Thursday, 14 March 2013
Friday, 8 March 2013
शिव पूजन में फूलों का महत्व
शिवपुराण
की रुद्रसंहिता के अनुशार विभिन्न फूलों का प्रयोग कर यदि साधारण से
साधारण मनुष्य भी थोडे से विधि-विधान से भगवान शिव का पूजन करले तो उसे
मनोवांछित फलों की प्राप्ति हो जाती हैं।
जो व्यक्ति लाल व सफेद आंकड़े (आर्क) के फूल से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे भोग व मोक्ष की प्राप्ति होती हैं।
जो व्यक्ति चमेली के फूल से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे उत्तम वाहन सुख की प्राप्ति होती हैं।
जो व्यक्ति अलसी के फूल से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे भगवान श्री हरी विष्णु का आशिर्वाद प्राप्त होता हैं।
जो व्यक्ति शमी पत्रों से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती हैं।
जो व्यक्ति बेला के फूल से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे उत्तम
पत्नी की प्राप्ति होती होती हैं यदि कोई कन्या बेला के फूल चढाती हैं तो
उसे उत्तम पति कि प्राप्ति होती हैं, अर्थातः विवाह से संबंधित बाधाएं दूर
होती हैं।
जो व्यक्ति जूही के फूल से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसके घरमें अन्नपूर्णा का वास होता हैं उसे अन्न का अभाव नहीं होता हैं।
जो व्यक्ति कनेर के फूल से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे उत्तम वस्त्र इत्यादी की प्राप्ति होती हैं।
जो व्यक्ति हरसिंगार के फूल से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे सुख-सम्पत्ति की प्राप्ति एवं वृद्धि होती हैं।
जो व्यक्ति धतुरे के फूल से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे उत्तम संतान की प्राप्ति होती हैं।
जो व्यक्ति डंठलवाले धतूरे से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे शुभ फलो की प्राप्ति होती हैं।
जो व्यक्ति हरी दुर्वा से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे दीर्धायु प्राप्त होती हैं।
जो व्यक्ति तुलसीदल से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे भोग एवं मोक्ष की प्राप्ति होती हैं।
जो व्यक्ति कमल के फूल से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे लक्ष्मी प्राप्ति होती हैं।
जो व्यक्ति बिल्वपत्र से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे धन, ऎश्वर्य की प्राप्ति होती हैं।
जो व्यक्ति शतपत्र से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे आर्थिक लाभ होता हैं।
जो व्यक्ति शंखपुष्प से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे धन की प्राप्ति होती हैं।
जो व्यक्ति सफेद कमल के फूल से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे भौतिक सुख एवं मोक्ष की प्राप्ति होती हैं।
विशेष: शास्त्रोक्त मत से मनोकामना पूर्ति हेतु यदि संबंधित फूलों को एक
लाख या सवा लाख की संखाया में शिवजी चढ़ाया जाए तो शीघ्र एवं उत्तम
मनोनुकूल फल प्राप्त होते हैं। भगवान शिव के पूजन हेतु चम्पा एवं केवडे,
केतकी के फूल निषेध मानेगएं हैं अन्य शेष सभी फूल शिव पूजन हेतु प्रयोग
किये जा सकते हैं।
Tuesday, 5 March 2013
tripur sundari
भारत के पूर्वोतर राज्य त्रिपुरा की सीमा असाम और मिजोरम से मिलती है.
त्रिपुरा की पुरानी राजधानी उदयपुर ही थी. उल्लेखनीय है कि महाविधा नामक
समुदार्य में त्रिपुरा नाम की अनेक देवियां है" जिनमें त्रिपुरा-भैरवी,
त्रिपुरा और त्रिपुर सुंदरी विशेष रुप से जानी जाती है. देवी त्रिपुरसुंदरी
ब्रह्मास्वरुपा है. भुवनेश्वरी को विश्वमोहिनी माना गया है. इस स्थान पर
माता के अनेक नाम है. उन्हें परदेवता, महाविधा, त्रिपुरसुंदरी, ललिताम्बा
के नाम से जाना जाता है. त्रिपुरसुंदरी का शक्ति-संप्रदाय में असाधारण
महत्व है. इन्हीं के नाम पर सीमान्त प्रदेश त्रिपुरा राज्य नामक स्थान है.
