Saturday, 27 June 2015

कांग्रेसी नेता देशी शासक से सत्ता छीन, फिर विदेशी को सौंपने के लिए मचल रहे हैं

सता खोने की छटपटाहट और पुन: पाने की कुलबुलाहट से सोनिया के वफादार सिपाही भारत को फिर उसी अंधेरे युग में ले जाना चाहते हैं, जहां से बमुश्किल मुल्क बाहर आया है। महारानी ने अपने अनुयायियों को आदेश दिया है- सत्ता के बिना रहना हमारे स्वभाव में नहीं। हम सत्ता के लिए जीते हैं और सत्ता के लिए ही मरते हैं। सत्ता सुख के लिए ही इस देश में रह रहे हैं। अपने परम बैरी को सत्ता सुख भोगते देख हमारे सीने पर सांप लौट रहा है। अत: मेरे आज्ञकारी अनुयायियों ! मोदी सरकार की गललियां ढूंढों। तिल का ताड़ बनाओं। रार्इ का पहाड़ बनाओ। जनता को अहसास हो जाय कि हमारे साथ दगाबाजी कर भारत की जनता ने बहुत बड़ी भूल की है। हमारा अब एक ही मिशन है- जनता से उसकी गलती का बदला लो। सरकार के किसी काम को सही मत ठहराओ। सरकार के विधायी कामों में अडंगे डालो। इतना शोर मचाओ कि आकाश हिल जाये और धरती कांप उठे।
आजकल कांग्रेस के हारे हुए योद्धा उस रण की तैयारी में तलवारें भांज रहे हैं, जो चार वर्ष बाद लड़ा जाने वाला है। रणबांकुरे सत्ता पाने के लिए तड़फ रहे हैं। उन्हें ऐसे लगा रहा है जैसे उनका प्रतिद्वंद्वी उनका शोर सुनकर कांप उठेगा। उनके सामने हथियार डाल देगा और सत्ता छोड़ कर भाग जायेगा। बावलों को यह नहीं मालूम कि न तो उनका प्रतिद्वंद्वी इतना लाचार और शक्तिहीन है, और न ही जनता की स्मरण शक्ति इतनी कमजोर है कि उनके पापों को भूल कर उन्हें पूण्यात्मा मानने लगेगी। पर महारानी का आदेश है- युद्ध चाहे आज हो या चार बरस बाद, हमें तैयारी आज से शुरु करनी पड़ेगी। उन्हें ललकारतें हुए अपनी ताकत का अहसास कराते रहो। चाहे संसद में हमारे सांसदों की कमी हो, पर हमारे पास धन की कमी नहीं है। हम सड़कों पर भीड़ एकत्रित कर हंगामा करने में सक्षम हैं। उन्हें शायद यह आभास नहीं कि आप भले ही सत्ता में बैठे हों पर सभी जगह हमारे आदमी जमे हुए हैं। मीडिया में हमारे चहते आदमी है, जो हमारे सुर में सुर मिलाते हैं। सरकरी दफ्तरो में हमारे वफादार बैठें हैं, जो मोदी सरकार को फेल करना चाहते हैं। क्रानी केपीटलिजम से धन कमाने वाले भारतीय उद्योगपति हमारे हैं, क्योंकि वे र्इमानदारी से नहीं बैमानी से धन कमाने के आदि हैं। मोदी सरकार से उनकी पटरी नहीं बैठ रही है। ये सभी हमारी सरकार चाहते हैं। हमारे साथ जो भी रहा, उसने जम कर मजे लूटे। हमारे पास ही वह साम्मर्थय है, जिससे सभी के मौज-मस्ती के दिन लौट आयेंगे। हमारे दिन वापस आते ही सरकारी धन का खूब मजा लुटेगे । खूब घपले- घोटाले करेंगें। ऐसा इसलिए कह रहे हैं कि भारत में ऐसी ही सरकारे बनती है और चलती है।
जनता ने आपातकाल के अपराधियों को भी क्षमादान दे कर सता सौंपी, तो हमे क्यों नही सौंपेगी ? आखिर हम भी तो उसी खानदान के अवशेष हैं, जिसने भारत की जनता के साथ हमेशा दगाबाजी की पर जनता ने उसे सम्मान और आदर दिया। इसलिए इस बात पर रंज मत करो कि हमने पूरा प्रशासनिक ढांचा भ्रष्ट कर उसे शिथिल और अस्तव्यवस्त कर दिया। इस बात पर भी अफसोस मत करो कि हमारी सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था का कबाड़ा कर दिया। इस बात पर भी पछताने की जरुरत नहीं है कि हमने घोटालों और घपलों से राजकोषीय घाटा इतना बढ़ाया की महंगार्इ आकाश छूने लगी। जनता ने हमे ठुकरा दिया इस पर हमे कोर्इ ग्लानि नहीं हैं, क्योंकि हम देश में ऐसी परिस्थितियां निर्मित करने में सक्षम हैं, जिससे थक हर हार कर जनता को हमारी ही शरण में आना पड़ेगा।
बड़े-बड़े घोटाले जो जांच से साबित हो गये, फिर भी हम नहीं मानते कि हमने कोर्इ घोटाले किये थे। पकड़े गये तब भी अपने आपको चोर नहीं समझते हैं। दस साल में बीस लाख करोड़ का घपला हुआ, फिर भी हमे अपना दामन साफ लगता है, क्योंकि हम घोटालों के मुख्य सूत्रधार है, पर हम पर कोर्इ आरोप बनते ही नहीं, क्योंकि हम किसी संवैधानिक पद पर नहीं थे, हमने कहीं अपने हस्ताक्षर नहीं किये। भारत का कोर्इ न्यायालय हमे दोषी ठहरा कर सजा नहीं सुना सकता। हांलांकि जनता ने हमे दोषी मान कर सजा सनुा दी है, पर हमे विश्वास है वह भी क्षमा कर कर देगी। हां, यह सच है कि घोटालों का अधिकांश धन हमने ही डकारा है, पर धन कहां है और हमने इसे कहां छुपा रखा है, इसका रहस्य हम कभी किसी को नहीं बतायेंगे। सरकार के पास न तो इतने स्त्रोत है और न क्षमता है कि वह हमारे छुपे हुए धन को खोज सके।
हम मानते हैं कि हम सर से पांव तक कीचड़ से सने हुए हैं, परन्तु यदि किसी के उजले दामन पर जरा से भी छींटे होने का आभास हों तो हमे शोर मचाने का अधिकार हैं, क्योंकि हम सत्ता में नहीं है। हम जनता को समझा देंगे कि आप हमारे शरीर पर जो कीचड़ देख रहे हैं, वह दरअसल आपका दृष्टि भ्रम है। आप पर हमारे ऊपर से दृष्टि हटा कर उनके कपड़ो पर दाग ढूढ़िये, जिसका आभास हमे हो रहा है।
हम जानते हैं कि भारत को आज़ादी मिले वर्षों हो गये, किन्तु इस देश की जनता की मानसिकता से गुलामी पूरी तरह हटी नहीं है, इसीलिए तो हमारी पार्टी के वफादार सिपाही एक विदेशी को ही अपना नेता मानते हैं और फिर एक विदेशी को हाथों में देश को सौंपने के लिए उतावले हो रहे हैं, क्योंकि उन्हें देशी शासक बिल्कुल पसंद नहीं हैं। उन्हें इस बात का भी अहसास नहीं कि पार्टी नेतृत्व के कारण ही पूरे देश में पार्टी मुंह दिखाने लायक नहीं बची है, फिर भी उनकी वफादारी में कोर्इ आंच नहीं आर्इ है। हमारी पार्टी के नेता देशी नेतृत्व को कोसते रहेंगे और विदेशी नेतृत्व के प्रति आस्था प्रकट करते रहेंगे। भारत की राजनीति से जब तक हमारी पार्टी का अस्तित्व बचा रहेगा। पार्टी में हमारे वफादार अनुयायियों की भरमार रहेगी, हमारा राजनीतिक जीवन चलता रहेगा।
सम्भवत: इसीलिए कांग्रेस महारानी के वफादार सेवकों ने मोदी सरकार के विरुद्ध चार साल तक चलने वाले एक निर्णायक युद्ध की घोषणा कर दी है। उन्हें विश्वास है कि यदि सरकार के विरुद्ध इसी तरह की आक्रामकता दिखाते रहेंगे तो चार साल तक लड़े जाने वाले निर्णायक युद्ध में उनकी जीत निश्चित होगी। उनकी महारानी के पास सत्ता की डोर आ जायेगी। उनका नौसिखिया पुत्र भारत का शासन सम्भाल लेगा। देशी शासको का पराभव हो जायेगा और विदेशी शासक फिर भारतीयों पर शासन करने का अधिकार पा लेंगे।

