Tuesday, 1 December 2015

भारतीय लोकतंत्र पर मंड़राती राहुल-केजरीवाल की अशुभ छाया

भारतीय राजनीति में राहुल और केजरीवाल ऐसी दो शख्सियतों का प्रभाव बढ़ रहा है, जिन्हें सिद्धान्तों, आदर्शों और राजनीतिक विचारधारा से कोर्इ लेना देना नहीं हैं। इनकी देशभक्ति भी संदिग्ध है। ये निरर्थक विवादों को जन्म देते हैं। प्रचार माध्यमों का सहारा लें, उन्हें हवा देते हैं और उससे राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश करते हैं।  राजनीतिक षड़यंत्रों के जरिये एक लोकतांत्रिक सरकार के कामों में जानबूझ कर व्यवधान उपस्थित कर रहे हैं। दोनों व्यक्ति सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने के लिए मचल रहे है। राहुल के पास तो एक पार्टी का केडर है, जिसकी जड़े पूरे भारत में हैं, किन्तु केजरीवाल के पास तो भाड़े पर रखे हुए कुछ ही लोग हीं बचे हैं, जो अपनी कुटिल बुद्धि और धूर्तता से भारतीय लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को अपने रंग में रंगना चाहते हैं।
यह अजीब विडम्बना है कि कांग्रेस के निर्लज्ज और बेबाक भ्रष्टााचार के विवरुद्ध किये गये जन आंदोलन से केजरीवाल का राजनीतिक जीवन प्रारम्भ हुआ,  किन्तु उसी कांग्रेस के सहयोग से वे मुख्यमंत्री बन गये। राहुल-केजरीवाल के किसी गुप्त षड़यंत्र के कारण ही केजरीवाल मुख्यमंत्री  पद छोड़, बनारस में नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध चुनाव लड़ने बनारस चले गये। पर्दे के पीछे की गर्इ किसी गुप्त संधि से  ही उन्हें दिल्ली विधानसभा में रिकार्ड़ तोड़ बहुमत मिला, क्योंकि राहुल गांधी  ने जानबूझ कर अपना वोट बैंक तश्तरी में रख कर केजरीवाल को भेंट कर दिया था। निश्चित रुप से भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए दिल्ली विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस ने आत्महत्या की थी, जिसे स्वस्थ लोकतांत्रिक परम्परा नहीं कह सकते। अपने को मिटा कर भाजपा को रोकना कहां तक उचित हैं, इसका मर्म तो राहुल गांधी ही समझा सकते हैं।
केजरीवाल ने चुनाव जीतने के लिए सारे अनैतिक आचरण अपनाएं। मसलन पाकिस्तान में बैठे एक डॉन से उन्होंने सहयोग और धन लिया। उन्हें मुस्लिम समुदाय के शतपतिशत वोट दिलाने के लिए पूरे देश से लोग प्रचार करने आये। जनता को लुभाने के लिए उन्होंने असम्भव वादे किये। सारे आदर्शों और सिद्धान्तों को ताक में रख कर संदिग्ध व्यक्तियों को उम्मीदावार बनाया। वस्तुत: केजरीवाल को भारतीय राजनीति में स्थापित करने का सारा श्रेय भाजपा को जाता है, क्योंकि सरकार के पास सारे प्रशासनिक अधिकार होते हुए भी वह केजरीवाल की देशद्रोही गतिविधियों पर नज़र नहीं रख पार्इ। केजरीवाल और डॉन के प्रगाढ़ रिश्तों को साबित नहीं कर पायी । सरकार यह सच भी नहीं जान पार्इ कि केजरीवाल, जो विध्वंसात्मक राजनीति कर रहे है, उसके पीछे डॉन की मोदी सरकार के विरुद्ध रची जा रही कोर्इ व्यूह रचना तो नहीं है। ऐसा संदेह इसलिए होता है, क्योंकि कर्इ प्रदेशों में विरोधी दलों की सरकारें हैं, परन्तु किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री केन्द्र सरकार के विरुद्ध इतना मुखर नहीं है, जितना अरविंद केजरीवाल है। शासन का अधिकार मिलने के प्रत्येक मुख्यमंत्री अपने प्रशासनिक कार्यों से जनता का दिल जीततना चाहता है, ताकि जनता उसे दुबारा जनादेश दें, किन्तु केजरीवाल के मन में ऐसा कुछ है ही नहीं। मुख्यमंत्री बनते ही केजरीवाल ने संवैधानिक संस्थाओं और केन्द्र सरकार के विरुद्ध घोषित युद्ध छेड़ रखा है।
अरविंद केजरीवाल की नीयत पर इसलिए संदेह होता है, क्योंकि गुजरात में जो पटेल आरक्षण का कार्ड़ खेला गया है, उसके पीछे भी केजरीवाल की कुटिल बुद्धि और किन्हीं अज्ञात स्त्रोंतों से इस आंदोलन को फैलाने के लिए उडेला गया धन है। बिहार चुनावों में भाजपा को हराने के लिए केजरीवाल ने लालू और नीतीश का पूरा समर्थन किया था। वे ही अज्ञात स्त्रोत जिन्होंनें केजरीवाल की मदद की थी, उन्होने बिहार चुनाव में भी धन से और प्रचार माध्यमों से महागठबंधन की मदद की है।  महागठबंधन को एक करोड़ साठ लाख वोट मिले थे और भाजपा गठबंधन को एक करोड़  करोड़ तीस लाख। महागठबंधन को मुस्लिम समुदाय के शतप्रतिशत वोट मिले हैं, जो  दिल्ली की तरह बिहार में भी भाजपा की करारी हार का मुख्य कारण है। दादरी कांड़ को अतिरंजित रुप से हर मुस्लिम मतदाता तक पहुंचाने का प्रभावी कार्य केजरीवाल ने किया। यह बात अब भी रहस्य है कि भ्रष्ट लालू के गठबंधन को जीताने के लिए केजरीवाल ने इतना उत्साह क्यों दिखाया ? क्या किसी आका के साथ की गर्इ अपवित्र संधि का तो यह परिणाम नहीं है। केन्द्र सरकार अपनी प्रशासनिक ताकत से केजरीवाल की संदिग्ध गतिविधियों को नहीं भांप पार्इ, जिससे इस व्यक्ति के होंसले बहुत बुलंद है।
पंजाब में राहुल, केजरीवाल और पाकिस्तान मिल कर जो खेल खेल रहे हैं, उस खतरनाक खेल पर भाजपा की आत्ममुग्धता अंकुश नहीं लगा पा रही है।  बादल सरकार की दुर्बलता का लाभ यह त्रिगुट उठा रहा है और भाजपा तमाशबीन दर्शक की तरह तमाशा देख रही है। देशहित में विध्वंसकारी राजनीति को रोकना भाजपा का कर्तव्य और धर्म दोनों है, जिसे उसे गम्भीरता से लेना होगा।
केजरीवाल और राहुल दोनो विध्वंसात्मक शैली की राजनीति करते हैं, जो लोकतंत्र के लिए अशुभ संकेत है। सहिष्णुता राहुल द्वारा तैयार किया गया एक प्रायोजित कार्यक्रम है, जिसकी सफल परणिति  बिहार चुनाव में भाजपा के पराजय के साथ हुर्इ है। राहुल अब इसी मुद्धे को उठा कर संसद की कार्यवाही बाधित करना चाहते हैं। उन्हें इस बात की जरा भी चिंता नहीं है कि एक झूठे मामले को बहुत ज्यादा तुल देने से उनकी पार्टी बहुसंख्यक समाज के वोटो की मोहताज हो जायेगी, जो उसके लिए बहुत घातक होगा। परन्तु जिस व्यक्ति के स्वभाव में छिछोरापन हो, राजनीतिक समझ का अभाव हो, वो राजनीतिक षड़यंत्रों से ही राजनीतिक लाभ उठाना चाहता हो,  ऐसे लोगों की  बुद्धि पर तरस आता है। क्योंकि राहुल को इस बात का जरा सा भी अहसास नहीं है कि षड़यंत्र हमेशा सफल नहीं होते। जनता का विश्वास जीतने के लिए सभी समुदाय के हितों की बात सोचनी रहती है।  केवल एक ही समुदाय के वोट बटोरने के लिए निरन्तर षड़यंत्र रचने से पासा पलट भी सकता है।
भारतीय राजनीति में अरविंद केजरीवाल का जन्म एक अभिशाप है। इस अभिशाप से मुक्ति मिल जाती यदि भाजपा दिल्ली का चुनाव जीतने के लिए सफल रणनीति बनाती और केजरीवाल के पाकिस्तान प्रेम का सच जान पाती।  राहुल के विदेशी खातों को खंगालने में सरकार सक्रियता दिखाती तो अब तक राहुल की बोलती बंद हो जाती। संसद का सत्र छोड़ कर सोनिया गांधी विदेश भागी है, इसका रहस्य भी सरकार यदि जान लें, तो असिहष्णुता के विरुद्ध छेड़ा गया प्रायोजित युद्ध समाप्त हो जायेगा। मोदी सरकार के पास प्रशासनिक अधिकार है, जिसके जरिये भारतीय लोकतंत्र को केजरीवाल और राहुल गांधी की अशुभ छाया से मुक्ति दिला सकती है। यदि सरकार इनके प्रति सहिष्णु बनी रही, तो इन दोनों की ताकत बढ़ती जायेगी, जिसके अशुभ परिणाम पूरे राष्ट्र को भोगने पड़ेंगे।

