Tuesday, 28 May 2013

"नेहरू-गाँधी राजवंश की असलियत”

नेहरू-गाँधी राजवंश (?) की असलियत”…इसको पढने से हमें यह समझ में आता है कि कैसे सत्ता शिखरों पर सडाँध फ़ैली हुई है और इतिहास को कैसे तोडा-मरोडा जा सकता है, कैसे आम जनता को सत्य से वंचित रखा जा सकता है । हम इतिहास के बारे में उतना ही जानते हैं जितना कि वह हमें सत्ताधीशों द्वारा बताया जाता है, समझाया जाता है (बल्कि कहना चाहिये पीढी-दर-पीढी गले उतारा जाता है) । फ़िर एक समय आता है जब हम उसे ही सच समझने लगते हैं क्योंकि वाद-विवाद की कोई गुंजाईश ही नहीं छोडी जाती । हमारे वामपंथी मित्र इस मामले में बडे़ पहुँचे हुए उस्ताद हैं, यह उनसे सीखना चाहिये कि कैसे किताबों में फ़ेरबदल करके अपनी विचारधारा को कच्चे दिमागों पर थोपा जाये, कैसे जेएनयू और आईसीएचआर जैसी संस्थाओं पर कब्जा करके वहाँ फ़र्जी विद्वान भरे जायें और अपना मनचाहा इतिहास लिखवाया जाये..कैसे मीडिया में अपने आदमी भरे जायें और हिन्दुत्व, भारत, भारतीय संस्कृति को गरियाया जाये…ताकि लोगों को असली और सच्ची बात कभी पता ही ना चले… हम और आप तो इस खेल में कहीं भी नहीं हैं, एक पुर्जे मात्र हैं जिसकी कोई अहमियत नहीं (सिवाय एक ब्लोग लिखने और भूल जाने के)…तो किस्सा-ए-गाँधी परिवार शुरु होता है साहेबान…शुरुआत होती है “गंगाधर” (गंगाधर नेहरू नहीं), यानी मोतीलाल नेहरू के पिता से । नेहरू उपनाम बाद में मोतीलाल ने खुद लगा लिया था, जिसका शाब्दिक अर्थ था “नहर वाले”, वरना तो उनका नाम होना चाहिये था “मोतीलाल धर”, लेकिन जैसा कि इस खानदान की नाम बदलने की आदत थी उसी के मुताबिक उन्होंने यह किया । रॉबर्ट हार्डी एन्ड्रूज की किताब “ए लैम्प फ़ॉर इंडिया – द स्टोरी ऑफ़ मदाम पंडित” में उस तथाकथित गंगाधर का चित्र छपा है, जिसके अनुसार गंगाधर असल में एक सुन्नी मुसलमान था, जिसका असली नाम गयासुद्दीन गाजी था. लोग सोचेंगे कि यह खोज कैसे हुई ?
दरअसल नेहरू ने खुद की आत्मकथा में एक जगह लिखा था कि उनके दादा अर्थात मोतीलाल के पिता गंगा धर थे, ठीक वैसा ही जवाहर की बहन कृष्णा ने भी एक जगह लिखा है कि उनके दादाजी मुगल सल्तनत (बहादुरशाह जफ़र के समय) में नगर कोतवाल थे. अब इतिहासकारों ने खोजबीन की तो पाया कि बहादुरशाह जफ़र के समय कोई भी हिन्दू इतनी महत्वपूर्ण ओहदे पर नहीं था..और खोजबीन पर पता चला कि उस वक्त के दो नायब कोतवाल हिन्दू थे नाम थे भाऊ सिंह और काशीनाथ, जो कि लाहौरी गेट दिल्ली में तैनात थे, लेकिन किसी गंगा धर नाम के व्यक्ति का कोई रिकॉर्ड नहीं मिला (मेहदी हुसैन की पुस्तक : बहादुरशाह जफ़र और १८५७ का गदर, १९८७ की आवृत्ति), रिकॉर्ड मिलता भी कैसे, क्योंकि गंगा धर नाम तो बाद में अंग्रेजों के कहर से डर कर बदला गया था, असली नाम तो था “गयासुद्दीन गाजी” । जब अंग्रेजों ने दिल्ली को लगभग जीत लिया था,तब मुगलों और मुसलमानों के दोबारा विद्रोह के डर से उन्होंने दिल्ली के सारे हिन्दुओं और मुसलमानों को शहर से बाहर करके तम्बुओं में ठहरा दिया था (जैसे कि आज कश्मीरी पंडित रह रहे हैं), अंग्रेज वह गलती नहीं दोहराना चाहते थे, जो हिन्दू राजाओं (पृथ्वीराज चौहान ने) ने मुसलमान आक्रांताओं को जीवित छोडकर की थी, इसलिये उन्होंने चुन-चुन कर मुसलमानों को मारना शुरु किया, लेकिन कुछ मुसलमान दिल्ली से भागकर पास के इलाकों मे चले गये थे । उसी समय यह परिवार भी आगरा की तरफ़ कूच कर गया…हमने यह कैसे जाना ? नेहरू ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि आगरा जाते समय उनके दादा गंगा धर को अंग्रेजों ने रोक कर पूछताछ की थी, लेकिन तब गंगा धर ने उनसे कहा था कि वे मुसलमान नहीं हैं, बल्कि कश्मीरी पंडित हैं और अंग्रेजों ने उन्हें आगरा जाने दिया… बाकी तो इतिहास है ही । यह “धर” उपनाम कश्मीरी पंडितों में आमतौर पाया जाता है, और इसी का अपभ्रंश होते-होते और धर्मान्तरण होते-होते यह “दर” या “डार” हो गया जो कि कश्मीर के अविभाजित हिस्से में आमतौर पाया जाने वाला नाम है । लेकिन मोतीलाल ने नेहरू नाम चुना ताकि यह पूरी तरह से हिन्दू सा लगे । इतने पीछे से शुरुआत करने का मकसद सिर्फ़ यही है कि हमें पता चले कि “खानदानी” लोग क्या होते हैं । कहा जाता है कि आदमी और घोडे़ को उसकी नस्ल से पहचानना चाहिये, प्रत्येक व्यक्ति और घोडा अपनी नस्लीय विशेषताओं के हिसाब से ही व्यवहार करता है, संस्कार उसमें थोडा सा बदलाव ला सकते हैं, लेकिन उसका मूल स्वभाव आसानी से बदलता नहीं है…. फ़िलहाल गाँधी-नेहरू परिवार पर फ़ोकस…
अपनी पुस्तक “द नेहरू डायनेस्टी” में लेखक के.एन.राव लिखते हैं….ऐसा माना जाता है कि जवाहरलाल, मोतीलाल नेहरू के पुत्र थे और मोतीलाल के पिता का नाम था गंगाधर । यह तो हम जानते ही हैं कि जवाहरलाल की एक पुत्री थी इन्दिरा प्रियदर्शिनी नेहरू । कमला नेहरू उनकी माता का नाम था, जिनकी मृत्यु स्विटजरलैण्ड में टीबी से हुई थी । कमला शुरु से ही इन्दिरा के फ़िरोज से विवाह के खिलाफ़ थीं… क्यों ? यह हमें नहीं बताया जाता…लेकिन यह फ़िरोज गाँधी कौन थे ? फ़िरोज उस व्यापारी के बेटे थे, जो “आनन्द भवन” में घरेलू सामान और शराब पहुँचाने का काम करता था…नाम… बताता हूँ…. पहले आनन्द भवन के बारे में थोडा सा… आनन्द भवन का असली नाम था “इशरत मंजिल” और उसके मालिक थे मुबारक अली… मोतीलाल नेहरू पहले इन्हीं मुबारक अली के यहाँ काम करते थे…खैर…हममें से सभी जानते हैं कि राजीव गाँधी के नाना का नाम था जवाहरलाल नेहरू, लेकिन प्रत्येक व्यक्ति के नाना के साथ ही दादा भी तो होते हैं… और अधिकतर परिवारों में दादा और पिता का नाम ज्यादा महत्वपूर्ण होता है, बजाय नाना या मामा के… तो फ़िर राजीव गाँधी के दादाजी का नाम क्या था…. किसी को मालूम है ? नहीं ना… ऐसा इसलिये है, क्योंकि राजीव गाँधी के दादा थे नवाब खान, एक मुस्लिम व्यापारी जो आनन्द भवन में सामान सप्लाय करता था और जिसका मूल निवास था जूनागढ गुजरात में… नवाब खान ने एक पारसी महिला से शादी की और उसे मुस्लिम बनाया… फ़िरोज इसी महिला की सन्तान थे और उनकी माँ का उपनाम था “घांदी” (गाँधी नहीं)… घांदी नाम पारसियों में अक्सर पाया जाता था…विवाह से पहले फ़िरोज गाँधी ना होकर फ़िरोज खान थे और कमला नेहरू के विरोध का असली कारण भी यही था…हमें बताया जाता है कि राजीव गाँधी पहले पारसी थे… यह मात्र एक भ्रम पैदा किया गया है । इन्दिरा गाँधी अकेलेपन और अवसाद का शिकार थीं । शांति निकेतन में पढते वक्त ही रविन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें अनुचित व्यवहार के लिये निकाल बाहर किया था… अब आप खुद ही सोचिये… एक तन्हा जवान लडकी जिसके पिता राजनीति में पूरी तरह से व्यस्त और माँ लगभग मृत्यु शैया पर पडी़ हुई हों… थोडी सी सहानुभूति मात्र से क्यों ना पिघलेगी, और विपरीत लिंग की ओर क्यों ना आकर्षित होगी ? इसी बात का फ़ायदा फ़िरोज खान ने उठाया और इन्दिरा को बहला-फ़ुसलाकर उसका धर्म परिवर्तन करवाकर लन्दन की एक मस्जिद में उससे शादी रचा ली (नाम रखा “मैमूना बेगम”) । नेहरू को पता चला तो वे बहुत लाल-पीले हुए, लेकिन अब क्या किया जा सकता था…जब यह खबर मोहनदास करमचन्द गाँधी को मिली तो उन्होंने ताबडतोड नेहरू को बुलाकर समझाया, राजनैतिक छवि की खातिर फ़िरोज को मनाया कि वह अपना नाम गाँधी रख ले.. यह एक आसान काम था कि एक शपथ पत्र के जरिये, बजाय धर्म बदलने के सिर्फ़ नाम बदला जाये… तो फ़िरोज खान (घांदी) बन गये फ़िरोज गाँधी । और विडम्बना यह है कि सत्य-सत्य का जाप करने वाले और “सत्य के साथ मेरे प्रयोग” लिखने वाले गाँधी ने इस बात का उल्लेख आज तक कहीं नहीं किया, और वे महात्मा भी कहलाये…खैर… उन दोनों (फ़िरोज और इन्दिरा) को भारत बुलाकर जनता के सामने दिखावे के लिये एक बार पुनः वैदिक रीति से उनका विवाह करवाया गया, ताकि उनके खानदान की ऊँची नाक (?) का भ्रम बना रहे । इस बारे में नेहरू के सेक्रेटरी एम.ओ.