हमारे जीवन में दो मार्ग हैं, एक बंधन का मार्ग और दूसरा मोक्ष का मार्ग। ज्यादातर लोग यह समझते हैं कि मृत्यु के बाद जब शरीर रूपी बंधन से मुक्ति मिलती है तब मोक्ष मिलता है, लेकिन सच्चाई यही है कि मनुष्य जीवित रहते हुए मोक्ष प्राप्त कर सकता है। महाभारत में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं, 'कर्म करते हुए और उन कर्मों को मन से परमसत्ता को अर्पण करते हुए यदि कोई पुरुषार्थ करता है, तो वह इसी जीवन में मोक्ष पा लेता है। दरअसल, कर्म करते हुए व्यक्ति को अनेक बंधनों को काटना पड़ता है, जिनमें लोभ, मोह व अहंकार प्रमुख हैं। चूंकि बंधन हमेशा दुष्प्रवृत्तियों के ही होते हैं, इसलिए इनसे छुटकारा पा लेना ही मोक्ष है।
यह दूरदर्शिता हमारे मन में बैठ जाए, तो मोक्ष का तत्वज्ञान समझते हुए हम जीवन को सफलता की चरम सीमा तक पहुंचा सकते हैं। हमें मानव जीवन मिला ही इसलिए है कि हर व्यक्ति इस परम पुरुषार्थ के लिए कर्म करे और परमतत्व की प्राप्ति के लिए इस प्रयोग को सार्थक बनाए। बंधन और मोक्ष में फर्क सिर्फ इतना है कि जब आसुरी संपदा हमारे पास बढ़ेगी, तो हम बंधन की ओर बढ़ेंगे, लेकिन जब दैवीय संपदा हमारे पास बढ़ेगी तो हम मोक्ष की तरफ बढ़ जाएंगे। बंधन का मकडज़ाल हमें जकड़े रहता है, लेकिन इससे छुटकारा पाना हर व्यक्ति के लिए जरूरी है, क्योंकि हर व्यक्ति के लिए मोक्ष जरूरी है। व्यक्ति जो कुछ भी करता है, उसमें क्रोध, मोह नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका निर्णय समाज हित में होना चाहिए। महाभारत का युद्ध हुआ, लेकिन इसके लिए श्रीकृष्ण ने पांडवों के मन में द्वेष नहीं, बल्कि अखंड भारत के कल्याण की भावना जगाई और एक संस्कारी राजा का आदर्श रखते हुए ईश्वर के लिए कर्म करने की भावना जगाकर युद्ध करने को कहा। शास्त्रों और पुराणों में कहा गया है कि आत्मा तब तक एक शरीर से दूसरे शरीर में भटकती रहती है, जब तक कि मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो जाती। इसलिए मोक्ष प्राप्ति के लिए किए जाने वाले कर्म को जीवन जीने की कला कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। मोक्ष प्राप्ति के लिए हमें अपनी वाणी पर संयम रखना चाहिए, सुनने व मनन की क्षमता को बढ़ाना चाहिए और निरंतर अध्ययन करते रहना चाहिए। स्पष्ट है कि मोक्ष जीते जी भी पाया जा सकता है।
Saturday, 5 March 2016
Friday, 4 March 2016
जीवन का उद्देश्य
जीवन का उद्देश्य
क्या आपने कभी एकांत में यह सोचा कि आपको मानव जीवन क्यों मिला है? महाभारत में युधिष्ठिर के एक प्रश्न के उत्तर में भीष्म पितामह ने कहा, 'मनुष्य से बढ़कर कोई नहीं। मनुष्य जीवन इहलोक और परलोक की कड़ी है।' आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि चौरासी लाख योनियों के बाद हमें मनुष्य जीवन मिलता है और संसार के सभी प्राणियों में मनुष्य ही सबसे श्रेष्ठ है। इसकी वजह मनुष्य में सत्य व असत्य का विवेक कराने वाली बुद्धि का होना है, लेकिन इस धरती पर हम दुनियादारी के चक्र में ऐसे फंस जाते हैं कि हमारी बुद्धि सीमित दायरे में ही सिमट कर रह जाती है।
