Sunday, 6 March 2016

शिवत्व

संसार सुख और दुख, दोनों का मिला-जुला रूप है। कोई इसे अपनी सोच से सुखदाई बनाता है तो कोई दुखदाई। सच देखा जाए तो दोनों स्थितियां सिक्के के चित-पट की तरह है। सिक्के को किसी तरह रखा जाए, उसकी कीमत नहीं घटती। इसी तरह जीवन को भी लेना चाहिए। हमारे आध्यात्मिक ग्रंथों में शिव को बहुत सरल देवता के रूप में दर्शाया गया है। लोकहित के लिए समुद्रमंथन के वक्त वे खुद आगे बढ़कर विष पीते हैं। जब व्यक्ति सहजता से विसंगतियों के जहर को आत्मसात करता है तो उससे भयाक्रांत नहीं होता और जब विपरीत हालात को सच में जहर मान लेता है तो वह घबरा जाता है। विपरीतता प्राय: असफलता, धोखा आदि से आती है। यदि कोई छल-छद्म करे, अप्रिय स्थिति उत्पन्न करे और उसे जहर की तरह पीने की स्थिति बन जाए तब उस जहर को भगवान शंकर की तरह कंठ में ही रोक लेना चाहिए। यदि जहर हृदय में उतरा तो मन क्षुब्ध होगा, बदला लेने का भाव जाग्रत होगा, जिसका अंततोगत्वा नुकसान उसी का होगा। इतने बड़े त्याग के बावजूद भगवान शंकर सिर्फ एक लोटा जल चढ़ाने से प्रसन्न हो जाते हैं। जीवन में जो भी प्राप्त हो रहा है, वह मनुष्य के प्रयत्न का परिणाम है। इससे संतुष्ट होने की आदत डालनी चाहिए।
भगवान शिव की स्तुति करते समय हमारे ऋषियों ने लिखा है कि काले पत्थर को स्याही, समुद्र को दवात, कल्पद्रुम को लेखनी और पूरी पृथ्वी को कागज बनाकर साक्षात् माता सरस्वती उनकी महिमा लिखें तब भी भगवान की महिमा नहीं लिखी जा सकेगी। इसके निहितार्थ पर ध्यान देना होगा कि हमें भी जिंदगी की विसंगतियों को काले पत्थर की स्याही, सकारात्मक चिंतनधारा को समुद्र की तरह दवात, दृढ़ संकल्पों को कल्पद्रुम की लेखनी, जीवनपथ को धरती की तरह कागज बनाकर बुद्धि रूपी सरस्वती भी महाकाल की व्याख्या करें तो जीवन में आनंद के इतने अवसर हैं कि उनकी व्याख्या नहीं हो सकती। इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए कि जब व्यक्ति नकारात्मक जीवन जीता है, तो अज्ञात भय चुपके से उसके जीवन में प्रवेश कर जाता है और यह भय मन को कमजोर करने के साथ शरीर के अवयवों को क्षतिग्रस्त करता है।

असली शिक्षा



आखिर शिक्षा हम क्यों प्राप्त करते हैं? शिक्षा प्राप्त करने का हमारा उद्देश्य क्या है? हम विद्यालयों या विश्वविद्यालयों में जाकर क्यों पढ़ते हैं? क्यों अपने जीवन के महत्वपूर्ण सालों को विश्वविद्यालय की चहारदीवारी में कुर्बान करते हैं? ऐसा इसलिए, क्योंकि हम अपने शेष जीवन में फूल खिलाना चाहते हैं। हम अपने जीवन-उद्यान को सुरभित और आनंदित करना चाहते हैं और अपनी भावी पीढ़ी को भी उसी सुगंध में सराबोर करना चाहते हैं। इसलिए हमें इस बात की खोज करनी चाहिए कि वह कौन-सी शिक्षा है जो हमारे जीवन को सफलताओं से भर सकती है और हमारी जीवन-बगिया को सुरभित और पुष्पित कर सकती है। क्या हमारी वर्तमान शिक्षा वैसी है, क्या वह हमारी आशाओं और अपेक्षाओं की कसौटी पर खरी उतरती है? यदि नहीं तो उसके स्थान पर किसी दूसरी शिक्षा पद्धति की बात हमें अवश्य सोचनी चाहिए। ऐसा इसलिए, क्योंकि शिक्षा का अर्थ ही होता है-प्रकाश, सफलता और उत्कृष्टता। तभी तो हमारे मनीषियों ने 'तमसो मा ज्योतिर्गमयÓ की परिकल्पना की थी, जो आज के परिवेश में कहीं भी साकार होती हुई नहीं दिखती। शिक्षा का संबंध ज्ञान से और ज्ञान का संबंध हमारे विवेक से है। ये तीनों शब्द सदैव एक ही पंक्ति में खड़े प्रतीत होते हैं।