Thursday, 25 June 2015

गांधी परिवार की देशभक्ति संदेह के घेरे में

गांधी परिवार ने भारतीय योग का मुखर विरोध ही नहीं किया एक समुदाय के मन में भ्रान्तियां पैदा कर इससे दूर रहने की नसीहत दी है। सरकार की किसी नीति से असहमति जायज है, किन्तु भारत की जिस प्राचीन विधा से विश्व का जनमानस अभिभूत है, ऐसी विधा के प्रचार की सरकारी नीति का विरोध करना अनुचित है। विश्व के अधिकांश देश योग में आस्था प्रकट कर रहे है, फिर गांधी परिवार और कांग्रेस का इसमें अनास्था प्रकट करने का औचित्य क्या है ? सिर्फ इसलिए कि यह मोदी सरकार का आयोजन है और नरेन्द्र मोदी को गांधी परिवार ने अपना दुश्मन नम्बर एक मान रखा है। यदि विरोध का यही एक कारण है तो यह अलोकतांत्रिक मन:स्थिति को प्रकट करता है, क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता कोर्इ व्यक्ति नहीं छीनता, जनता छीनती है। जनता ने गांधी परिवार से सत्ता छीन कर नरेन्द्र मोदी को सौंपी है । ऐसा होने पर क्या भारत की जनता को भी गांधी परिवार अपना दुश्मन नम्बर एक मानता है ?
योग को ले कर गांधी परिवार ने जो रवैया दर्शाया है, उससे यही साबित होता है कि इस परिवार की भारतीय संस्कृति और इसके मूल्यों में कोर्इ आस्था नहीं है। एक विदेशी की तरह गांधी परिवार भारतीयता को हेय दृष्टि से देखता है। अत: जिन लोगों के मन में भारत और भारतीयता के प्रति श्रद्धा नहीं हैं, उन्हें भारतीय की जनता पर शासन करने का हक भी नहीं है। अंगे्रजो की तरह उसकी नीति भी यही है कि भारत के दो समुदायों के बीच किसनी न किसी बहानें फूट डालों और उन्हें एक दूसरे से अलग करो, ताकि उनके मन में परस्पर अविश्वास की खार्इ गहरी होती जाय। कांग्रेस ने योग का भी इसी नीति की तरह विरोध किया है, जो उसकी कपटपूर्ण मंशा को दर्शाता है।
सोनिया गांधी लम्बे समय तक भारत में रहने के बाद भी अपने आपको भारतीय परिवेश में नहीं ढाल पार्इ है। भारत और भारतीयों पर वे सिर्फ और सिर्फ हुकूमत करना चाहती है, भारतीयों के दिलों से जुड़ने और भारतीयता के प्रति आस्था प्रकट करने के लिए उन्होंने अपने दीर्घ राजनीतिक जीवन में कोर्इ उदाहरण प्रस्तुत नहीं किया। भारतीयता के प्रति कभी अपने आंतरिक मनोभावों को प्रकट नहीं किया। सार्वजनिक जीवन में रहने के बाद उनकी रहस्यमय चुप्पी हमेशा चुभती है। उनकी निजी विदेश यात्राएं यह संदेह प्रकट करती है कि लूट के कारोबार से कमार्इ गर्इ धन राशि को कहीं व्यवस्थित करने के लिए तो वे विदेश नहीं जाती है। यदि ऐसा नहीं है तो वे अपनी यात्रा के मकसद को हमेशा गोपनीय क्यों रखती है ? उनके निकटस्थ कांग्रेसियों के पास भी इस बात की जानकारी नहीं होती कि वे कहां गर्इ है और किस उद्धेश्य को ले कर विदेश गर्इ है ? इस प्रश्न को यह कह कर नहीं टाला जा सकता कि निजी यात्रा की जानकारी देश को रखना आवश्यक नहीं है। क्या कांग्रेसी यह बता सकता है कि जो लोग सार्वजनिक जीवन में होते हैं, उनका निजी क्या होता है ? उन्हें अपना निजी जीवन इतना ही प्रिय है, तो सार्वजनिक जीवन छोड़ क्यों नहीं देते ?
राहुल गांधी को कांग्रेस ने अपना नेता स्वीकार कर लिया हेै और उनके कंधे पर पार्टी पूरा भार डालने की रणनीति बना रही है। अपरिपक्क और छिछोरी मानसिकता वाले व्यक्ति पर इतनी भारी जिम्मेदारी डालना युक्तियुक्त नहीं लगता, किन्तु कोर्इ भी कांग्रेसी इसका विरोध नहीं कर सकता, क्योंकि पार्टी सुप्रीमो की यही आंतरिक इच्छा है, जिसका विरोध करना अलोकतांत्रिक पार्टी की नियति में नहीं है। राहुलगांधी ने भारतीय संस्कृति और भारतीय इतिहास का अध्ययन नहीं किया। भारतीय राजनीति और संवैधानिक व्यवस्था पर भी उन्होंने कभी अपने विचार प्रकट नहीं किये। देश की प्रगति और खुशहाली के लिए क्या आर्थिक नीतियां बनानी चाहिये ? इसं संबंध में उन्होंने अपना कोर्इ निजी चिंतन नहीं प्रस्तुत किया। उनकी मन: स्थिति और राजनीतिक विचारों का परिचय कभी-कभी अपनी निकृष्ट,तथ्यहिन और बेतुकी भाषण शैली से देते रहते हैं। उनका राजनीतिक विचार और दर्शन यही है कि जनता द्वारा चुनी गर्इ एक सरकार का विरोध करते रहों। सरकार के प्रति तिरस्कार व अपमानित करने वाली शब्दावली का प्रयोग कर भाषण देते रहो।
प्रश्न उठता है कि क्या कांग्रेस के पास एक अपरिपक्क मानसिकता वाले व्यक्ति के अलावा कोर्इ नेता नहीं है ? क्या राहुल एक विदेशी महिला – के पुत्र है, इसीलिए कांग्रेस उन्हें कांग्रेस अपना नेता मान रही है और भारत पर शासन करने का हक दिलाना चाहती है। क्या यह गुलाम मानसिकता नहीं है ? दस वर्षों तक मां-पुत्र की भ्रष्ट नीतियों से देश बर्बाद हो गया। पूरे राष्ट्र ने अपमानित कर कांग्रेस को ठुकरा दिया, फिर भी कांग्रेसी नेताओं के मन मे इस परिवार के प्रति अंध श्रद्धा में कोर्इ कमी नहीं आर्इ है। कर्इ राज्यों की सरकारे हाथ से गर्इ। कर्इ प्रदेशों से लोकसभा के चुनावों में शून्य हाथ लगा। बड़े-बड़े प्रदेशों से दो चार सीटे हाथ लगी। कांग्रेसी नेताओं के मन में अपनी इस अपमानित करने वाली पराजय से कोर्इ ग्लानि नहीं है। वे आत्मचिंतन क्यों नहीं करना चाहते ? क्यों वे उस परिवार के साथ जोंक की तरह चिपके रहना चाहते हैं, जिनकी देश भक्ति संदेह के घेरे में है। जिनके भ्रष्ट आचरण से पूरा देश क्रोधित है।
शासद कांग्रेसी नेताओं के मन में यह धारण है कि चाहे उनके पास चवांलिस सांसदों की पूंजी हों, किन्तु उनके गांधी परिवार के पास सम्भवत: चवांलिस हजार करोड़ की पूंजी होगी। अपनी धनशक्ति के बल पर यह परिवार भारतीय लोकतंत्र पर पुन: नियंत्रण कर लेगा। एक न एक दिन इस परिवार की कृपा से हमारा शासन फिर आयेगा। वे मौज मस्ती वाले दिन लौट आयेंगे। इसलिए यह परिवार अपने धन के प्रभाव से जो भी राजनीतिक प्रपंच रच रहा है, चाहे वह गलत हो उससे जुड़े रहो। एक चुनी हुर्इ लोकप्रिय सरकार पर जितने शाब्दिक प्रहार किये जाये, करते राहे। चाहे वे सही हो या गलत हो, उनके साथ अपने आपको जोड़े रहो।
भारतीय योग का विरोध कर गांधी परिवार ने अपने आपको भारतीयता से अलग कर दिया है। यह साबित कर दिया है कि वे ऐसे किसी आयोजन के समर्थक नहीं है, जिससे भारत को विश्व में प्रतिष्ठा मिले। इस वििश्ष्ट आयोजन के समय पूरा परिवार देश छोड़ कर चला गया, जिससे परिवार की राष्ट्र भक्ति संदेह के घेरे में आ गर्इ हैं। अतीत में ऐसे कर्इ कृत्य इस परिवार ने किये हैं, जिससे उनकी राष्ट्रभक्ति पर प्रश्न चिन्ह लगे थे। परन्तु अब यह साबित हो रहा है कि यह विदेशी परिवार भारत पर शासन करने की मंशा सिर्फ इसलिए रखता है, ताकि किस न किसी तरह भारत की संवैधानिक व्यवस्था पर नियंत्रण कर अपने लूट के कारोबार को जारी रखा जा सके।
नरेन्द्र मोदी ही उस जीवट ऊर्जा वाले व्यक्ति हैं, जिन्होंने एक विदेशी परिवार को सत्ता से दूर किया है। अपनी छल विधा से यह परिवार साम्प्रदायिक शक्तियों को सत्ता से दूर रखने के राजनीतिक षड़यंत्र के तहत मोदी सरकार का विरोध करता रहेगा और सारे विरोधी दलों को एक जुट करता रहेगा। लोकसभा में सरकार प्रभावी काम नहीं कर पाये, उसके लिए अवरोध डालता रहेगा।