मथाई अपनी पुस्तक “रेमेनिसेन्सेस ऑफ़ थे नेहरू एज” (पृष्ट ९४ पैरा २) (अब भारत सरकार द्वारा प्रतिबन्धित) में लिखते हैं कि “पता नहीं क्यों नेहरू ने सन १९४२ में एक अन्तर्जातीय और अन्तर्धार्मिक विवाह को वैदिक रीतिरिवाजों से किये जाने को अनुमति दी, जबकि उस समय यह अवैधानिक था, कानूनी रूप से उसे “सिविल मैरिज” होना चाहिये था” । यह तो एक स्थापित तथ्य है कि राजीव गाँधी के जन्म के कुछ समय बाद इन्दिरा और फ़िरोज अलग हो गये थे, हालाँकि तलाक नहीं हुआ था । फ़िरोज गाँधी अक्सर नेहरू परिवार को पैसे माँगते हुए परेशान किया करते थे, और नेहरू की राजनैतिक गतिविधियों में हस्तक्षेप तक करने लगे थे । तंग आकर नेहरू ने फ़िरोज का “तीन मूर्ति भवन” मे आने-जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था । मथाई लिखते हैं फ़िरोज की मृत्यु से नेहरू और इन्दिरा को बडी़ राहत मिली थी । १९६० में फ़िरोज गाँधी की मृत्यु भी रहस्यमय हालात में हुई थी, जबकि वह दूसरी शादी रचाने की योजना बना चुके थे । अपुष्ट सूत्रों, कुछ खोजी पत्रकारों और इन्दिरा गाँधी के फ़िरोज से अलगाव के कारण यह तथ्य भी स्थापित हुआ कि श्रीमती इन्दिरा गाँधी (या श्रीमती फ़िरोज खान) का दूसरा बेटा अर्थात संजय गाँधी, फ़िरोज की सन्तान नहीं था, संजय गाँधी एक और मुस्लिम मोहम्मद यूनुस का बेटा था । संजय गाँधी का असली नाम दरअसल संजीव गाँधी था, अपने बडे भाई राजीव गाँधी से मिलता जुलता । लेकिन संजय नाम रखने की नौबत इसलिये आई क्योंकि उसे लन्दन पुलिस ने इंग्लैण्ड में कार चोरी के आरोप में पकड़ लिया था और उसका पासपोर्ट जब्त कर लिया था । ब्रिटेन में तत्कालीन भारतीय उच्चायुक्त कृष्ण मेनन ने तब मदद करके संजीव गाँधी का नाम बदलकर नया पासपोर्ट संजय गाँधी के नाम से बनवाया था (इन्हीं कृष्ण मेनन साहब को भ्रष्टाचार के एक मामले में नेहरू और इन्दिरा ने बचाया था) । अब संयोग पर संयोग देखिये… संजय गाँधी का विवाह “मेनका आनन्द” से हुआ… कहाँ… मोहम्मद यूनुस के घर पर (है ना आश्चर्य की बात)… मोहम्मद यूनुस की पुस्तक “पर्सन्स, पैशन्स एण्ड पोलिटिक्स” में बालक संजय का इस्लामी रीतिरिवाजों के मुताबिक खतना बताया गया है, हालांकि उसे “फ़िमोसिस” नामक बीमारी के कारण किया गया कृत्य बताया गया है, ताकि हम लोग (आम जनता) गाफ़िल रहें…. मेनका जो कि एक सिख लडकी थी, संजय की रंगरेलियों की वजह से गर्भवती हो गईं थीं और फ़िर मेनका के पिता कर्नल आनन्द ने संजय को जान से मारने की धमकी दी थी, फ़िर उनकी शादी हुई और मेनका का नाम बदलकर “मानेका” किया गया, क्योंकि इन्दिरा गाँधी को “मेनका” नाम पसन्द नहीं था (यह इन्द्रसभा की नृत्यांगना टाईप का नाम लगता था), पसन्द तो मेनका, मोहम्मद यूनुस को भी नहीं थी क्योंकि उन्होंने एक मुस्लिम लडकी संजय के लिये देख रखी थी । फ़िर भी मेनका कोई साधारण लडकी नहीं थीं, क्योंकि उस जमाने में उन्होंने बॉम्बे डाईंग के लिये सिर्फ़ एक तौलिये में विज्ञापन किया था । आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि संजय गाँधी अपनी माँ को ब्लैकमेल करते थे और जिसके कारण उनके सभी बुरे कृत्यों पर इन्दिरा ने हमेशा परदा डाला और उसे अपनी मनमानी करने की छूट दी । ऐसा प्रतीत होता है कि शायद संजय गाँधी को उसके असली पिता का नाम मालूम हो गया था और यही इन्दिरा की कमजोर नस थी, वरना क्या कारण था कि संजय के विशेष नसबन्दी अभियान (जिसका मुसलमानों ने भारी विरोध किया था) के दौरान उन्होंने चुप्पी साधे रखी, और संजय की मौत के तत्काल बाद काफ़ी समय तक वे एक चाभियों का गुच्छा खोजती रहीं थी, जबकि मोहम्मद यूनुस संजय की लाश पर दहाडें मार कर रोने वाले एकमात्र बाहरी व्यक्ति थे…। (संजय गाँधी के तीन अन्य मित्र कमलनाथ, अकबर अहमद डम्पी और विद्याचरण शुक्ल, ये चारों उन दिनों “चाण्डाल चौकडी” कहलाते थे… इनकी रंगरेलियों के किस्से तो बहुत मशहूर हो चुके हैं जैसे कि अंबिका सोनी और रुखसाना सुलताना [अभिनेत्री अमृता सिंह की माँ] के साथ इन लोगों की विशेष नजदीकियाँ….)एम.ओ.मथाई अपनी पुस्तक के पृष्ठ २०६ पर लिखते हैं – “१९४८ में वाराणसी से एक सन्यासिन दिल्ली आई जिसका काल्पनिक नाम श्रद्धा माता था । वह संस्कृत की विद्वान थी और कई सांसद उसके व्याख्यान सुनने को बेताब रहते थे । वह भारतीय पुरालेखों और सनातन संस्कृति की अच्छी जानकार थी । नेहरू के पुराने कर्मचारी एस.डी.उपाध्याय ने एक हिन्दी का पत्र नेहरू को सौंपा जिसके कारण नेहरू उस सन्यासिन को एक इंटरव्यू देने को राजी हुए । चूँकि देश तब आजाद हुआ ही था और काम बहुत था, नेहरू ने अधिकतर बार इंटरव्य़ू आधी रात के समय ही दिये । मथाई के शब्दों में – एक रात मैने उसे पीएम हाऊस से निकलते देखा, वह बहुत ही जवान, खूबसूरत और दिलकश थी – । एक बार नेहरू के लखनऊ दौरे के समय श्रध्दामाता उनसे मिली और उपाध्याय जी हमेशा की तरह एक पत्र लेकर नेहरू के पास आये, नेहरू ने भी उसे उत्तर दिया, और अचानक एक दिन श्रद्धा माता गायब हो गईं, किसी के ढूँढे से नहीं मिलीं । नवम्बर १९४९ में बेंगलूर के एक कॉन्वेंट से एक सुदर्शन सा आदमी पत्रों का एक बंडल लेकर आया । उसने कहा कि उत्तर भारत से एक युवती उस कॉन्वेंट में कुछ महीने पहले आई थी और उसने एक बच्चे को जन्म दिया । उस युवती ने अपना नाम पता नहीं बताया और बच्चे के जन्म के तुरन्त बाद ही उस बच्चे को वहाँ छोडकर गायब हो गई थी । उसकी निजी वस्तुओं में हिन्दी में लिखे कुछ पत्र बरामद हुए जो प्रधानमन्त्री द्वारा लिखे गये हैं, पत्रों का वह बंडल उस आदमी ने अधिकारियों के सुपुर्द कर दिया ।
मथाई लिखते हैं – मैने उस बच्चे और उसकी माँ की खोजबीन की काफ़ी कोशिश की, लेकिन कॉन्वेंट की मुख्य मिस्ट्रेस, जो कि एक विदेशी महिला थी, बहुत कठोर अनुशासन वाली थी और उसने इस मामले में एक शब्द भी किसी से नहीं कहा…..लेकिन मेरी इच्छा थी कि उस बच्चे का पालन-पोषण मैं करुँ और उसे रोमन कैथोलिक संस्कारों में बडा करूँ, चाहे उसे अपने पिता का नाम कभी भी मालूम ना हो…. लेकिन विधाता को यह मंजूर नहीं था…. खैर… हम बात कर रहे थे राजीव गाँधी की…जैसा कि हमें मालूम है राजीव गाँधी ने, तूरिन (इटली) की महिला सानिया माईनो से विवाह करने के लिये अपना तथाकथित पारसी धर्म छोडकर कैथोलिक ईसाई धर्म अपना लिया था । राजीव गाँधी बन गये थे रोबेर्तो और उनके दो बच्चे हुए जिसमें से लडकी का नाम था “बियेन्का” और लडके का “रॉल” । बडी ही चालाकी से भारतीय जनता को बेवकूफ़ बनाने के लिये राजीव-सोनिया का हिन्दू रीतिरिवाजों से पुनर्विवाह करवाया गया और बच्चों का नाम “बियेन्का” से बदलकर प्रियंका और “रॉल” से बदलकर राहुल कर दिया गया… बेचारी भोली-भाली आम जनता !
प्रधानमन्त्री बनने के बाद राजीव गाँधी ने लन्दन की एक प्रेस कॉन्फ़्रेन्स में अपने-आप को पारसी की सन्तान बताया था, जबकि पारसियों से उनका कोई लेना-देना ही नहीं था, क्योंकि वे तो एक मुस्लिम की सन्तान थे जिसने नाम बदलकर पारसी उपनाम रख लिया था । हमें बताया गया है कि राजीव गाँधी केम्ब्रिज विश्वविद्यालय के स्नातक थे, यह अर्धसत्य है… ये तो सच है कि राजीव केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में मेकेनिकल इंजीनियरिंग के छात्र थे, लेकिन उन्हें वहाँ से बिना किसी डिग्री के निकलना पडा था, क्योंकि वे लगातार तीन साल फ़ेल हो गये थे… लगभग यही हाल सानिया माईनो का था…हमें यही बताया गया है कि वे भी केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की स्नातक हैं… जबकि सच्चाई यह है कि सोनिया स्नातक हैं ही नहीं, वे केम्ब्रिज में पढने जरूर गईं थीं लेकिन केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में नहीं । सोनिया गाँधी केम्ब्रिज में अंग्रेजी सीखने का एक कोर्स करने गई थी, ना कि विश्वविद्यालय में (यह बात हाल ही में लोकसभा सचिवालय द्वारा माँगी गई जानकारी के तहत खुद सोनिया गाँधी ने मुहैया कराई है, उन्होंने बडे ही मासूम अन्दाज में कहा कि उन्होंने कब यह दावा किया था कि वे केम्ब्रिज की स्नातक हैं, अर्थात उनके चमचों ने यह बेपर की उडाई थी)। क्रूरता की हद तो यह थी कि राजीव का अन्तिम संस्कार हिन्दू रीतिरिवाजों के तहत किया गया, ना ही पारसी तरीके से ना ही मुस्लिम तरीके से । इसी नेहरू खानदान की भारत की जनता पूजा करती है, एक इटालियन महिला जिसकी एकमात्र योग्यता यह है कि वह इस खानदान की बहू है आज देश की सबसे बडी पार्टी की कर्ताधर्ता है और “रॉल” को भारत का भविष्य बताया जा रहा है । मेनका गाँधी को विपक्षी पार्टियों द्वारा हाथोंहाथ इसीलिये लिया था कि वे नेहरू खानदान की बहू हैं, इसलिये नहीं कि वे कोई समाजसेवी या प्राणियों पर दया रखने वाली हैं….और यदि कोई सानिया माइनो की तुलना मदर टेरेसा या एनीबेसेण्ट से करता है तो उसकी बुद्धि पर तरस खाया जा सकता है और हिन्दुस्तान की बदकिस्मती पर सिर धुनना ही होगा…