त्रिपुरा का शाब्दिक अर्थ "पानी के पास" होता है.
यहां की शक्ति "त्रिपुर सुंदरी" तथा भैरव "त्रिपुरेश" है. इस पीठ स्थान कूर्मपीठ भी कहते है. इस मंदिर का प्रांगण (आंगन)कछुवे की तरह है. तथा इस मंदिर में लाल-काली पत्थर की बनी मां महाकाली की भी मूर्ति है. इसके अतिरिक्त आद्धाकाली भी कहा जाता है. यहां देवी सती के दक्षिण पाद (पैर) का निपात हुआ था. यहां पर आधा मां की एक छोटी मूर्ति भी है. कहते ही कि त्रिपुरा-नरेश शिकार हेतु या युद्ध पर जाते समय स्वयं के प्राणों की रक्षा के लिए इन्हें अपने साथ रखते थे.
सैनिक मूर्ति लेकर लौट रहे थे कि माता बाडी पहुंचते-पहुंचते सूर्योदय हो गया और माता के आदेशानुसार वहीं मंदिर बनवाकर मूर्ति स्थापित कर दी गई. वहीं कालांतर में त्रिपुरसुंदरी के नाम से जानी गई. इस विषय में एक और किवंदती प्रसिद्ध है.
मंदिर के पीछे पूर्व की ओर झीळ की तरह एक तालाब है, जिसे कल्याणसागर कहते है. इसमें बडे-बडे कछुए तथा मछलियां है, जिन्हें मारना और पकडना अपराध है. प्राकृ्तिक मृ्त्यु प्राप्त कछुओं / मछलियों को दफनाने के लिए अलग से एक स्थान वहां नियत है. जहां पर पुरारियों की समाधियां भी बनी हुई है.
मंदिर तथा कल्याण सागर की देख-रेख त्रिपुरा सरकार कि एक समिति के द्वारा होता है. मंदिर का दैनिक व्यय इस समिति के द्वारा ही वहन किया जाता है. दीपावली के अवसर पर यहां भव्य मेले का आयोजन किया जाता है
यहां की शक्ति "त्रिपुर सुंदरी" तथा भैरव "त्रिपुरेश" है. इस पीठ स्थान कूर्मपीठ भी कहते है. इस मंदिर का प्रांगण (आंगन)कछुवे की तरह है. तथा इस मंदिर में लाल-काली पत्थर की बनी मां महाकाली की भी मूर्ति है. इसके अतिरिक्त आद्धाकाली भी कहा जाता है. यहां देवी सती के दक्षिण पाद (पैर) का निपात हुआ था. यहां पर आधा मां की एक छोटी मूर्ति भी है. कहते ही कि त्रिपुरा-नरेश शिकार हेतु या युद्ध पर जाते समय स्वयं के प्राणों की रक्षा के लिए इन्हें अपने साथ रखते थे.
त्रिपुरसुंदरी मंदिर कथा | Tripura Sundari Temple Katha in Hindi
इस संबन्ध में एक कथा प्रचलित है. 16वीं शताब्दी के प्रथम दशक में त्रिपुरा पर धन्यमाणिक का शासन था. एक रात उन्हें मां त्रिपुरेश्वरी स्वप्न में दिखीं तथा बोली की चिंतागांव के पहाड पर उनकी मूर्ति है, जो उन्हें वहां से आज ही लानी है. स्वप्न देखते ही राजा जाग गए तथा सैनिकों को तुरन्त रात में ही मूर्ति लाने का हुक्म सुना दिया.सैनिक मूर्ति लेकर लौट रहे थे कि माता बाडी पहुंचते-पहुंचते सूर्योदय हो गया और माता के आदेशानुसार वहीं मंदिर बनवाकर मूर्ति स्थापित कर दी गई. वहीं कालांतर में त्रिपुरसुंदरी के नाम से जानी गई. इस विषय में एक और किवंदती प्रसिद्ध है.