Friday, 12 June 2015

साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक शक्तियां- देश के बहुसंख्यक समाज को दी जाने वाली गालियां है

भारतीय राजनेताओं के लिए इस देश में रहने वाला बहुसंख्यक समाज दोयम दर्जें का नागरिक हैं, अत: जब तब उसकी धार्मिक आस्था और विश्वास पर बेहिचक चोट पहुंचार्इ जाती है, क्योंकि इसी तबके का पढ़ा लिखे सभ्रान्त समाज को अपने धर्म और परम्पराओं से परहेज है और वे इन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं, इसलिए जब कभी भी सम्प्रदाय और साम्प्रदायिकता को ले कर बवाल उठता है, वह राजनेताओं की जमात के साथ खड़ा हो जाता है।
यदि आप बहुसंख्यक समाज के धर्म से जुड़े हुए हैं और आपकी अपने धर्म में आस्था हैं, तो आप साम्प्रदायिक कहलाते हैं, किन्तु आपकी यदि उस धर्म में आस्था हैं, जो बहुसंख्यक समाज का नहीं है, तो आप धर्मनिरपेक्ष हो जाते हैं। इसी तरह एक धर्म के प्रचार प्रसार में लगे हुए साधु-संतों को साम्प्रदायिक शक्तियां कह कर पुकारा जाता है, वहीं दूसरे धर्मों के प्रचार प्रसार में लगे लोगों को धर्मनिरपेक्ष ताकते कहा जाता है। जो राजनीतिक दल भारत की प्राचीन मान्यताओं और संस्कृति के प्रति अपना अनुराग दिखाता है, वह साम्प्रदायिक दल हो जाता है, किन्तु जो राजनीतिक दल विदेशों से आयातित धर्म और मान्यताओं को अपना समर्थन देते हैं, वे धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल बन जाते हैं।
भारतीय संस्कृति से जुड़े हुए देवी देवताओं के कार्टुन बनाना और उनका उपहास उड़ाना जायज समझा जाता है। ऐसा करने पर जो अपनी आपत्ति दर्ज करते हैं, उन्हें साम्प्रदायिक कह कर उनकी तौहीन की जाती है, किन्तु किसी मजहब विशेष के संबंध में एक शब्द लिख देना या बोल देना जघन्य अपराध माना जाता है। पूरे विश्व में कोहराम मच जाता है। भारी खून-खराबा होता है, किन्तु इस पागलपन पर कुछ भी बोलने से धर्मनिरपेक्ष राजनेताओं की जबान लड़खड़ा जाती है। इसी तरह मंदिरों से मूर्तिया चुरा कर उन्हें अन्तरराष्ट्रीय बाज़ारों में बैच देने पर कोर्इ हंगाम नहीं होता, किन्तु किसी सिरफिरे द्वारा चर्च पर एक पत्थर फैंक देने से तूफान खड़ा हो जाता है। धर्मनिरपेक्ष राजनेता और समाचार मीडिया छोटी सी घटना पर गाहे बगाहे उबल पड़ता है।
कोर्इ राजनीतिक दल यदि बहुसंख्यक समाज के सबंध में कुछ बोलता है या उसकी पीड़ा के साथ अपने आपको जोड़ता है तो यह कहा जाता है ये लोग साम्प्रदायिकता की आग लगा रहे हैं। समाज में साम्प्रदायिकता विष भर रहे हैं। बार-बार ये शब्द दोहराये जाते हैं- साम्प्रदायिक ताकतों को रोको ! दुर्भाग्य से ऐसा कहने और करने वाले वे ही लोग हैं, जो भारत के बहुसंख्यक समाज का एक भाग हैं, किन्तु अपने राजनीतिक स्वार्थ की रोटियां सेकने के लिए अपनी सांस्कृतिक मान्यताओं को रौंदने का उपक्रम करते हैं।
पच्चीस वर्ष पहले कश्मीर घाटी के पंड़ितो पर अमानुषिक अत्याचार कर उन्हें खदेड़ दिया गया इस षड़यंत्र को पड़ोसी देश ने स्थानीय राजनेताओं के साथ मिल कर अंजाम दिया था। अपने ही देश में शरणार्थी बने ये भारतीय नागरिक इसलिए प्रताड़ित हैं, क्योंकि ये भारत के बहुसंख्यक समाज के अंग है। इन अभागे देशवासियों के प्रति सहानुभूति के दो शब्द किसी धर्मनिरपेक्ष राजनेता की जबान से नहीं फिसलें, क्योंकि वे ऐसा करते तो साम्प्रदायिक हो जाते। उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि कलंकित हो जाती। वहीं दूसरी ओर गुजरात दंगो पर बारह वर्ष तक तूफान खड़ा करने वाली धर्मनिरपेक्ष ताकतों के मन में कश्मीरी पंड़ितो के प्रति सहानुभूति क्यों नहीं उपजी ? यह प्रश्न अभी भी अनुतरित है। इस बारें में यही कहा जा सकता है कि भारत की राजनीति बहुसंख्यक समाज की पीड़ा से कभी द्रवित नहीं होती। उसके संबंध में कुछ भी कहने