Wednesday, 23 September 2015

राहुल चिंतन नहीं करते, चिंतन का ढोग करते हैं

चिंतन- मनन से व्यक्ति को अपनी दुर्बलताओं का अहसास होता हैं। जो गलतियां हुर्इ है, उन्हें सुधारने की प्रेरणा मिलती है। चिंतन से विचारों में गम्भीरता झलकती है। चिंतक की वाणी ओजपूर्ण हो जाती है, जिससे भाव अभिव्यक्ति में कर्कशता नहीं होती, तार्किकता और माधुर्य होता है, जो जनमानस को मंत्रमुग्ध कर उसे मोहित कर देता है। राहुल के व्यक्तित्व में इन सभी गुणों का क्षणांस भी नहीं हैं। राहुल न चिंतन करते हैं, न चिंतक है, कांग्रेस पार्टी को उनका व्यक्तित्व काफी बोझिल लग रहा है और कांग्रेसी जन पार्टी के दुखद भविष्य को ले कर चिंतित है।
हकीकत यह है कि राहुल ने कभी देश की समस्याओं के बारें में चितन नहीं किया। उनका भारत के इतिहास  और संस्कृति के बारें में ज्ञान शून्य है। उन्होंने कभी भारतीय संविधान, भारत की राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक परिस्थितियों का अध्ययन नहीं किया। गरीबों और मजदूरों की समस्याओं का उन्हें ज्ञान नहीं है। दरअसल  उनका अपना कोर्इ निज विचार  है ही नहीं। भारत के संबंध में वे क्या सोचते हैं और उनका क्या चिंतन है, न तो उन्होंने किसी लेख में लिपिबद्ध किया और न ही किसी भाषण में अभिव्यक्त किया।  चिंतन और चिंता से वे कोसो दूर है। चिंतन शब्द उन्हें उनके अनन्य भक्तों ने भेंट किया है। भक्त ही कहते हैं कि वे विदेश से देश के लिए चिंतन करते हुए लौटें हैं।  चिंतन के बाद वे आक्रामक हुए है। उनके भक्तों के प्रचार प्रपोगंड़े को ही भारतीय समाचार मीडिया प्रचारित करता रहता है।
राहुल विदेशों में अय्याशी करने जाते हैं, चिंतन करने नहीं। चिंतन तो घर के किसी कोने में एकांत में बैठ कर भी किया जा सकता है, उसके लिए विदेश जाने की आवश्यकता नहीं रहती। विदेश से आ कर उन्होंने संसद में जो छिछोरा भाषण दिया और जिस तरह अपने सांसदों को उपद्रव करने के लिए उकसाया, उससे भारतीय लोकतंत्र की गरिमा नष्ट हुर्इ है। भारतीय संसद कलंकित हुर्इ है। भारतीय संसद का हाल जो कभी मूर्धन्य सांसदों के ओजपूर्ण, विचारोतेजक और सारगर्भित भाषण से गूंजा करता था, उसी संसद में राहुल ने बेतुका, बेहुदा, अतार्किक और मर्यादाहीन भाषण दिया, जो संसद के रिकार्ड़ में भी रखने के लिए उपयुक्त नहीं है, उस भाषण में उनके भक्तों को राहुल के चिंतन का प्रभाव दिखार्इ दे रहा है।  स्वामीभक्ति का इससे निकृष्टतम उदाहरण और हो भी क्या सकता है ?
राहुल के र्इर्द-गिर्द भी कोर्इ चिंतक नहीं है। जो भी उनके स्क्रीप्ट रार्इटर है, वे उनके व्यक्तित्व को और अधिक छिछोरा बना रहे हैं। सम्भवत: कांग्रेस के पतन का कारण भी गांधी परिवार के साये के साथ जुड़े हुए वे लोग हैं, जिनकी सलाह पर चल कर इस परिवार ने कांग्रेस पार्टी को गहरी क्षति पहुंचार्इ है। राहुल को नरेन्द्र मोदी के स्वच्छता अभियान का उपहास उड़ाना कहां जरुरी था ? क्या स्वच्छता के पीछे उन्हें कोर्इ उद्धेश्य छुपा नहीं दिखार्इ दे रहा है ? स्वच्छ भारत का नारा दे कर प्रधानमंत्री ने कौनसा पाप कर दिया ? इसी तरह योग को प्रोत्साहित करने का जो विश्वस्तरीय प्रयास नरेन्द्र मोदी ने किया है, उसकी सराहना दुनियां कर रही है, किन्तु ऐसे मिशन की आलोचना करना राहुल अपना परम कर्तव्य समझते हैं। मेक इन इंड़िया के नारे के पीछे का अर्थ समझे बिना राहुल ने कह दिया- टेक इंड़िया। यह कितनी ओछी ओर बेतुकी बात है। क्या नरेन्द्र मोदी ने बुलेट के बल पर सत्ता पर नियंत्रण किया है ? बेलेट से जीती हुर्इ जंग का मजाक उड़ा कर राहुल उन करोड़ो भारतीयों का अपमान नहीं कर रहे है, जिन्होंने नरेन्द्र मोदी के पक्ष में मतदान किया था ? राहुल इस बात को समझ क्यों नहीं पा रहे हैं कि  भारतीय जनता ने एक परिवार को सत्ता से बाहर कर साधारण परिवार से ऊपर उठे एक कर्मयोगी पर भरोसा कर सत्ता सौंपी है। यह लोकतंत्र की परिपक्कता की निशानी है, जो साबित करती है कि राहुल गांधी भारत के आम नागरिक से भी कम राजनीतिक सोच रखते हैं।
भूमिअधिग्रहण कानून संशोधन बिल पर पूरे देश में यह भ्रम फैलाया गया कि इस कानून के तहत मोदी सरकार किसानों की जमीन छीन कर पूंजीपत्तियों को देने जा रही है। सरकार इस बिल से पीछे हट गर्इ, क्योंकि पूरे देश में अनावश्यक भ्रम में डालना सही नहीं था। परन्तु कांग्रेस पार्टी इसके पीछे राहुल की रणनीति की जीत बता  कर प्रचारित कर रहे हैं। यद्यपि मोदी सरकार ने अब तक किसानों की एक इंच जमीन भी छीन कर पूंजीपत्तियों को नहीं दी है, किन्तु कांग्रेस ने अपने शासन के साठ सालों में किसानों की लाखों एकड़ जमीन छीन कर पूंजीपत्तियों को दी है, उसका हिसाब सरकार के पास है। अच्छा होगा सरकार दुष्प्रचार के जवाब में सारा हिसाब जनता को दिखाये, ताकि कांग्रेसी नंगे हो जाये।
राहुल ने खूब चिंतन मनन कर लिया अब वे पार्टी नेताओं  को चिंतन करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। चिंतन देश की तरक्की, खुशहाली और आम जन की भलार्इ के लिए नहीं किया जा रहा है, वरन इस बात को ले कर किया जा रहा है कि कैसे झूठे दुष्प्रचार के जरिये मोदी सरकार को कठघरें में खड़ा किया जा सके ? कैसे नरेन्द्र मोदी पर अनावश्यक आरोप लगा कर उनकी छवि विद्रुप बनार्इ जा सके़ ? किन्तु इस बारें में चिंतन, मनन और मंथन पर प्रतिबन्ध है कि कांग्रेस पार्टी निरन्तर रसातल में क्यों जा रही है ? भारत के प्रमुख राज्यों में चोथे और पांचवें नम्बर पर क्यों पहुंच गर्इ ? लोकसभा चुनावों के दौरान जिन राज्यों में उसकी सरकारे थीं, वहां शून्य क्यों हाथ लगा ? लोकसभा में उसका संख्या बल मात्र चंवालिस पर क्यों पहुंच गया ? क्या कांग्रेस पार्टी का वर्तमान नेतृत्व पार्टी को पुरानी स्थिति में पहुंचा पायेगा ? यदि कमजोर नेतृत्व के कारण पार्टी डूब रही है, तो क्या नेतृत्व परिवर्तन पर चिंतन किया जायेगा ?
यदि राहुल वास्तव में चिंतन करते हैं, भारतीय नागरिकों की समस्याओं को ले कर चिंतित हैं, तो अपने दस वर्ष के कार्यकाल में मनमोहन सरकार को ऐतिहासिक घोटालें करने से क्यों नहीं रोका ? उनकी सरकार के कार्यकाल में महंगार्इ, बैरोजगारी और गरीबी भयावह रुप से बढ़ी थी, उस समय वे गरीबों, मजदूरों, किसानों की पीड़ा को ले कर दुखी क्यों नहीं हुए ? दस वर्षों के पापों पर कोर्इ पछतावा नहीं, कोर्इ चिंतन नहीं, पर सोलह माह पुरानी सरकार को सारे पापों के लिए दोषी समझा जा रहा है। बेहतर है दूसरों के पाप गिनाने के पहले पापियों को अपने पापों को स्वीकार कर जनता से क्षमा मांगनी चाहिये। राहुल को यह बात याद रखनी चाहिये कि जनता उनकी सरकार के कर्मों को भूली नहीं है। जब तक राहुल अपनी सरकार के कामों की माफी नहीं मांगेंगे. जनता उन्हें कभी अपना नेता स्वीकार नहीं करेगी। वे अपने कुछ चापलुसों के ही नेता बन कर रह जायेंगे। राहुल  चिंतन का ढोंग करते रहेंगे और भारत की जनता उनके चिंतन का उपहास उड़ाती रहेगी।  राहुल बकवास करते हुए घूमते रहेंगे और कांग्रेस सत्ता से दूर जाती रहेगी। यदि ऐसा ही चलता रहा तो कांग्रेस के अच्छे दिन लौटने की कोर्इ सम्भावना नहीं है।