आज हम लोगों ने शिक्षा को केवल विषयों से जोड़ दिया है। अब आप ही बताएं कि किसी एक विषय का स्नातक व्यक्ति भला शिक्षाविद् कैसे हो सकता है। शिक्षाविद् तो वह व्यक्ति कहलाएगा जिसे जीवनोपयोगी तमाम विद्याओं की समझ हो, क्योंकि शिक्षा का अर्थ कभी भी भौतिकी, रसायन, हिंदी, अंगे्रजी व गणित की पुस्तकों का पढऩा मात्र नहीं होता। ये तो सिर्फ विषय हैं, न कि संपूर्ण शिक्षा। इस दृष्टि से हम उस शिक्षा को अपने जीवन में उतारें जिससे तमाम विषयों और व्यवहारों का एक सुंदर स्वरूप तैयार हो सके। आत्म-ज्ञान एक ऐसी शिक्षा है, जिससे आप अपने आंतरिक व्यक्तित्व के बारे में जान सकते हैं। आपको शायद यह मालूम है कि आपके आंतरिक व्यक्तित्व में ऊर्जा का अक्षय भंडार निहित है। सद्गुरु के सानिध्य में रहकर आत्म-ज्ञान रूपी शिक्षा प्राप्त की जा सकती है। ध्यान (मेडिटेशन) के निरंतर अभ्यास से भी आप आत्मज्ञान को उपलब्ध हो सकते हैं।

Saturday, 5 March 2016

बंधन और मोक्ष

हमारे जीवन में दो मार्ग हैं, एक बंधन का मार्ग और दूसरा मोक्ष का मार्ग। ज्यादातर लोग यह समझते हैं कि मृत्यु के बाद जब शरीर रूपी बंधन से मुक्ति मिलती है तब मोक्ष मिलता है, लेकिन सच्चाई यही है कि मनुष्य जीवित रहते हुए मोक्ष प्राप्त कर सकता है। महाभारत में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, 'कर्म करते हुए और उन कर्मों को मन से परमसत्ता को अर्पण करते हुए यदि कोई पुरुषार्थ करता है, तो वह इसी जीवन में मोक्ष पा लेता है। दरअसल, कर्म करते हुए व्यक्ति को अनेक बंधनों को काटना पड़ता है, जिनमें लोभ, मोह व अहंकार प्रमुख हैं। चूंकि बंधन हमेशा दुष्प्रवृत्तियों के ही होते हैं, इसलिए इनसे छुटकारा पा लेना ही मोक्ष है। यह दूरदर्शिता हमारे मन में बैठ जाए, तो मोक्ष का तत्वज्ञान समझते हुए हम जीवन को सफलता की चरम सीमा तक पहुंचा सकते हैं। हमें मानव जीवन मिला ही इसलिए है कि हर व्यक्ति इस परम पुरुषार्थ के लिए कर्म करे और परमतत्व की प्राप्ति के लिए इस प्रयोग को सार्थक बनाए। बंधन और मोक्ष में फर्क सिर्फ इतना है कि जब आसुरी संपदा हमारे पास बढ़ेगी, तो हम बंधन की ओर बढ़ेंगे, लेकिन जब दैवीय संपदा हमारे पास बढ़ेगी तो हम मोक्ष की तरफ बढ़ जाएंगे। बंधन का मकडज़ाल हमें जकड़े रहता है, लेकिन इससे छुटकारा पाना हर व्यक्ति के लिए जरूरी है, क्योंकि हर व्यक्ति के लिए मोक्ष जरूरी है। व्यक्ति जो कुछ भी करता है, उसमें क्रोध, मोह नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका निर्णय समाज हित में होना चाहिए। महाभारत का युद्ध हुआ, लेकिन इसके लिए श्रीकृष्ण ने पांडवों के मन में द्वेष नहीं, बल्कि अखंड भारत के कल्याण की भावना जगाई और एक संस्कारी राजा का आदर्श रखते हुए ईश्वर के लिए कर्म करने की भावना जगाकर युद्ध करने को कहा। शास्त्रों और पुराणों में कहा गया है कि आत्मा तब तक एक शरीर से दूसरे शरीर में भटकती रहती है, जब तक कि मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो जाती। इसलिए मोक्ष प्राप्ति के लिए किए जाने वाले कर्म को जीवन जीने की कला कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। मोक्ष प्राप्ति के लिए हमें अपनी वाणी पर संयम रखना चाहिए, सुनने व मनन की क्षमता को बढ़ाना चाहिए और निरंतर अध्ययन करते रहना चाहिए। स्पष्ट है कि मोक्ष जीते जी भी पाया जा सकता है।