हम सांसारिक सुखों को ही सब कुछ मानकर उसमें लिप्त रहने में ही अपना सौभाग्य और अपने जीवन की सफलता समझते हैं। यही गलती हम कर जाते हैं, क्योंकि इसके बावजूद कोई भी व्यक्ति यह दावा नहीं करता है कि वह पूर्णतया सुखी है। सच्चाई यह है कि हमें सामान्य मानव जीवन के उद्देश्य की पूर्ति के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए। यह सच है कि अपने व अपने परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी हमारी है और हमें इसे हर हाल में निभाना चाहिए। क्या आपको यह मालूम है कि आप कहां से आए, आपको कितने दिनों या सालों तक इस जगत में रहना है और आपकी मंजिल क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर में ज्यादातर लोग यही कहेंगे, मालूम नहीं। ऐसे लोग बड़े अजीब मुसाफिर हैं।
वे यात्रा तो कर रहे हैं, पर यात्रा के संबंध में उन्हें कुछ भी पता नहीं। उन्होंने मानव जीवन पाया, लेकिन उन्हें अपने जीवन का लक्ष्य मालूम नहीं। हमारे-आपके जीवन का मतलब है, एक उद्देश्य खोज लेना और अपने भीतर शांत रहना। कहा गया है कि मनुष्य आनंदलोक का वासी है और आनंद के परमधाम तक पहुंचना ही उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य है, इसलिए मनुष्य को इस संसार की मृग मरीचिका से निकलकर भव्य जीवन की प्राप्ति के लिए साधना के मार्ग को अपनाकर अपने गंतव्य को पहचानना चाहिए और उसी में लीन होने के लिए साधनारत रहने का संकल्प लेना चाहिए। ऋग्वेद में कहा गया है कि जीवन पवित्र और श्रेष्ठ है। मनुष्य कर्मयोगी है। बस यह बात कर्मयोगी के हाथों में है कि वह अपने लिए किस लक्ष्य का चयन करता है।
क्या आपने कभी एकांत में यह सोचा कि आपको मानव जीवन क्यों मिला है? महाभारत में युधिष्ठिर के एक प्रश्न के उत्तर में भीष्म पितामह ने कहा, 'मनुष्य से बढ़कर कोई नहीं। मनुष्य जीवन इहलोक और परलोक की कड़ी है।' आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि चौरासी लाख योनियों के बाद हमें मनुष्य जीवन मिलता है और संसार के सभी प्राणियों में मनुष्य ही सबसे श्रेष्ठ है। इसकी वजह मनुष्य में सत्य व असत्य का विवेक कराने वाली बुद्धि का होना है, लेकिन इस धरती पर हम दुनियादारी के चक्र में ऐसे फंस जाते हैं कि हमारी बुद्धि सीमित दायरे में ही सिमट कर रह जाती है।
हम सांसारिक सुखों को ही सब कुछ मानकर उसमें लिप्त रहने में ही अपना सौभाग्य और अपने जीवन की सफलता समझते हैं। यही गलती हम कर जाते हैं, क्योंकि इसके बावजूद कोई भी व्यक्ति यह दावा नहीं करता है कि वह पूर्णतया सुखी है। सच्चाई यह है कि हमें सामान्य मानव जीवन के उद्देश्य की पूर्ति के लिए निरंतर प्रयास करना चाहिए। यह सच है कि अपने व अपने परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी हमारी है और हमें इसे हर हाल में निभाना चाहिए। क्या आपको यह मालूम है कि आप कहां से आए, आपको कितने दिनों या सालों तक इस जगत में रहना है और आपकी मंजिल क्या है? इन प्रश्नों के उत्तर में ज्यादातर लोग यही कहेंगे, मालूम नहीं। ऐसे लोग बड़े अजीब मुसाफिर हैं।