त्रिपुरसुंदरी मंदिर कैसे बना | How was Tripur Sundari Temple Established
राजा धन्यमाणिक वहां विष्णु मंदिर बनवाने वाले थें. किन्तु त्रिपुरेश्वरी की मूर्ति स्थापित हो जाने के कारण राजा पेशोपेश में पड गएं. कि वहां वे किसका मंदिर बनवाएं. किन्तु उसी समय आकाशवाणी हुई क राजा उस स्थान पर, जहां विष्णु मंदिर बनवाने वाले थें. मां त्रिपुरसुंदरी का मंदिर बनवा दें और राजा ने वही किया.मंदिर के पीछे पूर्व की ओर झीळ की तरह एक तालाब है, जिसे कल्याणसागर कहते है. इसमें बडे-बडे कछुए तथा मछलियां है, जिन्हें मारना और पकडना अपराध है. प्राकृ्तिक मृ्त्यु प्राप्त कछुओं / मछलियों को दफनाने के लिए अलग से एक स्थान वहां नियत है. जहां पर पुरारियों की समाधियां भी बनी हुई है.
मंदिर तथा कल्याण सागर की देख-रेख त्रिपुरा सरकार कि एक समिति के द्वारा होता है. मंदिर का दैनिक व्यय इस समिति के द्वारा ही वहन किया जाता है. दीपावली के अवसर पर यहां भव्य मेले का आयोजन किया जाता है
Monday, 25 February 2013
MAHATMA GANDHI
ये है गाँधी का असली चेहरा..........
23 मार्च 1931 को शहीद-ए-आजम भगतसिंह को फांसी के तख्ते पर ले जाने
वाला पहला जिम्मेवार सोहनलाल वोहरा हिन्दू की गवाही थी ।
यही गवाह बाद में इंग्लैण्ड भाग गया और वहीं पर मरा । शहीदे आजम भगतसिंह को फांसी दिए जाने पर अहिंसा के महान पुजारी गांधी ने कहा था, ‘‘हमें ब्रिटेन के विनाश के बदले अपनी आजादी नहीं चाहिए ।’’ और आगे कहा, ‘‘भगतसिंह की पूजा से देश को बहुत हानि हुई और हो रही है । वहीं इसका परिणाम गुंडागर्दी का पतन है । फांसी शीघ्र दे दी जाए ताकि 30 मार्च से करांची में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन में कोई बाधा न आवे । ” अर्थात् गांधी की परिभाषा में किसी को फांसी देना हिंसा नहीं थी ।
इसी प्रकार एक ओर महान् क्रान्तिकारी जतिनदास को जो आगरा में अंग्रेजों ने शहीद किया तो गांधी आगरा में ही थे और जब गांधी को उनके पार्थिक शरीर पर माला चढ़ाने को कहा गया तो उन्होंने साफ इनकार कर दिया अर्थात् उस नौजवान द्वारा खुद को देश के लिए कुर्बान करने पर भी गांधी के दिल में किसी प्रकार की दया और सहानुभूति नहीं उपजी, ऐसे थे हमारे अहिंसावादी गांधी ।
जब सन् 1937 में कांग्रेस अध्यक्ष के लिए नेताजी सुभाष और गांधी द्वारा मनोनीत सीताभिरमैया के मध्य मुकाबला हुआ तो गांधी ने कहा यदि रमैया चुनाव हार गया तो वे राजनीति छोड़ देंगे लेकिन उन्होंने अपने मरने तक राजनीति नहीं छोड़ी जबकि रमैया चुनाव हार गए थे। इसी प्रकार गांधी ने कहा था, “पाकिस्तान उनकी लाश पर बनेगा” लेकिन पाकिस्तान उनके समर्थन से ही बना । ऐसे थे हमारे सत्यवादी गांधी ।
इससे भी बढ़कर गांधी और कांग्रेस ने दूसरे विश्वयुद्ध में अंग्रेजों का समर्थन किया तो फिर क्या लड़ाई में हिंसा थी या लड्डू बंट रहे थे ? पाठक स्वयं बतलाएं ? गांधी ने अपने जीवन में तीन आन्दोलन (सत्याग्रहद्) चलाए और तीनों को ही बीच में वापिस ले लिया गया फिर भी लोग कहते हैं कि आजादी गांधी ने दिलवाई ।