Saturday, 25 May 2013

अपने महान हिंदू धर्म कि महान विरासत को

हमारे ऋषि-मुनियों ने कठोर तपस्याएं कि जिनके परिणामस्वरूप उन्हें ईश्वर का दर्शन हुआ और ईश्वर द्वारा उसकी इस सृष्टि के जीवन-मरण के अदभुत चक्र का ज्ञान प्राप्त हुआ तथा अनेक सिद्धियाँ (शक्तियाँ ) प्राप्त हुई जिनका प्रयोग करके उन्होनें ब्रह्मांड आदि के भी अनेक रहस्यों को जाना |


इस सारे ज्ञान को उन्होनें अपनी अगली पीढ़ी को सौंपा ,उस अगली पीढ़ी ने अपनी अगली पीढ़ी को वो ज्ञान ट्रांसफर किया ,ध्यान रहे यह सब मौखिक और क्रिया रूप में किया जाता रहा ना कि लिखित रूप में क्योंकि उस समय के हमारे भारतवासियों कि स्मरण शक्ति इतनी अधिक थी कि उन्हें उसे लिखकर याद रखने कि आवश्यकता नहीं थी ,गुरु अपने शिष्यों को मौखित रूप में ही सब कुछ बता देते थे और साक्षात् उसे सारी क्रियाओं का दर्शन देके और करवाकर उसे उसमें पारंगत कर देते थे यानी Oral Theory + Practical ये आज से हजारों से हजारों साल पुराना समय था |


ऐसा अनेकों वर्षों तक चलता रहा ,बाद में धीरे-२ प्रकर्ति में कुछ परिवर्तन आने शुरू हुए जिनका अच्छा-बुरा असर हम भारतवासियों पर भी पढ़ा और हमारी स्मरणशक्ति में थोड़ी कमी आनी शुरू हुई | अब वह पहले जितनी तीक्ष्ण नहीं रही थी ,केवल उदहारण के तौर ( यद्यपि असल संख्या बहुत ज्यादा थी ) पर अगर पुरानी पीढ़ी ने उस ज्ञान के एक लाख श्लोक नई पीढ़ी को बताए तो नई पीढ़ी केवल उसका 98% ही हुबहू रूप ग्रहण कर पाई ,बाकी 2 % को भी उसने किया जरूर परन्तु थोड़ी सी गडबड़ी के साथ | इतने विराट और अधिक ज्ञान को वैसा का वैसा याद रखने में कठिनाई महसूस कि जाने लगी |


अचानक आ रहे इस परिवर्तन को उस समय के महर्षि कृष्ण द्वैपायन व्यास जी ने समझ लिया और उन्हें चिंता हुई कि अगर ऐसे ही चलता रहा तो आने वाली पीढ़ियों के लिए यह विलक्षण ज्ञान नष्ट हो जाएगा या अगर उन तक पहुंचेगा भी तो वो गलत ,तोड़ा-मरोड़ा ,त्रुटिपूर्ण होगा जिससे कि धर्म पर अनास्था बढ़ेगी |


तो इस समस्या पर गहनतापूर्वक विचार करके उन्हें ये महसूस हुआ कि अब खाली मौखिक रूप से यह ज्ञान अगली पीढ़ी तक बिलकुल शुद्ध रूप में पहुंचाना सम्भव नहीं इसलिए उन्होनें इस ज्ञान को लिपिबद्ध यानी लिखित रूप में संजोकर अगली पीढ़ी दर पीढ़ी तक पहुंचाने का निर्णय किया |


ऐसा करने के लिए उन्होनें इस सारे ज्ञान को इकट्ठा करके उसे चार हिस्सों में बाँट दिया और उसे चार किताबों में लिख दिया | ऋग्वेद ,यजुर्वेद ,सामवेद और अथर्वेद | वेद का शाब्दिक अर्थ है ज्ञान | वेद का चार रूपों में ऐसा विभाजन करने के कारण ही महर्षि कृष्ण द्वैपायन व्यास जी वेद-व्यास के नाम से प्रसिद्ध हुए