Friday, 4 March 2016

जीवन का उद्देश्य

जीवन का उद्देश्य

क्या आपने कभी एकांत में यह सोचा कि आपको मानव जीवन क्यों मिला है? महाभारत में युधिष्ठिर के एक प्रश्न के उत्तर में भीष्म पितामह ने कहा, 'मनुष्य से बढ़कर कोई नहीं। मनुष्य जीवन इहलोक और परलोक की कड़ी है।' आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि चौरासी लाख योनियों के बाद हमें मनुष्य जीवन मिलता है और संसार के सभी प्राणियों में मनुष्य ही सबसे श्रेष्ठ है। इसकी वजह मनुष्य में सत्य व असत्य का विवेक कराने वाली बुद्धि का होना है, लेकिन इस धरती पर हम दुनियादारी के चक्र में ऐसे फंस जाते हैं कि हमारी बुद्धि सीमित दायरे में ही सिमट कर रह जाती है।

हम सांसारिक सुखों को ही सब कुछ मानकर उसमें लिप्त रहने में ही अपना सौभाग्य और अपने जीवन की सफलता समझते हैं। यही गलती हम कर जाते हैं, क्योंकि इसके बावजूद कोई भी व्यक्ति यह दावा नहीं करता है कि वह पूर्णतया सुखी है। सच्चाई यह है कि हमें सामान्य मानव जीवन के उद्देश्य की पूर्ति के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए। यह सच है कि अपने व अपने परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी हमारी है और हमें इसे हर हाल में निभाना चाहिए। क्या आपको यह मालूम है कि आप कहां से आए, आपको कितने दिनों या सालों तक इस जगत में रहना है और आपकी मंजिल क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर में ज्यादातर लोग यही कहेंगे, मालूम नहीं। ऐसे लोग बड़े अजीब मुसाफिर हैं।

वे यात्रा तो कर रहे हैं, पर यात्रा के संबंध में उन्हें कुछ भी पता नहीं। उन्होंने मानव जीवन पाया, लेकिन उन्हें अपने जीवन का लक्ष्य मालूम नहीं। हमारे-आपके जीवन का मतलब है, एक उद्देश्य खोज लेना और अपने भीतर शांत रहना। कहा गया है कि मनुष्य आनंदलोक का वासी है और आनंद के परमधाम तक पहुंचना ही उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य है, इसलिए मनुष्य को इस संसार की मृग मरीचिका से निकलकर भव्य जीवन की प्राप्ति के लिए साधना के मार्ग को अपनाकर अपने गंतव्य को पहचानना चाहिए और उसी में लीन होने के लिए साधनारत रहने का संकल्प लेना चाहिए। ऋग्वेद में कहा गया है कि जीवन पवित्र और श्रेष्ठ है। मनुष्य कर्मयोगी है। बस यह बात कर्मयोगी के हाथों में है कि वह अपने लिए किस लक्ष्य का चयन करता है।