वे यात्रा तो कर रहे हैं, पर यात्रा के संबंध में उन्हें कुछ भी पता नहीं। उन्होंने मानव जीवन पाया, लेकिन उन्हें अपने जीवन का लक्ष्य मालूम नहीं। हमारे-आपके जीवन का मतलब है, एक उद्देश्य खोज लेना और अपने भीतर शांत रहना। कहा गया है कि मनुष्य आनंदलोक का वासी है और आनंद के परमधाम तक पहुंचना ही उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य है, इसलिए मनुष्य को इस संसार की मृग मरीचिका से निकलकर भव्य जीवन की प्राप्ति के लिए साधना के मार्ग को अपनाकर अपने गंतव्य को पहचानना चाहिए और उसी में लीन होने के लिए साधनारत रहने का संकल्प लेना चाहिए। ऋग्वेद में कहा गया है कि जीवन पवित्र और श्रेष्ठ है। मनुष्य कर्मयोगी है। बस यह बात कर्मयोगी के हाथों में है कि वह अपने लिए किस लक्ष्य का चयन करता है।
हैरान करने वाला हलफनामा
हैरान करने वाला हलफनामा
अगर पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन, पूर्व केंद्रीय गृह सचिव जीके पिल्लई और गृह मंत्रालय में उनके सहयोगी रहे आरवीएस मणि इशरत जहां मामले में सच्चाई बयान कर रहे हैं तो फिर इस बारे में कोई संदेह नहीं रह जाता कि पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री के तौर पर पी चिदंबरम ने क्षुद्रता की सारी सीमाएं पार कर दी थीं। देश ने तमाम भ्रष्ट और आपराधिक प्रवृत्ति के नेता देखे हैं, लेकिन चिदंबरम का कृत्य तो हिंदी फिल्मों के शातिर खलनायकोंं के देश विरोधी काल्पनिक कृत्यों को भी मात देने वाला दिखता है। उन्होंने एक तरह से लश्कर के स्वार्थों की पूर्ति की और इस पर हैरत नहीं कि इन दिनों पाकिस्तान में सोशल मीडिया में उनके प्रति सहानुभूति उमड़ रही है। इशरत मामले में डेविड हेडली की गवाही का भी उल्लेख किया जा सकता है, लेकिन यदि उसके बयान को संदिग्ध भी मान लिया जाए तो भी कोई नारायणन, पिल्लई और मणि के बयानों की अनदेखी कैसे कर सकता है? चिदंबरम के बचाव में आगे आए कांग्रेसी नेता पिल्लई और मणि के बयानों पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन क्या वे एमके नारायणन को भी झूठा करार दे सकते हैं, जिन्होंने हेडली की गवाही के बाद हाल ही में अपने एक लेख में कहा है कि खुफिया एजेंसियों को अच्छी तरह पता था कि इशरत लश्कर की सदस्य थी और दुबई में रची गई उस साजिश का हिस्सा थी जिसे गुजरात में अंजाम दिया जाना था।
इशरत जहां अपने तीन साथियों के साथ 15 जून 2004 को अहमदाबाद में मारी गई थी। उसके साथ प्राणेश पिल्लई उर्फ जावेद गुलाम शेख, अमजद अली और जीशान जौहर भी मारे गए थे। इनमें अमजद और जीशान पाकिस्तानी थे। इस मुठभेड़ के कुछ दिनों बाद लश्कर के मुखपत्र समझे जाने वाले गजवा टाइम्स में 14 जुलाई 2004 को इशरत को शहीद करार देते हुए उसे शाबासी दी जाती है। तब तक इशरत का परिवार मुठभेड़ को फर्जी बताने के साथ यह साबित करने की कोशिश में जुट चुका था कि उनकी बेटी तो कॉलेज जाने वाली एक आम सी घरेलू लड़की थी, लेकिन वह यह नहीं बताता कि 12 जून को कथित तौर पर इंटरव्यू देने गई उनकी लड़की जब तीन दिन तक घर नहीं लौटी तो उन्होंने उसकी चिंता क्यों नहीं की? इशरत की मां ने पहले कहा कि उनकी बेटी जावेद को नहीं जानती थी, लेकिन बाद में कहा कि वह उसके यहां सेल्स गर्ल के तौर पर काम करती थी। जावेद के पिता का कहना था कि वह तो ट्रैवल एंजेंसी में काम करता था। कोई न तो इस सवाल का जवाब तलाशता है कि इशरत थाणे से अहमदाबाद कैसे पहुंची और न ही यह कि उसके साथ पाकिस्तानी नागरिक क्या कर रहे थे?