प्रत्येक वेद-पुस्तक में वेद-व्यास जी ने मुख्यतः तीन खंड बनाए -


पहले खंड में श्लोक रूपी वे कवितायें डाली गई हैं जिनमें प्रकृति को उस ईश्वर का ही साक्षात् मौजूद स्वरूप मानकर उसकी उपासना कि गई है | यही कारण है कि उस समय ये ग्लोबल-वार्मिंग जैसी समस्याएं उत्पन्न नहीं होती थी क्योंकि उस समय मानव ने प्रकृति का शोषण नहीं किया क्योंकि वे प्रत्येक कण में ईश्वर का वास मानते थे जिसके कारण वे जानते थे कि हमें प्रकृति से केवल अपनी आवश्यकता तक का ही लेने का हक है परन्तु उससे अधिक लेकर उसका शोषण करके अन्य जीव-जन्तुओं तथा आने वाली पीढ़ी के जीवन को खतरे में डालने का हक हमें नहीं है | दुनिया के अनेक विद्वानों और विचारकों ने स्वयं इस बात को माना है कि इस खंड में जो कवितायें दी हुई हैं वे कविता कि दृष्टि से हर मापदंड में इतनी अधिक perfect हैं कि आज कि कविताओं कि उनके सामने कोई तुलना नहीं हो सकती |


दूसरे खंड में उन्होनें कर्म-कांड कि विधियाँ डाली हैं | इस कर्म-कांड के विषय में ये विवाद हो सकता है कि क्या इनसे वाकई कुछ लाभ होता है | उदहारण के तौर पर धन-तेरस में हमारे यहाँ कोई ना कोई बर्तन खरीद कर लाने का विधान है इस उम्मीद में कि इससे हमारे घर में धन कि वृद्धि होगी | अब असल में इस सबसे हमें कुछ फायदा होता हो या ना होता हो परन्तु क्या हमने कभी सोचा है कि इन त्योहारों में बताए गए सामान कि खरीददारी करने से उसे बनाने वाले कितने हजारों गरीब लोगों को स्वरोजगार एवं आमदानी कि सम्भावना खड़ी होती है | और बहुत सी कर्म-कांड कि विधियों के तो कई ऐसे वैज्ञानिक प्रमाण भी साबित हुए हैं जिनके अनुसार उससे हमारे आसपास के वातावरण पर काफी अच्छा असर पड़ता है और नकारत्मक उर्जा दूर होकर सकारात्मक उर्जा निर्माण होती है |

तीसरे और अंतिम खंड में उन्होनें स्वयं को जानने का ,इस सृष्टि एवं ब्रह्मांड के रहस्यों को जानने का ,इस जीवन-मरण के चक्र को जानने इत्यादि का वह विलक्षण ज्ञान डाला जिसे पाने के लिए आज हम सभी लालियत रहते हैं कि आखिर हमारे जीवन का उदेश्य क्या है ,ईश्वर ने हमें क्यों इस धरती पर भेजा आदि आदि | हिंदू धर्म के इस रहस्यमयी ज्ञान को अथवा इस तीसरे खंड को ‘’ उपनिषदों ‘’ के नाम से भी जाना जाता है और ‘’ वेदान्त ‘’ के नाम से भी | वेदान्त के नाम से इसलिए क्योंकि यह वेद का अंतिम खंड है जिसके पश्चात इस वेद-पुस्तक का अंत होता है इसलिए इसे कहा गया ‘’ वेदान्त ‘’ | और उपनिषद नाम इसलिए क्योंकि इसमें मौजूद ज्ञान को शिष्य गुरुकुल में अपने गुरु के समीप बैठकर ग्रहण करते थे | उप का मतलब पास में ,नि का मतलब नीचे और षद का मतलब बैठकर यानी के गुरु के समीप नीचे बैठकर एकाग्रता पूर्वक ग्रहण किया गया अदभुत ज्ञान जो कि संस्कृत रूप में कहलाया ‘’ उपनिषद ‘’ |