से अपने आपको अलग कर देती है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दूसरे धर्मों का आदर करते हैं, किन्तु उनकी आस्था अपने धर्म में ही है, जिसे वे पाप नहीं समझते। पूजा-अर्चना करने और प्रसिद्ध मंदिरों में वे जाते हैं, किन्तु अपने आपको धर्मनिरपेक्ष घोषित करने के लिए वे अन्य मजहब की टोपी नहीं पहनते, क्योंकि ऐसी नौटंकी करना उन्हें पसंद नहीं है। इन्हीं उदाहरणों से उनकी साम्प्रदायिक मनोवृति को प्रमाणित किया जाता है और कट्टरवादी नेता कहा जाता है। किन्तु जिन नेताओं के मन में एक धर्म विशेष में आस्था नहीं है। वे उस धर्म की परम्पराओं को नहीं मानते, फिर भी यदि टोपी पहन लेते हैं, तो उनकी धर्मनिरपेक्षता प्रमाणित हो जाती है।
यदि संवैधानिक अधिकार प्राप्त करने के बाद कोर्इ राजनेता अपनी प्रशासनिक क्षमता प्रमाणित नहीं कर पाता हैं। जन समस्याओं को सुलझाने में वह असमर्थ रहता है, किन्तु धर्मनिरपेक्षता का आवरण ओढ़ कर साम्प्रदायिकता के नाम पर बहुसंख्यक समाज को कोसता है, तो उसकी सारी प्रशासनिक दुर्बलताएं छुप जाती है। इसी तरह अपने शासनकाल में ऐतिहासिक धोटाले कर देश की अर्थव्यवस्था को कबाड़ा करने वाला राजनीतिक दल भी अपने आपको पाक साफ समझता हैं, क्योंकि उसने धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़ रखा है और साम्प्रदायिक शक्तियों के साथ लड़ने की कसमें खा रखी है।
ललू यादव ने बिहार प्रदेश पर पंद्रह वर्ष तक शासन किया और पूरे प्रदेश जंगलराज में तब्दील कर दिया। पशुओं के चारे के लिए जारी किये जाने वाले करोड़ो रुपये के फंड का घपला किया, जिसका दोष प्रमाणित हो चुका है। किन्तु ये महाशय पुन: बिहार की राजनीतिक को अपने नियंत्रण मे लेना चाहते हैं, क्योंकि ये धर्मनिरपेक्ष हैं और यह मानते हैं कि धर्मनिरपेक्षता ने उनके सारे पाप धो दिये हैं और साम्प्रदायिक शक्तियों को बिहार की सत्ता नहीं सौंपने का अधिकार उन्हें देश की धर्मनिरपेक्षत ताकतों ने दे दिये हैं। वे स्वयं ही ऐसा मान रहे है कि ये ताकते आग लगताती है, जिसे बुझाने के लिए फायर बिग्रेड बन कर आया हूं। अर्थात आग लगी नहीं, धुआं उठा नहीं, फिर भी आग की कल्पना कर जनता को भयभीत करने वाले अपने आपको पुण्यात्मा समझते हैं, तो यह उनका अतिआत्मविश्वास है।
चाहे बिहार में नीतीश कुमार के साथ मिल कर साम्प्रदायिक शक्तियों ने अच्छा प्रशासन दिया हों, किन्तु उनके पुण्य को भी पाप ही माना जायेगा, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि ये शक्तियां भारत के बहुसंख्यक समाज का प्रतिनिधित्व करती है, इसलिए ये पापी है। अत: जब तक भारत का बहुसंख्यक समाज बंटा रहेगा, उसे साम्प्रदायिक कह कर कोसा जाता रहेगा, किन्तु जब वह एक हो जायेगा, भारत के कर्इ राजनेताओं की दुकाने बंद हो जायेगी। तब विवश हो कर अपने शरीर पर डाला गया धर्मनिरपेक्षता का लबादा फैंकना पड़ेगा। तब उन्हें भी सबका साथ सबका विकास का नारा देना पड़ेगा।
अब समय आ गया है जब हम एक हो जायें और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर जो लोग बहुसंख्यक समाज को साम्प्रदायिक और साम्प्रदायिकता की गालियां देते हैं, उनको भारत की राजनीति से तिरस्कृत कर दें, क्योंकि भारत का बहुसंख्यक समाज अपने सारे पूर्वाग्रहों को छोड़ कर अपनी संस्कृति और परम्पराओं में आस्था प्रकट करेगा, तब उन्हें भारत की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतें चिढ़ाने की हिम्मत नहीं कर पायेगी। भारत की प्रगति और खुशहाली तथा भारतीय राजनीति के शुद्धिकरण के लिए यह आवश्यक है कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर राजनेता अपनी प्रशासनिक अकुशलता, भ्रष्टआचरण को छुपाना बंद कर दें और एक धर्म विशेष से जुड़े समाज के प्रति झूठी सहानुभूति दर्शाने का उपक्रम बंद कर दें

