Thursday, 23 January 2014

अगले लोकसभा चुनाव में हमारा एक एक वोट नये भारत की तकदीर लिखेगा

अगले लोकसभा चुनाव में हमारा एक एक वोट नये भारत की तकदीर लिखेगा


आपका वोट बहुत कीमती है, इसे व्यर्थ नहीं गवाएं, क्योंकि अगले लोकसभा चुनाव में हमारा एक एक वोट हमारे भविष्य की इबारत है, जो नये भारत की तकदीर लिखेगा। अत: यदि हमने भावुकता में बह कर बिना सोचे विचारे अविश्वसनीय पार्टी  के पक्ष में अपना वोट दे दिया, तो इसकी भारी कीमत देश को चुकानी पडेगी। क्योंकि एक ऐसी पार्टी जो जनता का भरोसा तोड़ चुकी है, षडयंत्र के जरिये देश को अस्थिर राजनीतिक व्यवस्था में झोंकने की रणनीति बना रही है। इस पार्टी को उन सभी पार्टियों का चुनावों के बाद सहयोग मिलेगा, जो अपने तुच्छ राजनीतिक स्वार्थ के लिए देश की जनता को धोखा देने के लिए तैयार बैठी है।
केजरीवाल, मुलायम सिंह यादव, मायावती, नीतीश कुमार और लालू यादव दोगली राजनीतिक मन:स्थिति के राजनेता है, जिनकी विश्वसनीयता संदिग्ध है। ये सभी कांग्रेसी  थेली के चटेबट्टे हैं। एक दूसरे के विरोध में चुनाव लड़ेंगे और चुनावों के बाद अपने स्वार्थ के लिए साम्प्रदायिक शक्तियों को सत्ता से दूर रखने के नाम पर एक हो जायेंगे। इनकी पॉकेट पार्टियों के पक्ष में गिरे सभी वोट कांग्रेस को ही दिये हुए माने जायेंगे। अत: बाद में पछताने से अच्छा है कि हम पहले से ही सतर्क हो जायें। कांग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए यदि आक्रोशित हैं, तो उन्हें भी तिरस्कृत कर दें, जो कांग्रेस के भावी सत्ता षड़यंत्र के प्रमुख पात्र बनने वाले हैं।
दिल्ली की साठ विधानसभा के मतदाताओं ने कांग्रेस के विपक्ष में वोट दिये थे, किन्तु केजरीवाल ने साठ विधानसभा के मतदाताओं को धोखा देते हुए आठ कांग्रेसी विधायकों के समर्थन से कांग्रेस की ही डुप्लीकेट सरकार बना ली। निश्चय ही यदि दिल्ली की जनता को यह पता होता होता कि केजरीवाल ऐसा खेल खेलने वाला है, तो उसकी पार्टी के पक्ष में वोट देने के पहले जनता हजार बार सोचती। जनता ने उस व्यक्ति पर इसलिए विश्वास किया था क्योंकि उसने कसम खायी थी कि कांग्रेस के समर्थन से कभी सरकार नहीं बनायेगा। अठाईस  सीटें जीतने के बाद भी विपक्ष में बैठने या फिर जनादेश की बात करते हुए वह व्यक्ति चुपचाप कांग्रेस की गोद में बैठ गया। कांग्रेस के भ्रष्टाचार को उजागर करने और कांग्रेसियों को जेल भेजने का वचन देने वाला व्यक्ति एक भी भ्रष्टाचारी कांग्रसी तीतर को पकड़ कर पींजरे में बंद नहीं कर पाया है।
दिल्ली छोटा प्रदेश है। इस प्रदेश के मुख्यमंत्री के पास विशेष अधिकार व शक्तियां नहीं है।  किन्तु केन्द्र में  सत्ता षडयंत्र से ऍसी सरकार  बन गयी, तो उसका क्या हश्र होगा, इसकी कल्पना से ही एक कंपकंपी छूट जाती है। मन वितृष्णा से भर जाता है। क्योंकि एक सौ बीस करोड़ नागरिकों का भाग्य केन्द्र की सरकार से बंधा रहता है। देश की अर्थ,, गृह,रक्षा, विदेश व औद्योगिक नीति पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है। हमारी आंतरिक सुरक्षा प्रभावित होती है। दुश्मन राष्ट्र राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठा कर अपने घृणित मकसद को कामयाब करने में लग जाते हैं।
तीस सांसदों के मु​खिया वाली सरकार तीस दिन चले या एक दिन वह हर पल अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए भयभीत रहती है। ऐसी सरकारे वे महत्वकांक्षी राजनेता तो पसंद करेंगे जिनके लिए देश से बढ़ कर अपना राजनीतिक स्वार्थ हैं, किन्तु जनता क्यों इनके दुष्चक्र में फंसे ? अत: जनता से चुनावों से पहले उन्हें सीधा सवाल पूछना चाहिये- क्या आपकी पार्टी में इतनी क्षमता है कि वह लोकसभा की दो सौ बहतर सीटे जीत सके ? यदि नहीं है तो हम आपकी पार्टी के पक्ष में वोट नहीं देंगे। हम उस पार्टी को वोट देंगे जो यह क्षमता रखती है। आपकी पार्टी के पक्ष में वोट देने से उस पार्टी की क्षमता घट जायेगी, जो शासन करने का अधिकार रखती है। हम उस पार्टी को इतनी सशक्त बनायेंगे कि उसे  धूर्त और स्वार्थी राजनेताओं के समर्थन की आवश्यकता नहीं पड़े। जनता के समर्थन से ही वह सरकार बना लें और पूरी जवाबदेही से सरकार चला सकें।