Thursday, 17 September 2015

नीतीश की कश्ती डांवाडोल-डूबने की पूरी सम्भावना

राजनीति के भंवर में फंसी नीतीश कुमार की कश्ती के डूबने की पूरी सम्भावना है। जब तक भाजपा का साथ था, राजनीति की शांत जल धारा में नीतीश आसानी से कश्ती खे रहे थे। न तूफान था। न तेज हवा बह रही थी, विकास की गाड़ी आगे बढ़ रही थी। उन्हें सुशासन बाबू का तमगा मिल गया था। पंद्रह वर्ष तक अराजकता का दंश झेल रहा भारत का पिछड़ा और गरीब बिहार विकास के मार्ग पर आगे बढ़ रहा था। यद्यपि बिहार की हालत पूरी तरह नहीं सुधरी थी, फिर भी मन में आशा बंधी थी कि यदि ऐसा ही चलता रहा, तो  एक दिन बिहार अपने पिछड़ेपन और गरीबी के अभिशाप से मुक्त हो जायेगा।
बीजेपी के साथ रहने से नीतीश के विरोधियों के हौंसले पस्त हो गये थे। वे चुनौती देने की ताकत खोते जा रहे थे। अचानक नीतीश को अपने आप पर अभिमान हो गया। सम्मिलित ताकत को अपनी निज ताकत समझ बैठें। उन्हें भारत का प्रधानमंत्री बनने का सपना आया और उन्होंने एक झटके से भाजपा का साथ छोड़, अपनी कश्ती को राजनीतिक तूफान के हवाले कर दिया। लोकसभा चुनाव परिणामों ने उन्हें अपनी गलती का अहसास करा दिया, किन्तु गलती को सुधारा नहीं। कश्ती को शांत जल धारा की ओर मोड़ने का प्रयास नहीं किया। उसे उसे गहरे भंवर की ओर धेकेल दिया।
परम मित्र को शत्रु बना, प्रबल शत्रु को मित्र बनाने की जो जोखिम नीतीश कुमार ले रहे हैं, वह उनके राजनीतिक जीवन की सब से बड़ी भूल है। ऐसा न हो कि इस जोखिम से गहरी खार्इ में गिर, वे राजनीति के बिंयाबन में कहीं गुम हो जायें। यह सही हैं,  राजनीति में कोर्इ स्थायी दुश्मन और स्थायी मित्र नहीं होते, किन्तु यह भी सही है कि राजनीति के गणित में कभी एक और एक दो नहीं होते। दो प्रबल शत्रुओं के वोट जुड़ कर उन्हें जीत नहीं दिला सकते।  जनता इतनी भी मूर्ख नहीं है कि वह जिंदा मक्खी  आंख बंद कर निगल लें।  वह इस बात को अच्छी तरह जानती है  कि कल तक तो जो एक दूसरे के शरीर में खंजर  घोंपने के लिए मौके की तलाश में रहते थे, अब अचानक क्यों अपने हाथ में पकड़े हुए खंजर पीछे छुपा कर गले मिलने की कोशिश कर रहे हैं। इतनी गहरी कटुता एक क्षण में नहीं भुलायी जा सकती है। कटुता न चाहते हुए भी इसलिए भुलार्इ जा रही है, क्योंकि दोनों के पावों के नीचे से जमीन खिसक रही है।
ऐसी सत्ता भी क्या काम की जो अपने राजनीतिक बैरी की महरबानी से मिल जाय। ऐसी सत्ता मिल भी जाय, तो वह किसी काम की नहीं रहेगी, क्योंकि शत्रु अपनी शत्रुता भुलेगा नहीं। गले मिलने के पहले जिस खंजर को अपनी पीठ के पीछे छुपा रखा था, उसका उपयोग करेंगे और एक दूसरे को अपने मार्ग से हटाने का प्रयास करेंगे। ऐसा होने पर बिहार में फिर अराजकता का दौर प्रारम्भ होगा। क्योंकि भाजपा ने नीतीश को नेता माना था, किन्तु लालू कभी उन्हें नेता स्वीकार नहीं किया है।  यदि करेंगे भी तो उसकी भारी कीमत वसूलेंगे। यदि नीतीश कीमत चुका देंगे, तो दिवालिया हो जायेंगे। उन्हें  खुदा मिलेगा न बिसाले सनम, न इधर के रहेंगे न उधर के रहेंगे।  उनका राजनीतिक जीवन बर्बाद हो जायेगा। लालू के संग आ कर  वे राजनीतिक खुदकशी कर रहें हैं। अपने हाथों से पांवों पर कुल्हाड़ी से वार कर अपाहिज बन, लालू की बैसाखियों के सहारे चलना चाहते हैं, जिसे राजनीतिक मूर्खता के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता। याद रहे ये वही लालू यादव हैं, जिन्हें विवश हो कर मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा था, किन्तु उन्होंने वर्षों से पार्टी के साथ जुड़े किसी विश्वस्त व्यक्ति को मुख्यमंत्री पद देने के बजाय अपनी निरक्षर पत्नी को मुख्यमंत्री बना दिया, जो प्रशासनिक ज्ञान की दृष्टि से भी अनपढ़ थी। फिर भला क्यों लालू अपने परमशत्रु के समक्ष मुख्यमंत्री का पद तश्तरी में रख कर भेंट कर देंगे ?
बिहार की जनता नहीं चाहेगी कि राजनीति के भंवर में फंसी नीतीश की डांवाडोल कश्ती में बैठ कर अपने भविष्य को दांव पर लगा दें। नीतीश ने जोखिम ली है, उससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि जनता भी वैसी ही जोखिम ले लें। लालू राज की दुखद यादे जनता के जेहन में आज भी ताजा है। नीतीश भूल गये हैं, किन्तु जनता भूली नहीं है। नीतीश ने अपने राजनीतिक लाभ के लिए लालू के अपराधों को क्षमा कर अपना मित्र बना लिया, किन्तु न्यायालय उन्हें अभी भी अपराधी ही ठहरा रहा है। एक अपराधी के मित्र पर जनता क्यों कर विश्वास करेगी। यदि विश्वास करेगी, तो वे निश्चित रुप से धोखा खायेगी।
बिहार चुनाव परिणाम न केवल बिहार का भविष्य तय करेंगे, अपितु भारत के विकास का रथ, जो संसद ने अवरुद्ध कर रखा है, उसे बाहर निकालने में बिहार की जनता महत्वपूर्ण निभायेंगी। इस चुनाव में मोदी की जीत होगी या नीतीश कुमार की, यह तो समय ही बताएगा, किन्तु बिहार को जंगलराज की सौगात देने वाला शख्स यदि इस चुनाव के बाद ताकतवर बन कर उभरेगा तो बिहार की तकदीर फिर एक बार अपराधियों के हाथों में आ जायेगी, जो निश्चित रुप से दुर्भाग्यजनक स्थिति होगी, क्योंकि अवसरवादी अराजक शक्तियां हमेशा विनाश की गाथा ही लिखती है, सृजन की नहीं।
बिहार चुनाव परिणाम नीतीश कुमार के भाग्य का फैंसला करेगा, जिसमें एक मुख्यमंत्री सत्ता के नज़दीक पहुंच कर भी हार जायेगा, क्योंकि जीत उसके प्रबल राजनीतिक बैरी के सहयोग से मिलेगी, जो अपनी पूरी कीमत वसूल करेगा। यदि नीतीश सत्ता से दूर हो जायेंगे, तब भी उनकी हार ही होगी।  निश्चय ही उनके पास पाने को कुछ नहीं है, खोना ही खोना है। शांत जलधारा में तेर रही कश्ती को तूफान के हवाले करना और फिर उसे भंवर में धकेलने का यही अंजाम होना था।  भॅंवर में फंसी  नीतीश कुमार की डांवाडोल कश्ती का राजनीति के गहरे समुंद्र में डूबना लगभग निश्चित दिखार्इ दे रहा है। ऐसा होने पर अवसरवादी और कपटपूर्ण राजनीति का अवसान हो जायेगा।