Friday, 22 May 2015

हमने मुल्क को तबाह करने की सुपारी ली है जी !

हम देश के संविधान को सत्ता पर चढ़ने की सीढ़ी मानते हैं जी। संविधान की शपथ लें, कुर्सी पर बैठ गये, फिर संविधान की धाराओं को पांवों के तले रौंद रहें है जी। हमे देश की प्रशासनिक व्यवस्था से कोर्इ सरोकार नहीं। हमने इसे बर्बाद करने का मानस बना लिया है। हमने अपने छियांसठ विधायकों को मंत्री या मंत्री जितनी सुविधाएं दिला दीं। उन्हें सचिवालय में कमरे और स्टाफ दिला दियें। आर्इएस अफसरों को हमने खाली बिठा रखा है। जो हमारे अपने थे, उन्हें काम दिया, ऑफिस दिये, बाकि बहुत सारे खाली बैठें हैं, क्योंकि न तो हमारे पास उनको देने के लिए काम है और न ही बिठाने के लिए जगह। दरअसल स्थापित नियम, कानून और लोकतांत्रिक परम्पराओं को हम नहीं मानते, क्योंकि हमे अराजक कहते हैं। हम अराजक हैं और अराजक रहेंगे। खबरों में बने रहने के लिए हम वे सारे अराजक काम करते रहेंगे, ताकि पूरे देश की जनता रोज टीवी पर हमारे दर्शन करती रहें। हम कोर्इ सरकार चलाने या काम करने थोड़े ही आये हैं, हम तो अपने व्यक्तित्व को चमकाने आये है। व्यवस्था के विरुद्ध जनता को विद्रोही बनाने आये हैं।
हम शहरी नक्सली है जी ! हम शब्दों की गोलियों और सफेद झूठ के धमाकों से अपने दुश्मनों को ललकारते हैं। जंगल में रहनेवालें नक्सलियों की तरह हमे धमाके करने और गोलियां बरसाने के बाद जंगलों मे छुपना नहीं पड़ता। हम सीना तान कर घूमते हैं। हमे इस देश के कानून की धाराएं पकड़ ही नहीं सकती, क्योंकि हम खून नहीं करते, लोगों का दिमाग खराब करते हैं, ताकि सभी हमारी तरह अराजक बन जायें। जंगली नक्सली राजनीतिक व्यवस्था को नहीं मानते। वे जंगल में रह कर इस व्यवस्था को नष्ट करना चाहते हैं। हम शहरी नक्सली व्यवस्था मे घुस कर और राजनेता बन कर व्यवस्था को तबाह करना चाहता है।
नक्सलियों की भी भारत के संविधान में आस्था नहीं हैं, हमारी भी नहीं है। वे व्यवस्था के विरुद्ध खुला विद्रोह कर रहे हैं। हमारा छुपा हुआ एजेंड़ा भी यही है। संविधान को हम भी नहीं मानते, किन्तु संविधान से लाभ उठा कर देश की राजनीतिक व्यवस्था को नष्ट कर हम अपने लिए नर्इ व्यवस्था बनाना चाहते हैं, ताकि हम दिल्ली प्रदेश के नहीं, पूरे भारत के तानाशाह बन जायें। हमे विरोध और विरोधी पसंद नहीं हैं। यदि हमारा मकसद पूरा हो गया तो पांच साल बाद फिर जनता के पास वोटों की भीख मांगने की जरुरत नहीं होगी। जैसे हमने अपनी पार्टी और विधानसभा में अपने सारे विरोधियों को ठिकाने लगा दिया, वैसे ही तानाशाह बन कर हम देश भर में अपने विरोध और विरोधियों को खत्म कर देंगे। आप समझ गये न, हमारे इरादे कितने खतरनाक हैं जी ! हम सिस्टम में घुस कर इसे पूरी तरह नष्ट करना चाहते हैं। जनता ने कांग्रेस को ठुकरा दिय। अब मुल्क चार साल तक हमारी नौटंकिया देखेगा। इन्हीं नौंटकियों की बदौलत हम चार साल बाद भाजपा को सत्ता से हटा देंगे। दिल्ली विधानसभा जैसा प्रचण्ड़ बहुमत हमने भारतीय संसद में पा लिया तो निश्चित रुप से इस देश का संविधान बदल कर भारत के तानाशाह बन जायेंगे। इसके बाद देश में न सवंिधान रहेगा, न हमारे विरोधी रहेंगे। बस हम ही हम रहेंगे।
पूरे देश के किसानों को अराजक बनाने के लिए हमने एक किसान को हमारी सभा के मंच के पास ही मरवा दिया और इस देश का कानून हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सका। मीडिया की दगाबाजी से हमारा सारा प्लान फ्लाप हो गया। यदि हमारा प्लान सफल हो जाता, तो पूरे देश के किसानों को अराजक बना कर मोदी सरकार के विरुद्ध खड़ा कर देते।
हमारा एक प्लान फेल हो गया इसका मतलब यह नहीं है कि हम भविष्य और नये प्लान ले कर नहीं आयेंगे। दरअसल भारत की राजनीतिक व्यवस्था को तबाह करने के लिए हमने सुपारी ली है। जिन्होंने सुपारी दी हैं, उन्होंने दिल्ली का चुनाव लड़ने के लिए धन भी दिया था, अपने आदमी भी प्रचार में भी लगायें थे। उनका मकसद था- मोदी के घंमड़ का चूर-चूर करना, जो हमने कर दिखाया। अब हमारी योजना हैं-भारत की राजनीति से मोदी के वर्चस्व को समाप्त करना, इसकेलिए हम कर्इ योजनाओं पर काम कर रहे हैं, जिनका मकसद है- भारत को आर्थिक व राजनीतिक दृष्टि से तबाह करना। पूरे देश की जनता को विद्रोही बना कर अपने वश में करना।
दिल्ली तो हमारी प्रयोगशाला हैं, जहां हम शासन नहीं कर रहे हैं, दिल्ली को अराजक क्षे़त्र बनाने की भरसक कोशिश कर रहे हैं। जो वादे चुनाव जीतने के लिए किये थे, वे पूरे होंगे नहीं, क्योंकि इतना पैसा है नहीं। बिजली के दाम आधे करने का बाद विकास के लिए धन बचा ही नहीं है। पर काम किसे करना है और शासन किसे चलाना है। हमे तो अपने सारे विधायकों को संतुष्ट कर चुपचाप बिठाना चाहते हैं, ताकि वे हमारे खिलाप मोर्चा बन्दी नहीं करें। इसलिए हमने उन्हें मौखिख सलाह दे रखी है- भ्रष्टाचार कर जितना पैसा कमाना चाहते हों, कमाते रहो। मैं रिश्वत नहीं लेने और रिश्वत नहीं देने के पोस्टर लगा कर भ्रष्टाचार दूर करता रहुंगा। मैं जनता को झूठ-मूठ ही समझाता रहुंगा कि देखो मेरे आने के बाद दिल्ली में भ्रष्टाचार खत्म हो गया है। अफसरों के माथे पर भ्रष्टाचार के पाप का मटका फोड़ कर उन्हें बदनाम करता रहुंगा। मैं भी अफसर रहा हूं और जानता हूं कि बिना मंत्रियों के मिलीभगत के अफसर भ्रष्टाचार नहीं कर सकता, पर उन्हें बदनाम करने में अपना क्या जाता है।
हमारा मकसद है-दिल्ली की सत्ता हाथ में आने के बाद केन्द्र सरकार के विरुद्ध न खत्म होने वाले संघर्ष की शुरुआत करना, जो हमने कर दी है। दिल्ली के राज्यपाल को तो जंग के लिए हमने मोहरा बनाया है। दरसअल हम अपने झूठ, प्रपंच और नौटंकी कला से केन्द्र सरकार को परेशान करना चाहते हैं। थोड़े दिनों बाद उपमुख्यमंत्री को पूरा चार्ज दे कर हम देश भर में घूमेंगे और जनता को केन्द्र सरकार के विरुद्ध भड़कायेंगे। वैसे राहुल हमे गुरु मान कर हमारी ही नीतियों का अनुशरण कर रहे हैं। पर आप जानते हैं, राहुल राजनीति के कच्चे खिलाड़ी है। वे जानते नहीं कि वे जा रास्ता बना रहे हैं, उस पर एक दिन हम दौडेंगे और उन्हें मिलों पीछे छोड़ देंगे। चार साल बाद भाजपा को सत्ता से राहुल नहीं, हम हटायेंगे, क्योंकि हमारे पास दिमाग है, तिकड़म है और विदेश में बैठे अपने एक प्रिय साथी का साथ हैं । साथी हमारे लिए प्रचुर धन का जुगाड़ करेगा। देश में काम कर रहे विदेशी मालिकों के मीडिया भी हमारा साथ देंगे। क्योंकि हमारा भारत मूर्खों का देश हैं। आपके पास जनता को मूर्ख बनाने की कला है, तो आप हर बाजी जीतते जायेंगे। दिल्ली में हमने वह करिश्मा कर दिखाया। दिल्ली की जनता की मूर्खता का लाभ उठाया। अब पूरे देश की जनता की मूर्खता का लाभ उठा कर भारत की शासन व्यवस्था को अपनी मुट्ठी में करना है। हमारे विदेशी साथी की भारत को तबाह करने की दिल्ली इच्छा यही हैं, जिसे हमे पूरा करना है, क्योंकि वह भी यह चाहता है कि भारत की सत्ता ऐसे आदमी के पास हो, जो उसके इशारे पर काम करें। हम उनके अहसान को पूरा करने के लिए जी जान एक कर देंगे, क्योंकि उनसे सुपारी जो ली है, जी!
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Monday, 18 May 2015