Thursday, 23 May 2013

सरकार की मंशा से उभरी आशंका

हिन्दी क्षेत्र में, विशेषकर उत्तर प्रदेश में एक प्रचलित कहावत है-
जबरिया मारे, रोबन भी न दे
अर्थात कोई किसी को जबरदस्ती मारे, उसे दर्द हो तो उसे रोने भी न दे। लगता है केन्द्र में सत्तारूढ़ कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार की यही मंशा है। सरकार घोटाले पर घोटाले करती रहे पर न आप शोर करिए, न जांच हो। सरकार की गलत नीतियों से महंगाई बढ़े, जनता दर्द से कराहे, पर उनके प्रदर्शन हों तो पुलिस उनपर लाठी बराए। संसद में घोटालों और नाकामियों के मुद्दे न उठें, इसीलिए वहां भी हंगामा। इस सबके बीच इंटरनेट के माध्यम से एक नई मुहिम शुरू हुई-सोशल नेटवर्क, तो उसकी साइट्स पर भी सरकार की तिरछी नजर है। सन् 2011 में योगगुरू स्वामी रामदेव व समाजसेवी अण्णा हजारे के आंदोलन के समय सरकार के हाथ-पांव फूल गए थे। उसे लगा कि इन सोशल नेटवर्किंग साइट्स के कारण ही हंगामा बरपा है।
उस समय सरकार और उसके बड़बोले संचार मंत्री कपिल सिब्बल ने इन साइट्स को नियंत्रित करने के नाम पर उनको दबाने का भी प्रयास किया। फेसबुक, ट्विटर पर पढ़ी-लिखी जनता अपने मन की बात भी न कह सके, इसके लिए असम हिंसा की आड़ लेकर उन्हें प्रतिबंधित करने की पूरी तैयारी थी, पर बात नहीं बनी। उसके बाद से सूचना प्रौद्योगिकी कानून का जमकर दुरुपयोग किया गया। फेसबुक, ट्विटर पर किसी नेता या सम्प्रदाय के विरुद्ध टिप्पणी करने वालों को बिना पूरी प्रक्रिया के जेल की हवा खानी पड़ी। महाराष्ट्र की दो युवतियों की ऐसे ही एक मामले में गिरफ्तारी से आईटीएक्ट की धारा 66ए के दुरुपयोग की बात सामने आई तो चौतरफा निंदा हुई। आनन फानन में उन युवतियों को छोड़ा गया, न्यायालय ने भी फटकारा और केन्द्र सरकार को उस संबंध में दिशा निर्देश जारी करने पड़े।
पर जब सारा जोर चोर-चोर के शोर को दबाने पर लगा हो तो कानून ऐसे बनाए जाते हैं या इस तरह तोड़-मरोड़े जाते हैं जिससे जनता की आवाज गले में ही घुटकर रह जाए। आंध्र प्रदेश की पुलिस ने भी ऐसी ही एक आवाज का गला घोंट दिया था। गैरसरकारी संगठन की कार्यकर्त्ता जया विंध्यालया ने फेसबुक पर प्रदेश के राज्यपाल और एक विधायक के खिलाफ कड़ी टिप्पणी कर दी, जिसे इन दोनों ने आपत्तिजनक माना और शिकायत होते ही जया पहुंच गई सलाखों के पीछे। इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचाने वाली श्रेया सिंघल की एक याचिका का निपटारा करते हुए न्यायाधीश बी.एस.चौहान और न्यायाधीश दीपक मिश्रा की खंडपीठ ने गत 16 मई को दिए निर्देश में साफ कर दिया कि ऐसे मामलों में सोच समझकर कार्रवाई की जाए। न्यायालय ने आईटी एक्ट की धारा 66(ए) पर पूरी तरह से रोक लगाने से तो इनकार कर दिया और उसकी वैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका का अलग से निपटारा करने को कहा, पर यह भी साफ-साफ कहा कि सोशल साइट्स पर आपत्तिजनक टिप्पणी के मामलों में किसी की गिरफ्तारी से पूर्व वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की अनुमति आवश्यक होगी। जिले के पुलिस अधीक्षक, क्षेत्र के महानिरीक्षक आदि की अनुमति के बिना आईटी एक्ट की धारा 66(ए) के अन्तर्गत किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार न किया जाए।
इधर वर्तमान सूचना और प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी भी गाहे-बगाहे मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर टिप्पणी कर रहे हैं। स्वामी रामदेव एवं अण्णा हजारे के आंदोलन के समय मीडिया का सुर सरकार के विरुद्ध था। पर अचानक ऐसा कुछ हुआ कि कुछ चैनलों और अखबारों के तेवर ढीले पड़ गए और जनजागरण में लगे इन दोनों योद्धाओं के आंदोलन के उद्देश्यों पर आशंकाओं के तीर छोड़ जाने लगे। इसके पीछे सरकार की इस सलाह का दबाव भी माना जा रहा था कि मीडिया को आत्मनियंत्रण के लिए स्वयं एक तंत्र बनाना चाहिए। पर वस्तुत: आत्म नियंत्रण की सलाह के पीछे सरकारी नियंत्रण का संदेश साफ-साफ प्रतिध्वनित हो रहा था।
जनता से संवाद के एक और सबसे सशक्त माध्यम टेलीविजन पर भी सरकारी नियंत्रण की पदचाप धीरे-धीरे सुनाई देने लगी है। पिछले कुछ दिनों तक देश के 38 महानगरों में हाहाकार मचा हुआ था और सब तरफ 'सेट टाप बाक्स, सेट टाप बाक्स' का शोर सुनाई दे रहा है। इन 38 महानगरों के टेलीविजन उपभोक्ताओं को 31 मार्च तक सेट टाप बाक्स लगवाना अनिवार्य कर दिया गया था, जिसे बढ़ाकर 15 अप्रैल कर दिया गया। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने साफ कर दिया कि अगर आपके केबल आपरेटर ने या आपने स्वयं 15 अप्रैल तक सेट टाप बाक्स नहीं लगवाया तो मनोरंजन की छुट्टी, बुद्धू बक्सा सिर्फ बक्सा ही रह जाएगा। बच्चों की गर्मियों की छुट्टी और उस पर से 'जम्पिंग जपांग' की तान-ऐसे में टीवी बंद हो जाएं तो मानों जीवन में कुछ बचा ही नहीं, इसलिए भगदड़ मच गई। 800-900 रु. का सेट टाप बाक्स 1500-1500 रु. तक में बिका, फिर भी पूरा नहीं पड़ा। देश के हजारों घर इन दिनों 'मनोरंजन' के बिना ही रह रहे हैं, क्योंकि कई महानगरों में सेट टाप बाक्स लगाने वाली कंपनियों की मनमानी और खींचतान के चलते टेलीविजन नहीं चल पा रहे हैं। जब तैयारी पूरी नहीं थी तो आखिर समय सीमा निर्धारित करने की जरूरत क्या थी? सरकार ने सेट टाप बाक्स की कालाबाजारी का अवसर क्यों प्रदान किया? और उससे भी बड़ी बात की सबको सेट टाप बाक्स लगवाना अनिवार्य ही क्यों किया गया?
दरअसल यह सारी कवायद शुरू हुई है 2006-07 से, तब एक शब्द हवा में तैरा-कैस, यानी कंडीशनल एक्सेस सिस्टम। टेलीविजन उपभोक्ताओं के ऊपर एक सुनहरा जाल फेंका गया कि अब आप जो देखना चाहें, सिर्फ उसी के पैसे दें, केबल आपरेटरों की मनमानी से मुक्ति पाएं। कहा यह भी गया केबल टेलिविजन उद्योग में बढती अव्यवस्था और उपभोक्ताओं की तरफ से लगातार आ रही शिकायतों की वजह से सरकार ने 'कैस' व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया। कहने को इसका उद्देश्य केबल सेवाओं में पारदर्शिता लाना है। अब केबल आपरेटर हर दूसरे महीने चैनलों की बढ़ी दर का हवाला देकर केबल कनेक्शन की राशि नहीं बढ़ाएंगे। प्रसारणकर्ताओं की यह नाराजगी भी दूर हो जाएगी कि ज्यादातर केबलआपरेटर उनके चैनलों के दर्शकों की संख्या ठीक नहीं बताते। 'कैस' लागू होने से व्यवस्था में पारदर्शिता आएगी, प्रसारणकर्ता अपने चैनलों के उपभोक्ताओं की सही संख्या जान पाएंगे, क्योंकि 'सेट टाप' बक्से के जरिए ही भुगतान चैनल उन तक पहुंचेंगे। जब उन्हें अपने दर्शकों की सही संख्या पता चल जाएगी, तो वे विज्ञापनदाताओं से ठोस सबूत के आधार पर बात कर पाएंगे। अभी विज्ञापनदाता टेलीविजन 'आडियंस मानीटर' जैसी कुछ सर्वेक्षण कम्पनियों आदि की रपट के आधार पर प्रसारण कम्पनियों को विज्ञापन देते हैं और दर्शक उन्हें एक केबल कनैक्शन लेकर देखते हैं। लेकिन अब कुछ भुगतान चैनलों को दर्शक सिर्फ 'सेट टाप बक्से' के जरिए एक निश्चित राशि अदा करने के बाद ही देख सकेंगे फ्री चैनल, पेड चैनल डिजिटलाइजेशन, बेहतर तस्वीर और साफ आवाज, सरकार को मनोरंजन कर की प्राप्ति, विज्ञापनदाताओं के लिए सही दर्शक संख्या, इंटरएक्टिव टीवी और जो देखो उसके ही पैसे दो की कवायद में सरकार ने एक बड़ा खेल खेला और वह उसमें सफल भी होती दिख रही है। वह यह कि देश के हजारों-लाखों केबल आपरेटरों की बजाय अब उसे सिर्फ 5 प्रमुख केबल आपरेटर्स को ही नियंत्रित करना पड़ेगा। पहले केबल आपरेटर स्वतंत्र थे, उनकी छतरी पर उपग्रह से सीधे एनालॉग सिग्नल आते थे और वे तारों (केबल) के द्वारा उपभोक्ता तक पहुंचाते थे। शहर में साम्प्रदायिक हिंसा आदि किसी विषमपरिस्थिति में यदि उस पर नियंत्रण करना होता था तो प्रशासन निर्देशित करता था और पूरा प्रसारण ठप। पता चल जाती थी शासन प्रशासन की मंशा। पर अब सरकार चाहे और सिर्फ 5 आपरेटर्स की बांह मरोड़ दे और इशारा कर दे कि फलां फलां चैनल का प्रसारण कुछ समय के लिए ठप कर दो, क्योंकि वह सरकार के विरुद्ध ज्यादा जहर उगल रहे हैं, तो सिर्फ वही चैनल आप नहीं देख पाएंगे। आपको पता भी नहीं चलेगा और 'सेंसरशिप' लागू हो जाएगी। कैस सिस्टम के अन्तर्गत सैप टाप बाक्स लगवाना अनिवार्य किए जाने के पीछे उपजी इस आशंका को अब दरकिनार नहीं किया जा सकता। अभी तो यह शुरुआती दौर है। पहले 4 महानगरों (दिल्ली, मुम्बई, चेन्नै, बेंगलूरु) के बाद अब 38 महानगरों में कैस प्रणाली लागू हो गयी है। इसके बाद अब नगरों, फिर उपनगरों और गांव तक जाने की तैयारी है। इस प्रणाली के पूरी तरह लागू हो जाने के बाद सरकार को उपभोक्ताओं की सही संख्या तो पता चलेगी ही, उसे पूरा मनोरंजन शुल्क भी मिलेगा। पर इससे अधिक उसे वह ताकत भी मिलने की आशंका है, जिसे वह प्रसार माध्यमों पर अपने नियंत्रण के लिए जरूरी समझती है। 