Monday, 13 July 2015

फिर अमन का दीया जला रहे हैं, बुझाने के लिए

इतिहास के घरोंदे में हमने कितने दीये जलाये और बुझायें हैं, पर हर बार हम उसमें विश्वास का तेल डालना भूल जाते हैं। कोर्इ आ कर दीये में इंसानी खून उडे़ल देता है। दीया बुझ जाता है। हम फिर अंधेरे में ठोकरे खाते हैं। हम पर जुनून सवार होता है। हम दुश्मन बन जाते हैं। नंगी तलवारे लहराते हुए अपने दुश्मन का सर काटने के लिए तैयार हो जाते है। एक दूसरे को मिटाने की कसमे खाते रहते हैं। यह सिलसिला अडसठ वर्ष से चल रहा है। बार-बार अमन का दीया जलाने की असफल कोशिश की जाती है। दीया जलता नहीं, बुझ जाता है। आशा बंधती है, फिर टूट जाती है। सियासत से अच्छा सुकून मिलने को बेताब करोड़ो दिलों की हसरते हर बार अधुरी रह जाती है।
अब उन्हें कौन समझाए कि धरती बांट देने से उन दिलों को एक दूसरे से जुदा नहीं कर सकते, जिनके पुरखे शताब्दियों से इसी धरती पर एक साथ रह रहे थे। जिन्हें यहीं जलाया गया था या दफनाया गया था। उसी धरती पर अलग-अलग मुल्कों की दीवारे खींच दीं। चार-पांच युद्ध लड लिये। नफरत बनी रहे हैं, इसके लिए कभी न खत्म होने वाला दहशतगर्दी का युद्ध लड रहे हैं। परमणु अत्र बना कर अपने अस्तित्व मिटा देने को भी तैयार हो गये, किन्तु अपनी जबान, तहजीब और आदते नहीं बदल पायें। एक दूसरे से फिर जुड़ कर आपसी विश्वास पैदा करने की कसक कम नहीं कर पाये। हिन्दी फिल्मों और हिन्दुस्तानी संगीत की दीवानगी नहीं छोड़ पाये। हिमालय से बहने वाली हवाओं को नहीं रोक पाये। रावी और चिनाब के पानी का रंग नहीं बदल पाये। नदियों के साथ बह कर आ रही हिन्दुस्तान की धरती की माटी और उसकी गंध को नहीं रोक पाये। इधर से उड कर उधर जाने वाले परिंदों की राह नहीं बदल पाये।
बहुत हो चुका। सियासत को भूल कर हम इंसान के जज्बाती रिश्तों की बात करें। अब समय आ गया है कि अमन का दीया जलाने की कोशिश करने के पहले बही खाता खोल कर हिसाब देख लें। किसने क्या खोया और क्या पाया इसका हिसाब समझ लें। बहीखाते में लाभ शून्य है, पर हानि की कोर्इ सीमा नहीं है। खून की स्याही से लाशों की गिनती लिखी हुर्इ है। बेमतलब के बेहूदा जुनून की भेंट चढ़ने वाला चाहे इधर का था या उधर का, पर था तो किसी का बेटा, शौहर, भार्इ या बाप। अंदाजा लगा सकते हैं, उन मां-बाप पर क्या गुजर रही है, जिसका बेटा चला गया और वे रोने के लिए संसार में बचे रहें। जिन बेवाओं की असमय मांग उजड़ गर्इ और वे पहाड़ सी जिंदगी अकेले जीने के लिए रह गर्इ। मासूम बच्चे यतीम हो गये, क्योंकि उनके सर पर से बाप का साया उठ गया।
कश्मीर लेने और और कश्मीर नहीं देने की कीमत पर यह सारा सियासी खेल खेला जा रहा है। लड़े गये जंग और दहशतगर्दी में कितने लोग दोनो तरफ मारे गये, उन सबका हिसाब देखेंगे तो रुह कांप उठेगी। परन्तु दुखद आश्चर्य है कि उनका कोर्इ नहीं मरा जो पर्दे के पीछे बैठ कर ऐसा घटिया सियासी खेल खेलते हैं। अडसठ वर्षों से वे हिन्दुस्तान से कश्मीर लेने की जद्धोजहद कर रहे हैं। जानते हैं- हिन्दुस्तान कश्मीर देगा नहीं और हम हांसिल नहीं कर पायेंगे, पर जिद्ध छोड़ेंगे नहीं, क्योकि ऐसा करेंगे तो उन लोगों का दाना पानी बंद हो जायेगा,जो कश्मीर की रट लगाते हुए ही जिंदगी मजे से गुजार रहे हैं। इस रट ने उन्हें खुशहाली का तोहफा दिया और बदले में वे दूसरों जिंदगी तबाह कर रहे हैं। कश्मीर के नाम पर खून-खराबा उनकी फिदरत में हैं, जिसे वे रोक नहीं सकते। यदि यह खून खराबा रुक गया तो वे क्या करेंगे ? उनके पास करने को कोर्इ काम ही नहीं बचेगा।
कश्मीर का मसला है, इसलिए पाकिस्तान का वजूद बना हुआ है। यदि मसला हल हो जायेगा, तो नफरत की दीवार गिर जायेगी। टेंशन खत्म होते ही लोगों को इधर से उधर जाने की छूट मिल जायेगी। फौज की अहमियत खत्म हो जायेगी। पाकिस्तान के बाज़ारों की दुकाने हिन्दुस्तानी सामान से भर जायेगी। पाकिस्तानी सड़को पर भारत में बनी कारे दौड़ेगी। भारतीय उद्योगपति पाकिस्तान में कारखानों का जाल बिछा देंगे। भारतीय शिक्ष संस्थान में पाकिस्तानी बच्चों की बाढ़ आ जायेगी। स्वास्थय केन्द्रों में पाकिस्तानी मरीजो की संख्या बढ़ जायेगी। अजमेर ख्वाजा के दरबार में जायरिनो की भीड़ बढ़ जायेगी। दो चार सालों में ही ऐसा लगने लगेगा जैसे पाकिस्तान कोर्इ दूसरा देश है ही नहीं, वह तो उत्तर प्रदेश और बिहार की तरह भारत का ही एक प्रान्त है।
ऐसा सुखद सपना आज़ादी के बाद की चार पीढ़िया तो देख नहीं पायी और पांचवी और छठी भी नहीं देख पायेगी, क्योंकि अमन की राह में हमेशा फौज और उनके सहयोगी अवरोध बन कर खड़े रहेंगे, क्योंकि आवाम की खुशहाली की कीमत पर वे अपनी बर्बादी नहीं चाहते। किन्तु गरीब पाकिस्तानी जनता को अपना पेट काट कर भारी भरकम फौज का भार ढ़ोना पड़ रहा है। कश्मीर के बहाने फौज ने पाकिस्तानी राजनीति में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका बना रखी है। अत: लाख चाहने पर भी पाकिस्तानी जनता और लोकतांत्रिक सरकारे कुछ नहीं कर सकती। अमन के दीये बार-बार जलाने की कवायद की जायेगी और उसे बुझाने का सिलसिला चलता रहेगा। सरकारे आयेगी और जायेगी। वार्तएं चालू होगी और बंद होगी। कभी कोर्इ निर्णय नहीं निकलेगा, क्योंकि पाकिस्तानी फौज अमन का दीया जलाना नहीं चाहती। अंधेरा रहेगा तभी उसकी हुकूमत बनी रहेगी। उजाले में जब जनता को सब कुछ साफ-साफ दिखार्इ देगा, तब वह उसकी नसीहतों पर कौन यकीन करेगा ?
अमन का दीया जलाने की कोशिश पाकिस्तानी की आवाम करेगी, तभी इसकी लौ बुझेगी नहीं, वो जलती रहेगी। फौज के आतंक से सरकारे डरती है, आवाम भी डरती रही तो कभी कोर्इ मसला हल नहीं होगा। उसे यह फैंसला करना होगा कि गरीबी और बैगारी से निज़ात चाहिये या कश्मीर चाहिये। ताकतवर फौज चाहिये या जनता के हित में बुलंद फैंसले लेने वाली लोकतांत्रिक सरकार चाहिये। हिन्दुस्तानी आवाम के दिलों से जुड़ने की कशिश चाहिये या हमेशा एक दूसरे को मिटा देने की कसमे खानी चाहिये।
इसी उम्मीद में जी रहे हैं कि अमन का दीया एक दिन जलेगा। लम्बी अंधेरी रात जुदा होगी। नया सवेरा होगा। एक नयी सुबह को हम सब मिल कर आने वाली पीढ़ियों के बेहतर भविष्य के लिए सारे सियासी दांव-पेंच भूल, खुशहाली और अमन के नये गीत गायेंगे।