भारत की राजनीति में आये भूचाल के एक वर्ष बाद

एक वर्ष पहले भारत की राजनीति में भूचाल आया था। परिवार पार्टी के मजबूत गढ़ ढह गये। कहीं-कहीं तो शून्य हाथ लगा और कहीं से मात्र एक आध सांसद जीत कर लोकसभा पहुंचे। अपनी पार्टी के सांसदों से भरा रहने वाला सदन एक छोटे से कोने में सिमट कर रह गया। कुछ क्षत्रपों के मनसूबों पर भारी वज्रपात हुआ। अपने संख्या बल से केन्द्र की सरकारों को ब्लैकमेल करने और समर्थन देने के बदलें भारी कीमत वसूलने के सपने धरे रह गये। दलित महारानी अपने प्रदेश में हाथ मसल कर रह गर्इ और प्रधानमंत्री बनने की हसरते सीने में दबाये एक सूबे के सूबेदार सिर्फ अपनी लाज बचा पायें। अतृप्त महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए बिहार के क्षत्रप इतने बैचेन हो गये कि जिनके सहारे सत्ता के शिखर पर पहुंचे, उसी को लात मार दी। उनके सपने ताश के पत्तों की तरह बिखर गये। धड़ाम से जमीन पर गिरते ही आंखों के सामने अंधेरा छा गया। बैचारें को रोते हुए अपने पूराने राजनीतिक बैरी को गले लगाना पड़ा।
एक वर्ष तक गहरे सदमें की पीड़ा के दंश से छटपटा रहे राजनेता अपने सुनहरे दिन फिर लौट आने की आशा में उठ खड़े हुए हैं। सभी मिल कर ऐसी रणनीति बनाने में जुट गये हैं, जिससे पूराने दिन लौट आयें। महारानी अपने हाथों में सत्ता की डोर थामने के लिए मचल रही है। अब वे चाहती हैं कि किसी पुतले कों नहीं, अपने बेटे को सिंहासन पर बिठा कर भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर पुन: अपना अधिकार जमा लें। प्रादेशिक क्षत्रपों का मौन समर्थन उन्हें मिल रहा है, क्योंकि भारत के इस राजनीतिक परिवार के हाथों में फिर सत्ता आने से ही उनका राजनीतिक भविष्य सुरक्षित हैं। गठबंधन सरकारों से ही उनका राजनीतिक भविष्य संवरता है। चार वर्ष बाद फिर ऐसा ही कोर्इ भूचाल आ गया तो उनके तम्बू पूरी तरह उखड़ जायेंगे। वे कहीं के नहीं रहेंगे। राजनीति की दुकान बंद कर और कोर्इ नया धंधा शुरु करना होगा।
सभी हारे हुए खिलाड़ियों ने अब यह ठान लिया है कि अपना अस्तित्व बचाने के लिए सरकार के हर उस काम का विरोध करेंगे, जो देश के विकास से जुड़ा हुआ हो। वे देश के विकास की कीमत पर अपना विनाश नहीं चाहते। जनता को खुशहाल बनाने की कीमत पर वे स्वयं बदहाल होना नहीं चाहते। अत: सरकार कोर्इ भी विधेयक लाएगी, उस पर लोकसभा में शोर मचाएंगे और राज्यसभा में अपने बहुत के बल पर उसे पास नहीं होने देंगे।
चाहे भारत की जनता ने सरकार को बहुमत से चुना हों, पर हम भारत की जनता के निर्णय सही नहीं मानते। दरबारी पार्टी तो अपनी महारानी को अब भी भारत की भाग्य विधाता मानती है और उनके युवराज को भारत का भावी सम्राट। ऐसा इसलिए हैं, क्योंकि रस्सी जल गयी, पर एंठ नहीं गर्इ। सभी जगह पीट गये पर यह मानने को तैयार नहीं है कि हमारी औकात अब छोटी हो गर्इ है। हमारे पास सत्ता नहीं है। हमारे इशारे पर देश का प्रधानमंत्री और उसके मंत्री काम नहीं करते। हम चाहे जो बोल सकते, पर हम चाहे जो कर नहीं सकते। हम सरकार को चोर कहने में नहीं हिचकिचाते, क्योंकि चोरों को सारे चोर नज़र आते हैं।
महारानी को दिलासा देने के लिए दरबारी कहते हैं- साले को पूरा बहुमत मिल गया, इसलिए प्रधानमंत्री बन गया। यदि दस-बीस सीटे कम आती, तो कभी इसकी सरकार नहीं बनने देते। यदि ऐसा होता तो गठबंधन सरकार का दौर चलता रहता। सरकार बनती और गिरती या गिरा दी जाती और अंतत एक वर्ष बाद आज देश मध्यावधी चुनावों की तैयारी में लगा होता। युवराज की राह आसान हो जाती। भारतीय लोकतंत्र फिर राजतंत्र में तब्दील हो जाता। पर भारत की जनता का यह सौभाग्य ही था कि ऐसा हादसा नहीं हुआ, वरना अनर्थ हो जाता।
एक चुनी हुर्इ सरकार के वैधानिक निर्णयों को राजनीतिक षड़यंत्र के तहत रोकना जनमत का अपमान करना है, जिसने सरकार को कार्य करने के अधिकार दिये हैं। लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च होती है, राजनीतिक दल नहीं। किसी दल के नेता का अहंकार नहीं। लोकसभा में बहुमत से पास हुए बिल को राज्यसभा में रोकने की परम्परा अलोकतांत्रिक हैं, क्योंकि लोकसभा के सांसदों को जनता सीधा चुनती है। राज्यसभा के बहुमत का लाभ उठाना दरअसल जनता की अवमानना करना है, जिसने लोकसभा के सांसदों को चुन कर संसद में भेजा है।
भारत की जनता ने राहुल गांधी को अस्वीकृत कर दिया है, किन्तु आजकल उन्हें सरकार की खिल्ली उड़ाने का काम सौप रखा है। तथ्यहीन, अतार्किक, बेहुदे जुमलों के तहत वे सरकार को कठघरे में खड़े करने का प्रयास कर रहे हैं। झूठ और प्रपंचपूर्ण बकवास करते हुए वे सोच रहें हैं कि उनकी ऐसी ओछी हरकतों से भारत की जनता पर गहरा प्रभाव पड़ेगा और अंतत: वह उन्हें अपना नेता स्वीकार कर लेगी। पर उन्हें शायद मालूम नहीं है कि ऐसा कर वे अपनी अपरिपक्क व ओछी मानसिकता का परिचय पूरे देश को दे रहे हैं। क्या एक सौ पच्चीस करोड़ की जनसंख्या में राहुल से ज्यादा समझदार व गम्भीर कोर्इ नेता ही नहीं बचा है, जो जनता उन्हें ही प्रधानमंत्री के रुप में स्वीकार कर लें ? राहुल कभी भारत के प्रधानमंत्री नहीं बन सकते। जो लोग इस नासमझ बछड़े की पूंछ पकड़ कर भवसागर पार करना चाहते हैं, वे अपना इरादा छोड़ दें, क्योंकि बछड़ा निश्चित रुप से पानी में डूबेगा और साथ में उन्हें भी ले डूबेगा।
जब तक राज्यसभा में सरकार का बहुमत नहीं हैं, देश के विकास के लिए क्रांतिकारी निर्णय नहीं लिये जा सकते। अत: सरकार को अपनी रणनीति बदलनी होगी। संसद में अपनी बात रखने के बाद जनता से सीधा संवाद करना होगा। जनता को अपनी बात सरल शब्दों में समझाने के लिए व्यापक जनसम्पर्क अभियान छोड़ना होगा। जनता का साथ रहेगा, तो सरकार सारी बाधाएं पार कर लेगी। सरकार के पास अड़तालिस महीने हैं, इन महीनों का यदि समझदारी से पूरा उपयोग किया जाय तो राज्यसभा में भी बहुमत आ जायेगा और चार चाल बाद फिर ऐसा भूकम्प आने की सम्भावा बन जायेगी, जिससे भारतीय राजनीति पूरी तरह साफ-सुथरी हो जायेगी। वे सारे राजनीतिक चरित्र कहीं गुम हो जायेंगे, जो देश के लिए नहीं अपने लिए जीते हैं। जो जनता को अपने राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए मात्र सीढ़ी समझते हैं। जिनके मन में संवैधानिक अधिकार प्राप्त कर जनता की सेवा करने का भाव नहीं है। वे सत्ता चाहते हैं और सत्ता का भरपूर उपयोग कर अपनी आर्थिक सेहत सुधारना चाहते हैं।
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Monday, 20 April 2015

क्या किसान रैली में राहुल का झूठ जीत गया और मोदी सरकार का सच हार गया ?