Wednesday, 22 May 2013

सत्य की निरंतर खोज का नाम ही हिन्दू-धर्म है

हिन्दू-धर्म कोई संप्रदाय या पूजा पद्धति नहीं है। हिन्दुत्व एक सांस्कृतिक धारा है जो सभी को जोड़ने का कार्य करता है। सत्य की निरंतर खोज का नाम ही हिन्दू-धर्म है। यही विचार स्वामी विवेकानन्दजी के थे, जो आज के युग में भी प्रासंगिक और आवश्यक है। उक्त विचार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल ने स्वामी विवेकानन्द सार्ध शती समारोह समिति द्वारा आयोजित प्रबुद्ध नागरिक सम्मेलन में व्यक्त किए।
स्वामीजी ने विदेश की धरती पर जाकर उस समय भारत के प्रति प्रचलित धारणा – भारत के लोग जंगली, बर्बर और गवांर है, को नकारा और वास्तविक भारतीय दर्शन का प्रतिपादन किया। उन्होंने कहा कि मैं उनका प्रतिनिधि हूँ जो प्राणी मात्र के सुख का चिन्तन करते हैं। भारत का दर्शन वहीं हो सकता है जिसमें सभी के कल्याण की बात हो, जो ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’, ‘एकम् सत विप्रा बहुधा वदन्ति’ का संदेश देता हो।
स्वामीजी ने आग्रह किया कि ‘शिव भाव से जीव सेवा’ ही भारतीयों का कर्तव्य है। ये भगवा वस्त्र, मठ, मंदिर केवल स्वयं की साधना के लिए ही नहीं है अपितु असहायों, जरूरतमंदो की सेवा करने के लिए है। तुम तभी हिन्दू कहलाने के लायक होगें जब सामने खड़ा व्यक्ति का दु:ख तुम्हें अपना लगे।
डॉ. कृष्ण गोपाल ने कहा कि समाज में फैली हुई कुरीतियों को दूर करने के लिए एक नए ग्रंथ की रचना करनी होगी। महिला शिक्षा पर जोर देना होगा। दुनिया के लोग भारतीय दर्शन को समझने लगे हैं। स्वामीजी की हम इस वर्ष 150वीं जयंती मना रहे हैं। यह विडम्बना का विषय है कि भारत में पैदा हुए युगपुरुष स्वामी विवेकानन्द के जन्म दिवस को युवा दिवस के रूप में मनाने कि पहल यू. एन. ओ. ने की, फिर इसके बाद भारत में इसकी शुरूआत हुई। विवेकानन्दजी चाहते थे कि भारत दुनिया का नेतृत्त्व करें, किन्तु पहले भारत में रहने वाले असहाय, गरीब और जरूरतमंद की सेवा को प्रभु की भक्ति माने। उन्होंने कहा कि हिन्दू-धर्म व संस्कृति में भेदभाव का कोई स्थान नहीं है।
मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए “प्रात:काल” समाचार पत्र के मुख्य सम्पादक सुरेश गोयल ने कहा कि यह हमारे लिए बहुत गौरव की बात है कि भारत में युवाओं का प्रतिशत सर्वाधिक है और अगर हमें देश को आगे बढ़ाना है तो इस सामर्थ्यवान युवाशक्ति को आगे लाना होगा। लेकिन हम अपनी युवा पीढ़ी के सामर्थ्य का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं, फलस्वरूप हमारे युवा पश्चिमी संस्कृति के वाहक बन गए हैं।
लेफ्टनेंट जनरल नन्दकिशोर सिंह ने इस कार्यक्रम की अध्यक्षता की।
‘हिन्दू एक बड़ा मंच है जिस पर कई संप्रदाय खड़े हैं’
हिन्दू संकुचित शब्द नहीं है। पाश्च्चात्य संस्कृति से प्रभावित व्यक्ति, विश्व के अन्य सम्प्रदायों से तुलना कर हिन्दू को भी सम्प्रदाय मानते हैं। यह उनकी बहुत बड़ी भूल है, क्योंकि हिन्दू तो एक बड़ा मंच है जिस पर कई सम्प्रदाय खड़े हैं, ऐसा प्रतिपादन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डॉ. कृष्ण गोपाल ने किया। स्वामी विवेकानन्द सार्ध शती समारोह समिति, उदयपुर द्वारा 27 अप्रैल, 2013 को सामाजिक सद्भावना बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक में डॉ. कृष्ण गोपाल मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित थे।
पराधीनता के काल में प्राण रक्षा के लिए जातिगत व्यवस्था बनाकर कई प्रकार की व्यवस्थाऐं बनाई गईं, जो आज के परिपेक्ष्य में कुरीतियों के रूप में दिखाई देती हैं। आवश्यकता इस बात है कि स्वाधीनता के पश्चात प्राचीन जंजीरों की आवश्यकता नहीं है। इसलिए कुरीतियां रूपी जंजीरों को तोड़कर समाज में ऐक्यभाव देते हुए आगे बढ़ना चाहिए। जैसे, शरीर के विभिन्न अंगों में विभिन्नता होते हुए भी उनमें होने वाला रक्तसंचार शरीर के ऐक्यभाव को बनाए रखता है। उसी से हमारा राष्ट्रदेव खड़ा होगा। हजार-बारा सौ वर्ष के संघर्षकाल में प्राण रक्षा के लिए बहुमूल्य संस्कार छूट गए, जिन्हें पुन: संजोना होगा, ऐसा उन्होंने आवाहन किया।सद्भावना बैठक की भूमिका डॉ. भगवति प्रकाश ने रखी व विभिन्न समाजों के पधारे हुए प्रतिनिधियों ने अपने समाज में किए जा रहे नवाचारों को व्यक्त किया। 76 समाजों के 215 प्रतिनिधियों ने बैठक में भाग लिया। कार्यक्रम का संचालन रमेश शुक्ल ने किया व एकल गीत डॉ. कोशल शर्मा ने प्रस्तुत किया।

Wednesday, 15 May 2013

काग्रेस की काली नीयत और काले इतिहास

काग्रेस की काली नीयत और काले इतिहास
का काला सच अवश्य जानिये l
1. यह पार्टी पूरी तरह से हिन्दू मुस्लमान में फूट डालती है ।
2. अपने जन्म से ही यह पार्टी हिंदु
विरोधी पार्टी हैं.
3. भगत सिंह को फांसी लगाने
का विरोध नहीं किया उल्टा गाँधी नइ sign कर दिए ।
4. खिलाफत आन्दोलन को समर्थन किया.
5. क्रांतिकारियों को आतंकवादी बताते थे.
6. सुभाष चन्द्र बोस को कांग्रेस अध्यक्ष पद से
हटने को मजबूर किया.
7. देश का बंटवारा मंज़ूरकिया.
8. यदि बंटवारा हो ही गया थातो पूरी तरह से
होना चाहिए था, परन्तु नेहरु
गाँधी के कारण से नहीं हो पाया.
9. कश्मीर समस्या नेहरु परिवार की देन हैं.
10. धारा 370 नेहरु परिवार की देन हैं.
11. जब भारतीय सेना आगे बढ़ रही थी तो युद्ध
विराम घोषित किया.
12 पूरा कश्मीर भारत के पास आ रहा था,
तो नेहरु ने पाकिस्तान के पास
एकहिस्सा छोड़ दिया.
13 एक हिस्सा चीन के पास जाने दिया.
14. तिब्बत तश्तरी में उठा के चीन कोदे दिया.
15. पाकिस्तान को 56 करोड़ रूपये दिए.
16. देश के विभाजन की जिम्मेदार मुस्लिम लीग
को सरकार में साझा किया.
17. कश्मीर में श्यामा प्रसाद मुखर्जी को जेल में
डाल दिया, जहाँ पर
उनकी संदेहास्पद अवस्था में मौत हो गयी.
18. 1962 में चीन के सामने शर्मनाक रूप में
समर्पण किया.
19. 1971 की जीत को इंदिरा ने 1973 में
भुट्टो के सामने हार में बदल दिया.
20. देश में आपातकाल लागू किया.
21. इंदिरा के मरने पर देश में
20000सिक्खों का दर्दनाक क़त्ल करवा
दिया और कत्ल करने को नेशनल चैनल पर सबके सामने
लोगो को कहा
22. स्वर्ण मंदिर पर हमला किया और उसे नष्ट
कर दिया गया.
23. राजीव गाँधी ने अपने ही तमिल/हिंदु
भाइयोँ पर हमला करने के लिए
श्रीलंका में सेना भेजी, जिसमे हमारे 3000
जवान मारे गए.
24.हिन्दू मुस्लिमो को फूट डालने के लिए मुस्लिम आरक्षण
देना शुरू किया.
25. रामजन्म भूमि का विरोध शुरू किया.
26. राम सेतु को तुडवाना चाहा.
27. साधू संतो का व हिंदु प्रतीकों का अपमान
करना शुरू किया
28 हिंदुओ को आतंकवादी कहा ।
29. 4 जून आधी रातको योग गुरु बाबा रामदेव
के साथ अनशन कर रहे एक लाख
औरतोँ और बच्चों साधू-संतों पर रात के समय
लाठी व गोली चलवाई.
30. भृष्टाचार के सारे रिकॉर्ड तोड़दिए.
31. महंगाई ने लोगो से भोजन भी छीन लिया.
32. एक विदेशी औरत जो वेटर मात्र थी को आज
हमारे सर पर बैठा दिया.
33. प्रधानमंत्री की कुर्सी पर एक ही परिवार
का राज हो गया.
34. ओसामा को ओसामा जी व संतो को ठग बताते
हैं.
35.फूट डालने के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए.
36. Indian होना इसदेश में एक गाली के
समान हो गया हैं.
37. करोड़ों हिन्दुओं की आस्था के प्रतीक भगवान
श्रीराम चन्द्र
जी को काल्पनिक बताया आदि … ये सब नेहरु
परिवार व इस परिवार
की महाभ्रष्ट, लुटेरी पार्टी कांग्रेस
का इतिहास है, इसमें बहुत कुछ बाकी रह
गयाहै वो आप जोड़ देना -
हम तू इतना ही कहेंगें की अगर भारत
को बचाना है तो कांग्रेस हटाओ देश
बचाओ