Saturday, 27 June 2015

कांग्रेसी नेता देशी शासक से सत्ता छीन, फिर विदेशी को सौंपने के लिए मचल रहे हैं

सता खोने की छटपटाहट और पुन: पाने की कुलबुलाहट से सोनिया के वफादार सिपाही भारत को फिर उसी अंधेरे युग में ले जाना चाहते हैं, जहां से बमुश्किल मुल्क बाहर आया है। महारानी ने अपने अनुयायियों को आदेश दिया है- सत्ता के बिना रहना हमारे स्वभाव में नहीं। हम सत्ता के लिए जीते हैं और सत्ता के लिए ही मरते हैं। सत्ता सुख के लिए ही इस देश में रह रहे हैं। अपने परम बैरी को सत्ता सुख भोगते देख हमारे सीने पर सांप लौट रहा है। अत: मेरे आज्ञकारी अनुयायियों ! मोदी सरकार की गललियां ढूंढों। तिल का ताड़ बनाओं। रार्इ का पहाड़ बनाओ। जनता को अहसास हो जाय कि हमारे साथ दगाबाजी कर भारत की जनता ने बहुत बड़ी भूल की है। हमारा अब एक ही मिशन है- जनता से उसकी गलती का बदला लो। सरकार के किसी काम को सही मत ठहराओ। सरकार के विधायी कामों में अडंगे डालो। इतना शोर मचाओ कि आकाश हिल जाये और धरती कांप उठे।
आजकल कांग्रेस के हारे हुए योद्धा उस रण की तैयारी में तलवारें भांज रहे हैं, जो चार वर्ष बाद लड़ा जाने वाला है। रणबांकुरे सत्ता पाने के लिए तड़फ रहे हैं। उन्हें ऐसे लगा रहा है जैसे उनका प्रतिद्वंद्वी उनका शोर सुनकर कांप उठेगा। उनके सामने हथियार डाल देगा और सत्ता छोड़ कर भाग जायेगा। बावलों को यह नहीं मालूम कि न तो उनका प्रतिद्वंद्वी इतना लाचार और शक्तिहीन है, और न ही जनता की स्मरण शक्ति इतनी कमजोर है कि उनके पापों को भूल कर उन्हें पूण्यात्मा मानने लगेगी। पर महारानी का आदेश है- युद्ध चाहे आज हो या चार बरस बाद, हमें तैयारी आज से शुरु करनी पड़ेगी। उन्हें ललकारतें हुए अपनी ताकत का अहसास कराते रहो। चाहे संसद में हमारे सांसदों की कमी हो, पर हमारे पास धन की कमी नहीं है। हम सड़कों पर भीड़ एकत्रित कर हंगामा करने में सक्षम हैं। उन्हें शायद यह आभास नहीं कि आप भले ही सत्ता में बैठे हों पर सभी जगह हमारे आदमी जमे हुए हैं। मीडिया में हमारे चहते आदमी है, जो हमारे सुर में सुर मिलाते हैं। सरकरी दफ्तरो में हमारे वफादार बैठें हैं, जो मोदी सरकार को फेल करना चाहते हैं। क्रानी केपीटलिजम से धन कमाने वाले भारतीय उद्योगपति हमारे हैं, क्योंकि वे र्इमानदारी से नहीं बैमानी से धन कमाने के आदि हैं। मोदी सरकार से उनकी पटरी नहीं बैठ रही है। ये सभी हमारी सरकार चाहते हैं। हमारे साथ जो भी रहा, उसने जम कर मजे लूटे। हमारे पास ही वह साम्मर्थय है, जिससे सभी के मौज-मस्ती के दिन लौट आयेंगे। हमारे दिन वापस आते ही सरकारी धन का खूब मजा लुटेगे । खूब घपले- घोटाले करेंगें। ऐसा इसलिए कह रहे हैं कि भारत में ऐसी ही सरकारे बनती है और चलती है।
जनता ने आपातकाल के अपराधियों को भी क्षमादान दे कर सता सौंपी, तो हमे क्यों नही सौंपेगी ? आखिर हम भी तो उसी खानदान के अवशेष हैं, जिसने भारत की जनता के साथ हमेशा दगाबाजी की पर जनता ने उसे सम्मान और आदर दिया। इसलिए इस बात पर रंज मत करो कि हमने पूरा प्रशासनिक ढांचा भ्रष्ट कर उसे शिथिल और अस्तव्यवस्त कर दिया। इस बात पर भी अफसोस मत करो कि हमारी सरकार ने देश की अर्थव्यवस्था का कबाड़ा कर दिया। इस बात पर भी पछताने की जरुरत नहीं है कि हमने घोटालों और घपलों से राजकोषीय घाटा इतना बढ़ाया की महंगार्इ आकाश छूने लगी। जनता ने हमे ठुकरा दिया इस पर हमे कोर्इ ग्लानि नहीं हैं, क्योंकि हम देश में ऐसी परिस्थितियां निर्मित करने में सक्षम हैं, जिससे थक हर हार कर जनता को हमारी ही शरण में आना पड़ेगा।
बड़े-बड़े घोटाले जो जांच से साबित हो गये, फिर भी हम नहीं मानते कि हमने कोर्इ घोटाले किये थे। पकड़े गये तब भी अपने आपको चोर नहीं समझते हैं। दस साल में बीस लाख करोड़ का घपला हुआ, फिर भी हमे अपना दामन साफ लगता है, क्योंकि हम घोटालों के मुख्य सूत्रधार है, पर हम पर कोर्इ आरोप बनते ही नहीं, क्योंकि हम किसी संवैधानिक पद पर नहीं थे, हमने कहीं अपने हस्ताक्षर नहीं किये। भारत का कोर्इ न्यायालय हमे दोषी ठहरा कर सजा नहीं सुना सकता। हांलांकि जनता ने हमे दोषी मान कर सजा सनुा दी है, पर हमे विश्वास है वह भी क्षमा कर कर देगी। हां, यह सच है कि घोटालों का अधिकांश धन हमने ही डकारा है, पर धन कहां है और हमने इसे कहां छुपा रखा है, इसका रहस्य हम कभी किसी को नहीं बतायेंगे। सरकार के पास न तो इतने स्त्रोत है और न क्षमता है कि वह हमारे छुपे हुए धन को खोज सके।
हम मानते हैं कि हम सर से पांव तक कीचड़ से सने हुए हैं, परन्तु यदि किसी के उजले दामन पर जरा से भी छींटे होने का आभास हों तो हमे शोर मचाने का अधिकार हैं, क्योंकि हम सत्ता में नहीं है। हम जनता को समझा देंगे कि आप हमारे शरीर पर जो कीचड़ देख रहे हैं, वह दरअसल आपका दृष्टि भ्रम है। आप पर हमारे ऊपर से दृष्टि हटा कर उनके कपड़ो पर दाग ढूढ़िये, जिसका आभास हमे हो रहा है।
हम जानते हैं कि भारत को आज़ादी मिले वर्षों हो गये, किन्तु इस देश की जनता की मानसिकता से गुलामी पूरी तरह हटी नहीं है, इसीलिए तो हमारी पार्टी के वफादार सिपाही एक विदेशी को ही अपना नेता मानते हैं और फिर एक विदेशी को हाथों में देश को सौंपने के लिए उतावले हो रहे हैं, क्योंकि उन्हें देशी शासक बिल्कुल पसंद नहीं हैं। उन्हें इस बात का भी अहसास नहीं कि पार्टी नेतृत्व के कारण ही पूरे देश में पार्टी मुंह दिखाने लायक नहीं बची है, फिर भी उनकी वफादारी में कोर्इ आंच नहीं आर्इ है। हमारी पार्टी के नेता देशी नेतृत्व को कोसते रहेंगे और विदेशी नेतृत्व के प्रति आस्था प्रकट करते रहेंगे। भारत की राजनीति से जब तक हमारी पार्टी का अस्तित्व बचा रहेगा। पार्टी में हमारे वफादार अनुयायियों की भरमार रहेगी, हमारा राजनीतिक जीवन चलता रहेगा।
सम्भवत: इसीलिए कांग्रेस महारानी के वफादार सेवकों ने मोदी सरकार के विरुद्ध चार साल तक चलने वाले एक निर्णायक युद्ध की घोषणा कर दी है। उन्हें विश्वास है कि यदि सरकार के विरुद्ध इसी तरह की आक्रामकता दिखाते रहेंगे तो चार साल तक लड़े जाने वाले निर्णायक युद्ध में उनकी जीत निश्चित होगी। उनकी महारानी के पास सत्ता की डोर आ जायेगी। उनका नौसिखिया पुत्र भारत का शासन सम्भाल लेगा। देशी शासको का पराभव हो जायेगा और विदेशी शासक फिर भारतीयों पर शासन करने का अधिकार पा लेंगे।