2 मई 2007 को गजवा टाइम्स के इंटरनेट संस्करण में यह एक भूल सुधार नजर आती है कि 2004 को इशरत के बारे में छपी खबर एक रिपोर्टर की गलती थी। तीन साल बाद 'भूल सुधारÓ का यह दुर्लभ मामला था। इस दुर्लभ मामले के कुछ ही दिनों बाद जावेद के पिता सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर अहमदाबाद मुठभेड़ की सीबीआइ जांच की मांग करते हैं। 2009 में संप्रग फिर सत्ता में आती है और 2008 में मुंबई में लश्कर के भीषण आतंकी हमले के बाद गृहमंत्री बनाए गए चिंदबरम पुन: गृहमंत्रालय संभालते हैं। इशरत मुठभेड़ मामले में गृह मंत्रालय 6 अगस्त 2009 को गुजरात उच्च न्यायालय में 14 पेज का एक हलफनामा दायर करता है। हलफनामे में विस्तार से बताया जाता है कि इशरत लश्कर की आतंकी थी। यह हलफनामा आरवीएस मणि ने ही दाखिल किया था। इसके बाद 30 सितंबर 2009 को पहले वाला हलफनामा वापस लेकर दूसरा दाखिल किया जाता है और वह पहले वाले के बिल्कुल उलट होता है। जीके पिल्लई की मानें तो दूसरा हलफनामा चिदंबरम ने लिखवाया था और चूंकि यह काम खुद मंत्री महोदय ने किया इसलिए शेष अफसर कोई विरोध-प्रतिरोध नहीं कर सके। अगर यह आरोप सही है तो चिदंबरम ने वही काम किया जो गजवा टाइम्स ने किया। जिस तरह लश्कर नहीं चाहता था कि इशरत को उसके सदस्य के तौर पर जाना जाए उसी तरह सितंबर 2009 में हमारे तत्कालीन गृहमंत्री भी नहीं चाह रहे थे कि इशरत लश्कर की आतंकी के रूप में जानी जाए। चिदंबरम ने किसके मन की मुराद पूरी की? उसी लश्कर के मन की जिसने जैशे मोहम्मद के साथ मिलकर संसद पर हमला कराया और जिसने आइएसआइ की सहायता से मुंबई में हमला किया। चिदंबरम के हलफनामा बदलने से कौन खुश हुआ होगा? जाहिर है हाफिज सईद एंड कंपनी।
चिदंबरम पर जैसे आरोप लगे हैं वे यह भी कहते हैं कि उन्होंने केवल ऐसा हलफनामा ही तैयार नहीं किया जिससे लश्कर खुश हुआ होगा, बल्कि अहमदाबाद मुठभेड़ की जांच में गुजरात पुलिस के अफसरों और उनके जरिये अमित शाह और नरेंद्र मोदी को फंसाने के लिए सीबीआइ के विशेष जांच दल को इंटेलीजेंस ब्यूरो के उन अधिकारियों के पीछे भी लगा दिया जिन्होंने इशरत और उसके साथियों की खुफिया सूचना गुजरात पुलिस को दी थी। आइबी के ऐसे ही एक अफसर राजेंद्र कुमार की मानें तो चिदंबरम ने यह काम गुजरात के एक बड़े कांगे्रसी नेता के साथ मिलकर किया। यह अहमद पटेल के अलावा और कोई नहीं हो सकते। अहमद पटेल कांगे्रस के बड़े नेता इसलिए माने जाते हैं, क्योंकि वह सोनिया गांधी के करीबी हैं। अच्छा होता कि जीके पिल्लई 2009 में ही थोड़ा साहस दिखाते और उसी वक्त चिदंबरम के देश विरोधी कृत्य का भंडाफोड़ करते। अगर उन्होंने उस समय साहस नहीं दिखाया तो इसका यह मतलब नहीं कि उनकी बातों पर भरोसा न किया जाए। पता नहीं चिदंबरम का क्या होगा, लेकिन इससे ज्यादा लज्जाजनक और कुछ नहीं कि उनके रूप में हमारे पास एक ऐसा गृहमंत्री था जो राजनीतिक प्रतिशोधवश देश के शत्रुओं के हित साध रहा था। चिदंबरम एक बड़े वकील भी हैं। वह अच्छे से जानते होंगे कि इशरत मामले में उनका खुद का कृत्य राजद्रोह की श्रेणी में आता है नहीं?
