कर चलना है। एक नये भारत के निमार्ण में सहयोगी बनना है। उन्हें एक ही स्वर में कहना है, हमें तुष्टीकरण नहीं, कांग्रेस द्वारा दिये गये श्राप – असुरक्षा, अशिक्षा, गरीबी, पिछड़ापन और मजहबी जुनून से मुक्ति चाहिये। हमारे बच्चों को अच्छी तामिल, रोजगार और सनहरा भविष्य चाहियें। अतः हम उसी राजनीति पार्टी को वोट देंगे, जो सुशासन का वादा करेगी। समस्याओं से निज़ात दिलाने का भरोसा जगायेगी। आज की परिस्थितियों में यही मनःस्थिति देश के हित के लिए उपयुक्त होगी।

Friday, 28 March 2014

केजरीवाल का बेलगाम झूठ और भाजपा की चुभती चुप्पी

कांग्रेस ने अपनी आसन्न पराजय स्वीकार कर ली है। उसके बड़े-बड़े योद्धा चुनाव लड़ने से कतरा रहे हैं। पार्टी छोड़ कर भागने का हडकम्प मचा है। राहुल को प्रधानमंत्री बनना नहीं है। वे हारी हुई बाजी को जीतने की तैयारी में लगे हुए है। उन्हें खेल जीतना नहीं, बिगाड़ना है। वे मध्यवावदी चुनावों की आशाएं संजो बैठे हैं, जिसमें वे हीरो बनने के सपने देख रहे हैं। राजनीति के इस गंदे खेल में केजरीवाल उनके प्रमुख सहयोगी बने हुए हैं। अपनी दो वर्ष पुरानी पार्टी को अखिल भारतीय स्वरुप देने के लिए वे बेताब है। राजनीति के गंदे खेल में रम गये हैं। खेल मे उन्हें मजा आ रहा है। भारत की राजनीति की सारी गंदगी अपने ऊपर उडेल कर वे मुस्करा रहे हैं। राजनीति के व्यवसाय में उन्होने इतना धन कमाया है, जिसकी उन्हें कभी आशा नहीं थी।
झूठ और प्रपंच की नौटंकियों से राजनीति की दुकान सफलता से जमाई जा सकती है, यह उनके मिशन का एक भाग है। इसी मिशन के तहत वे भाजपा का खेल बिगाड़ने में लगे हैं। उन्हें भरोसा है कि जिस तरह दिल्ली में उन्होंने भाजपा को सत्ता की दहलीज पर आ कर रोक दिया था, ऐसे ही वे केन्द्र की सत्ता में आने से भी रोक देंगे। मोदी का प्रधानमंत्री बनने का सपना चूर-चूर कर देंगे। एक हद तक वे अपने मिशन में सफल हो रहे हैं, क्योंकि भाजपा उनके झूठ और प्रपोगंड़ा का प्रभावी जवाब देने के तरीके नहीं ढूंढ पा रही है।
केजरीवाल को झूठ बोलने में न शर्म है, न झेंप हैं और न ही झूठ के पकड़े जाने पर वे शर्मिंदगी महसूस करते हैं। एक के बाद एक वे नये नये झूठ सुनियोजित तरीके से हवा में उछालते जा रहे हैं और भाजपा नेता उनका प्रभावी जवाब नहीं दे पा रहे हैं। जबकि उनकी हर झूठ बात का आसान व तथ्यों के अनरुप ठोस जवाब उपलब्ध है। यह जरुरी नहीं कि मोदी के विरुद्ध उगले गये जहर का जवाब पलट कर मोदी ही दें। भाजपा के पास ढे़रो प्रवक्ता है और देश के हर कोने में प्रभावशाली नेता हैं। मात्र सोशल मीडिया में ही सारे झूठ को उजागर करने से काम बनने वाला नहीं है। उनके झूठ का जवाब उन्हीं की तर्ज पर सार्वजनिक रुप से जनता के सामने देना होगा। यह काम देश भर में फैले हुए भाजपा नेताओं को प्रभावी ढंग से करना होगा, अन्यथा उनके बेलगाम झूठ पर अंकुश नहीं लगेगा और झूठ बोलने में उनका साहस बढ़ता जायेगा।
रिलायंस गैस प्रकरण पर निरन्तर वे मोदी पर आरोपों की झड़ी लगा रहे हैं, जबकि सुप्रीम कोर्ट में इस संबंध में तीन पीआईएल पहले से लगी हुई है, जिसका निर्णय लंबित है। दूसरा गैस का यह मामला केन्द्र के पैट्रोलियम मंत्रालय के अधीन है, जिसमें गुजरात सरकार का कोई रोल नहीं है। इस मामले को संसद में भाजपा नेता यशवंत सिन्हा जोर-शोर से उठा चुके हैं। परन्तु केजरीवाल आजकल हर मंच पर यह कह रहें है कि मोदी इस बारें में कुछ नहीं बोल रहे हैं, इसका मतलब वे अम्बानी के एजेंट है। क्या भाजपा नेता उनके इस आरोप का प्रभावी ढंग से जवाब नहीं दे सकते कि जो मामला सुप्रीम कोर्ट के पास विचाराधीन है, उस पर क्यों टिप्पणी की जाय ? जबकि इस विषय में वे जो भी तर्क और दलीले दे रहें है, वे सब झूठी और तथ्यहीन है। क्या जनता को निरन्तर हर जगह जा कर भ्रमित करने के उनके इस प्रयास को विफल करने की कोशिश नहीं की जा सकती ?