Thursday, 25 June 2015

गांधी परिवार की देशभक्ति संदेह के घेरे में

गांधी परिवार ने भारतीय योग का मुखर विरोध ही नहीं किया एक समुदाय के मन में भ्रान्तियां पैदा कर इससे दूर रहने की नसीहत दी है। सरकार की किसी नीति से असहमति जायज है, किन्तु भारत की जिस प्राचीन विधा से विश्व का जनमानस अभिभूत है, ऐसी विधा के प्रचार की सरकारी नीति का विरोध करना अनुचित है। विश्व के अधिकांश देश योग में आस्था प्रकट कर रहे है, फिर गांधी परिवार और कांग्रेस का इसमें अनास्था प्रकट करने का औचित्य क्या है ? सिर्फ इसलिए कि यह मोदी सरकार का आयोजन है और नरेन्द्र मोदी को गांधी परिवार ने अपना दुश्मन नम्बर एक मान रखा है। यदि विरोध का यही एक कारण है तो यह अलोकतांत्रिक मन:स्थिति को प्रकट करता है, क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता कोर्इ व्यक्ति नहीं छीनता, जनता छीनती है। जनता ने गांधी परिवार से सत्ता छीन कर नरेन्द्र मोदी को सौंपी है । ऐसा होने पर क्या भारत की जनता को भी गांधी परिवार अपना दुश्मन नम्बर एक मानता है ?
योग को ले कर गांधी परिवार ने जो रवैया दर्शाया है, उससे यही साबित होता है कि इस परिवार की भारतीय संस्कृति और इसके मूल्यों में कोर्इ आस्था नहीं है। एक विदेशी की तरह गांधी परिवार भारतीयता को हेय दृष्टि से देखता है। अत: जिन लोगों के मन में भारत और भारतीयता के प्रति श्रद्धा नहीं हैं, उन्हें भारतीय की जनता पर शासन करने का हक भी नहीं है। अंगे्रजो की तरह उसकी नीति भी यही है कि भारत के दो समुदायों के बीच किसनी न किसी बहानें फूट डालों और उन्हें एक दूसरे से अलग करो, ताकि उनके मन में परस्पर अविश्वास की खार्इ गहरी होती जाय। कांग्रेस ने योग का भी इसी नीति की तरह विरोध किया है, जो उसकी कपटपूर्ण मंशा को दर्शाता है।
सोनिया गांधी लम्बे समय तक भारत में रहने के बाद भी अपने आपको भारतीय परिवेश में नहीं ढाल पार्इ है। भारत और भारतीयों पर वे सिर्फ और सिर्फ हुकूमत करना चाहती है, भारतीयों के दिलों से जुड़ने और भारतीयता के प्रति आस्था प्रकट करने के लिए उन्होंने अपने दीर्घ राजनीतिक जीवन में कोर्इ उदाहरण प्रस्तुत नहीं किया। भारतीयता के प्रति कभी अपने आंतरिक मनोभावों को प्रकट नहीं किया। सार्वजनिक जीवन में रहने के बाद उनकी रहस्यमय चुप्पी हमेशा चुभती है। उनकी निजी विदेश यात्राएं यह संदेह प्रकट करती है कि लूट के कारोबार से कमार्इ गर्इ धन राशि को कहीं व्यवस्थित करने के लिए तो वे विदेश नहीं जाती है। यदि ऐसा नहीं है तो वे अपनी यात्रा के मकसद को हमेशा गोपनीय क्यों रखती है ? उनके निकटस्थ कांग्रेसियों के पास भी इस बात की जानकारी नहीं होती कि वे कहां गर्इ है और किस उद्धेश्य को ले कर विदेश गर्इ है ? इस प्रश्न को यह कह कर नहीं टाला जा सकता कि निजी यात्रा की जानकारी देश को रखना आवश्यक नहीं है। क्या कांग्रेसी यह बता सकता है कि जो लोग सार्वजनिक जीवन में होते हैं, उनका निजी क्या होता है ? उन्हें अपना निजी जीवन इतना ही प्रिय है, तो सार्वजनिक जीवन छोड़ क्यों नहीं देते ?
राहुल गांधी को कांग्रेस ने अपना नेता स्वीकार कर लिया हेै और उनके कंधे पर पार्टी पूरा भार डालने की रणनीति बना रही है। अपरिपक्क और छिछोरी मानसिकता वाले व्यक्ति पर इतनी भारी जिम्मेदारी डालना युक्तियुक्त नहीं लगता, किन्तु कोर्इ भी कांग्रेसी इसका विरोध नहीं कर सकता, क्योंकि पार्टी सुप्रीमो की यही आंतरिक इच्छा है, जिसका विरोध करना अलोकतांत्रिक पार्टी की नियति में नहीं है। राहुलगांधी ने भारतीय संस्कृति और भारतीय इतिहास का अध्ययन नहीं किया। भारतीय राजनीति और संवैधानिक व्यवस्था पर भी उन्होंने कभी अपने विचार प्रकट नहीं किये। देश की प्रगति और खुशहाली के लिए क्या आर्थिक नीतियां बनानी चाहिये ? इसं संबंध में उन्होंने अपना कोर्इ निजी चिंतन नहीं प्रस्तुत किया। उनकी मन: स्थिति और राजनीतिक विचारों का परिचय कभी-कभी अपनी निकृष्ट,तथ्यहिन और बेतुकी भाषण शैली से देते रहते हैं। उनका राजनीतिक विचार और दर्शन यही है कि जनता द्वारा चुनी गर्इ एक सरकार का विरोध करते रहों। सरकार के प्रति तिरस्कार व अपमानित करने वाली शब्दावली का प्रयोग कर भाषण देते रहो।
प्रश्न उठता है कि क्या कांग्रेस के पास एक अपरिपक्क मानसिकता वाले व्यक्ति के अलावा कोर्इ नेता नहीं है ? क्या राहुल एक विदेशी महिला – के पुत्र है, इसीलिए कांग्रेस उन्हें कांग्रेस अपना नेता मान रही है और भारत पर शासन करने का हक दिलाना चाहती है। क्या यह गुलाम मानसिकता नहीं है ? दस वर्षों तक मां-पुत्र की भ्रष्ट नीतियों से देश बर्बाद हो गया। पूरे राष्ट्र ने अपमानित कर कांग्रेस को ठुकरा दिया, फिर भी कांग्रेसी नेताओं के मन मे इस परिवार के प्रति अंध श्रद्धा में कोर्इ कमी नहीं आर्इ है। कर्इ राज्यों की सरकारे हाथ से गर्इ। कर्इ प्रदेशों से लोकसभा के चुनावों में शून्य हाथ लगा। बड़े-बड़े प्रदेशों से दो चार सीटे हाथ लगी। कांग्रेसी नेताओं के मन में अपनी इस अपमानित करने वाली पराजय से कोर्इ ग्लानि नहीं है। वे आत्मचिंतन क्यों नहीं करना चाहते ? क्यों वे उस परिवार के साथ जोंक की तरह चिपके रहना चाहते हैं, जिनकी देश भक्ति संदेह के घेरे में है। जिनके भ्रष्ट आचरण से पूरा देश क्रोधित है।
शासद कांग्रेसी नेताओं के मन में यह धारण है कि चाहे उनके पास चवांलिस सांसदों की पूंजी हों, किन्तु उनके गांधी परिवार के पास सम्भवत: चवांलिस हजार करोड़ की पूंजी होगी। अपनी धनशक्ति के बल पर यह परिवार भारतीय लोकतंत्र पर पुन: नियंत्रण कर लेगा। एक न एक दिन इस परिवार की कृपा से हमारा शासन फिर आयेगा। वे मौज मस्ती वाले दिन लौट आयेंगे। इसलिए यह परिवार अपने धन के प्रभाव से जो भी राजनीतिक प्रपंच रच रहा है, चाहे वह गलत हो उससे जुड़े रहो। एक चुनी हुर्इ लोकप्रिय सरकार पर जितने शाब्दिक प्रहार किये जाये, करते राहे। चाहे वे सही हो या गलत हो, उनके साथ अपने आपको जोड़े रहो।
भारतीय योग का विरोध कर गांधी परिवार ने अपने आपको भारतीयता से अलग कर दिया है। यह साबित कर दिया है कि वे ऐसे किसी आयोजन के समर्थक नहीं है, जिससे भारत को विश्व में प्रतिष्ठा मिले। इस वििश्ष्ट आयोजन के समय पूरा परिवार देश छोड़ कर चला गया, जिससे परिवार की राष्ट्र भक्ति संदेह के घेरे में आ गर्इ हैं। अतीत में ऐसे कर्इ कृत्य इस परिवार ने किये हैं, जिससे उनकी राष्ट्रभक्ति पर प्रश्न चिन्ह लगे थे। परन्तु अब यह साबित हो रहा है कि यह विदेशी परिवार भारत पर शासन करने की मंशा सिर्फ इसलिए रखता है, ताकि किस न किसी तरह भारत की संवैधानिक व्यवस्था पर नियंत्रण कर अपने लूट के कारोबार को जारी रखा जा सके।
नरेन्द्र मोदी ही उस जीवट ऊर्जा वाले व्यक्ति हैं, जिन्होंने एक विदेशी परिवार को सत्ता से दूर किया है। अपनी छल विधा से यह परिवार साम्प्रदायिक शक्तियों को सत्ता से दूर रखने के राजनीतिक षड़यंत्र के तहत मोदी सरकार का विरोध करता रहेगा और सारे विरोधी दलों को एक जुट करता रहेगा। लोकसभा में सरकार प्रभावी काम नहीं कर पाये, उसके लिए अवरोध डालता रहेगा।

Friday, 12 June 2015

साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक शक्तियां- देश के बहुसंख्यक समाज को दी जाने वाली गालियां है