हैरान करने वाला हलफनामा

हैरान करने वाला हलफनामा

अगर पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन, पूर्व केंद्रीय गृह सचिव जीके पिल्लई और गृह मंत्रालय में उनके सहयोगी रहे आरवीएस मणि इशरत जहां मामले में सच्चाई बयान कर रहे हैं तो फिर इस बारे में कोई संदेह नहीं रह जाता कि पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री के तौर पर पी चिदंबरम ने क्षुद्रता की सारी सीमाएं पार कर दी थीं। देश ने तमाम भ्रष्ट और आपराधिक प्रवृत्ति के नेता देखे हैं, लेकिन चिदंबरम का कृत्य तो हिंदी फिल्मों के शातिर खलनायकोंं के देश विरोधी काल्पनिक कृत्यों को भी मात देने वाला दिखता है। उन्होंने एक तरह से लश्कर के स्वार्थों की पूर्ति की और इस पर हैरत नहीं कि इन दिनों पाकिस्तान में सोशल मीडिया में उनके प्रति सहानुभूति उमड़ रही है। इशरत मामले में डेविड हेडली की गवाही का भी उल्लेख किया जा सकता है, लेकिन यदि उसके बयान को संदिग्ध भी मान लिया जाए तो भी कोई नारायणन, पिल्लई और मणि के बयानों की अनदेखी कैसे कर सकता है? चिदंबरम के बचाव में आगे आए कांग्रेसी नेता पिल्लई और मणि के बयानों पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन क्या वे एमके नारायणन को भी झूठा करार दे सकते हैं, जिन्होंने हेडली की गवाही के बाद हाल ही में अपने एक लेख में कहा है कि खुफिया एजेंसियों को अच्छी तरह पता था कि इशरत लश्कर की सदस्य थी और दुबई में रची गई उस साजिश का हिस्सा थी जिसे गुजरात में अंजाम दिया जाना था।

इशरत जहां अपने तीन साथियों के साथ 15 जून 2004 को अहमदाबाद में मारी गई थी। उसके साथ प्राणेश पिल्लई उर्फ जावेद गुलाम शेख, अमजद अली और जीशान जौहर भी मारे गए थे। इनमें अमजद और जीशान पाकिस्तानी थे। इस मुठभेड़ के कुछ दिनों बाद लश्कर के मुखपत्र समझे जाने वाले गजवा टाइम्स में 14 जुलाई 2004 को इशरत को शहीद करार देते हुए उसे शाबासी दी जाती है। तब तक इशरत का परिवार मुठभेड़ को फर्जी बताने के साथ यह साबित करने की कोशिश में जुट चुका था कि उनकी बेटी तो कॉलेज जाने वाली एक आम सी घरेलू लड़की थी, लेकिन वह यह नहीं बताता कि 12 जून को कथित तौर पर इंटरव्यू देने गई उनकी लड़की जब तीन दिन तक घर नहीं लौटी तो उन्होंने उसकी चिंता क्यों नहीं की? इशरत की मां ने पहले कहा कि उनकी बेटी जावेद को नहीं जानती थी, लेकिन बाद में कहा कि वह उसके यहां सेल्स गर्ल के तौर पर काम करती थी। जावेद के पिता का कहना था कि वह तो ट्रैवल एंजेंसी में काम करता था। कोई न तो इस सवाल का जवाब तलाशता है कि इशरत थाणे से अहमदाबाद कैसे पहुंची और न ही यह कि उसके साथ पाकिस्तानी नागरिक क्या कर रहे थे?

2 मई 2007 को गजवा टाइम्स के इंटरनेट संस्करण में यह एक भूल सुधार नजर आती है कि 2004 को इशरत के बारे में छपी खबर एक रिपोर्टर की गलती थी। तीन साल बाद 'भूल सुधारÓ का यह दुर्लभ मामला था। इस दुर्लभ मामले के कुछ ही दिनों बाद जावेद के पिता सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर अहमदाबाद मुठभेड़ की सीबीआइ जांच की मांग करते हैं। 2009 में संप्रग फिर सत्ता में आती है और 2008 में मुंबई में लश्कर के भीषण आतंकी हमले के बाद गृहमंत्री बनाए गए चिंदबरम पुन: गृहमंत्रालय संभालते हैं। इशरत मुठभेड़ मामले में गृह मंत्रालय 6 अगस्त 2009 को गुजरात उच्च न्यायालय में 14 पेज का एक हलफनामा दायर करता है। हलफनामे में विस्तार से बताया जाता है कि इशरत लश्कर की आतंकी थी। यह हलफनामा आरवीएस मणि ने ही दाखिल किया था। इसके बाद 30 सितंबर 2009 को पहले वाला हलफनामा वापस लेकर दूसरा दाखिल किया जाता है और वह पहले वाले के बिल्कुल उलट होता है। जीके पिल्लई की मानें तो दूसरा हलफनामा चिदंबरम ने लिखवाया था और चूंकि यह काम खुद मंत्री महोदय ने किया इसलिए शेष अफसर कोई विरोध-प्रतिरोध नहीं कर सके। अगर यह आरोप सही है तो चिदंबरम ने वही काम किया जो गजवा टाइम्स ने किया। जिस तरह लश्कर नहीं चाहता था कि इशरत को उसके सदस्य के तौर पर जाना जाए उसी तरह सितंबर 2009 में हमारे तत्कालीन गृहमंत्री भी नहीं चाह रहे थे कि इशरत लश्कर की आतंकी के रूप में जानी जाए। चिदंबरम ने किसके मन की मुराद पूरी की? उसी लश्कर के मन की जिसने जैशे मोहम्मद के साथ मिलकर संसद पर हमला कराया और जिसने आइएसआइ की सहायता से मुंबई में हमला किया। चिदंबरम के हलफनामा बदलने से कौन खुश हुआ होगा? जाहिर है हाफिज सईद एंड कंपनी।