Thursday, 9 May 2013

दिखावा छो़डो मातृभाषा से मन लगाओ ||

मातृभाषा हिन्दी के उत्थान के प्रयास हर घर में होना चाहिए। हिन्दी के प्रति गंभीरता और सम्मान जरूरी है तभीहम अपनी मातृभाषा की लाज बचा पाएंगे। विदेशी लोग हिन्दी को अपना रहे हैं जबकि हम खुद इससे जी चुरा रहे हैं। जरूरत हमारे नजरिए को बदलने की है। ये बातें विभिन्न महाविद्यालयों में हिन्दी पढ़ाने वाले विशेषज्ञों ने कही हैं।
महाविद्यालयों में हिन्दी विभाग के विद्यार्थियों की संख्या कितनी कम हुई है और हिन्दी के उत्थान के लिए क्या प्रयास किए जाना चाहिए, इसी पर आधारित है यह रिपोर्ट :
विशेषज्ञों से मिले कुछ सुझाव
* विद्यालयीन शिक्षा का माध्यम हर हालमें हिन्दी ही होना चाहिए
* विद्यालयों में हिन्दी के आधारभूत ज्ञान पर ध्यान देना चाहिए
* विभिन्न उद्देश्यों से होने वाले पत्र-व्यवहार में भी हिन्दी को प्राथमिकता दी जाना चाहिए ।
विद्यार्थियों की संख्या 70 से घटकर 15
शहर के विभिन्न शासकीय महाविद्यालयों में हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर स्तर तक पढ़ाई की व्यवस्था है। चिंता की बात है कि आम विषयों की अपेक्षा हिन्दी विषय के विद्यार्थियों की संख्या लगातार गिर रही है। शासकीय कला व वाणिज्य महाविद्यालय की हिन्दी विभागाध्यक्षडॉ. पुष्पलता जैन मजेजी ने बताया कि दोसाल में हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों की संख्या 70 से घटकर 15 हो गई है। सेमेस्टर पद्धति लागू होने और अन्य कारणों से भी हिन्दी साहित्य में नियमित विद्यार्थियों की संख्या तेजी से कम हो रही है।
घटती जा रही है रुचि
न्यू जीडीसी के प्राचार्य डॉ. अशोक वाजपेई ने बताया कि संस्थान में स्नातकोत्तर उपाधि के पूर्वार्द्ध में हिन्दी साहित्य के विद्यार्थियों की संख्या 20 है। पिछले कुछ सालों में यह कम हुई है, क्योंकि युवा वर्ग में हिन्दी भाषा कीउपाधि हासिल करने की रुचि कम हुई है। हिन्दी के प्रति रुझान पैदा करने और ज्यादा से ज्यादा उपयोग के लिए विद्यालयीन स्तर से ही प्रयास की जरूरत है।
बढ़ें रोजगार के अवसर
हिन्दी विभाग की सहायक प्राध्यापक डॉ.मनोरमा अग्रवाल ने बताया कि पिछली बारहिन्दी साहित्य के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम (पूर्वार्द्ध) में 16 विद्यार्थी थे, इस बार 8 ही हैं। विद्यार्थियों में हिन्दी के आधारभूत ज्ञान का अभाव होना इसका बड़ा कारण है। बच्चों को अच्छी हिन्दी लिखने, प़ढ़ने और सीखने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। मार्गदर्शिकाओं और कुंजियों से हटकर किताबों पर जोर दियाजाना तथा हिन्दी से संबंधित रोजगार केअवसर बढ़ाए जाना चाहिए।
अधूरा ज्ञान, ज्यादा कोशिश
अधिकांश वे ही लोग अंगरेजी बोलने की कोशिश करते हैं जिन्हें हिन्दी और अंगरेजी दोनों का ही अधूरा ज्ञान होताहै। कई लोग बोलचाल की भाषा में अंगरेजी के शब्दों का उपयोग करते हैं, लेकिन व्याकरण हिन्दी की ही होती है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनका दोनों ही भाषाओं का ज्ञान कमजोर है।
कई लोग खुद के अधीनस्थ लोगों से अथवा कम शिक्षित लोगों से अंगरेजी में बात कर यह जताना चाहते हैं कि उनके ज्ञान का स्तर काफी ऊंचा हैं। खुद को ज्यादा श्रेष्ठ साबित करने के इस तरह का दिखावा छो़ड़कर मातृभाषा के प्रति गंभीरता रखी जाना चाहिए।