एक उनका बहुप्रचारित झूठ है- ‘गुजरात में कोई विकास नहीं हुआ।’ क्या इस सफेद झूठ का भी भाजपा के पास जवाब नहीं है। इस झूठ का जवाब दिया भी जा रहा है, किन्तु जिस ढंग से केजरीवाल और उनके अनुयायी बोले जा रहे हैं, उससे साफ लग रहा है कि केजरीवाल मंड़ली की तुलना में भाजपा काफी शिथिल है।
केजरीवाल की बेहुदा नौटंकी पर तरस आता है जब वे महाराष्ट्र में जा कर गुजरात में हुई किसानों की आत्महत्या के आंकड़े दे रहे हैं। जबकि महराष्ट्र में किसानों के आत्महत्या करने की घटनाएं अब भी रोज हो रही है। यही झूठ उन्होंने बैंगलोर में दोहराया और महराष्ट्र पर चुप्पी साधे रहें। गुजरात में हुई किसानों की आत्महत्या के झूठे आंकड़े बैंगलोर में दिये, उसका भाजपा ने जवाब नहीं दिया, जिससे उनका साहस बढ़ गया और उन्होंने बनारस में गुजरात में किसानों की आत्महत्या की संख्या दुगुनी कर दी। बहुत दिनों बाद गुजरात सरकार ने अब विज्ञप्ति जारी कर कहा है कि गुजरात में मात्र एक किसान ने फसल खराब होने पर आत्महत्या की है।
एक और झूठ वे प्रत्येक जन सभा में जा कर बोल रहे हैं- गुजरात की मोदी सरकार किसानों की जमीन से सस्तें में ले कर अम्बानी अडानी को दे रही है, जबकि वास्तविकता यह है कि रिलायंस की जामनगर परियोजना 1990 में प्रारम्भ हुई थी, जब मोदी सरकार नहीं थी और रिलायंस ने सारी जमीन किसानों से सीधी खरीदी थी। गुजरात सरका ने उद्योगपतियो के लिए जो भी जमीन अधिगृहण की थी, उसका तरीका बहुत ही पारदर्शी है और उसकी मिशाल पूरे देश में दी जाती है। फिर प्रश्न उठता है कि क्यों केजरीवाल गुजरात सरकार पर झूठे, तथ्यहीन और अर्नगल आरोप लगा रहे हैं और भाजपा नेता उनके झूठ को चुनौती क्यों नहीं दे रहे हैं ?