चिदंबरम पर जैसे आरोप लगे हैं वे यह भी कहते हैं कि उन्होंने केवल ऐसा हलफनामा ही तैयार नहीं किया जिससे लश्कर खुश हुआ होगा, बल्कि अहमदाबाद मुठभेड़ की जांच में गुजरात पुलिस के अफसरों और उनके जरिये अमित शाह और नरेंद्र मोदी को फंसाने के लिए सीबीआइ के विशेष जांच दल को इंटेलीजेंस ब्यूरो के उन अधिकारियों के पीछे भी लगा दिया जिन्होंने इशरत और उसके साथियों की खुफिया सूचना गुजरात पुलिस को दी थी। आइबी के ऐसे ही एक अफसर राजेंद्र कुमार की मानें तो चिदंबरम ने यह काम गुजरात के एक बड़े कांगे्रसी नेता के साथ मिलकर किया। यह अहमद पटेल के अलावा और कोई नहीं हो सकते। अहमद पटेल कांगे्रस के बड़े नेता इसलिए माने जाते हैं, क्योंकि वह सोनिया गांधी के करीबी हैं। अच्छा होता कि जीके पिल्लई 2009 में ही थोड़ा साहस दिखाते और उसी वक्त चिदंबरम के देश विरोधी कृत्य का भंडाफोड़ करते। अगर उन्होंने उस समय साहस नहीं दिखाया तो इसका यह मतलब नहीं कि उनकी बातों पर भरोसा न किया जाए। पता नहीं चिदंबरम का क्या होगा, लेकिन इससे ज्यादा लज्जाजनक और कुछ नहीं कि उनके रूप में हमारे पास एक ऐसा गृहमंत्री था जो राजनीतिक प्रतिशोधवश देश के शत्रुओं के हित साध रहा था। चिदंबरम एक बड़े वकील भी हैं। वह अच्छे से जानते होंगे कि इशरत मामले में उनका खुद का कृत्य राजद्रोह की श्रेणी में आता है नहीं?