इससे भी बढ़कर जब देश के महान सपूत उधमसिंह ने इंग्लैण्ड में माईकल डायर को मारा तो गांधी ने उन्हें पागल कहा इसलिए नीरद चौ० ने गांधी को दुनियां का सबसे बड़ा सफल पाखण्डी लिखा है । इस आजादी के बारे में इतिहासकार सी. आर. मजूमदार लिखते हैं – “भारत की आजादी का सेहरा गांधी के सिर बांधना सच्चाई से मजाक होगा । यह कहना उसने सत्याग्रह व चरखे से आजादी दिलाई बहुत बड़ी मूर्खता होगी । इसलिए गांधी को आजादी का ‘हीरो’ कहना उन सभी क्रान्तिकारियों का अपमान है जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना खून बहाया ।”
23 मार्च 1931 को शहीद-ए-आजम भगतसिंह को फांसी के तख्ते पर ले जाने
वाला पहला जिम्मेवार सोहनलाल वोहरा हिन्दू की गवाही थी ।
यही गवाह बाद में इंग्लैण्ड भाग गया और वहीं पर मरा । शहीदे आजम भगतसिंह को फांसी दिए जाने पर अहिंसा के महान पुजारी गांधी ने कहा था, ‘‘हमें ब्रिटेन के विनाश के बदले अपनी आजादी नहीं चाहिए ।’’ और आगे कहा, ‘‘भगतसिंह की पूजा से देश को बहुत हानि हुई और हो रही है । वहीं इसका परिणाम गुंडागर्दी का पतन है । फांसी शीघ्र दे दी जाए ताकि 30 मार्च से करांची में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन में कोई बाधा न आवे । ” अर्थात् गांधी की परिभाषा में किसी को फांसी देना हिंसा नहीं थी ।
इसी प्रकार एक ओर महान् क्रान्तिकारी जतिनदास को जो आगरा में अंग्रेजों ने शहीद किया तो गांधी आगरा में ही थे और जब गांधी को उनके पार्थिक शरीर पर माला चढ़ाने को कहा गया तो उन्होंने साफ इनकार कर दिया अर्थात् उस नौजवान द्वारा खुद को देश के लिए कुर्बान करने पर भी गांधी के दिल में किसी प्रकार की दया और सहानुभूति नहीं उपजी, ऐसे थे हमारे अहिंसावादी गांधी ।
जब सन् 1937 में कांग्रेस अध्यक्ष के लिए नेताजी सुभाष और गांधी द्वारा मनोनीत सीताभिरमैया के मध्य मुकाबला हुआ तो गांधी ने कहा यदि रमैया चुनाव हार गया तो वे राजनीति छोड़ देंगे लेकिन उन्होंने अपने मरने तक राजनीति नहीं छोड़ी जबकि रमैया चुनाव हार गए थे। इसी प्रकार गांधी ने कहा था, “पाकिस्तान उनकी लाश पर बनेगा” लेकिन पाकिस्तान उनके समर्थन से ही बना । ऐसे थे हमारे सत्यवादी गांधी ।
इससे भी बढ़कर गांधी और कांग्रेस ने दूसरे विश्वयुद्ध में अंग्रेजों का समर्थन किया तो फिर क्या लड़ाई में हिंसा थी या लड्डू बंट रहे थे ? पाठक स्वयं बतलाएं ? गांधी ने अपने जीवन में तीन आन्दोलन (सत्याग्रहद्) चलाए और तीनों को ही बीच में वापिस ले लिया गया फिर भी लोग कहते हैं कि आजादी गांधी ने दिलवाई ।
इससे भी बढ़कर जब देश के महान सपूत उधमसिंह ने इंग्लैण्ड में माईकल डायर को मारा तो गांधी ने उन्हें पागल कहा इसलिए नीरद चौ० ने गांधी को दुनियां का सबसे बड़ा सफल पाखण्डी लिखा है । इस आजादी के बारे में इतिहासकार सी. आर. मजूमदार लिखते हैं – “भारत की आजादी का सेहरा गांधी के सिर बांधना सच्चाई से मजाक होगा । यह कहना उसने सत्याग्रह व चरखे से आजादी दिलाई बहुत बड़ी मूर्खता होगी । इसलिए गांधी को आजादी का ‘हीरो’ कहना उन सभी क्रान्तिकारियों का अपमान है जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना खून बहाया ।”
Sunday, 24 February 2013
MANDIR JANE SE LABH
मंदिर जाने के चमत्कार जानेंगे तो आप भी रोज जाएंगे मंदिर...