Tuesday, 7 May 2013

बेदाग छवि नहीं रही है पवन बंसल की

बेदाग छवि नहीं रही है पवन बंसल की

मिस्टर क्लीन प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह के एक और खास सिपाही अब भ्रष्टाचार के आरोप में फँस रहे हैं। ये सिपाही हैं, रेल मन्त्री पवन कुमार बंसल। वैसे तो बंसल 1986 में ही राज्यसभा पहुँच गये थे और उसके बाद संसदीय जीवन की एक लम्बी पारी खेली है। लेकिन उनका वास्तविक राजनीतिक अभ्युदय मनमोहन सिंह के समय में हुआ। पहली बार वो यूपीए-1 में मनमोहन सिंह के कारण वित्त राज्य मन्त्री बने। दोबारा मनमोहन की सरकार बनी तो कैबिनेट रैंक में आये और संसदीय कार्यमन्त्री बन गये। जब ममता की पार्टी रेल मन्त्रालय से निकली तो उनकी लाटरी खुली और रेल मन्त्री बन गये। मनमोहन सिंह को खासी उम्मीद थी पवन बंसल से। एक तो बंसल विरोध की राजनीति नहीं करते। सामने वालों के लिये यसमैन रहते हैं। सरकार जो कहेगी वही करेंगे। रेल मन्त्रालय में यही किया। फिर मनमोहन सिंह को पवन बंसल के ज्ञान पर भी भरोसा रहा है। बंसल बिना बात के विवादों में नही पड़ते और यही काऱण है कि दिल्ली में स्वच्छ छवि बनाने में वे अभी तक कामयाब रहे थे।
लेकिन 3 मई 2013 की शाम उनके लिये खराब था। भ्रष्टाचार के आरोप में पवन बंसल बुरी तरह से घिर गये। उनके भांजे को 90 लाख रुपये का रिश्वत लेते सीबीआई ने गिऱफ्तार किया। वैसे चंडीगढ़ में इस बात की आम चर्चा थी कि अगर रेलवे में कोई काम हो तो विजय सिंगला से मिलो, पैसे दो और काम करवा लो। क्योंकि पवन बंसल के लिये सारा कामकाज वही देखते हैं। दरअसल रेल मन्त्री बनते ही पवन बंसल के रिश्तेदारों के यहाँ रेलवे के काम के लिये भीड़ लगने लगी थी। जिस दिन पवन बंसल को रेल मन्त्री बनाने का फैसला लिया गया था उस दिन चंडीगढ़ में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में पवन बंसल थे। जैसे ही उन्हें फोन से सूचना दी गयी उनके आसपास के समर्थक एक दूसरे को बधाई दे रहे थे। बधाई देने का कारण सिर्फ यह था कि सूखे संसदीय कार्य मन्त्रालय से उनका तबादला हरियाली वाले रेल मन्त्रालय में हो गया था। बेशक नई दिल्ली में पवन बंसल की गिनती ईमानदार मन्त्रियों में हो रही थी। लेकिन चंडीगढ़ में उनकी इमेज ईमानदार की कभी नहीं रही। उनके विरोधी उनके भांजे विजय सिंगला और उनके कुछ और रिश्तेदारों पर रेल मन्त्रालय में काम करवाने के एवज में डीलिंग करने का आरोप लगाते रहे।
विजय सिंगला इस समय सीबीआई की हिरासत में है। रेलवे बोर्ड के मेम्बर से काम के एवज में 90 लाख रुपये ले रहे थे। हालाँकि पवन बंसल ने इस मामले से पल्ला झाड़ लिया है। लेकिन देश की जनता बंसल की इस सफाई पर शायद ही भरोसा करे। अगर सीबीआई विजय सिंगला के पिछले पाँच छःह सालों में शुरू किये गये कई प्रोजेक्टों की भी जाँच करेगी तो पवन बंसल की मुश्किलें बढ़ जायेंगी क्योंकि विजय सिंगला ने चंडीगढ़ और इसके आसपास के लगते इलाकों में भारी सम्पत्ति अर्जित की है। शहर के सबसे महँगे इण्डस्ट्रियल एरिया में उनके प्लॉट हैं। ये प्लॉट पिछले कुछ सालों में ही खरीदे गये हैं। विजय सिंगला इण्डस्ट्रियल एरिया में ही  एक बड़ा मॉल बना रहे हैं। बीते साल ही इस मॉल में निर्माण कार्य के दौरान मलबा में दबकर मजदूरों की मौत हो गयी थी। लेकिन प्रशासन ने विजय सिंगला के दबदबे देख कोई कार्रवाई नहीं की थी। बंसल के तमाम विरोधियों का आरोप यही है कि विजय सिंगला के इस मॉल की ही सीबीआई जाँच करेगी तो पवन बंसल की मुश्किलें बढ़ जायेंगी। बंसल के खिलाफ लगातार चुनाव लड़ने वाले चंद्रशेखर सरकार में मन्त्री रहे हरमोहन धवन के अनुसार उन्होंने राजनीति में अपनी सम्पत्ति गँवायी लेकिन पवन बंसल की सम्पत्ति हर चुनाव के बाद बढ़ती गयी। धवन के अनुसार विजय सिंगला की सम्पत्तियों की ईमानदारी से अगर सीबीआई जाँच करवायेगी तो पवन बंसल के सारे निवेश का पता चल जायेगा। धवन आरोप लगाते है कि विजय सिंगला ने हिमाचल प्रदेश, चंडीगढ़, पंजाब और हरियाणा में अरबों रुपए की सम्पत्ति बनायी जो वास्तव में पवन बंसल की है।
सवाल यह है कि विजय सिंगला की गिरफ्तारी और घूस लिये जाने के मामले से पवन बंसल कैसे बच सकते हैं? घूस रेलवे के एक अधिकारी महेश कुमार ने भिजवायी। महेश कुमार पश्चिम रेलवे के जनरल मैनेजर भी रह चुके हैं। वे छोटे मोटे अधिकारी नहीं है। फिलहाल वो मेम्बर रेलवे बोर्ड हैं। आखिर रेलवे बोर्ड का एक मेम्बर पवन बंसल के भांजे को घूस क्यों देगा? समाज सेवा के लिये या मन्दिर में दान देने के लिये? अगर ये पैसे मन्दिर में दान और समाज सेवा के लिये नहीं थे फिर किसी काम के एवज में दिये गये। फिर उस अधिकारी का काम या उसके फाइलों पर दस्तखत विजय सिंगला को नहीं बल्कि पवन बंसल को ही करना है। तो निश्चित तौर पर इस पूरे रिश्वत प्रकरण की जानकारी पवन बंसल को रही होगी। इसलिये इस पूरे घूस काण्ड से पवन बंसल लाख सफाई के बावजूद बेदाग नहीं बच सकते है।
रेल मन्त्रालय में पिछले दिनों कुछ अहम परिवर्तन देखने को मिले थे। पत्रकारों का प्रवेश रेल मन्त्रालय में बन्द कर दिया गया था। रेल मन्त्रालय के कामकाज की पारदर्शिता खत्म हो गयी थी। कई लोगों ने साफ तौर पर कहा कि पत्रकारों का प्रवेश इसलिये बन्द किया गयी क्योंकि मन्त्रालय के अन्दर खुलेआम डीलिंग हो रही थी। कई लोगों ने साफ तौर पर आरोप लगाया कि पैसेंजर कमेटी के सदस्य बनने के लिये भी पैसे माँगे जा रहे है। राजनीतिक पदों पर नियुक्ति के लिये भी पैसे माँगे जा रहे है।
पवन बंसल का भरोसा अपने खास लोगों पर ही हमेशा रहा। वो भी रिश्तेदारों पर ही। यहाँ तक कि उनके पर्सनल स्टाफ में वही अधिकारी रखे गये जो कहीं न कहीं से उनकी रिश्तेदारी में हैं। चंडीगढ़ में कांग्रेस के ही लोग साफ कह रहे हैं कि पवन बंसल कई मामलों में पार्टी की सुनते ही नहीं थे। यहाँ तक कि टिकट कन्फर्मेशन के लिये भी कांग्रेस के नेताओं और कार्यकर्ताओं की सुनवायी नहीं थी। जबकि विरोधी दलों का तर्क है कि उनके निजी स्टाफ की गतिविधियों को सीबीआई जाँच करे तो सारा खेल पता चल जायेगा।
आम चर्चा है कि रेल मन्त्री बनने के बाद पवन बंसल का व्यवहार एरोगेन्ट था। चंडीगढ़ में विरोधियों को धमका कर कांग्रेस में शामिल करवाया जा रहा था। पहले विरोधियों पर सरकारी अमलों से कारर्वाई करवायी जाती थी फिर उन्हें बुलाकर कहा जाता था कि कांग्रेस ज्वाइन कर लो, मामला रफा दफा हो जायेगा। चंडीगढ़ के गाँव दड़ुआ में भाजपा समर्थक दो-तीन होटल मालिक अपने होटल गिराये जाने के डर से ही कांग्रेस में शामिल हो गये। जबकि कुछ भाजपा समर्थक गोदाम मालिकों ने जब कांग्रेस में शामिल होने से इन्कार किया तो उनके गोदामों को प्रशासन से गिरवा दिया गया। चंडीगढ़ मार्केट कमेटी के चेयरमैन पर पहले प्रशासन ने छापा डाला और उस पर जुर्माना लगाया गया। चेयरमैन भाजपा समर्थक थे। मामला समझ गये। कांग्रेस में शामिल हो गये और ईश्वरीय कृपा से उनके खिलाफ चल रही सारी कार्रवाई रुक गयी।
यह पहला अवसर नहीं है कि बंसल विवादित हुये हैं। ये उनकी खुशकिस्मती रही कि उनका विवाद राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खी नहीं बना। चंडीगढ़ की स्थानीय मीडिया तक ही उनका विवाद सीमित रह गया। यूँ तो उनका विवादों से वास्ता राजग सरकार के समय से ही था। उस समय चंडीगढ़ में अपने दिल्ली पब्लिक स्कूल के लिये जमीन आवंटन को लेकर बंसल विवाद में आ गये थे। हालाँकि उस समय सरकार भाजपा की थी और स्थानीय भाजपा नेता इस पर हंगामा करते रहे। लेकिन बताया जाता है कि बंसल को मदद उस समय राजग सरकार में मन्त्री रही सुषमा स्वराज से मिल गयी। संप्रग-1 के समय में चंडीगढ़ के पूर्व प्रशासक और पंजाब के गर्वनर एसएफ रोड्रिग्स से उनका विवाद सड़क पर आ गया था। बंसल का आरोप था कि रोड्रिग्स उनकी सुनते नहीं हैं। जबकि रोड्रिग्स ने साफ आरोप लगाया था कि बंसल अपने निजी फायदों के लिये उनसे काम करवाना चाहते हैं। रोड्रिग्स के समय में ही चंडीगढ़ के डिप्टी कमिशनर रहे अरूण कुमार से बंसल की सीधी टक्कर हो गयी थी। अरूण कुमार ने साफ कहा था कि पवन बंसल उनसे गलत काम करवाना चाहते थे। बंसल, अरूण कुमार से इतने नाराज हुये कि दो साल में ही उन्हें वापस उनके पैरेंट कैडर हरियाणा में भिजवा दिया। हालाँकि अरुण कुमार भी डरे नहीं और मीडिया में बंसल के खिलाफ मोर्चा खोलकर बैठ गये थे।
हाल ही में पवन बंसल का नाम चंडीगढ में बूथ घोटाले में उछला था। चंडीगढ़ के तत्कालीन एडीसी पीएस शेरगिल ने शहर में करोड़ों रुपये के हुये बूथ घोटाले की जाँच की थी। जाँच रिपोर्ट में एडीसी ने पवन बंसल पर अँगुली उठायी। एडीसी ने रिपोर्ट में बताया था कि इस बूथ घोटाले में करोड़ों रुपये का खेल हुआ है। इसके बाद पवन बंसल एडीसी से खासे नाराज हो गये थे। लेकिन बंसल का विवादों से सिर्फ यहीं लेना देना नहीं है। चंडीगढ़ में नगर निगम ने जेपी ग्रुप को एक प्लॉट आवंटित किया था। इस प्लाट आवंटन के खिलाफ कांग्रेस के ही एक पार्षद चंद्रमुखी शर्मा मोर्चा खोल बैठे थे। उन्होंने इस सम्बंध में सीवीसी तक शिकायत की। इस भूमि आवंटन में भी पवन बंसल पर अंगुली उठायी गयी थी। बंसल वो नेता है जो कांग्रेस के बराबर भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में पैठ रखते हैं। संघ के एक जाति विशेष के स्थानीय पदाधिकारी जो पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में हैं, बंसल के मुरीद हैं। बंसल को हमेशा उनसे मदद मिलती रही। इसके अलावा बंसल के सम्बंध सुषमा स्वराज समेत कई भाजपा नेताओं से अच्छे रहे। चंडीगढ़ में इस बात की आम चर्चा होती है कि बंसल के चुनाव में जितने कांग्रेसी उनके समर्थन में सक्रिय होते हैं उतने ही संघ और भाजपा के कार्यकर्ता उनके समर्थन में सक्रिय होते हैं। यही कारण है कि लगातार 1999 से बंसल चुनाव बंसल जीत रहे हैं।
पर एक अहम सवाल है कि आखिर सीबीआई ने एक कांग्रेसी मन्त्री पर हमला कैसे कर दिया ? क्या सीबीआई वाकई में स्वतन्त्र हो गयी है? क्योंकि पवन बंसल कोई कमजोर शख्स नहीं है। इसका जवाब काफी आसान है। इस समय सीबीआई चीफ रंजीत सिन्हा मुश्किल में हैं। कोलगेट घोटाले और चारा घोटाले में सीबीआई की हाल में हुयी कार्रवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई पर सवालिया निशान लगा दिया है। रंजीत सिन्हा ने इस सवालिया निशान का काट ढूँढ लिया। अब सुप्रीम कोर्ट में अगली पेशी में रंजीत सिन्हा यह बताने में सक्षम होंगे कि सीबीआई सरकारी दबाव में नहीं है। अगर सीबीआई सरकारी दबाव में होती तो बंसल के भांजे को गिरफ्तार नहीं किया जाता ? इतने ब़ड़े घूस काण्ड को सीबीआई एक्सपोज नहीं करती ?