बनारस की जन सभा में केजरीवाल ने अम्बानी बंधुओं के स्वीस अकाउंट के नम्बर दिये। अब ये नम्बर सही थे या गलत और सही है तो इसकी वास्तविकता क्या है, इसका पूर्ण विवरण जनता को दिया जा सकता था, किन्तु इस पर भी भाजपा नेता चुप्पी साधे हुए हैं, जबकि स्वीस बैंक में काला धन सरकारी अफसरों और कांग्रेसी नेताओं का है, जिसमें सर्वाधिक मेडम सोनिया का है। यदि केजरीवाल अम्बानी बंधुओ के स्वीस अकाउंट के नम्बर ला सकते हैं, तो दूसरे लोगों के क्यों नहीं ला पा आये ? क्या उनके अलावा और किसी का पैसा स्वीस बैंक में नहीं है ? अन्य के बारें में केजरवाल चुप्प क्यों है ? भाजपा नेताओं को चाहिये कि सार्वजनिक रुप से केजरीवाल के इस झूठ को उजागर करें।
आश्चर्य इस बात पर होता है कि केजरीवाल के झूठे प्रायोजित शो पर भी भाजपा कठोर टिप्पणी नहीं करती, जबकि वे भाजपा की टिप्पणी पर तुरन्त पलट वार करते हैं। मसलन एके 49 पर उन्होंने तुरन्त टिप्पणी कर दी, परन्तु चतुराई से अपनी वेबसाईट पर से कश्मीर को हटाये जाने पर कुछ नहीं बोला। इसी तरह बम्बई प्लेन से गये और एयरपोर्ट पर पूना से लाये गये आॅटो रिक्शा में बैठ कर केजरीवाल और उनके अनुयायियों ने जानबूझ कर ट्राफिक नियमों की धज्जियां उड़ाई। महाराष्ट्र सरकार ने कोई कार्यवाही नहीं की। बनारस में गंगा में डूबकी लगाने का प्रायोजित नाटक किया। अपने लोगों से रोड़ शो में अंडे़ व स्याही फिंकवाई। रोड़ शो गंगा के घाट और मंदिरों से प्रारम्भ किया और समापन मुस्लिम मोहल्लों में जा कर किया। वहां टोपी भी पहनी और अजान के समय अपना भाषण भी रोक दिया । याने लोकप्रियता पाने के वे सारे टोटके किये, जो राजनीति में जमने के लिए किये जाते हैं।
भ्रष्टाचार के विरुद्ध राजनीति में उतरने वाले केजरीवाल भारत की राजनीति में पैर जमाने के लिए तड़फ रहे हैं और वे सभी उपाय कर रहे हैं, जो स्वच्छ राजनीति की श्रेणी में नहीं आता। उनका सिर्फ सिर्फ भाजपा और मोदी विरोध और अन्य के बारे में चुप्पी यह दर्शाता है कि वे एक षड़यंत्र के तहत काम कर रहे हैं। जानबूझ कर कश्मीर को भारत के नक्शे से हटाना भी मुस्लिम राष्ट्रो से धन प्राप्त करने का एक षडयंत्र है। अतः देश हित में भाजपा नेताओं को केजरीवाल के झूठ को गम्भीरता से लेना होगा और उनकी गंदी राजनीति पर अंकुश लगाने के लिए ठोस व प्रभावी उपाय करने होंगे, अन्यथा उनका साहस बढ़ता जायेगा और वे भाजपा को भारी नुकसान पहुंचाने में सफल होंगे।

Wednesday, 12 March 2014

महान नौटंकीबाज अरविन्द केजरीवाल का सम्मान नहीं, तिरस्कार कीजिये

महान नौटंकीबाज अरविन्द केजरीवाल का सम्मान नहीं, तिरस्कार कीजिये !


एक समाचार समूह द्वारा केजरीवाल को अहमदाबाद से दिल्ली लाने के लिए चार्टड़ प्लेन उपलब्ध कराना एक साथ कर्इ प्रश्न उपसिथत करता है-”क्या मीडिया समूह के पास एक व्यकित विशेष का व्यकितत्व चमकाने के लिए अतिरिक्त फंड है ? यदि है, तो यह पैसा कौन दे रहा है ? पूरे देश ने केजरीवाल को स्वीकार नहीं किया है। दिल्ली प्रदेष की अठार्इस विधानसभा सीटें जीतने का मतलब यह नहीं है कि वे पूरे भारत के सर्वमान्य नेता बन गये हैं। फिर किस आधार पर इस समाचार समूह ने केजरीवाल को इतना अधिक महत्व दिया ? भारत के राष्ट्रीय दलों के पास विधानसभाओं की हज़ारो सीटे हैं। कर्इ प्रादेशिक क्षत्रप भी सौ से अधिक सीटे जीतने की औकात रखते हैं। फिर क्यों नहीं भारत के किसी अन्य राजनेता को अपने टीवी स्टूडियों में बुलाने के लिए इस समाचार समूह ने विशेष सुविधा उपलब्ध करायी ?”