भारतीय राजनेताओं के लिए इस देश में रहने वाला बहुसंख्यक समाज दोयम दर्जें का नागरिक हैं, अत: जब तब उसकी धार्मिक आस्था और विश्वास पर बेहिचक चोट पहुंचार्इ जाती है, क्योंकि इसी तबके का पढ़ा लिखे सभ्रान्त समाज को अपने धर्म और परम्पराओं से परहेज है और वे इन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं, इसलिए जब कभी भी सम्प्रदाय और साम्प्रदायिकता को ले कर बवाल उठता है, वह राजनेताओं की जमात के साथ खड़ा हो जाता है।
यदि आप बहुसंख्यक समाज के धर्म से जुड़े हुए हैं और आपकी अपने धर्म में आस्था हैं, तो आप साम्प्रदायिक कहलाते हैं, किन्तु आपकी यदि उस धर्म में आस्था हैं, जो बहुसंख्यक समाज का नहीं है, तो आप धर्मनिरपेक्ष हो जाते हैं। इसी तरह एक धर्म के प्रचार प्रसार में लगे हुए साधु-संतों को साम्प्रदायिक शक्तियां कह कर पुकारा जाता है, वहीं दूसरे धर्मों के प्रचार प्रसार में लगे लोगों को धर्मनिरपेक्ष ताकते कहा जाता है। जो राजनीतिक दल भारत की प्राचीन मान्यताओं और संस्कृति के प्रति अपना अनुराग दिखाता है, वह साम्प्रदायिक दल हो जाता है, किन्तु जो राजनीतिक दल विदेशों से आयातित धर्म और मान्यताओं को अपना समर्थन देते हैं, वे धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल बन जाते हैं।
भारतीय संस्कृति से जुड़े हुए देवी देवताओं के कार्टुन बनाना और उनका उपहास उड़ाना जायज समझा जाता है। ऐसा करने पर जो अपनी आपत्ति दर्ज करते हैं, उन्हें साम्प्रदायिक कह कर उनकी तौहीन की जाती है, किन्तु किसी मजहब विशेष के संबंध में एक शब्द लिख देना या बोल देना जघन्य अपराध माना जाता है। पूरे विश्व में कोहराम मच जाता है। भारी खून-खराबा होता है, किन्तु इस पागलपन पर कुछ भी बोलने से धर्मनिरपेक्ष राजनेताओं की जबान लड़खड़ा जाती है। इसी तरह मंदिरों से मूर्तिया चुरा कर उन्हें अन्तरराष्ट्रीय बाज़ारों में बैच देने पर कोर्इ हंगाम नहीं होता, किन्तु किसी सिरफिरे द्वारा चर्च पर एक पत्थर फैंक देने से तूफान खड़ा हो जाता है। धर्मनिरपेक्ष राजनेता और समाचार मीडिया छोटी सी घटना पर गाहे बगाहे उबल पड़ता है।
कोर्इ राजनीतिक दल यदि बहुसंख्यक समाज के सबंध में कुछ बोलता है या उसकी पीड़ा के साथ अपने आपको जोड़ता है तो यह कहा जाता है ये लोग साम्प्रदायिकता की आग लगा रहे हैं। समाज में साम्प्रदायिकता विष भर रहे हैं। बार-बार ये शब्द दोहराये जाते हैं- साम्प्रदायिक ताकतों को रोको ! दुर्भाग्य से ऐसा कहने और करने वाले वे ही लोग हैं, जो भारत के बहुसंख्यक समाज का एक भाग हैं, किन्तु अपने राजनीतिक स्वार्थ की रोटियां सेकने के लिए अपनी सांस्कृतिक मान्यताओं को रौंदने का उपक्रम करते हैं।
पच्चीस वर्ष पहले कश्मीर घाटी के पंड़ितो पर अमानुषिक अत्याचार कर उन्हें खदेड़ दिया गया इस षड़यंत्र को पड़ोसी देश ने स्थानीय राजनेताओं के साथ मिल कर अंजाम दिया था। अपने ही देश में शरणार्थी बने ये भारतीय नागरिक इसलिए प्रताड़ित हैं, क्योंकि ये भारत के बहुसंख्यक समाज के अंग है। इन अभागे देशवासियों के प्रति सहानुभूति के दो शब्द किसी धर्मनिरपेक्ष राजनेता की जबान से नहीं फिसलें, क्योंकि वे ऐसा करते तो साम्प्रदायिक हो जाते। उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि कलंकित हो जाती। वहीं दूसरी ओर गुजरात दंगो पर बारह वर्ष तक तूफान खड़ा करने वाली धर्मनिरपेक्ष ताकतों के मन में कश्मीरी पंड़ितो के प्रति सहानुभूति क्यों नहीं उपजी ? यह प्रश्न अभी भी अनुतरित है। इस बारें में यही कहा जा सकता है कि भारत की राजनीति बहुसंख्यक समाज की पीड़ा से कभी द्रवित नहीं होती। उसके संबंध में कुछ भी कहने से अपने आपको अलग कर देती है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दूसरे