भाजपा के 282 सांसद किसानों को सच समझाने में असफल रहे, किन्तु पिटे हुए कांग्रेसी नेता झूठ समझाने में सफल रहें। भाजपा सांसद सच को प्रभावी ढंग से समझा कर किसानों को गांवों में रोक सकते थे, किन्तु वे ऐसा नहीं कर पाये और कांग्रेसी मिथ्या प्रचार के जरिये किसानों की भारी भीड़ रामलीला मैदान में एकत्रित करने में सफल रहें। रैली में राहुल जम कर झूठ बोलें, उनके प्रत्येक झूठ का जवाब प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में दिया, किन्तु यही सच राज्य सरकारे, भाजपा विधायक और सांसद गांव-गांव जा कर किसानों को समझा सकते थे। यदि ऐसा होता तो रैली में भीड़ ही नहीं जुटती, फिर राहुल अपना झूठ किसे सुनाते ?
बेहतर संवाद का जरिया गांव की चौपाल और शहरों के मोहल्ले होते हैं, टीवी चेनल और सोशल मीडिया नहीं। लोगों से मिलने उनके दुख-दर्द जानने से जनता का भरोसा बढ़ता है। जनता आपकी बात ध्यान से सुन कर उस पर यकीन कर लेती हैं, किन्तु जनता से दूरियां बढ़ाने से विरोधियों को झूठ के सहारे आपकी छवि बिगड़ाने और उपलिब्ध्यों पर पानी फेरने का मौका मिल जाता है। अभी पानी सिर से गुजरा नहीं है। भाजपा के जनप्रतिनिधि जन संवाद के जरियें सरकार की उपलिब्ध्यों, नीतियों और उससे को मिलने वाले लाभ का सच प्रभावी ढं़ग से जनता को समझा सकते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने दस माह में एक भी अवकाश नहीं लिया। कोर्इ निजी यात्रा नहीं की। अव्यवस्थित, अकर्मण्य भ्रष्ट सरकारी व्यवस्था को सुधारने के लिए कठोर परिश्रम किया। देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर ले आये। विदेशों में भारत की साख बढ़ार्इ। वहीं राहुल गांधी दस महीने पूर्णतया निष्क्रिय रहें। उनके नेतृत्व मेंं कांग्रेस सभी विधानसभा चुनावों में पराजित हुर्इ। पार्टी की हालत सुधारने के बजाय राहुल दो महीने तक विदेशों में मौज मस्ती कर के लौटे हैं। आते ही उनके दरबारियों ने झूठ बोलने के नुस्खे दिये, उनका झूठ सुनने के लिए भारी भीड़ जुटार्इ और राहुल की सारी दुर्बलताओं को छुपा कर उसे जनता का हीरो बनाने की कोशिश की। उनकी कोशिश कितनी सफल रही, यह तो वक्त ही बताएगा, किन्तु किसान रैली प्रकरण भाजपा को नसीहत दे गया है कि झूठ का ढिं़ढोरा पीट को जनता को बहकाया जा सकता है, तो सच को प्रभावी ढंग से जनता के सामने रखने से उनका दिल भी जीता जा सकता है।
ग्यारह महीने में सरकार ने कुछ नहीं किया। राहुल को इतना बड़ा झूठ बोलने में तनिक झिझक नहीं आयी। सरकार ने क्या किया इसका सच सरकारी रिकार्ड में उपलब्ध है। राहुल को पढ़ने लिखने का शौक हो तो सारी जानकारी उन्हें उपलब्ध हो जायेगी। जबकि यह सच साबित हो गया है कि उनकी मनमोहन सरकार दस साल तक सोर्इ रही। प्रधानमंत्री ने लुटेरों को देश का खजाना लूटने की अनुमति दे दी। उन्हें कह दिया- मैं अंधा हूं। कुछ नहीं देख रहा हूं। मैं झूठ बोलता रहूंगा कि लुटेरों ने क्या लूटा, मुझे कुछ नहीं मालूम। यह सच है कि बेबाक और बेशर्म लूट से राजकोषीय घाटा बढ़ता गया, महंगार्इ बढ़ती रही, औद्योगिक उत्पादन गिरता गया, नये कारखाने तो लगे ही नहीं, किन्तु चल रहे थे, वे भी मंदी की मार से बंद हो गये। घर में बेटा बैरोजगार बैठा थाा और कारखाना बंद होने से बाप भी बैरोजगार हो कर घर बैठ गया, किन्तु हकीकत से आंखें मूंद कर राहुल झूठ बोल रहे हैं, कि हमारी सरकार मजदूरों और किसानों की सरकार थी। जब कि सच यह है कि दस वर्ष के शासनकाल में नये रोजगारों का सृजन तो हुआ ही नहीं, बल्कि तालेबंदी से लाखों श्रमिकों की छटनी हो गयी। उन्हें अपने रोजगार से हाथ धोना पड़ा।
राहुल भट्टा परसौल में किसानों के लिए लड,़े किन्तु इस सच से क्यों मुहं मोड़ लिया कि उनके जीजा-रार्बट बाड्रा ने राजस्थान और हरियाणा सरकारों से मिली भगत कर किसानों की जमीन कोड़ियों में खरीद, करोड़ो बना लिये। क्या राहुल के पास ऐसा एक भी सच है, जिसमें वे साबित कर सकते हैं कि वर्तमान सरकार के किसी मंत्री या उनके रिश्तेदारों ने किसानों की जमीन धोखे से हड़प्पी हैं ?
स्कील इंड़िया और स्कैम इंड़िया में क्या झूठ हैं, इसे राहुल साबित कर सकते हैं ? वे सारे घोटालें जिसमें अरबों रुपये की हेराफेरी हुर्इ थी, क्या सब झूठ है ? यदि नहीं है, तो उन्हें इस बात पर क्यों आपत्ति है कि मनमोहन युग घोटालों और घपलों का स्वर्ण युग नहीं था ? देश को बर्बाद किया। जनता ने ठुकरा दिया। फिर भी जनता को झूठ बोल कर मूर्ख बनाने में अब भी झेंप नहीं आ रही है। क्या सोनिया, राहुल और उनके दरबारी भारत की जनता को नितांत मूर्ख और अज्ञानी ही समझे हैं, जो उनके द्वारा बोले गये हर सफेद झूठ पर जनता विश्वास कर लेगी ?
उड़िसा में वेदांता परियोजना इसलिए नहीं बंद की गयी कि इससे आदिवासी नक्सली बन जाते, बल्कि इसलिए बंद की गयी कि पर्दे के पीछे होने वाली डील सफल नहीं हो पार्इ। सच यह है कि अपनी कुल सम्पति का पिचहतर प्रतिशत- लगभग पच्चीस हजार करोड़ रुपया भारत सरकार को दान देने वाला दानी उद्योगपति सत्ता “ाड़यंत्रों के समक्ष नतमस्तक नहीं हुआ। यह सच है कि किसी एक परियोजना से आदिवासियों की कुछ एकड़ जमीन जाती है, किन्तु परियोजना से सौ किलोमीटर दूर तक रह रहे नागरिकों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार मिलता है। पूरा क्षेत्र समृद्ध होता है। राहुल का यह कथन सरासर झूठ है कि वेदांता परियोजना बंद नहीं की जाती तो आदिवासी नक्सली बन जाते। क्या राहुल यह बता सकते हैं कि पर्यावरण मंत्रालय ने कर्इ परियोजना फायलों को एनवायरमेंट क्लीयरेंस क्यों नहीं दिया ? नयी सरकार ने आते ही पर्यावरण मंत्रालय में लम्बित पड़ी परियोजनाओं को स्वीकृति दे दी। राहुल इस बात का जवाब देश की जनता को दें कि उनकी सरकार ने वर्षों तक फार्इलों को जानबूझ कर दबा रखा था। ऐसा करने से देश का औद्योगिक विकास रुक गया। बैंकों का पैसा फंस गया। क्या परियोजना रोकने का कारण उनकी सरकार का भ्रष्टाचार नहीं था ? राहुल भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी सरकार को कैसे जनता की सरकार होने का प्रमाण पत्र दे रहे हैं।
राहुल का यह जुमला कि मोदी ने उद्याोगपतियों से कर्ज लिया है, जिसका चुकारा किसानों की जमीन छीन कर किया जायेगा। यदि यह सच है तो यह भी बता दीजिये कि कांग्रेस के कोष में हज़ारो करोड़ रुपया पड़ा है, वह किसी उद्योगपति का नहीं है ? जबकि सच यह है कि रैली में भीड़ एकत्रित करने के लिए एक कांग्रेसी उद्योगपति ने करोड़ो रुपये चंदा दिया है, जो इन दिनों कर्इ स्केण्डल में फंस कर छटपटा रहे हैं। हमाम में सभी नंगे होते हैं, राहुल जी ! स्वयं के शरीर पर वस्त्र नहीं है, किन्तु दूसरों की इशार करते हुए कह रहे हैं- देखों वे नंगे हैं !
राहुल के दरबारियों को यह आशा है कि जिस तरह झूठ बोल-बोल कर केजरीवाल ने लोकसभा में भाजपा की पचास विधानसभा सीटों की बढ़त को तीन में बदल दिया, उसी तरह चार वर्ष तक सरकार के विरुद्ध सदन में और बाहर चिल्ला-चिल्ला कर झूठ बोलेंगे, तो निश्चय ही अगली बार फिर हमारी सरकार फिर आ जायेगी। हो सकता है, उनकी मंशा सही हो, किन्तु भाजपा नेताओं को अपनी आत्मुग्धता छोड़ कर इस बात पर गौर करना चाहिये कि कोर्इ विरोधी कमजोर नहीं होता । सार्वजनिक जीवन का हर दिन चुनौती पूर्ण होता है। झूठ बोलने में ज्यादा परिश्रम करना पड़ता है, सच बोलने में कम। फिर सच को जनता से आलस्यवश क्यों छुपाया जा रहा है ?