इस समय भाजपा और कांग्रेस दो ही ऐसी  राजनीतिक पार्टियां हैं, जो दो सौ बहतर का आंकड़ा छू सकती है, किन्तु इसमे से एक- कांग्रेस वह क्षमता खो चुकी है। दस वर्ष के कुशासन ने उसे ऐसी स्थिति में ला कर खड़ा कर दिया है कि उसके सांसदों की संख्या सौ से भी कम हो जायेगी। इसमें भी कोई आश्चर्य नहीं होगा कि उसकी संख्या पचास -साठ के आस पास ही पहुंच जाय। ऐसी स्थिति में वह सरकार बनाने में समर्थ नहीं होगी, किन्तु षडयंत्र के जरिये केजरीवाल या अन्य क्षत्रप को प्रधानमंत्री बना देगी। यह स्थिति ठीक वैसी ही होगी, जैसी दिल्ली प्रदेश में बनी है। सत्ता पर कोई अन्य बैठा होगा, किन्तु सरकार की डोर कांग्रेस के हाथ में होगी। कांग्रेस भले ही देश को सुशासन और जवाबदेय प्रशासन देने में समर्थ नहीं हो, किन्तु राजनीतिक षडयंत्र रचने और जनता के साथ विश्वासघात करने में निष्णात है। राजनीतिक रंगमंच पर रोज तमाशे होंगे। जनता के पास एक वितृष्णा के साथ इन्हें देखने के अलावा कोई चार नहीं बचेगा।
एक राजनीतिक षड़यंत्र के तहत ही केजरीवाल की आप पार्टी चार सौ लोकसभा की सीटो पर प्रत्यासी खड़े करने की योजना बना रही है। दिल्ली में पावं उखड़ रहे हैं, किन्तु पूरे देश में पावं जमाने की हड़बड़ी हैं। जबकि हालत यह है कि देश के प्रत्येक प्रदेश, शहर और गांव में इस पार्टी का नेटवर्क नहीं है। पार्टी के पास दस अनुभवी नेता नहीं है, वे चार सौं सांसदों का जुगाड़ कैसे करेंगे? यह समझ के परे हैं। लोकसभा का क्षेत्र बहुत विस्तृत होता है। वही व्यक्ति हर गांव के मतदाता तक पहुंच सकता है, जो उस क्षेत्र में लोकप्रिय हो या जिसकी एक राष्ट्रीय छवि हो। निश्चय ही आप पार्टी के पास इतनी क्षमता और साम्मर्थय नहीं है। सम्भव है अपने राजनीतिक षडयंत्र को सफल करने के लिए कांग्रेस प्रचार का सारा खर्च उठा लें, ताकि आप पार्टी के प्रत्यासी जीतेंगे तो नहीं, किन्तु इतने वोट जरुर प्राप्त कर लेंगे, जिससे भाजपा को नुकासान हो। कांगेस लगभग तीस-चालिस भाजपा की सीटे कम करना चाहती हैं, वो भी अपनी क्षमता के बेहतर प्रदर्शन से नहीं, वरन एक राजनीतिक षड़यंत्र के जरिये। ऐसी धूर्त नीति देश के लिए बहुत घातक होगी। जिन लोगों की निष्ठा ही संदेहास्पद हों, उन पर विश्वास करना अपने आपको धोखा देना ही है।
अपने घपले और घोटालों के लिए कुख्यात कांग्रेस को दस वर्ष बाद महंगाई और भ्रष्टाचार की चिंता हुई है। अब शब्द आडम्बर से जनता की फटी जेब को सीने की निष्फल कोशिश कर रही है। लेकिन इससे क्या वह धन वापिस आ जायेगा, जो कोलगेट व टूजी स्पेक्ट्रम जैसे भारी भरकम घोटाले कर के लूटा गया था। यदि घोटाले नहीं होते, तो राजकोषीय घाटा नहीं बढ़ता और इसकी पूर्ति के लिए महंगाई बढ़ा कर जनता की जेब नही काटी जाती। जनता को अरबो रुपये की चपत देने के बाद अब समाज को बांटने वाले लोगों से दूर रहने की नसीहत दी जा रही है। जनता को नसीहत देने के पहले अपने कर्मों का हिसाब दीजिये। देश की जनता को तीन हजार वर्ष पूर्व का इतिहास याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है। जनता आपके दस वर्ष के शासन को अच्छी तरह भोग चुकी है, जो आपको पुन: सत्ता पाने के लिए अयोग्य साबित करता है। अत: अशोक और अकबर की तुलना अपने आपसे मत कीजिये। महान सम्राटों ने जनता का दिल जीतने के लिए छल, कपट और धूर्त नीतियों का सहारा नहीं लिया था।