धर्मों का आदर करते हैं, किन्तु उनकी आस्था अपने धर्म में ही है, जिसे वे पाप नहीं समझते। पूजा-अर्चना करने और प्रसिद्ध मंदिरों में वे जाते हैं, किन्तु अपने आपको धर्मनिरपेक्ष घोषित करने के लिए वे अन्य मजहब की टोपी नहीं पहनते, क्योंकि ऐसी नौटंकी करना उन्हें पसंद नहीं है। इन्हीं उदाहरणों से उनकी साम्प्रदायिक मनोवृति को प्रमाणित किया जाता है और कट्टरवादी नेता कहा जाता है। किन्तु जिन नेताओं के मन में एक धर्म विशेष में आस्था नहीं है। वे उस धर्म की परम्पराओं को नहीं मानते, फिर भी यदि टोपी पहन लेते हैं, तो उनकी धर्मनिरपेक्षता प्रमाणित हो जाती है।
यदि संवैधानिक अधिकार प्राप्त करने के बाद कोर्इ राजनेता अपनी प्रशासनिक क्षमता प्रमाणित नहीं कर पाता हैं। जन समस्याओं को सुलझाने में वह असमर्थ रहता है, किन्तु धर्मनिरपेक्षता का आवरण ओढ़ कर साम्प्रदायिकता के नाम पर बहुसंख्यक समाज को कोसता है, तो उसकी सारी प्रशासनिक दुर्बलताएं छुप जाती है। इसी तरह अपने शासनकाल में ऐतिहासिक धोटाले कर देश की अर्थव्यवस्था को कबाड़ा करने वाला राजनीतिक दल भी अपने आपको पाक साफ समझता हैं, क्योंकि उसने धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़ रखा है और साम्प्रदायिक शक्तियों के साथ लड़ने की कसमें खा रखी है।
ललू यादव ने बिहार प्रदेश पर पंद्रह वर्ष तक शासन किया और पूरे प्रदेश जंगलराज में तब्दील कर दिया। पशुओं के चारे के लिए जारी किये जाने वाले करोड़ो रुपये के फंड का घपला किया, जिसका दोष प्रमाणित हो चुका है। किन्तु ये महाशय पुन: बिहार की राजनीतिक को अपने नियंत्रण मे लेना चाहते हैं, क्योंकि ये धर्मनिरपेक्ष हैं और यह मानते हैं कि धर्मनिरपेक्षता ने उनके सारे पाप धो दिये हैं और साम्प्रदायिक शक्तियों को बिहार की सत्ता नहीं सौंपने का अधिकार उन्हें देश की धर्मनिरपेक्षत ताकतों ने दे दिये हैं। वे स्वयं ही ऐसा मान रहे है कि ये ताकते आग लगताती है, जिसे बुझाने के लिए फायर बिग्रेड बन कर आया हूं। अर्थात आग लगी नहीं, धुआं उठा नहीं, फिर भी आग की कल्पना कर जनता को भयभीत करने वाले अपने आपको पुण्यात्मा समझते हैं, तो यह उनका अतिआत्मविश्वास है।
चाहे बिहार में नीतीश कुमार के साथ मिल कर साम्प्रदायिक शक्तियों ने अच्छा प्रशासन दिया हों, किन्तु उनके पुण्य को भी पाप ही माना जायेगा, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि ये शक्तियां भारत के बहुसंख्यक समाज का प्रतिनिधित्व करती है, इसलिए ये पापी है। अत: जब तक भारत का बहुसंख्यक समाज बंटा रहेगा, उसे साम्प्रदायिक कह कर कोसा जाता रहेगा, किन्तु जब वह एक हो जायेगा, भारत के कर्इ राजनेताओं की दुकाने बंद हो जायेगी। तब विवश हो कर अपने शरीर पर डाला गया धर्मनिरपेक्षता का लबादा फैंकना पड़ेगा। तब उन्हें भी सबका साथ सबका विकास का नारा देना पड़ेगा।
अब समय आ गया है जब हम एक हो जायें और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर जो लोग बहुसंख्यक समाज को साम्प्रदायिक और साम्प्रदायिकता की गालियां देते हैं, उनको भारत की राजनीति से तिरस्कृत कर दें, क्योंकि भारत का बहुसंख्यक समाज अपने सारे पूर्वाग्रहों को छोड़ कर अपनी संस्कृति और परम्पराओं में आस्था प्रकट करेगा, तब उन्हें भारत की तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतें चिढ़ाने की हिम्मत नहीं कर पायेगी। भारत की प्रगति और खुशहाली तथा भारतीय राजनीति के शुद्धिकरण के लिए यह आवश्यक है कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर राजनेता अपनी प्रशासनिक अकुशलता, भ्रष्टआचरण को छुपाना बंद कर दें और एक धर्म विशेष से जुड़े समाज के प्रति झूठी सहानुभूति दर्शाने का उपक्रम बंद कर दें