मंदिर वह स्थान है जहां जाकर मन को शांति का अनुभव होता है। वहां हम अपने भीतर नई शक्ति का अहसास करते हैं। हमारा मन-मस्तिष्क प्रफुल्लित हो जाता है। शरीर उत्साह और उमंग से भर जाता है। मंत्रों के स्वर, घंटे-घडिय़ाल, शंख और नगाड़े की ध्वनियां सुनना मन को अच्छा लगता है। इन सभी के पीछे है, ऐसे वैज्ञानिक कारण जो हमें प्रभावित करते हैं।
मंदिरों का निर्माण पूर्ण वैज्ञानिक विधि है। मंदिर का वास्तुशिल्प ऐसा बनाया जाता है, जिससे वहां शांति और दिव्यता उत्पन्न होती है। मंदिर की वह छत जिसके नीचे मूर्ति की स्थापना की जाती है। ध्वनि सिद्धांत को ध्यान में रखकर बनाई जाती है, जिसे गुंबद कहा जाता है। गुंबद के शिखर के केंद्र बिंदु के ठीक नीचे मूर्ति स्थापित होती है। गुंबद तथा मूर्ति का मध्य केंद्र एक रखा जाता है। गुंबद के कारण मंदिर में किए जाने वाले मंत्रोच्चारण के स्वर और अन्य ध्वनियां गूंजती है तथा वहां उपस्थित व्यक्ति को प्रभावित करती है। गुंबद और मूर्ति का मध्य केंद्र एक ही होने से मूर्ति में निरंतर ऊर्जा प्रवाहित होती है। जब हम उस मूर्ति को स्पर्श करते हैं, उसके आगे सिर टिकाते हैं, तो हमारे अंदर भी ऊर्जा प्रवाहित हो जाती है। इस ऊर्जा से हमारे अंदर शक्ति, उत्साह, प्रफुल्लता का संचार होता है।
मंदिर की पवित्रता हमें प्रभावित करती है। हमें अपने अंदर और बाहर इसी तरह की शुद्धता रखने की प्रेरणा मिलती है। मंदिर में बजने वाले शंख और घंटों की ध्वनियां वहां के वातावरण में कीटाणुओं को नष्ट करते रहती हैं। घंटा बजाकर मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करना हमें शिष्टाचार सिखाता है कि जब हम किसी के घर में प्रवेश करें तो पूर्व में सूचना दें। घंटे का स्वर देवमूर्ति को जाग्रत करता है, ताकि आपकी प्रार्थना सुनी जा सके। शंख और घंटे-घडिय़ाल की ध्वनि दूर-दूर तक सुनाई देती है, जिससे आसपास से आने-जाने वाले अंजान व्यक्ति को पता चल जाता है कि आसपास कहीं मंदिर है।
मंदिर में स्थापित देव प्रतिमा में हमारी आस्था और विश्वास होता है। मूर्ति के सामने बैठने से हम एकाग्र होते हैं। यही एकाग्रता धीरे-धीरे हमें भगवान के साथ एकाकार करती है, तब हम अपने अंदर ईश्वर की उपस्थिति को महसूस करने लगते हैं। एकाग्र होकर चिंतन-मनन से हमें अपनी समस्याओं का समाधान जल्दी मिल जाता है।
मंदिर में स्थापित देव प्रतिमाओं के सामने नतमस्तक होने की प्रक्रिया से हम अनजाने ही योग और व्यायाम की सामान्य विधियां पूरी कर लेते हैं। इससे हमारे मानसिक तनाव, शारीरिक थकावट, आलस्य दूर हो जाते हैं। मंदिर में परिक्रमा भी की जाती है, जिसमें पैदल चलना होता है। मंदिर परिसर में हम नंगे पैर पैदल ही घूमते हैं। यह भी एक व्यायाम है। नए शोध में साबित हुआ है नंगे पैर मंदिर जाने से पगतलों में एक्यूपे्रशर होता है। इससे पगतलों में शरीर के कई भीतरी संवेदनशील बिंदुओं पर अनुकूल दबाव पड़ता है जो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।