Wednesday, 22 January 2014

कहीं केजरीवाल स्टंट देश के लिए संकट नहीं बन जाय

कहीं केजरीवाल स्टंट देश के लिए संकट नहीं बन जाय


अनीति के खेल में निष्णात कांग्रेस अपने ही कर्मो पर आज शिर्मंदा हो रही है। जो फसल बोई थी, उसके फल इतने जल्दी लग जायेंगे, ऐसी आशा कांग्रेस के उन नेताओं को नहीं थी, जो केजरीवाल को एक तुरुप का इक्का बना कर नरेन्द्र मोदी की बढ़त को रोकने का ख्वाब देख रहे थे। मोदी की लोकप्रियता के रथ को केजरीवाल रोकेंगे या नहीं, यह तो समय ही बतायेगा, किन्तु कांग्रेस की रही सही प्रतिष्ठा इस व्यक्ति ने धूल में मिला दी है। शिंदे को खलनायक बना कर पूरे देश में प्रचारित करने से कांग्रेस की ही किरकिरी हो रही है। कांग्रेसी नेताओं को अब तो समझ आ गया होगा कि जिस व्यक्ति की महत्वाकांक्षाएं पहाड़ जितनी बढ़ गयी हों, उस पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता। दिल्ली के आठो विधायक केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाने के समर्थक नहीं थे, उन्होंने बड़े बे मन से हाईकमान के आदेश को माना था। किन्तु पूरे देश के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को पार्टी का निर्णय पसंद नहीं आया था, क्योंकि जिस व्यक्ति ने पूरे देश में पार्टी की प्रतिष्ठा बिगाड़ने में कोई कसर बाकी नहीं रखी, उसकी ही सरकार बनाना उन्हें जंचा नहीं था। अब सांप निकल जाने के बाद लाठी पिटने से कुछ हांसिल भी होने वाला नहीं है। सिर पकड़ कर रोने के अलावा कांग्रेस के पास कोई चारा ही नहीं बचा है।
केजरीवाल ने बहुत सोच समझ प्रपोगंड़ा कर रहे हैं। वे शीला दीक्षित के धोटालों में हाथ डालना नहीं चाहते, क्योंकि एक आध महीने में उन्हें कुछ भी हाथ लगने वाला नहीं है। वे जानते हैं कि उनकी सरकार की उम्र छ: माह से ज्यादा नहीं है और वे जांच बिठायेंगे उसके परिणाम आने में देर लगेगी। जनता से किये गये वादे भी पूरे करने में सक्षम नहीं है। प्रदेश की वित्तीय हालत बहुत खराब है, लोकलुभावन वादे पूरे करने के लिए पैसा कौन देगा ? बिजली -पानी की दरे तो आवेश में आ कर घटा दी, परन्तु जो उलझने आ रही है उन्हें सुलझा नहीं पा रहे हैं। भारी टीवी प्रचार के माध्यम से भ्रष्टाचार के विरुद्ध हैल्पलाईन  की घोषणा तो कर दी, परन्तु परिणाम सिफर ही रहा। पूरे देश के किसी भी कार्यालय में कोई भी अफसर कहीं पर भी सीधे रिश्वत नहीं लेता है। सारा काम दलालों के माध्यम से होता है, अत: कानूनों में सुधार किये बिना रिश्वत नहीं रोक सकते। भ्रष्टाचार रोकने का केजरीवाल का दावं भी फैल हो गया है। वे अब तक एक भी भ्रष्टाचार का प्रकरण पकड़ नहीं पाये हैं।
अपने अनुभवहीन नौसिखिये मंत्रियों के बल पर केजरीवाल सरकार चलाने में असमर्थ हैं। दूसरी ओर उन्हें मालूम है कि बिन्नी कांग्रेसी पृष्ठभूमि के व्यक्ति है, जो पार्टी का विभाजन भी कर सकते है। परन्तु सारा खेल लोकसभा के चुनावों के बाद खेला जायेगा, जब केजरीवाल का तिलस्म समाप्त हो जायेगा और चौबेजी से छब्बे जी बनने के लालच के कारण दूबे जी ही बन कर रह जायेंगे। निष्कर्ष यह है कि केजरीवाल सरकार की उम्र अधिक नहीं है। कांग्रेस किसी भी क्षण समर्थन ले सकती है और केजरीवाल की स्वयं की पार्टी टूट सकती है।
दिल्ली में सरकार बनाने से उन्हें इतना मजा नहीं आया, जितना उन्होंने सोचा था। मीडिया भी अब धीरे-धीरे दूर होने लगा था। सभी चेनल उनके समाचारों को कम दिखा रहे थे। जो व्यक्ति मीडिया के भरोसे ही पूरे देश में अपनी छवि चमकाने को व्यथित नज़र आ रहा था, उसे यह सब कुछ सहन नहीं हुआ और अंतत: नये स्टंट की आवश्यकता आ पड़ी। सड़क स्टंट में सफल रहते हैं, क्योंकि सड़कों पर मीडिया के केमरे आ ही जाते हैं। मीडिया के केमरे के सामने झूठ बोलना, अपनी बात पर पलट जाना और कांग्रेस और बीजेपी को मिला हुआ बताने में उन्हें कभी संकोच नहीं होता। आज उन्होंने कुछ मीडिया के समाचार चेनलों को मोदी और कांग्रेस का एजेंट भी बता दिया, क्योंकि उनके झूठ को पकड़ कर वे सबूत दे रहे थे। जबकि उनके चहेते चेनल उनके झूठ को महिमामंडित कर रहे थे।
पूरे देश की जनता केजरीवाल के स्टंट से बोर होने लगी है। वे उन चेनल को बदल देते हैं, जिसमें केजरीवाल से संबंधित खबरे ही आती है। अत: आंदोलन के समर्थन और विपक्ष में जो आंकड़े चेनल जुटाते हैं, वे सभी इन्हीं के लोगो द्वारा भेजे जाते हैं। पूरे देश की जनता उसमें भाग नहीं लेती। समाचार चेनल यदि निरन्तर पूरे देश में घटित हो रहे समाचारों को उपेक्षित कर केजरीवाल के ही समाचार देंतें रहेंगे, तो उनकी टीआरपी बढ़ने के बजाय घटने लगेगी। वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया में इस पार्टी की अत्यधिक सक्रियता है। कई लोग इसी काम में लगे हुए हैं, जो निरन्तर भ्रम और झूठी खबरे देश भर में फैला रहे हैं।
केजरीवाल झूठ, स्टंट, नौटंकी और प्रपोगंड़ा में सिद्धहस्त हो गये हैं। समाचार मीडिया और सोशल मीडिया में अपने प्रचार के लिए भारी धन राशि खर्च कर रहे हैं। फलत: देश विदेश से भारी धन राशि चंदे के रुप में उनके पास आ रही है। यह भी सम्भव है कि जो देश भारत की प्रगति पसंद नहीं करते तथा जो भारत के साथ परम्परागत दुश्मनी निभा रहे हैं, वे भारत में स्थिर और सुदृढ़ सरकार नहीं चाहते है। वे यह भी नहीं चाहते हैं कि कोई योग्य प्रशासक भारत की सरकार का संचालन करें। ऐसी भी आशंका व्यक्त की जा रही है कि उन देशों से इस व्यक्ति को अपनी राजनीति चमकाने के लिए भारी धन राशि दी जा सकती है।
यदि ऐसा होता है, तो यह बहुत ही दुर्भाग्यजनक स्थिति होगी। क्योंकि जो व्यक्ति जिममेदार पद पर बैठ कर अपने स्वार्थ के लिए संवैधानिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक परम्पराओं को तोड़ने में बिल्कुल भी संकोच नहीं कर रहा है, हर सांस में झूठ बोल रहा है, उस पर किसी भी तरह से भरोसा नहीं किया जा सकता। अत: देश की सभी राजनीतिक पार्टियों के नेताओं को केजरीवाल के राजनीतिक स्टंट को बहुत गम्भीरता से लेना पहोगा, क्योंकि अब वे सारी हदे पार कर चुके हैं। देश हित में इस व्यक्ति के प्रपोगंड़ा का विरोध करना चाहिये। कहीं ऐसा नहीं हो कि अपने झूठ और स्टंट के बल पर भारतीय जनता को मूर्ख बनाने में सफल हो जाय, जिसका खामियाजा राष्ट्र की सार्वभौमिकता और सुरक्षा को चुकाना पड़े। अभी तो दिल्ली प्रदेश की सरकार को संकट झेलना पड़ रहा है, किन्तु केन्द्र सरकार पर केजरीवाल का नियंत्रण हो गया तो क्या होगा ? इसकी कल्पना से कंप-कंपी छूट जाती है। अच्छा है, कांग्रेस नेताओं की अपनी अनीति जिसे कूटनीति समझ रहें है, उसके दुष्परिणामों को भांप कर इस बिगडै़ घोड़े पर दावं नहीं लगायेंगे। बिगड़े घोड़े निश्चय ही बीच में पटक देते हैं। भारी दुर्घटना से अपने अस्तित्व पर संकट खड़ा करने की जोखिम कांग्रेस नेताओं को नहीं लेनी चाहिये।