Sunday, 22 March 2015

हिन्दू धर्म नहीं, हमारी राष्ट्रीय पहचान है

हमारे पौराणिक ग्रन्थों में कहीं हिन्दू, हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म का उल्लेख नहीं है। देवी देवताओं के आगे भी हिन्दू देवी-देवता का विशेषण नहीं लगाया जाता। वेदो और उपनिषदों में तो प्राकृतिक शक्तियों को अनुष्ठान और यज्ञ से प्रसन्न करने की कर्इ पद्धतियों का वर्णन है, जो मूलत: वैज्ञानिक है, जिसे किसी धर्म से जोड़ कर नहीं समझा जा सकता।  पुराणों में कर्इ कथाएं हैं, पर किसी कथा में हिन्दू धर्म की व्याख्या नहीं की गयी है। रामायण और महाभारत संसार के वहृततम और श्रेष्ठतम महाकाव्य है, जिनके महानायक राम और कृष्ण हैं, किन्तु इनकी महता देवताओं के रुप में नहीं की गयी हैं। इन्हें विष्णु का मनुष्य रुप में अवतार माना गया है। भग्वदगीता को धर्म का चश्मा उतार कर पढ़ने से इसमें छुपा हुआ गूढ आध्यात्मिक अर्थ समझ में आता है। भग्वद गीता धर्म, दर्शन और आध्यात्म का अनुपम ग्रन्थ है, जो हमारी राष्ट्रीय निधि  है। शताब्दियों पूर्व लिखा गया यह ग्रन्थ विश्व का पहला और अंतिम ऐसा ग्रन्थ हैं, जैसा न कभी लिखा गया था और न लिखा जायेगा। किन्तु गीता के किसी श्लोक में हिन्दू, हिन्दु धर्म और हिन्दुत्व की व्याख्या नहीं की गयी है। यदि भारतीय सांस्कृति को ही हिन्दू धर्म समझा जाता है, तो यह न केवल भारतीयों के लिए वरन पूरी मावन जाति के लिए गर्व का विषय है।
बुद्ध और महावीर ने वैदिक धर्म से हट कर अलग उपासना पद्धति का परिचय कराया था, किन्तु बौद्ध और जैन ग्रन्थों में भी कहीं हिन्दू धर्म का उल्लेख नहीं मिलता। फिर प्रश्न उठता है, भारत में हिन्दू कब पैदा हुए और हिन्दुधर्म कहां से आया ? दरअसल मुगलों के भारत में आने से पहले हम आर्य, सनातन, शैव, वैष्णव, जैन और बौद्ध थे, किन्तु मुगलों ने भारत में आ कर हमे भारतीय से हिन्दू बना दिया। हमारे देवी देवताओं को उन्होंने हिन्दू देवी -देवता कहा और उपासना पद्धति को उन्होंने हिन्दूधर्म से परिभाषित किया। मुगलों ने जिन्हें तलवार के बल या प्रलोभन दे कर इस्लाम कबूल करवाया, उन्हें मंदिरों में जा कर पूर्जा अर्चना करने से प्रतिबंधित कर दिया, क्योंकि इस्लाम में मूर्ति पूजा को निषेद्ध माना गया है। उपासना पद्धति बदले जाने के बावजूद भी वे हिन्दू और हिन्दुस्तानी ही रहे, क्योंकि मुगल बादशाह अपने आपको फख्र से हिन्दुस्तानी कहते थे। उनके मन में हिन्दू या हिन्दुस्तानी शब्द से घृणा नहीं थी।
मुगल बादशाहों ने भारत को हिन्दुस्तान नाम दिया और स्वयं को हिन्दुस्तानी माना। अर्थात हिन्दुस्तान में रहने वाला हिन्दू है, इस हकीकत को स्वीकार किया। यदि ऐसा नहीं होता, तो भारत का नाम हिन्दुस्तान रखने के बजाय उसे अहमदाबाद, औरंगाबाद, होंसंगाबाद की तर्ज पर बाबरीस्तान, अकबरीस्तान आदि रखते। मुगलों ने सात सौ वर्षों तक शासन किया। कर्इ मंदिरों को तोड़ कर मज्जिदे बनायी। नागरिकों का धर्म परिवर्तन करवाया, किन्तु भारतीय संस्कृति में इतनी अद्भुत शक्ति थी कि वक्त के कर्इ झंझावत सहने के बाद उसकी गरिमा अक्षुण्ण रही। हार कर मुगलों ने गंगा-जमुनी तहजीब की आधारशिला रखी, जिसके अवशेष आज भी मौजूद है।
अंग्रेजो की कुटिलता से क्षुब्ध हो कर अठारह सौ सतावन में अंग्रेजो के खिलाप जब हिन्दुस्तानियों ने पहला स्वतंत्रता संग्राम लड़ा था, तब उनके बीच मजहब की कोर्इ दीवार नहीं थी। यदि हिन्दुस्तानी विफल स्वतंत्रतासंग्राम की सफल पुनरावृति करते तो अंग्रेजो को मजबूर हो कर उन्नीसवीं सदी में ही भारत छोड़ना पड़ता। अंग्रेजो ने हिन्दुस्तानियों की एकता को तोड़ने के लिए मुसलमानों और हिन्दुओं के साथ उनका धर्म जोड़ कर दोनों समुदाय के बीच छल से कटुता पैदा की जो आज भी विद्यमान है। जबकि हिन्दू कोर्इ धर्म था ही नहीं। हिन्दुस्तानी से टूट कर हिन्दू बना है, जो हमारी राष्ट्रीय पहचान है। ठीक उसी तरह जिस तरह अमेरिका में रहने वाले अमरिकी नागरीक  की और जर्मनी में रहने वाले जर्मन नागरिक की पहचान होती है। जिस तरह जर्मन और अमरीका कोर्इ धर्म नहीं है, उसी तरह हिन्दू कोर्इ धर्म नहीं है। हिन्दुस्तान में रहने वाला प्रत्येक नागरिक हिन्दू ही है, जो उसकी पहचान बताता है।
भारत, पाकिस्तान और बंगलादेश में पच्चीस-तीस करोड़ मुसलमान रहते हैं, जिनके पुरखे मध्य ऐशिया या पश्चिमी ऐशिया से नहीं आये, वे हिन्दू और हिन्दुस्तानी ही थे। सभी की रगो में एक ही खून बहता है। एक ही संस्कृति की उपज है। अंग्रेजो ने हिन्दुस्तानियों का मजहब के आधार पर जो विभाजन किया, उसी परम्परा को भारत के सेकुलर राजनीतिक दल और पाकिस्तान की कट्टरपंथी ताकते निभा रही है। वे किसी हालत में नागरिकों के मन में मजहब को ले कर जो नफरत भरी गयी है, उसे कम नहीं होने देना चाहती, क्योंकि ऐसा यदि हो जाता है, तो भारत पाकिस्तान की बीच बनी हुर्इ नफरत की दीवार ढ़ह जायेगी। भारत की राजनीति में एक समुदाय विशेष के प्रति  कृत्रिम सहानुभूति अर्थात तुष्टीकरण का प्रभाव समाप्त हो जायेगा। इस तरह पाकिस्तान में सक्रिय कट्टरपंथी ताकते और भारत के सेकुलर राजनेताओं के पास कोर्इ काम ही नहीं बचेगा और वे बैरोजगार हो जायेंगे।
इस्लाम एक उपासना पद्धति है, जिसकी अपनी धार्मिक परम्पराएं और मान्यताएं है, जिसे निभाने की उन्हें भारत में पूरी छूट हैं। ठीक उसी तरह जिस तरह विष्णु, शिव, दुर्गा, हनुमान, बुद्ध, महावीर और क्राइस्ट  के उपासक अपने आराध्य देव की अलग-अलग उपासना पद्धति से उपासना करते है। इस हकीकत को झूठलाया नहीं जा सकता कि ये सभी मूलत: हिन्दू और हिन्दुस्तानी है, किन्तु सभी हिन्दुस्तानियों के मध्य अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का भेद हटा कर उन्हें एक संख्यक हिन्दू कह देने पर कुछ ताकते क्यों तमतमा जाती है ? टीवी चेनल क्यों बवाल खड़ा कर देते हैं ? क्या हिन्दू अपमानसूचक शब्द है ? जब हिन्दू कोर्इ धर्म नहीं है, फिर इसे गाली क्यों समझा जाता है ?
मजहब और सियासत के घालमेल के कर्इ दुखद परिणाम आये हैं। जबकि मजहब मन को पवित्र करता है। उसे परमपिता परमेश्वर या परवरदिगार से जोड़ता हैं। मजहब बैर नहीं सिखाता। दिलों में नफरत नही भरता, किन्तु सियासत मजहब की आड़ में अपने स्वार्थ की रोटियां सेकती है। भारतीय उपमहाद्वीप की डेढ़ अरब आबादी मजहब के नाम पर इंसानों के बीच गलतफहमियां करने से उत्पन्न हुए दर्द की पीड़ झेल रही है। जब तक सियासत और मजहब को अलग नहीं किया जाता, तब तक हमारी तक़लीफों में इज़ाफा होता रहेगा।
हिन्दू -सिन्धु शब्द का अभ्रंश है, जिसका नामकरण संसार की उस प्राचीन सभ्यता के नाम पर हुआ था, जो सिंधु नदी के किनारे बसी थी। अत: ऐतिहासिक तथ्यों से भी यह साबित होता है कि हिन्दू धर्म नहीं, हमारी पहचान है। जो हिन्दू या हिन्दू धर्म के नाम पर बखेड़ा करते हैं, वे अपनी सियासी लाभ के लिए जानबूझ कर हकीकत से आंखें  मूंदे हए