अरविन्द केजरीवाल को चार्टड़ प्लेन उपलब्ध कराने पर समाचार समूह मौन है, किन्तु केजरीवाल ने इस विषय पर जिस तरह शरारतपूर्ण जवाब दिया, वह हैरान करने वाला है। वे कहते हैं-ऐसे सवाल राहुल और मोदी से क्यों नहीं पूछते ? भारत की राजनीति को भ्रष्टाचार मुक्त और स्वच्छ बनाने का दावा करने वाले सख्श का ऐसा उद्धण्ड़ता पूर्वक उत्तर यह बताता है कि यह व्यक्ति भारत के सवा सौ करोड़ नागरिकों को मूर्ख समझता है। अपने अपराध को छुपाने के लिए आवश्यक है कि अन्य राजनेताओं के नाम उछाल दो या किन्हीं अन्य उधोगपतियों को गालियां दे दो, जनता उन्हें माफ कर देगी।
निश्चय ही, अरविन्द केजरीवाल र्इमानदार और स्वच्छ छवि के लिए मात्र ढ़ोग करते हैं। वे भी अन्य राजनेताओं की तरह भारतीय राजनीति को व्यावसाय मानते हैं और इसी प्रयोजन को पूरा करने के लिए वे भारतीय राजनीति में कूदे हैं। अन्य राजनेता वर्षों से राजनीति में रहने के बाद जितना धन नहीं कमा पाये, उससे कही अधिक केजरीवाल ने अपनी नौटंकी और स्टंट कला से कुछ महिनों में ही कमा लिये हैं। उनकी राजनीति की दुकान भविष्य में चल पाये या न चल पाये, उनका तिलस्म कायम रह पाये या न पाये, परन्तु उनके पास ज्ञात और अज्ञात स्त्रोंतों से अपार धन एकत्रित करने का मौका हाथ लग गया है। केजरीवाल क्रांतिकारी नहीं, विशु़द्ध व्यावसायिक मनोवृति के व्यक्ति  हैं, जिसे वे सिद्ध कर चुके हैं।
जिस मीडिया समूह ने केजरीवाल को अपने स्टूडियो तक बुलाने के लिए चार्टड़ प्लेन उपलब्ध कराया, उसी समूह ने अपने टीवी चेनल पर अरविन्द केजरीवाल का प्रायोजित इंटरव्यू प्रसारित किया। जानबूझ कर अपने पीछे शहीद भगत सिंह की तस्वीर लगा कर अपने आपको क्रांतिकारी घोषित करने का नया शगूफा छोड़ा। देश में नयी क्रांति लाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की। ऐसा व्यक्ति जो भारत के संविधान में आस्था नहीं रखता, जो झूठ, कपट व छल को राजनीति का एक भाग मानता है, जो अपननी कही बात पर तुरन्त पलटी मारनें में सिद्ध हस्त है, जो अपने थूंक को चाटने में संकोच नहीं करता, जो अपने बच्चों की झूठी कसमें खाता है, जिसके पास अपनी कोर्इ विचारधारा नहीं, कोर्इ सिद्धान्त नहीं, मात्र उद्धण्ड़ता और अशिष्ट्ता ही जिसके स्वभाव में हैं, वह व्यकित कैसे भगतसिंह के आदर्शों को मानने वाला हो सकता है ? जो  व्यक्ति देश का अहित चाहने वाले लोगों से साठगांठ रखता है, जिसकी पार्टी कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग नहीं मानती है, उसे कैसे हम महान देश भक्त का दर्जा दे सकते हैं ?
प्रश्न यह है कि उस टीवी चेनल और अरविन्द केजरीवाल को प्रायोजित इंटरव्यू प्रसारित करवाने की आवश्यक्ता क्यों आ पड़ी ? क्या यह देश की जनता को धोखा देने का प्रयोजन नहीं है ? क्या यह झूठ और फरेब की यह पराकाष्ठा नहीं है ? भाजपा के वोट काटने और मोदी की बढ़त को रोकने के लिए इतने नीचे स्तर तक उतर जायेंगे और इसके लिए मीडिया की विश्वसनीयता दावं पर लगा देंगे, ऐसी आशा किसी को नहीं थी। जो व्यकित मीडिया की लहरों पर बैठ कर घर-घर पहुंचा, आज उसे मीडिया ही लोगों के दिलों से बाहर निकाल रहा है। लोगों के मन में जिस व्यक्ति ने विश्वास जगाया, आज वहीं उन्हें विश्वासघाती लग रहा है। जनता को इस बात पर दुख है कि जिसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने वाला योद्धा माना, वह मात्र चमकते कागज का नकली पूतला निकला।