Thursday, 12 December 2013

भारत की राजनीति में विष घोल कर पुन: सत्ता पाने की अभद्र कोशिश

राजनीति में अत्यधिक विष घोल कर वातावरण को विषाक्त बनाने से उन्हें आखिर क्या हांसिल हो जायेगा ? क्या ऐसा करने से उनके सारे पाप छुप जायेंगे ? क्या वातावरण के प्रभाव से जनता मूर्छित हो कर उनके पक्ष में मतदान कर देगी ? नहीं ऐसा सम्भव नहीं होगा। हवा के रुख को बदला नहीं जा सकता। सवेरा निश्चित रुप से होगा, क्योंकि आकाश पर चढ़ कर सूर्य को उदय होने से नहीं रोका जा सकता। समय को अपनी मुट्ठी में बंद नहीं किया जा सकता।
मनुष्य हांड़-मांस का पुतला ही है, उसकी शक्तियां अजेय नहीं होती। वह कभी अजातशत्रु नहीं बन सकता। युद्ध में विजय मिल जायेगी, किन्तु पराजित भी होना पड़ सकता है, क्योंकि प्रतिद्वंद्वी भी विजयी होने के लिए ही रण में उतरा है। किन्तु कोर्इ यह समझ बैठे कि हमे पराजित करने का किसी के पास अधिकार नहीं है, तो यह उसका अहंकार है। अहंकार व्यक्ति को हिरणाकस्यप, रावण, कंस और दुर्योधन बना देता है, जिसका अंतत: विनाश निश्चित है।
लोकतंत्र में रक्तपात से सत्ता का हस्तांतरण नहीं होता, क्योंकि किसी को स्थायी रुप से शासन करने का अधिकार नहीं दिया जाता। जो योग्य है, उपयुक्त है, कसौटी पर खरा उतरता है, उसे सेवा का अवसर दिया जाता है। उसे राष्ट्र का मालिकाना हक नहीं सौंपा जा सकता। परन्तु कोर्इ सेवा को ही मालिकाना हक मान बैठता है, इसका मतलब यह हुआ कि वह देश की जनता का मालिकाना हक छीनना चाहता है। क्योंकि लोकतांत्रिक गणराज्य में जनता ही उस गणराज्य की मालिक होती है। जो राजनीतिक दल ऐसा करने की चेष्टा करता है, उसे लोकतंत्र में आस्था नहीं हैं। वह जनता को सत्ता प्राप्ति का माध्यम समझता है, साध्य नहीं मानता । वह जनता की शक्ति को स्वीकार नहीं करता। उसे इस बात का गरुर हो जाता है कि देश पर शासन करने का अधिकार हमारा ही है। यह अधिकार हमसे छीना नहीं जा सकता।
सम्भवत: इसीलिए भारत के एक राजनीतिक दल के नेता देश की जनता को यह समझा रहे हैं कि अमूक व्यक्ति हमे नापसंद है, हम इससे घृणा करते हैं, अत: जनता इसे स्वीकार नहीं करें। शायद ऐसा कहते हुए वे यह भूल जाते हैं कि लोकतंत्र में जनता से आदेश लिया जाता है, जनता को निर्देश नहीं दिया जाता। कौन सही है और कौन गलत, इसका निर्णय लेने का अधिकार जनता के पास है। आप जनता के अधिकार और उसके विवेक को चुनौती नहीं दे सकते।
एक प्रदेश की यदि करोड़ो जनता किसी व्यक्ति के प्रति विश्वास जताते हुए, उसे अपना नेता स्वीकार करती है, तब स्वत: ही उस व्यक्ति का कद विराट हो जाता है। वह सम्मान पाने का अधिकारी है। उसका तिरस्कार व अपमान करना उस प्रदेश की करोड़ो जनता का अपमान करना है, जिसने उसे अपना नेता स्वीकार किया है। किन्तु इस हकीकत को स्वीकार करने में काफी कष्ट होता है। वे यह मानना ही नहीं चाहते कि अमूक व्यक्ति एक प्रदेश का नेता है और उसे यह पद प्रदेश की जनता ने संवैधानिक परम्परा के आधार पर सौंपा है। इस पद को उन्होंने हथियाया नहीं है।
और क्या एक राजनीतिक दल, जिसके पक्ष में देश के करोड़ो मतदाता, मतदान करते हैं, यह अधिकार नहीं है कि देश के प्रधानमंत्री पद के लिए अपना एक उम्मीदवार घोषित करें ? करोड़ो मतदाता वाला राजनीतिक दल यदि किसी व्यक्ति विशेष को अपने दल की  ओर से अधिकृत प्रत्यासी मानता है, उसे जनता से निर्देश लेने की अनुमति देता है, तो इसमें गलत क्या है ? क्या ऐसा करना उस राजनीतिक दल का संवैधानिक अधिकार नहीं है ? क्या एक स्वर में उस व्यक्तित्व को अशोभनयी शब्दावली से संबोधित करना करोड़ो जनता का अपमान करना नहीं है, जो उस पार्टी के साथ जुड़ी हुर्इ है और उसके पक्ष में मतदान करती है ? क्या  एक राजनीतिक दल के नेताओं की ओछी मनोवृति अप्रत्यक्षरुप से देश की जनता को यह समझाने की कोशिश नहीं करती कि देश पर शासन करने का अधिकार हमारा ही है। हम यह अधिकार किसी ओर को नहीं लेने देंगे।
यदि आप सत्ता में हैं,  तो आपके कार्यों की आलोचना करने के आधार पर ही विपक्ष जनता से वोट मांगेगा और जनता से निवेदन करें कि आप एक बार हमें भी सेवा का अवसर दें, हम आपकी कसौटी पर खरे उतरेंगें। क्या ऐसा करना राजनीतिक अपराध की श्रेणी में आता है ? क्या  विपक्ष की आलोचना का सारगर्भित शब्दावली में जवाब देने के बजाय, उस पर कटाक्ष करना उचित है ? क्या उसके नेता को तरह-तरह के अशोभनीय अलंकारों से अलंकृत कर उनकी छवि को जानबूझ कर विद्रूप  करना सही है ? सिद्धान्त: यदि सत्ता पक्ष पुन: सत्ता में आना चाहता है, तो किये गये कार्यों का प्रमाणित विवरण जनता को  दे, अपनी उपलब्धियों के आधार पर जनता से पुन: सेवा का अवसर मांगे । विपक्ष के नेता के विरुद्ध अर्नगल व नींदनीय शब्दावली का प्रयोग करना, उनकी कुत्सिक मन:स्थिति को दर्शाता है, जो यह साबित करता है कि भारत की राजनीति को इन्होंने अपने स्वार्थ के लिए कितनी विषैली बना दिया है।
एक पार्टी के अधिकांश नेता, एक घृणित रणनीति के तहत एक व्यक्ति विशेष की आलोचना करना और उनके द्वारा कहे गये एक -एक शब्द का पोस्टमार्टम कर उन्हें नीचा दिखाने की धूर्त कोशिश करना, क्या यह नहीं दर्शाता कि उनका लोकतंत्र, भारत के सवं​िधान और संवैधानिक संस्थाओं में कोर्इ विश्वास नहीं हैं। वे किसी भी तरह सत्ता पर नियंत्रण चाहते हैं और इसके लिए वे एक हद तक गिर सकते हैं।
मनुष्य सर्वगुण सम्पन्न नहीं होता। जनता के समक्ष बोलते समय कुछ त्रुटियां होना स्वाभिक ही है। इतिहास के बारें में कोर्इ गलत  तथ्य प्रस्तुत करने का मतलब यह नहीं होता कि यह व्यक्ति निकृष्ट है। उसके सारे संवैधानिक अधिकार समाप्त हो गये हैं। पहाड़ सी गलती वह कहलाती है, जब व्यक्ति संवैधानिक पद का दुरुपयोग करते हुए देश के प्राकृतिक संसाधनों को लूटता है। अपने अपराध को स्वीकार नहीं करता हैं। अपराध को छुपाने और दबाने के लिए जांच एंजेसियों का सहयोग लेता है। ऐसे क्षुद्रतम अपराध करने वाले व्यक्ति या उस राजनीतिक दल को पुन: जनता से सत्ता का अधिकार मांगना, किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता।
किसी भी संवैधानिक पद पर नहीं रहने के उपरांत भी किसी व्यक्ति विशेष या एक परिवार के प्रति एक लोकतांत्रिक पार्टी के नेताओं द्वारा अत्यधिक स्वामीभक्ति का सार्वजनिक प्रदर्शन, यह दर्शाता है कि इस पार्टी का लोकतंत्र के बजाय राजतंत्र में ज्यादा आस्था है। ऐसे परिवार के एक सदस्य के लिए शहजादा संबोधन गाली नही कहा जा सकता। इसे लोकतंत्र में राजतंत्र की परम्परा निभाने पर कटाक्ष ही समझा जा सकता है। किन्तु प्रतिकार में  बोले गये रावण, दैत्य, भष्मासुर आदि अनेक अलंकारों को क्या उपयुक्त और शोभनीय कहा जा सकता है ?
यदि कोर्इ राजनेता अपने व्यक्तित्व के बल पर जनता में भरोसा जगाने में समर्थ लगने लगता है, तो उसे रोकने एक ही उपाय है- उसके समक्ष अपने किसी प्रभावशाली व्यक्तित्व को मैदान में उतारना। किन्तु आपके पास ऐसा कोर्इ व्यक्तित्व है ही नहीं और यदि है तो वह बहुत बौना है, अत: एक अन्वेषण टीम बना कर प्रतिद्वंद्वी व्यक्तित्व की छोटी सी गलती को पहाड़ बता कर मीडिया के माध्यम से खूब प्रचार करना, एक तरह से युद्ध आरम्भ होने के पहले ही हार स्वीकार करना ही है, जिसे खीझ और बौखलाहट कहा जा सकता है।