अगर पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन, पूर्व केंद्रीय गृह सचिव जीके पिल्लई और गृह मंत्रालय में उनके सहयोगी रहे आरवीएस मणि इशरत जहां मामले में सच्चाई बयान कर रहे हैं तो फिर इस बारे में कोई संदेह नहीं रह जाता कि पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री के तौर पर पी चिदंबरम ने क्षुद्रता की सारी सीमाएं पार कर दी थीं। देश ने तमाम भ्रष्ट और आपराधिक प्रवृत्ति के नेता देखे हैं, लेकिन चिदंबरम का कृत्य तो हिंदी फिल्मों के शातिर खलनायकोंं के देश विरोधी काल्पनिक कृत्यों को भी मात देने वाला दिखता है। उन्होंने एक तरह से लश्कर के स्वार्थों की पूर्ति की और इस पर हैरत नहीं कि इन दिनों पाकिस्तान में सोशल मीडिया में उनके प्रति सहानुभूति उमड़ रही है। इशरत मामले में डेविड हेडली की गवाही का भी उल्लेख किया जा सकता है, लेकिन यदि उसके बयान को संदिग्ध भी मान लिया जाए तो भी कोई नारायणन, पिल्लई और मणि के बयानों की अनदेखी कैसे कर सकता है? चिदंबरम के बचाव में आगे आए कांग्रेसी नेता पिल्लई और मणि के बयानों पर सवाल उठा रहे हैं, लेकिन क्या वे एमके नारायणन को भी झूठा करार दे सकते हैं, जिन्होंने हेडली की गवाही के बाद हाल ही में अपने एक लेख में कहा है कि खुफिया एजेंसियों को अच्छी तरह पता था कि इशरत लश्कर की सदस्य थी और दुबई में रची गई उस साजिश का हिस्सा थी जिसे गुजरात में अंजाम दिया जाना था।
इशरत जहां अपने तीन साथियों के साथ 15 जून 2004 को अहमदाबाद में मारी गई थी। उसके साथ प्राणेश पिल्लई उर्फ जावेद गुलाम शेख, अमजद अली और जीशान जौहर भी मारे गए थे। इनमें अमजद और जीशान पाकिस्तानी थे। इस मुठभेड़ के कुछ दिनों बाद लश्कर के मुखपत्र समझे जाने वाले गजवा टाइम्स में 14 जुलाई 2004 को इशरत को शहीद करार देते हुए उसे शाबासी दी जाती है। तब तक इशरत का परिवार मुठभेड़ को फर्जी बताने के साथ यह साबित करने की कोशिश में जुट चुका था कि उनकी बेटी तो कॉलेज जाने वाली एक आम सी घरेलू लड़की थी, लेकिन वह यह नहीं बताता कि 12 जून को कथित तौर पर इंटरव्यू देने गई उनकी लड़की जब तीन दिन तक घर नहीं लौटी तो उन्होंने उसकी चिंता क्यों नहीं की? इशरत की मां ने पहले कहा कि उनकी बेटी जावेद को नहीं जानती थी, लेकिन बाद में कहा कि वह उसके यहां सेल्स गर्ल के तौर पर काम करती थी। जावेद के पिता का कहना था कि वह तो ट्रैवल एंजेंसी में काम करता था। कोई न तो इस सवाल का जवाब तलाशता है कि इशरत थाणे से अहमदाबाद कैसे पहुंची और न ही यह कि उसके साथ पाकिस्तानी नागरिक क्या कर रहे थे?