Wednesday, 2 March 2016

कांग्रेस सुप्रीमों की नीति और नीयत संदेह के घेरे में

कांग्रेस सुप्रीमों की नीति और नीयत संदेह के घेरे में
जेएनयू घटनाक्रम विवाद नहीं, राष्ट्र की एकता, अखंड़ता और सम्प्रभुंता को दी गर्इ बेबाक खुली चुनौती है, जो राजद्रोह है, जिसे अक्षम्य अपराध की श्रेणी में रखा जाता है। लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में सत्ता छीनी नहीं जाती, वरन बेलेट की ताकत से उस पर अधिकार किया जाता है। भारतीय लोकतंत्र में प्रभावी हुए नकली राजनेता जो बेलेट से हार गये, किन्तु देश के दुश्मनों से मिल कर बुलेट की ताकत से जनता की सरकार को गिराने का ख्वाब संजो रहे हैं। भारत में इन दिनों सियासी षड़यंत्रों का दौर चल रहा है। सत्ता खोने की पीड़ा से छटपटाते हुए जो राजनेता प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से राजद्रोह के समर्थन में खड़े हैं, वे राजधर्म भूल गये हैं। धनबल से इन्होंने मुट्ठी भर युवाओं को राजद्रोह के लिए मोहरा बना रखा है, किन्तु स्वयं पर्दे के पीछे खड़े रह कर एक दुखद नाटक को निर्देशित कर रहे हैं।
जेएनयू प्रकरण में कांग्रेस सुप्रीमों की संदिग्ध भूमिका इस बात को प्रमाणित करती है कि वे शतप्रतिशत विदेशी है और उनके मन में देशभक्ति का लेश मात्र भी भाव नहीं है। वे किसी भी तरह सियासी षड़यंत्रों के जरिये अपने मंदबुद्धि पुत्र को सत्ता के शीर्ष पर बिठाना चाहती है। शासन पर नियंत्रण कर भारत के प्राकृतिक संसाधनों को लुटना चाहती है। चाटुकारिता में निष्णात उनके स्वामी भक्तों के लिए मालकिन की आज्ञा शिरोधार्य है। उनका ज़मीर मर चुका है। वे अपना स्वाभिमान खो चुके हैं। मालकिन के आदेश को पत्थर की लकीर मान कर उसका अनुशरण करते हैं। कांग्रेसी एक परिवार के सरोवर की मछलिया है और जब भी सरोवर का पानी सूखने लगता है, वे सत्ता के लिए तड़फने लगते हैं।
जेएनयू प्रकरण ने कांग्रेस सुप्रीमों के चरित्र को तार तार कर दिया है। यह भी साबित कर दिया है कि कांग्रसियों के लिए सत्ता पहले है, राष्ट्र बाद में। देश को आज़ाद कराने का दावा करने वाली पार्टी सत्ता पाने के लिए भारत विरोधी ताकतों के साथ मिल कर राष्ट्र की सम्प्रभुता का सौदा कर रही है। यह घिनौना सच है, जिसे जानने के बाद भारत का हर राष्ट्र भक्त नागरिक कांग्रेसी नेताओं, विशेषकर उनकी सुप्रीमों के संदिग्ध चरित्र को संदेह की दृष्टि से देख रहा है। इस तथ्य की पुष्टि के लिए निम्न तथ्य पर्याप्त है:-
एक: जेनएनयू में जो कुछ हुआ उसे देख कर और सुन कर प्रत्येक भारतीय नागरिक शर्मसार हुआ। ऐसे समय में जब भारत का हर नागरिक क्षुब्ध था। उद्वेलित था। देशद्रोही तत्वों के विरुद्ध सख्त कार्यवाही करने के लिए सरकार से गुहार कर रहा था, तब कांग्रेस सुप्रीमों ने अपने पुत्र को सरकार की कार्यवाही का विरोध करने और देशद्रोही तत्वों का पक्ष लेने के लिए जेएनयू परिसर में क्यों भेजा ? कांग्रेसी प्रवक्ताओं को क्यों सरकार की कार्यवाही के विरुद्ध भड़ास निकालने का निर्देश दिया ? क्या राजद्रोह के पक्ष में तर्क देना कांग्रेसियों के लिए जरुरी था ? अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब यह नहीं है कि भारत को तोड़ने का संकल्प लेने वाले तत्वों के पक्ष में जा कर खड़े हो जाये ! आखिर कांग्रेस सुप्रीमों वामपंथियों, आतंकी आकाओं और केजरीवाल जैसे नेताओं के साथ मिल कर किस प्रकार के सियासी षड़यंत्र को अंजाम देना चाहती है ? क्या ऐसा करने से नरेन्द्र मोदी को सत्ता से हटाने में सफल हो जायेगी ?