Thursday, 5 December 2013

धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता पर नयी बहस छेड़ने की आवश्यकता है

साम्प्रदायिकता हिंसा निरोधक बिल - बाजी जीतने की घृणित कोशिश
हम भारतीय नागरिक है, किसी जानवारों की मंड़ी के जानवर नहीं, जिनका नस्ल के आधार पर भेदभाव किया जाय। धर्म के आधार पर हमारी पहचान नहीं होती। हमारी पहचान भारतीयता के आधार पर होती है। संविधान ने भारतीय नागरिकता की परिभाषा दी है, उसे किसी भी तरह से खंड़ित नहीं किया जा सकता। धर्म के आधार पर नागरिकों का संविधान ने विभाजन नहीं किया है। धर्म के आधार पर नागरिकों को विशेष अधिकार नहीं दिये गये है, इसीलिए भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट् कहा जाता है।
धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा बदलने के लिए युपीए सरकार -साम्प्रदायिक हिंसा रोकने  के लिये ए क बिल  communalलाना चाहती है। यह न केवल हमारे संविधान की मूल भावना के प्रतिकूल है, वरन हमारे संघीय लोकतंत्र की पवित्रता पर अकारण किया जा रहा कुठाराघात है। जो सरकार देश को जवाबदेय सुशासन नही दे पायी। महंगाई और भ्रष्टाचार के भयावह प्रकोप से त्राहि-त्राहि कर रही जनता को राहत नहीं दे पायी।  ऐसी सरकार की नीतियों और अर्कमण्यता से  जनता नाराज है। सरकार चलाने वालो नेताओं को यह अहसास हो गया है कि जनता अब उन्हें पूरी तरह तिरस्कृत कर देगी, इसलिए देश में आग लगा कर ही यदि पुन: सत्ता सुख मिल सकता है, तो ऐसा करने में कहां एतराज है। सम्भवत: इसी कारण एक नये कानून को लाने की आवश्यकता आ पड़ी है।
इस समय पूरा देश शांत हैं। असम और उत्तर प्रदेश को छोड़ कर कहीं साम्प्रदायिक दंगे नहीं हो रहे हैं। उन प्रदेशों में भी नहीं, जहां दस पंद्रह वर्षों से वे सरकारे काम कर रही है, जिनकी धर्मनिरपेक्षता पर प्रश्न चिन्ह लगाया जाता है। नागरिकों के मन में एक दूसरे सम्प्रदाय के प्रति नफरत और घृणा का  भाव नहीं है। सभी नागरिकों की समस्याएं एक जैसी है। उनकी तकलीफे एक जैसी है। वे कुशासन से मुक्ति पाने के लिए एक हो रहे हैं और एक हो कर नयी सरकार का विकल्प ढूंढ रहे हैं। यही कारण है कि भ्रष्ट कारनामों के उजागर होने से भयभीत सरकार, नागरिकों के जीवन को संकट में डालने का घृणित खेल, खेलने के लिए विचलित दिखाई दे रही है।
प्रश्न उठता है कि धर्मनिरपेक्षता की विकृत परिभाषा प्रस्तुत कर देश के नागरिकों के मध्य विभ्रम की स्थिति निर्मित करने का आखिर क्या औचित्य है ? दुनियां में कही ऐसा कानून हैं, जहां दो व्यक्तियों के झगड़े में यह नियम बना लिया जाय कि झगड़ा चाहे कोई भी प्रारम्भ करें, दोषी एक विशेष व्यक्ति को ही माना जायेगा। उसी पर मुकदमा चलाया जायेगा और दूसरे को दोष मुक्त माना जायेगा। प्राकृतिक न्याय का सिद्धान्त क्या ऐसे नियम को सही ठहराता है ? क्या यह वोट पाने के लिए कुटिल नीति नहीं है। आखिर सत्ता पाने के लिए ऐसा कानून बनाने की कहां आवश्यकता आ पड़ी कि दंगा होने पर एक समुदाय को ही दोषी मान कर उस पर मुकदमा चलाया जायेगा और दूसरे को दोष मुक्त समझा जायेगा। क्या ऐसा कानून बनाने वालों की घृणित सोच को साम्प्रदायिकता नहीं कहा जा सकता ? निश्चय ही ये लोग साम्प्रदायिक हैं और धर्मनिरपेक्षता का उपहास उड़ा रहे हैं।
साम्प्रदायिक दंगों में असामाजिक तत्वों की मुख्य भूमिका होती है, जो सभी समाज में पाये जाते हैं। दंगा भड़काने वाली सरकारे इन असमाजिक तत्वों का उपयोग करती हैं। अत: वे सरकारे साम्प्रादियक कही जा सकती है, जिनके मन में कुटिलता होती है, जो धर्म को आधार मान कर अपना घृणित राजनीतिक उद्धेश्य पूरा करती है। वे सरकारे नहीं, जो जनता को सुशासन देने के लिए वचनबद्ध होती है। दंगे सरकार की प्रशासनिक विफलता से फैलते हैं। दक्ष सरकारों के प्रशासन में कभी दंगे नहीं होते। “
कोई भी झगड़ा या विवाद दो व्यक्तियों या व्यक्ति समूह के बीच किसी निजी स्वार्थ को ले कर होता है। उसे अकारण ही राजनीतिक लाभ उठाने के लिए साम्प्रदायिक रंग दे दिया जाता है, ताकि झगड़ा साम्प्रदायिक रंग पा कर फैलें और राजनेताओं का अपना राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध करने का बहाना मिल जाय। दंगे बहुधा प्रायोजित होते हैं, जिन्हें एक निश्चित उद्धेश्य की पूर्ति के लिए भड़काया जाता है। उत्तर प्रदेश का मुजफ्फर नगर दंगा इसका ज्वलन्त उदाहरण है। ऐसा कार्य वे ही सरकारे करती हैं, जिनके कुशासन और भ्रष्ट शासन से जनता रुष्ट हो जाती है। तब वे अपनी अर्कमण्यता और निकम्मेपन पर पर्दा डालने के लिए किसी आपसी विवाद को साम्प्रदायिक रंग दे कर उसमें आग लगाती हैं और निर्दोष नागरिकां को उसमें झुलसने के लिए छोड़ देते हैं।
अंग्रेज शासक तो भारत पर शासन करने के लिए ऐसे विकृत कानून बनाते थे, ताकि भारतीय जनता में आपस फूट डाल कर राज किया जा सके। सम्भवत: इसी नीति के कारण अंग्रेज इस देश पर वर्षों तक राज करते रहें। क्या ऐसी ही कुटिल नीति को आधार बना कर कांग्रेस पार्टी भारत पर शासन करने का अधिकार पाना चाहती है ? क्या यह उसकी साम्प्रदायिक सोच नहीं है , क्या इस आधार पर उसे एक साम्प्रदायिक पार्टी नहीं ठहराया जासकता ?
फूट डाल कर यदि ऐसे तत्व सरकार बनाने में पुन: समर्थ हो जाते हैं, इससे सभी को नुकसान होगा।  उन नागरिकों का भी  होगा, जिनको उपकृत कर एक अक्षम सरकार पुन: सत्ता सुख भोगना चाहती है, क्योंकि भ्रष्ट और अकर्मण्य सरकारों का भार सभी नागरिकों  को उठाना पड़ेगा। ऐसी सरकारों का सीधा भार नागरिकों की जेब पड़ता है। उनके घर के  चुल्हें पर पड़ता है। उनके बच्चों के भविष्य पर पड़ता है। साम्प्रदायिकता की आग कभी कभार कहीं ही लगती है, उसे आम नागरिक नहीं लगाते, राजनेता लगाते हैं। यह आग तो क्षणिक होती है, जो बुझ जाती है। किन्तु पेट की आग तो रोज लगती है। बच्चों के भविष्य और उनकी पढाई की चिंता रोज सताती है। महंगाई रोज पीड़ा देती है। अत: नागरिकों को स्थायी समस्याओं के समाधान का हल खोजना चाहिये। ऐसी सरकारे चुननी चाहिये, जिनके मन में सुशासन देने की इच्छा हों। सम्प्रदाय या धर्म के आधार पर नागरिकों को आपस में लड़ाने की कुटिलता नहीं हो।
सदियों से भारत के गांवों और शहरों में दोनो समुदाय के लोग शांति से रह रहे हैं। वे एक दूसरे की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हैं। कोई इसमें व्यवधान उपस्थित नहीं करता। मुसलमान मज्जिद में जाते हैं, उन्हें हिन्दू नहीं टोकते हैं। हिन्दू मंदिर में जा कर पूजा अर्चना करते हैं, उससे मुसलमानों को कभी  एतराज नहीं होता। अन्य इस्लामी देशों की तरह हिन्दू किसी मज्जिद को अपवित्र नही करते । भारत की किसी म​िज्ज़द में गोलीबारी और हत्याकांड़ नहीं होता। यह हमारी आपसी समझ और सहिष्णुता का उत्कृष्ट उदाहरण है।
अत: भारत के नागरिकों को अब यह आपसी समझ विकसित करनी चाहिये कि हम एक हैं हमारे बीच किसी तरह का कोई मतभेद नहीं है। धर्म या सम्प्रदायिकता के आधार पर जो हमारे बीच खाई खोदने का प्रयास करेगा, उसे हम मिल कर रोकेंगं। हम उसी पार्टी के प्रति अपनी आस्था व्यक्त करेंगे, जो हमे सुशासन देने का वादा करेगी। यदि हम एक हो जायेंगे, तो फूट डालों और राज करों के स्थान पर राजनीतिक पार्टियां सुशासन दों और राज करों, सिद्धान्त को आत्मसात करेगी। यदि ऐसा हो जाता है तो देश में एक नयी राजनीतिक व्यवस्था का निर्माण होगा। देश को अपनी समस्याओं से निजात दिलाने के लिए देश की जनता सहायक बनेगी।