2 मई 2007 को गजवा टाइम्स के इंटरनेट संस्करण में यह एक भूल सुधार नजर आती है कि 2004 को इशरत के बारे में छपी खबर एक रिपोर्टर की गलती थी। तीन साल बाद 'भूल सुधारÓ का यह दुर्लभ मामला था। इस दुर्लभ मामले के कुछ ही दिनों बाद जावेद के पिता सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर अहमदाबाद मुठभेड़ की सीबीआइ जांच की मांग करते हैं। 2009 में संप्रग फिर सत्ता में आती है और 2008 में मुंबई में लश्कर के भीषण आतंकी हमले के बाद गृहमंत्री बनाए गए चिंदबरम पुन: गृहमंत्रालय संभालते हैं। इशरत मुठभेड़ मामले में गृह मंत्रालय 6 अगस्त 2009 को गुजरात उच्च न्यायालय में 14 पेज का एक हलफनामा दायर करता है। हलफनामे में विस्तार से बताया जाता है कि इशरत लश्कर की आतंकी थी। यह हलफनामा आरवीएस मणि ने ही दाखिल किया था। इसके बाद 30 सितंबर 2009 को पहले वाला हलफनामा वापस लेकर दूसरा दाखिल किया जाता है और वह पहले वाले के बिल्कुल उलट होता है। जीके पिल्लई की मानें तो दूसरा हलफनामा चिदंबरम ने लिखवाया था और चूंकि यह काम खुद मंत्री महोदय ने किया इसलिए शेष अफसर कोई विरोध-प्रतिरोध नहीं कर सके। अगर यह आरोप सही है तो चिदंबरम ने वही काम किया जो गजवा टाइम्स ने किया। जिस तरह लश्कर नहीं चाहता था कि इशरत को उसके सदस्य के तौर पर जाना जाए उसी तरह सितंबर 2009 में हमारे तत्कालीन गृहमंत्री भी नहीं चाह रहे थे कि इशरत लश्कर की आतंकी के रूप में जानी जाए। चिदंबरम ने किसके मन की मुराद पूरी की? उसी लश्कर के मन की जिसने जैशे मोहम्मद के साथ मिलकर संसद पर हमला कराया और जिसने आइएसआइ की सहायता से मुंबई में हमला किया। चिदंबरम के हलफनामा बदलने से कौन खुश हुआ होगा? जाहिर है हाफिज सईद एंड कंपनी।
चिदंबरम पर जैसे आरोप लगे हैं वे यह भी कहते हैं कि उन्होंने केवल ऐसा हलफनामा ही तैयार नहीं किया जिससे लश्कर खुश हुआ होगा, बल्कि अहमदाबाद मुठभेड़ की जांच में गुजरात पुलिस के अफसरों और उनके जरिये अमित शाह और नरेंद्र मोदी को फंसाने के लिए सीबीआइ के विशेष जांच दल को इंटेलीजेंस ब्यूरो के उन अधिकारियों के पीछे भी लगा दिया जिन्होंने इशरत और उसके साथियों की खुफिया सूचना गुजरात पुलिस को दी थी। आइबी के ऐसे ही एक अफसर राजेंद्र कुमार की मानें तो चिदंबरम ने यह काम गुजरात के एक बड़े कांगे्रसी नेता के साथ मिलकर किया। यह अहमद पटेल के अलावा और कोई नहीं हो सकते। अहमद पटेल कांगे्रस के बड़े नेता इसलिए माने जाते हैं, क्योंकि वह सोनिया गांधी के करीबी हैं। अच्छा होता कि जीके पिल्लई 2009 में ही थोड़ा साहस दिखाते और उसी वक्त चिदंबरम के देश विरोधी कृत्य का भंडाफोड़ करते। अगर उन्होंने उस समय साहस नहीं दिखाया तो इसका यह मतलब नहीं कि उनकी बातों पर भरोसा न किया जाए। पता नहीं चिदंबरम का क्या होगा, लेकिन इससे ज्यादा लज्जाजनक और कुछ नहीं कि उनके रूप में हमारे पास एक ऐसा गृहमंत्री था जो राजनीतिक प्रतिशोधवश देश के शत्रुओं के हित साध रहा था। चिदंबरम एक बड़े वकील भी हैं। वह अच्छे से जानते होंगे कि इशरत मामले में उनका खुद का कृत्य राजद्रोह की श्रेणी में आता है नहीं?