दो: अफजल गुरु भारतीय संसद को बम से उड़ाने और सांसदों को मारने के अपराधिक षड़यंत्र का मुख्य रणनीतिकार था। इस शख्स ने अपना अपराध टीवी के पर्दे पर आ कर पूरे देश के सामने स्वीकार किया था। न्यायालय ने सारे प्रमाणों को जानने के बाद उसे फांसी की सजा सुनार्इ थी। ऐसे अपराधी की फांसी कांग्रेस सुप्रीमों आठ साल ताक क्यों टालती रही ? फिर सियासी लाभ के लिए क्यों भयभीत हो कर चुपचाप फांसी दे दी? अब जब ऐसेा लग रहा है कि अफजल गुरु की फांसी से उसे वोटों को नुकसान हो रहा है, तो क्यों कांग्रेसी नेता अफजल की फांसी को एक भूल बता रहे हैं ? कांग्रेस सुप्रीमों के आदेश से क्यों चिदम्बरम न्यायालय के निर्णय को गलत ठहरा रहे हैं ? राष्ट्र सवाल पूछ रहा है- ‘देशद्रोहियों को हीरो बताने वालों के पक्ष में खड़े हो कर कांग्रेसी आखिर पाना क्या चाहते हैं ?’
तीन: इशरत जहां आतंकी थी। उसे नरेन्द्र मोदी का वध करने के उद्धेश्य से अहमदाबाद भेजा गया था। गुजरात पुलिस ने उसे एक मुठभेड़ में मारा था। जब एक आंतकी के साथ पुलिस की मुठभेड़ होती है, उसे फर्जी कैसे कहा जा सकता है ? वर्षों तक कांग्रेस सुप्रीमों मुठभेड़ को फर्जी बताते हुए न्यायालय में और न्यायालय के बाहर अल्पसंख्यक समुदाय की सहानुभुति अर्जित करने] पाकिस्तानी आतंकी संगठनों को खुश करने के लिए इशरत जहां को मासूम महिला बता कर क्यों नरेन्द्र मोदी को घेरती रही ? यहां तक कि लोकसभा चुनावों के ठीक पहले इशरत जहां की हत्या के मामले को जोर-शोर से उठाया था और नरेन्द्र मोदी को मुस्लिम महिला की हत्या का दोषी बताने का प्रयास किया था। अब जब यह तथ्य सामने आ गया है कि भारत के गृहमंत्रालय के पास इस बात की जानकारी थी कि इशरत जहां आतंकी थी, फिर जानबूझ कर कांग्रेस सुप्रीमों के इशारे पर कांग्रसियों ने इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ के मामले को इतना जोर-शोर से क्यों उछाला ? क्या कांग्रेस सुप्रीमों के लिए अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी से निपटने के लिए आतंकवादियों को हीरो बनाना जरुरी था ?
चार: बम्बर्इ के ताज होटल में हुर्इ आतंकी कार्यवाही के बाद दिग्विजय सिंह का बेतुका बयान आया था, जिसमें उन्होंने इस आतंकी प्रकरण को भगवा आतंकवाद से जोड़ कर शहीद पुलिसकर्मी को आरएसएस का एजेंट बताया था। इस बेतुके बयान पर कांग्रेस सुप्रीमों चुप क्यों रही ? इस बयान पर उन्होंने दिग्विजय सिंह को फटकार क्यों नहीं लगार्इ ? क्या इसका सीधा अर्थ यह नहीं निकलता कि कांग्रेस सुप्रीमों के आदेश से ही दिग्विजय सिंह ने ऐसा बयान दिया था ? इसी तरह बाटला हाऊस आतंकी घटना में आतंकियों के मारे जाने पर वे दुखी हो कर बहुत रोर्इ थी। इस बयान को उन्होंने खंड़न क्यों नहीं किया ? शहीद पुलिसकर्मी के प्रति सहानुभूति क्यों नहीं प्रकट की ?
निश्चय ही कांगेस सुप्रीमों अपने विरोधियों से निपटने के लिए आतंकी संगठनों से मदद ले रही है। यदि ऐसा नहीं है तो उनके दस साल के शासनकाल में पूरा देश आतंकियों के लिए खुला अभयारण्य क्यों बन गया ? पूरे देश में स्लीपर सेल का जाल बिछ गया \ यूपीए सरकार ने इस जाल को क्षत-विक्षत करने का संकल्प क्यों नहीं दोहराया ?
कांग्रेस सुप्रीमों के इशारे पर आज संसद को उडाने वालों का पक्ष लेने वाले जानबूझ कर संसद सत्रों को हंगामें की भेंट चढ़ा रहे हैं। यह इस बात को साबित करती हैं कि कांग्रस सुप्रीमों की भारतीय संसदीय व्यवस्था में आस्था नहीं है। इसे वे अपने घृणित मकसद के लिए इस्तेमाल करना चाहती है। उनके इस दुष्कृत्य पर मीडिया मौन है। भारत के बुद्धिजीवी कुछ भी लिखने बोलने से सकुचा रहे हैं। किन्तु भारत की जनता यदि देशद्रोही शख्सियत के विरुद्ध विद्रोही हो जायेगी तब भारत की राजनीति से उनका निष्कासन सम्भव हो पायेगा।