Monday, 2 December 2013

तरुण तेजपाल की तरह भ्रष्टचारियों को जेल भेजने का अब हमे कठोर कानून चाहिये

दिसम्बर 2012 का स्वत:स्फूर्त व नेतृत्व विहीन युवा जन आंदोलन ने भारतीय राजनेताओं अचंभित कर दिया था।  कड़कती ठंड में उन पर डाली गयी पानी की बौछारों को सहते हुए वे रात में भी सड़कों पर डटे हुए थे। युवाओं ने सत्ता के अहंकार और निष्ठुरता को चूर-चूर कर रख दिया था। स्त्री प्रताड़ना को सहने का आदि भारतीय समाज भ्रष्ट पुलिस की निरंकुशता से परिचित था और जानता था कि पुलिस बिक जायेगी और निर्भया का ऐसा लच्चर केस बनायेगी कि कुछ ही दिनों  में अपराधी छूट जायेंगे। युवाओं को  संवेदनाविहीन पुलिस और राजननैतिक व्यवस्था से न्याय की आशा नहीं थी।
अन्ना ह्जारे  और बाबा रामदेव के जनआंदोलन को निष्ठुरता और निर्ममता से दबाने वाला सत्ताधारी राजनीतिक दल पूरे देश में यकायक फैले इस जन आंदोलन से घबरा गया। उसे लगा यदि अगले लोकसभा चुनावों में भारत का युवा वर्ग उसके विरुद्ध हो गया, तो सत्ता उसके हाथ से चली जायेगी। इसी भय से विवश हो कर स्त्री प्रताड़ना के विरुद्ध कड़ा कानून बनाने के लिए बाध्य होना पड़ा। संसद की मंजूरी मिल गयी। भारत के किसी भी राजनीतिक दल ने इस कानून का विरोध नहीं किया।
संयोग से इस कठोर कानून की चपेट में सक ऐसा सख्श आ गया, जो उंचे रसूख वाला था। एक सत्ताधारी दल की राजनीतिक तिकड़म का सहयोगी था। धूर्तता को पत्रकारी पेशे के साथ घालमेल कर उसने अपार धन कमाया था। उसने अपराध किया। अहंकार के साथ इसे स्वीकार किया। इस गलतफहमी में निश्चिंत हो गया कि इस देश में उसका कोर्इ कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उससे जो कृत्य हो गया, सो हो गया, अत: जिन्हें उसने उपकृत किया था, वह नेताबिरादरी उसके पक्ष में खड़ी हो जायेगी और आगे आ कर उसे बचा लिया जायेगा। आखिर बड़े और रुतबे वाले लोग थोड़े ही किसी जेल में बंद हो सकते हैं।
इसी भरोसे और गरुर के साथ  भारत के भ्रद समाज का अभद्र जानवर -तरुण तेजपाल हैकड़ी और हैसियत का रंग दिखाता हुआ दिल्ली से गोवा गया था। उसे पूर्ण विश्वास था कि उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा, क्योंकि दिल्ली का एक ताकतवर मंत्री उसके बचाव में उतर आयेगा। उसके खिलाप की जा रही कार्यवाही को विरोधी दल का षड़यंत्र माना जायेगा और भारत के शीर्षस्थ राजघराने की ताकत उसे अंतत: बचा लेगी।
तरुण तेजपाल के अहंकार और उनके अजीब आत्मविश्वास को पूरा देश भांप गया। जनमानस उद्वेलित हो गया। चारों तरफ से आवाजे़ उठने लगी- क्या भारत के राजनेताओं के खाने के और दिखाने के दांत अलग-अलग होते हैं ? सभी की जबान को लकवा क्यों मार गया है ? नये राजनीतिक दल के वे महाशय जो निर्भया आंदोलन का लाभ उठाने के लिए युवाओं के साथ सड़को पर उतर गये थे और बहुत जोर-शोर से स्त्री प्रताड़ना के पक्ष में दलिले दे रहे थे, वे भी क्यों चुप हो गये ? सभी की चुप्पी का एक ही कारण था- भाजपा तेजपाल के कृत्य का विरोध कर रही थी। भाजपा याने सांम्प्रदायिक पार्टी। याने हिन्दुत्व की समर्थक पार्टी। इसलिए जिस न्यायोचित प्रकरण का भाजपा समर्थन करेगी, वह मामला कैसा भी हो उसका हम समर्थन नहीं करेंगे, चाहे यह मामला किसी अबला नारी के सम्मान, उसकी आबरु और स्त्री उत्पीड़न के विरुद्ध उठायी गये उसके साहसिक निर्णय  से जुड़ा हो। चाहे वह मामल उस कानून से जुड़ा हो, जिसे भारतीय संसद ने पास किया था।
कानून की लाख बाजीगरी दिखाने के बाद भी तरुण तेजपाल की जमानत याचिका खारिज कर दी गयी। उन महाशय को हवालात में दिन गुजारने पड़ रहे हैं। पंच सितारा संस्कृति के जीव के चेहरे के रंग तब उडे़ हुए थे, जब उन्हें निर्णय सुनाया गया था। वे ऐसी जगह कैसे रह सकते हैं, जहां का जीवन स्तर उनके लिए नारकीय हो। शायद उस अभद्र पुरुष ने दुस्साहस करते हुए स्वपन में भी नहीं सोचा था कि उसे ऐसे दिन भी देखने पड़ सकते हैं। उसे ऐसा अहसास था  कि वह अपने रुतबे और ताकत से एक प्रताड़ित अबला नारी की आवाज वह दबा देगा। सम्भवत: पूर्व में भी उसने ऐसा किया होगा और किसी युवती की दुर्बलता का लाभ उठा कर समर्पण के लिए बाध्य किया होगा। क्योंकि ऐसे दुष्कर्म वही व्यक्ति करता है, जो आदतन ऐसे कृत्य करने का  अनुभवी होता है।
तरुण तेजपाल प्रकरण से हमें एक नसीहत मिलती है- क्या स्त्री उत्पीड़न के विरुद्ध बनाये गये कानून की तरह भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए भारतीय संसद ऐसा कोर्इ कठोर कानून बना सकती है, जिससे बड़े-बड़े तीसमार खां अपराधियों को जेल की सलाखों के भीतर ठूंसा जा सके।  वर्तमान भारतीय संसद का जो स्वरुप है, उससे   तो ऐसी आशा नहीं की जा सकती, क्योंकि इसमें एक से बढ़ कर एक भ्रष्टाचार में आंकठ डूबे व्यक्ति बैठे हुए हैं।
भारतीय संसद का स्वरुप बदला जा सकता है- यदि 2014 के लोकसभा चुनावों के पूर्व एक ऐसा युवा जनआंदोलन पूरे देश में फैले, जो यह मांग रखे कि हम उसी राजनीतिक दल और उसके नेता को समर्थन करेंगे, जो भारत में भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए कठोर कानून बनायेगा। हम ऐसा कानून चाहते हैं, जिसके अनुपालन से उन सफेदपोश राजनेता और नौकरशाह कानून के लपेटें में आ कर जेल भेजे जा सकें, जिन्होंने बेबाक हो कर देश के अरबों रुपये लूटे हैं।
भारतीय संसद ऐसा कानून बनाये जिससे विदेशों में जमा काला धन वापस लाया जा सके और जिन अपराधियों ने यह कृत्य किया है, उन्हें कठोर दंड़ से दंड़ित किया जाय। पूरे देश में फैली भ्रष्टाचारियों की  बैमानी संपति को जब्त किया जा सके।
भारत आर्थिक ताकत तभी बन सकता है, जब भ्रष्टाचार पर पूर्ण अंकुश लगाया जा सके, क्योंकि भ्रष्टाचार के उन्मूलन से ही निर्धनता का अंधकार मिटाया जा सकता है। देश का तीव्र औद्योगिक विकास कर उसे समृद्धिशाली राष्ट् बनाया जा सकता है। भारतीय युवा शक्ति अपनी ताकत भारत से सारे राजनीतिक समीकरण को बदल सकती है। जो राजनीतिक दल जातिगत समीकरणों के सहारे चुनाव जीतते हैं और भ्रष्टाचार को सींचते हैं, उन सभी राजनीतिक दलों का राजनीति से अवसान हो जायेगा। इन राजनीतिक दलों से जुडे़ अपराधी वृति के व्यक्ति चुनाव हार जायेंगे। ऐसा सम्भव होने पर ही भारतीय संसद का स्वरुप बदला जा सकता है।
अत: निर्भया आंदोलन की तर्ज पर ही अब पूरे देश में भ्रष्टाचार उन्मूलन का आंदोलन खड़ा किया जा सकता है। इस आंदोलन का नारा होगा – हम भारतीय हैं, भारतीयता ही हमारी जाति है। भारतीयता ही हमारा धर्म हैं। हर भारत की राजनीति का शुद्धिकरण करने के लिए सब एक हैं। हमें ऐसी संसद चाहिये जो भ्रष्टाचार उन्मूलन के कठोर कानून बना सकें। हमारा समर्थन उसी राजनीतिक दल को होगा, जो शपथ ले कर यह घोषणा करें कि यदि हमारा दल सत्ता में आया और उसे जनता ने पूर्ण बहुमत दिया, तो हम भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर कानून बनायेंगे और सभी अपराधियों को जेल भेजेंगें।
यदि ऐसा सम्भव हो पायेगा तो भारत की तकदीर बदल जायेगी। तरुण तेजपाल की तरह सारे अपराधी चाहे वो कितने ही ताकतवर क्यों न हो, अपनी बची हुर्इ जिंदगी जेलों में गुजारेंगे।

Thursday, 28 November 2013

अंधेरे युग की विदाई सम्भव है, यदि हम स्वामीभक्तों की पार्टी को पूरी तरह तिरस्कृत कर दें