Thursday, 3 March 2016
Wednesday, 2 March 2016
कांग्रेस सुप्रीमों की नीति और नीयत संदेह के घेरे में
कांग्रेस सुप्रीमों की नीति और नीयत संदेह के घेरे में
जेएनयू घटनाक्रम विवाद नहीं, राष्ट्र की एकता, अखंड़ता और सम्प्रभुंता को दी गर्इ बेबाक खुली चुनौती है, जो राजद्रोह है, जिसे अक्षम्य अपराध की श्रेणी में रखा जाता है। लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में सत्ता छीनी नहीं जाती, वरन बेलेट की ताकत से उस पर अधिकार किया जाता है। भारतीय लोकतंत्र में प्रभावी हुए नकली राजनेता जो बेलेट से हार गये, किन्तु देश के दुश्मनों से मिल कर बुलेट की ताकत से जनता की सरकार को गिराने का ख्वाब संजो रहे हैं। भारत में इन दिनों सियासी षड़यंत्रों का दौर चल रहा है। सत्ता खोने की पीड़ा से छटपटाते हुए जो राजनेता प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से राजद्रोह के समर्थन में खड़े हैं, वे राजधर्म भूल गये हैं। धनबल से इन्होंने मुट्ठी भर युवाओं को राजद्रोह के लिए मोहरा बना रखा है, किन्तु स्वयं पर्दे के पीछे खड़े रह कर एक दुखद नाटक को निर्देशित कर रहे हैं।
जेएनयू घटनाक्रम विवाद नहीं, राष्ट्र की एकता, अखंड़ता और सम्प्रभुंता को दी गर्इ बेबाक खुली चुनौती है, जो राजद्रोह है, जिसे अक्षम्य अपराध की श्रेणी में रखा जाता है। लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में सत्ता छीनी नहीं जाती, वरन बेलेट की ताकत से उस पर अधिकार किया जाता है। भारतीय लोकतंत्र में प्रभावी हुए नकली राजनेता जो बेलेट से हार गये, किन्तु देश के दुश्मनों से मिल कर बुलेट की ताकत से जनता की सरकार को गिराने का ख्वाब संजो रहे हैं। भारत में इन दिनों सियासी षड़यंत्रों का दौर चल रहा है। सत्ता खोने की पीड़ा से छटपटाते हुए जो राजनेता प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से राजद्रोह के समर्थन में खड़े हैं, वे राजधर्म भूल गये हैं। धनबल से इन्होंने मुट्ठी भर युवाओं को राजद्रोह के लिए मोहरा बना रखा है, किन्तु स्वयं पर्दे के पीछे खड़े रह कर एक दुखद नाटक को निर्देशित कर रहे हैं।
जेएनयू प्रकरण में कांग्रेस सुप्रीमों की संदिग्ध भूमिका इस बात को प्रमाणित करती है कि वे शतप्रतिशत विदेशी है और उनके मन में देशभक्ति का लेश मात्र भी भाव नहीं है। वे किसी भी तरह सियासी षड़यंत्रों के जरिये अपने मंदबुद्धि पुत्र को सत्ता के शीर्ष पर बिठाना चाहती है। शासन पर नियंत्रण कर भारत के प्राकृतिक संसाधनों को लुटना चाहती है। चाटुकारिता में निष्णात उनके स्वामी भक्तों के लिए मालकिन की आज्ञा शिरोधार्य है। उनका ज़मीर मर चुका है। वे अपना स्वाभिमान खो चुके हैं। मालकिन के आदेश को पत्थर की लकीर मान कर उसका अनुशरण करते हैं। कांग्रेसी एक परिवार के सरोवर की मछलिया है और जब भी सरोवर का पानी सूखने लगता है, वे सत्ता के लिए तड़फने लगते हैं।
जेएनयू प्रकरण ने कांग्रेस सुप्रीमों के चरित्र को तार तार कर दिया है। यह भी साबित कर दिया है कि कांग्रसियों के लिए सत्ता पहले है, राष्ट्र बाद में। देश को आज़ाद कराने का दावा करने वाली पार्टी सत्ता पाने के लिए भारत विरोधी ताकतों के साथ मिल कर राष्ट्र की सम्प्रभुता का सौदा कर रही है। यह घिनौना सच है, जिसे जानने के बाद भारत का हर राष्ट्र भक्त नागरिक कांग्रेसी नेताओं, विशेषकर उनकी सुप्रीमों के संदिग्ध चरित्र को संदेह की दृष्टि से देख रहा है। इस तथ्य की पुष्टि के लिए निम्न तथ्य पर्याप्त है:-
एक: जेनएनयू में जो कुछ हुआ उसे देख कर और सुन कर प्रत्येक भारतीय नागरिक शर्मसार हुआ। ऐसे समय में जब भारत का हर नागरिक क्षुब्ध था। उद्वेलित था। देशद्रोही तत्वों के विरुद्ध सख्त कार्यवाही करने के लिए सरकार से गुहार कर रहा था, तब कांग्रेस सुप्रीमों ने अपने पुत्र को सरकार की कार्यवाही का विरोध करने और देशद्रोही तत्वों का पक्ष लेने के लिए जेएनयू परिसर में क्यों भेजा ? कांग्रेसी प्रवक्ताओं को क्यों सरकार की कार्यवाही के विरुद्ध भड़ास निकालने का निर्देश दिया ? क्या राजद्रोह के पक्ष में तर्क देना कांग्रेसियों के लिए जरुरी था ? अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब यह नहीं है कि भारत को तोड़ने का संकल्प लेने वाले तत्वों के पक्ष में जा कर खड़े हो जाये ! आखिर कांग्रेस सुप्रीमों वामपंथियों, आतंकी आकाओं और केजरीवाल जैसे नेताओं के साथ मिल कर किस प्रकार के सियासी षड़यंत्र को अंजाम देना चाहती है ? क्या ऐसा करने से नरेन्द्र मोदी को सत्ता से हटाने में सफल हो जायेगी ?