भारत की राजनीति में दोगले और धोखेबाज नेताओं की भरमार है, किन्तु उन सभी को पीछे छोड कर अरविन्द केजरीवाल सबसे आगे निकल गया है। कांग्रेस की खार्इ खोदी और अब उस खार्इ में कांग्रेस के सहयोग से भाजपा को धकेलने का प्रयास चल रहा है। कांग्रेस के भ्रष्टाचार और अर्कमण्यता का नारा लगा कर दिल्ली विधान सभा का चुनाव जीता और कांग्रेस के सहयोग से ही सरकार बना लीं । सरकार बना कर काम कम किये, नौटंकिया ज्यादा की। नौटंकी करते हुए सत्ता में आये और नौटंकी करते हुए सत्ता को छोड़ कर भाग खड़े हुए। 50 दिन तक एक प्रदेश की जिम्मेदारी ओढ़ने में अक्षम साबित हुए, किन्तु पंद्रह वर्ष से सरकार चला रहे गुजरात के मुख्यमंत्री के प्रशासन की कमजोरियां ढूंढने गुजरात चले गये।
मीडिया में बने रहने के लिए गुजरात की एक सामान्य घटना को अनावश्यक तुल दे कर दिल्ली के भाजपा कार्यालय के बाहर हिंसक भीड़ ले कर उनके नेता आक्रमण करने पहुंच गये। आचार संहित के उल्लंघन करने पर गुजरात पुलिस ने केजरीवाल को पूछताछ के लिए रोका था, उन्हें जेल में ठूंस कर प्रताडि़त नहीं किया था, जिससे आवेशित हो कर उनके नेताओं को ऐसा उद्धण्ड़ उपक्रम करना पड़ा। सबकुछ जान बूझ कर मीडिया में चर्चित होने के लिए किया गया था, किन्तु पास उल्टा पड़ गया। जनता के हीरो बनने चले थे, विलेन बन गये। फिर भी हार नहीं मानी। गुजरात के कांग्रेसी नेताओं को टोपियां पहना कर केजरीवाल हाय-हाय! के नारे लगवाये। उसी भीड़ से रोड़ शो किये। अपने ही लोगों से मनीष सीसोदिया की कार पर पत्थर फिंकवाये। फिर मोदी को गालियां देते हुए, उनसे मिलने की इच्छा जतार्इ। मिलने की अनुमति नहीं मिली, तो मीडिया में सुर्खियां बटोरने के लिए बवडंर किया।
पर इससे बात कुछ बनी नहीं। जनता पर अपना प्रभाव छोड़ने में असफल रहें। मीडिया के पास चुनावों की घोषणा के बाद समाचार की भरमार हो गयी थी, इसलिए एक ही व्यक्ति को महत्व देना सम्भव नहीं था। फिर कैसे अपनी राजनीति चमकार्इ जाय। ऐसा क्या करें, जिससे मीडिया घास डालने लगे। सम्भवत: इसी प्रयोजन को ध्यान में रखते हुए अपने चहेते टीवी चेनल के साथ मिल कर प्रायेजित इंटरव्यू प्रसारित करने का षडयंत्र रचा गया। परन्तु छल से तैयार किया गया इंटरव्यू के वे महत्वपूर्ण भाग लीक हो गये, जिन्हें छुपाया जाना था। सारे किये धरे पर पानी फिर गया। अब चारों ओर प्रशंसा के बजाय किरकिरी हो रही है। श्रीमान नौटंकीबाज अरविन्द केजरीवाल को सफार्इ देते नहीं बन रहा है। मोदी के रथ को रोकने के प्रयास में स्वयं घायल हो गये। पार्टी में खलबली मची हुर्इ है। अच्छे-अच्छे नेताओं का मोहभंग हाने लगा है। चार-पांच प्रबुद्ध व्यकित ही अब पार्टी में रह गये हैं, बाकि सब धीरे-धीरे किनारा कर रहे हैं।
परन्तु दुखद बात यह है कि भारत का एक प्रमुख समाचार समूह जिसने काफी प्रतिष्ठा अर्जित की है, केजरीवाल के साथ किसी राजनीतिक षडयंत्र में समिमलित हो जाय, यह व्यथीत करता है। मीडिया की विश्वसनीयता घटाता है। ऐसा आभास होता है कि कहीं देश के दुश्मन, जो भारत को निरन्तर असिथर करने में लगे हैं, अपने धन के प्रभाव से किसी मीडिया समूह और राजनेता को मोहरा बना कर अपने घृणित उद्धेश्यों की पूर्ति में तो नहीं लगे हैं ?
अरविंद केजरीवाल मात्र भाजपा के वोट काटने की ही राजनीति कर रहे हैं। उन्हें न तो चुनाव जीतना है और न ही सरकार बनानी है। वे किसी के मोहरे हैं। छल-प्रपंच की राजनीति करना ही उनका प्रमुख ध्येय है। भारत की जनता को ऐसे लोगों की बातों में आ कर भ्रमित नहीं होना चाहिये। इनका पूर्णतया तिरस्कार करने से ही भविष्य में ऐसाी घृणित और निकृष्ट राजनीति पर विराम लगाया जा सकता है।