पाकिस्तान हर बाजी जीत जाता है। हम हार कर उसे कोसने के अलावा कुछ नहीं कर पाते। यह पीड़ादायक स्थिति है। अफजल-कसाब की फांसी के बाद एक साधारण भारतीय नागरिक के मन में भी यह आशंका थी कि पाकिस्तान जरुर कोई न कोई खुरापत करेगा, किन्तु राजनीतिक हानि लाभ का आंकलन कर उन्हें फांसी दे दी और परिणामों की परवाह किये बिना सरकार सो गयी। हैदराबाद ब्लास्ट ने जगाया। थोडी देर के लिए जागी, फिर सो गयी। इसके बाद भारतीय जवानों के सिर पाकिस्तानी सेना काट कर ले गयी। बीएसएफ के केंप में घुस कर आतंकवादियों ने  जवानो को मार दिया। बैंगलोर में फिर ब्लास्ट किया  और एक सोची-समझी रणनीति के तहत सरबजीत की हत्या कर दी।बोद्धगया और फिर पटना में मोदी की रैली में किया गया ब्लास्ट। सिलसिलेबार घटित हो रही घटना पर रटा रटाया वक्तव्य देने के अलावा सरकार कुछ नहीं कर पायी। उसके पास न तो कुछ करने की सोच है और न ही इच्छा शक्ति। एक अकर्मण्य और निकम्मी सरकार से इसके अलावा कोई अपेक्षा भी नहीं की जा सकती।
दरअसल वर्तमान सरकार हर क्षेत्र में अक्षमता साबित कर चुकी है। गृह, अर्थ, विदेश, रक्षा, संचार और ऊर्जा मंत्रालय के कार्य निष्पादन के  ऐसे कई उदाहरण  है,  जिसमें उसकी रीति-नीति की झलक दिखाई देती है। भारी भरकम घोटालों से देश की अर्थव्यवस्था  को चोपट कर दिया। औद्योगित प्रगति अवरुद्ध हो गयी, किन्तु जो लोग सरकार चला रहे है, उनमें मन में अपराधबोध नहीं है। शर्मिदगी नहीं है। देश की जनता से कोई भय नहीं है। क्योंकि वे भारतीय जनता को मूर्ख और अज्ञानी समझते हैं और जानते हैं, हम कुछ भी करें, जनता हमे ही चुनेगी। हम झूठ, फरेब, छल, कपट को आधार बना कर चुनाव जीतेंगे।  इस देश पर शासन हम ही करेंगे।
वस्तुत: वर्तमान सरकार जिस व्यक्तित्व के नियंत्रण में हैं, उनके मन में इस देश के प्रति  आदर भाव नहीं है। निष्ठा नहीं है। देश प्रेम नहीं है। भारतीय संस्कृति में आस्था नहीं है। भारतीय जीवन मूल्यों की चिंता नहीं है। भारत के स्वाभिमान की परवाह नहीं है।  भारत के उत्कर्ष की कामना नहीं है। भारत को समृद्धिशाली और शक्तिशाली राष्ट्र बनाने की उत्कंठा नहीं है। भारतीय नागरिकों के प्रति अनुराग नहीं है। उनके जीवन के प्रति संवेदनशीलता नहीं है।
प्रश्न उठता है, एक ऐसी शख्सियत जिसे भारत की संवैधानिक परम्पराओं में विश्वास नहीं हैं। जो इसकी पवित्रता को अपने स्वार्थ के लिए जानबूझ कर नष्ट करने पर तुली हुई है। जिसके पास अपना कोई व्यावहारिक निज सोच नहीं हों। जन समस्याओं को सुलझाने के लिए तीक्ष्ण विश्लेषणात्मक मस्तिष्क नहीं हों। जिनके राजनीतिक विचार अस्पष्ट, बहुत संकुचित व संकीर्ण हों। जिनका व्यक्तित्व रहस्यमय और न समझ में आने वाली पहेली बन गया हों, ऐसी शख्सियत के हाथों में हमने देश क्यों सौंपा?  क्यों उन्हें  हमने सता का शक्ति केन्द्र बना दिया? क्यों  प्रतिभाशाली , समर्थ व कर्मठ राजनेताओं को मंत्री बनाने के बजाय चाटुकारिता में प्रवीण, स्चामी की आज्ञा को शिरोधार्य कहने वाली चाटुकार टोली को देश के महत्वपूर्ण मंत्रालय सौंप दिये गये और देश की जनता मूक दर्शक बन कर देखती रह गयी ?
वस्तुत: भारत की गरीबी, अशिक्षा, पिछड़ापन, धार्मिक, जातीय व प्रादेशिक संकीर्णता, उस शख्सियत के लिए  उपयोगी साबित हुई है।  हमारी दुर्बलताऐं हमारे लिए अभिशाप बन गयी और उनके लिए वरदान बन गयी। क्योंकि हमारी दुर्बलताओं को आधार बना कर चुनाव जीते जाते हैं। तिकड़म से सरकार बनायी जाती है।  घृणित उद्धेश्य ले कर सरकार चलायी जाती है। संवैधानिक संस्थाओं और प्रशासनिक व्यवस्था पर नियंत्रण स्थापित करने के बाद अपने छुपे हुए मिशन को पूरा करने में सफलता हांसिल की जा सकती है।
जिस पार्टी की वह शख्सियत सर्वेसर्वा है, उस पार्टी में अब जीवट ऊर्जा वाला नेता नहीं बचे है, जो उनके सामने चुनौती प्रस्तुत कर सके। पार्टी पूर्णतया अपंग हो गयी है। एक खानदान पर पूरी तरह अवलम्बित हो गयी है। पार्टी के पास स्वाभीमानी और देश भक्त नेताओं का अकाल पड़ गया है। पार्टी में ऐसे नेता बच गये, जिन्हें कहो उठो, तो वे उठ जाते हैं और बैठने के लिए कहो, तो बैठ जाते हैं।  अपने नेता को स्वामी मानते हैं और उनकी हर आज्ञा को सिर झुका कर स्वीकार कर लेते हैं। स्वामी के बारें में कुछ भी कहो तो बिफर पड़ते हैं।  कहने को तो इसे गांधी की पार्टी कहा जाता है, किन्तु  गांधी की पार्टी में गांधी के सिद्धान्तों और आदर्शों  के लिए  किंचित भी जगह बचा कर नहीं रखी गयी है।
विपक्ष बिखरा-बिखरा है। प्रादेशिक क्षत्रप शक्तिशाली बन कर उभरे हैं, जो अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए  स्वामीभक्तों की पार्टी के समक्ष समय-समय पर शरणागत हो जाते हैं। कभी समर्थन देते हैं। कभी समर्थन ले लेते हैं।  कभी समर्थन वापस लेने की धमकी देते हैं। लुका-छुपी का गंदा राजनीति के खेल ने जनता के मन में वितृष्णा भर दी है। राजनीतिक अस्थिरता और अर्कमण्य सरकार के अस्तित्व में बने रहने से पड़ोसी देश प्रभावी हो रहे हैं। वे जो चाहे कर रहे हैं और हमारी सरकार उपहास का उड़ा रहे हैं। हम भारतीय नागरिक शर्मिंन्दगी महसूस कर रहे हैं। परन्तु इसके अलावा हम कर ही क्या सकते हैं।
एक अक्षम सरकार जिसे अपने उतरदायित्व की परवाह नहीं है,  जैसे-तैसे अपने दिन पूरे कर रही है। देश के एक सौ बीस करोड़ नागरिकों को अंधेरे युग में धकेल दिया गया है। नागरिकों के मन में सरकार के कुकृत्यों को ले कर गहरा असंतोष है। आक्रोश है। उद्वेलन है। किन्तु इस अंधेरे युग से बाहर निकलने का कोई रास्ता भी नहीं दिखाई दे रहा है। अपने हाथों में जलती हुई मशाल ले कर कोई अलौकिक शक्ति नहीं आ रही है, जो कहे- मेरे पीछ-पीछे चलों। मैं तुम्हें रास्ता दिखाऊंगा। अंधेरे से निज़ात दिलाऊंगा।
यह भ्रम है हमारा। हमें अपना रास्त स्वयं ही खोजना होगा। यदि हम अपनी दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त कर लेंगे] तो निश्चय ही हमे प्रकाश किरणे दिखाई देगी। अंधेरे के छंटने के आसार बनेंगे। दुर्बलताओं पर विजय पाने के लिए हमे यह भूलना होगा कि हमारी जाति क्या है। हमारा मजहब क्या है। हम किस प्रान्त में रहते है। हमे सिर्फ यह याद रखना होगा कि भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था खतरे में हैं। हमे अपने नागरिक अधिकारों के प्रति सजग हो कर यह संकल्प लेना होगा कि हम उन्हें अपना जन प्रतिनिधि चुनेगें जो जनता के प्रति उतरदायित्व का भाव रखें, न कि अपने स्वामी के प्रति। हम उस राजनीतिक दल को अपना भरपूर समर्थन देंगे, जो देश को एक जवाबदेय, सक्षम सरकार दे सकें। जिस पार्टी के पास देश भक्त नेताओं का बाहुल्य हों। जो अपनी प्रशासनिक क्षमता को प्रमाणित कर सकें। जो पार्टी उपयुक्त लगे और हमारी कसौटी पर खरी उतरे, उसे भरपूर समर्थन देना होगा, ताकि उसको अपनी क्षमता का प्रदर्शन करने का मौका मिले। यह तभी सम्भव है, जब हम स्वामीभक्त पार्टी को पूरी तरह तिरस्कृत कर दें। उन क्षत्रपों का प्रभाव सीमित कर दें, जो चुनाव तो एक दूसरे के विरुद्ध लड़ते हैं और सरकार बनाने के लिए अपने प्रतिद्वंद्वी के सहयोगी बन जाते हैं। यदि ऐसा हो जायेगा तो अंधेरा छंट जायेगा। नया सवेरा होगा। नयी सरकार जनता की अपनी होगी। जो जनता लिए कार्य करेगी। मात्र स्वामी की आज्ञा का पालन ही नहीं करेगी।