इस तरह हम देखते हैं कि मंदिर जाने से हमे बहुत लाभ है। मंदिर को वैज्ञानिक शाला के रूप में विकसित करने के पीछे हमारे पूर्वज ऋषि-मुनियों का यही लक्ष्य था कि सुबह जब हम अपने काम पर जाएं उससे पहले मंदिर से ऊर्जा लेकर जाएं, ताकि अपने कर्तव्यों का पालन सफलता के साथ कर सकें और जब शाम को थककर वापस आएं तो नई ऊर्जा प्राप्त करें। इसलिए दिन में कम से कम एक या दो बार मंदिर अवश्य जाना चाहिए। इससे हमारी आध्यात्मिक उन्नति तो होती है, साथ ही हमें निरंतर ऊर्जा मिलती है और शरीर स्वस्थ रहता है।
मंदिर वह स्थान है जहां जाकर मन को शांति का अनुभव होता है। वहां हम अपने भीतर नई शक्ति का अहसास करते हैं। हमारा मन-मस्तिष्क प्रफुल्लित हो जाता है। शरीर उत्साह और उमंग से भर जाता है। मंत्रों के स्वर, घंटे-घडिय़ाल, शंख और नगाड़े की ध्वनियां सुनना मन को अच्छा लगता है। इन सभी के पीछे है, ऐसे वैज्ञानिक कारण जो हमें प्रभावित करते हैं।
मंदिरों का निर्माण पूर्ण वैज्ञानिक विधि है। मंदिर का वास्तुशिल्प ऐसा बनाया जाता है, जिससे वहां शांति और दिव्यता उत्पन्न होती है। मंदिर की वह छत जिसके नीचे मूर्ति की स्थापना की जाती है। ध्वनि सिद्धांत को ध्यान में रखकर बनाई जाती है, जिसे गुंबद कहा जाता है। गुंबद के शिखर के केंद्र बिंदु के ठीक नीचे मूर्ति स्थापित होती है। गुंबद तथा मूर्ति का मध्य केंद्र एक रखा जाता है। गुंबद के कारण मंदिर में किए जाने वाले मंत्रोच्चारण के स्वर और अन्य ध्वनियां गूंजती है तथा वहां उपस्थित व्यक्ति को प्रभावित करती है। गुंबद और मूर्ति का मध्य केंद्र एक ही होने से मूर्ति में निरंतर ऊर्जा प्रवाहित होती है। जब हम उस मूर्ति को स्पर्श करते हैं, उसके आगे सिर टिकाते हैं, तो हमारे अंदर भी ऊर्जा प्रवाहित हो जाती है। इस ऊर्जा से हमारे अंदर शक्ति, उत्साह, प्रफुल्लता का संचार होता है।
मंदिर की पवित्रता हमें प्रभावित करती है। हमें अपने अंदर और बाहर इसी तरह की शुद्धता रखने की प्रेरणा मिलती है। मंदिर में बजने वाले शंख और घंटों की ध्वनियां वहां के वातावरण में कीटाणुओं को नष्ट करते रहती हैं। घंटा बजाकर मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करना हमें शिष्टाचार सिखाता है कि जब हम किसी के घर में प्रवेश करें तो पूर्व में सूचना दें। घंटे का स्वर देवमूर्ति को जाग्रत करता है, ताकि आपकी प्रार्थना सुनी जा सके। शंख और घंटे-घडिय़ाल की ध्वनि दूर-दूर तक सुनाई देती है, जिससे आसपास से आने-जाने वाले अंजान व्यक्ति को पता चल जाता है कि आसपास कहीं मंदिर है।