Tuesday, 26 November 2013

हम चाहें कैसे भी हों, इस देश पर शासन करने का अधिकार हमारा ही है

भाईयों और बहनों ! हमारी पार्टी गरीबो, पिछड़ो, दलितों और मुसिलमों की पार्टी है। हम इन दबे हुए समाज की सेवा में लगे हुए हैं। हमने यह भरसक प्रयास किया है कि इनकी जैसी सिथति है वैसी ही बनी रहें, ताकि इन बेबस लोगों के वोट हमें हमेशा मिलते रहें। साठ वर्षों तक हमने इनके वोटों के सहारे ही भारत पर शासन किया है। माया मुलायम, लालू, नीतीश जैसे नये उभरे नेता हमारी राह में अवरोध बने हैं, परन्तु सत्ता सुख भोगने में ये हमारे सहायक बन जाते हैं, अत: इनसे हमारा कोई विशेष विरोध नहीं हैं। क्योंकि हम धर्मनिरपेक्षता की डोर से बंध कर सारा विरोध भूल जाते हैं। जहां ये नहीं हैं, वहां हम ही हम है। साम्प्रदायिक ताकतों से हम सभी साझा विरोध रखते हैं। ये ही हमारे विपक्षी हैं। इन्हें हम कभी शासन करने का अधिकार लेने नहीं देंगे।
हमारे भ्रष्ट कुशासन की वजह से गरीब इतने गरीब बनते गये कि वे कभी अपनी गरीबी से छुटकारा पाने की सोच ही नहीं सकते। पिछले दस सालों के हमारे शासन में महंगाई ने अपना रौद्र रुप दिखाया, जिससे गरीबों की संख्या में काफी वृद्धि हो गयी है। हम चाहते भी यही थे, क्योंकि ज्यादा से ज्यादा गरीबों के आंसू पौंछ कर उन्हें दिलासा दे, उनके वोट प्राप्त करना चाहते हैं।
यह हमारे कुशासन और दोषपूर्ण नीतियों का ही कमाल हैं कि आज़ादी के छियांसठ वर्ष बाद भी भारत की अधिकांश आबादी -दलित, आदिवासी और पिछड़ी कही जाती है। हम कभी इस समाज के नाम के आगे से विशेषण हटाना ही नहीं चाहते, क्योंकि ऐसा होने पर यह समाज हमारी बातों में नहीं आयेंगा। अधिकांश आबादी यदि शिक्षित हो गयी, तो हमे कौन पूछेगा ? इसलिए देश के 90 प्रतिशत आदिवासी आज भी झोंपड़ो में ही रहते हैं। इनके पास पक्के मकान नहीं है। दलितों और पिछड़ो के भी यही हाल है। इनके बच्चे स्कूलों में नहीं जाते। यदि मुशिकल से जाते भी हैं, तो प्राथमिक शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाते। हम मानते हैं कि इनकी ऐसी हालत के जिम्मेदार हम ही है। परन्तु इनकी सिथति बेहतर बना कर हम अपना शासन खोने की जोखिम नहीं लेना चाहते। अत: इनकी यथा सिथति बनाये रखने के ही पक्षधर हैं।
मुसिलम समुदाय को हम गरीब, पिछड़ा और अपनी मान्यताओं से झकड़ा हुआ ही देखना चाहते हैं। हम छियांसठ वर्षों से इनके रहनुमा बने हुए हैं। परन्तु शिक्षा और रोजगार पाने में इस पूरे समुदाय को फिसडडी ही बना रखा है। हमारे द्वारा बनाये गये सच्चर आयोग ने इस समुदाय की सिथति दलितों से भी बदतर बतायी थी। यह समुदाय जब तक दबा हुआ रहेगा, हमारा थोक वोटर बना रहेगा। इनके थोक वोटो के सहारे ही तो हम साम्प्रदायिक शकितयों से बाजी जीत जाते हैं।
विपक्ष सत्ता का भूखा है। हम सत्ता के प्यासे हैं। सत्ता के बिना हमारी सिथति उस मछली की तरह हो जाती है, जो पानी से बाहर निकाले जाने के बाद तड़फती है। हम सत्ता के बिना रह नहीं सकते। इसीलिए जनता से वोट मांगते है। वोट पाने का हमारा अधिकार हैं, क्योंकि हमने देश को आज़ादी दिलायी। परन्तु देश की बरबादी की त्रासदी दी, परन्तु हम विपक्ष को सत्ता में नहीं आने देंगे। यह देश हमारा है। हम ही इस पर राज करेंगे। विपक्ष को हम यह अधिकार कभी नहीं लेने देंगे।
विपक्ष वोटों के लिए भाई से भाई को लड़ाता है। समाज में जहर घोलता है। किन्तु हम लड़ाते नहीं, बांटते हैं, जहर घोलते नहीं, पिलाते हैं। हमारे नेताओं की सहमति से हिन्दुस्तान को ही बांट कर पाकिस्तान बनाया गया। हमारे नेता यदि राज सुख भोगने की जल्दबाजी नहीं करते, तो हिन्दुस्तान पाकिस्तान नहीं बनता। पाकिस्तान बना कर आवाम को ऐसा जहर पिलाया, जिसका असर आजादी के बाद की चार पीढियों भोग रही है। हमारी यह विशेषता है कि हम हर बिमारी को स्थायी बनाते हैं, ताकि हम इसी बहाने राजसुख भोगते रहें।
समाज को बांटने में कोई हमारा मुकाबला नहीं कर सकता। हमने धर्म, जाति और समुदाय के आधार पर समाज को बांटा। हमने वोट पाने के लिए भारतीय नागरिक के आगे कभी भारतीय पहचान को महत्व नहीं दिया, वरन उसे सदैव हिन्दु-मुसलमान, स्वर्ण-दलित, अगड़ा-पिछड़ा कह कर संबोधित किया।
राजनीति में विचार, आदर्श, सिद्धान्त आदि बेमतलब के शब्दों से हमे परहेज है। झूठ, फरेब, छल, कपट और साम, दाम, दंड, भेद याने सारे उचित और अनुचित तरीके अपना कर किसी भी तरह सत्ता पर कब्जा करों, यही हमारी विचारधारा रही है। हमारी पार्टी और नेता इस विधा में प्रवीण है। अब सिद्धान्तवादी, आदर्शवादी और गांधीवादी नेताओं का हमारी पार्टी में कोई स्थान नहीं है। जो ज्यादा झूठ बोल सकता है। बात का बतंगड़ बना सकता है। धन का जुगाड़ कर सकता है। हमारे नेता के पीछे ढाल कर बन कर खड़ा रहता है। उन पर किये गये प्रहारों का कड़ जवाब देने की क्षमता रखता है, वही नेता कसौटी पर ज्यादा खरा उतरता है।
हम देश की न तो चिंता करते हैं और न ही चिंतन करते हैं। हमारे अपने कोई विचार ही नहीं है। क्योंकि आज की राजनीतिक परिसिथतियों में इसकी आवश्यकता भी नहीं है। भाषण लिखने वाले भाषण लिख देते हैं और हम पढ़ लेते हैं। कभी हमारा चेहरा सपाट रहता था, शब्दों के जबान से निकलने पर चेहरे पर भाव नहीं उभरते थे, परन्तु आजकल विपक्ष का नाम ले कर क्रोध और तिरस्कार का भाव चेहरे पर अवश्य उभरता है। हमारे मन में यह भाव है कि भारत की जनता मूर्ख और भोली है, उन्हें जो कुछ, जिस तरह कहा जायेगा, मान लेगी।
हमने देश का विकास किया है। विकास कर रहे हैं। विपक्ष देश का विकास नहीं चाहता। विकास की राह में रोड़े अटकाता है। हमारी विकास की नीतियों का ही परिणाम है कि भारत, संसार का निर्धनतम देश माना जाता है। दुनियां में सर्वाधिक गरीब भारत में रहते हैं। हमने भ्रष्ट आचरण को आत्मसात किया। भ्रष्टाचार को पल्लवित व पोषित किया, जिससे वह आज दुनिया का भष्टतम राष्ट्र कहलाता है। ऐसी मान्यता मिलने पर हमे कभी शर्म महसूस नहीं होती, वरन गर्व होता है।
यह हमारी ढुलमुल गृहनीति का ही परिणाम हैं कि भारत आतंकवादियों का अभयारण्य बना हुआ है। भारत में दहशदगर्दियों को जब चाहे बम विस्फोट करने की छूट हैं। दुनियां में सर्वाधिक निर्दोष और बेकसूर नागरिक भारत में ही मारे गये हैं। जब तक हम सत्ता में रहेंगे यह सिलसिला रुकेगा नहीं।
अंत में हमारी भारतीय नागरिकों से यही गुजारिश है कि चाहे हमने देश को गरीबी, बेरोजगारी, भूखमरी, दहशदगर्दी और भ्रष्ट कुशासन दिया हों। इस देश को बरबाद और तबाह करने की कोई कसर बाकी नहीं रखी हों। किन्तु फिर भी आप हमे ही वोट देतें रहें, क्योंकि सत्ता पाने का अधिकार हमे ही है, हम यह अधिकार विपक्ष को नहीं लेने देंगे। चाहें हम कैसे भी हो, इस देष पर षासन हम ही करेंगे।