मंदिर में स्थापित देव प्रतिमा में हमारी आस्था और विश्वास होता है। मूर्ति के सामने बैठने से हम एकाग्र होते हैं। यही एकाग्रता धीरे-धीरे हमें भगवान के साथ एकाकार करती है, तब हम अपने अंदर ईश्वर की उपस्थिति को महसूस करने लगते हैं। एकाग्र होकर चिंतन-मनन से हमें अपनी समस्याओं का समाधान जल्दी मिल जाता है।
मंदिर में स्थापित देव प्रतिमाओं के सामने नतमस्तक होने की प्रक्रिया से हम अनजाने ही योग और व्यायाम की सामान्य विधियां पूरी कर लेते हैं। इससे हमारे मानसिक तनाव, शारीरिक थकावट, आलस्य दूर हो जाते हैं। मंदिर में परिक्रमा भी की जाती है, जिसमें पैदल चलना होता है। मंदिर परिसर में हम नंगे पैर पैदल ही घूमते हैं। यह भी एक व्यायाम है। नए शोध में साबित हुआ है नंगे पैर मंदिर जाने से पगतलों में एक्यूपे्रशर होता है। इससे पगतलों में शरीर के कई भीतरी संवेदनशील बिंदुओं पर अनुकूल दबाव पड़ता है जो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।
इस तरह हम देखते हैं कि मंदिर जाने से हमे बहुत लाभ है। मंदिर को वैज्ञानिक शाला के रूप में विकसित करने के पीछे हमारे पूर्वज ऋषि-मुनियों का यही लक्ष्य था कि सुबह जब हम अपने काम पर जाएं उससे पहले मंदिर से ऊर्जा लेकर जाएं, ताकि अपने कर्तव्यों का पालन सफलता के साथ कर सकें और जब शाम को थककर वापस आएं तो नई ऊर्जा प्राप्त करें। इसलिए दिन में कम से कम एक या दो बार मंदिर अवश्य जाना चाहिए। इससे हमारी आध्यात्मिक उन्नति तो होती है, साथ ही हमें निरंतर ऊर्जा मिलती है और शरीर स्वस्थ रहता है।
Tuesday, 5 February 2013
LOKPAL
सरकारी लोकपाल....???
राजनीतिक दलों की जांच नहीं कर पाएगा,
न धार्मिक संस्थाओं की और
न सरकारी चंदा लेने वाली एनजीओ की...!
तो सवाल ये है कि
क्या वो नर्सरी के बच्चों की कापियां जांचेगा.....????
राजनीतिक दलों की जांच नहीं कर पाएगा,
न धार्मिक संस्थाओं की और
न सरकारी चंदा लेने वाली एनजीओ की...!
तो सवाल ये है कि
क्या वो नर्सरी के बच्चों की कापियां जांचेगा.....????
BHARTIYA RAJNITI
पहले मूर्ख से जब पहला ठग मिला
तब धर्म पैदा हुआ..!
..
पहले ठग से दूसरा ठग मिला
तो राजनीति पैदा हुई..!!
..
और पहले मूर्ख से जब दूसरा मूर्ख मिला
तब..लोकतंत्र पैदा हुआ...!!!
तब धर्म पैदा हुआ..!
..
पहले ठग से दूसरा ठग मिला
तो राजनीति पैदा हुई..!!
..
और पहले मूर्ख से जब दूसरा मूर्ख मिला
तब..लोकतंत्र पैदा हुआ...!!!
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