दो: अफजल गुरु भारतीय संसद को बम से उड़ाने और सांसदों को मारने के अपराधिक षड़यंत्र का मुख्य रणनीतिकार था। इस शख्स ने अपना अपराध टीवी के पर्दे पर आ कर पूरे देश के सामने स्वीकार किया था। न्यायालय ने सारे प्रमाणों को जानने के बाद उसे फांसी की सजा सुनार्इ थी। ऐसे अपराधी की फांसी कांग्रेस सुप्रीमों आठ साल ताक क्यों टालती रही ? फिर सियासी लाभ के लिए क्यों भयभीत हो कर चुपचाप फांसी दे दी? अब जब ऐसेा लग रहा है कि अफजल गुरु की फांसी से उसे वोटों को नुकसान हो रहा है, तो क्यों कांग्रेसी नेता अफजल की फांसी को एक भूल बता रहे हैं ? कांग्रेस सुप्रीमों के आदेश से क्यों चिदम्बरम न्यायालय के निर्णय को गलत ठहरा रहे हैं ? राष्ट्र सवाल पूछ रहा है- ‘देशद्रोहियों को हीरो बताने वालों के पक्ष में खड़े हो कर कांग्रेसी आखिर पाना क्या चाहते हैं ?’
तीन: इशरत जहां आतंकी थी। उसे नरेन्द्र मोदी का वध करने के उद्धेश्य से अहमदाबाद भेजा गया था। गुजरात पुलिस ने उसे एक मुठभेड़ में मारा था। जब एक आंतकी के साथ पुलिस की मुठभेड़ होती है, उसे फर्जी कैसे कहा जा सकता है ? वर्षों तक कांग्रेस सुप्रीमों मुठभेड़ को फर्जी बताते हुए न्यायालय में और न्यायालय के बाहर अल्पसंख्यक समुदाय की सहानुभुति अर्जित करने] पाकिस्तानी आतंकी संगठनों को खुश करने के लिए इशरत जहां को मासूम महिला बता कर क्यों नरेन्द्र मोदी को घेरती रही ? यहां तक कि लोकसभा चुनावों के ठीक पहले इशरत जहां की हत्या के मामले को जोर-शोर से उठाया था और नरेन्द्र मोदी को मुस्लिम महिला की हत्या का दोषी बताने का प्रयास किया था। अब जब यह तथ्य सामने आ गया है कि भारत के गृहमंत्रालय के पास इस बात की जानकारी थी कि इशरत जहां आतंकी थी, फिर जानबूझ कर कांग्रेस सुप्रीमों के इशारे पर कांग्रसियों ने इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ के मामले को इतना जोर-शोर से क्यों उछाला ? क्या कांग्रेस सुप्रीमों के लिए अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वी से निपटने के लिए आतंकवादियों को हीरो बनाना जरुरी था ?
चार: बम्बर्इ के ताज होटल में हुर्इ आतंकी कार्यवाही के बाद दिग्विजय सिंह का बेतुका बयान आया था, जिसमें उन्होंने इस आतंकी प्रकरण को भगवा आतंकवाद से जोड़ कर शहीद पुलिसकर्मी को आरएसएस का एजेंट बताया था। इस बेतुके बयान पर कांग्रेस सुप्रीमों चुप क्यों रही ? इस बयान पर उन्होंने दिग्विजय सिंह को फटकार क्यों नहीं लगार्इ ? क्या इसका सीधा अर्थ यह नहीं निकलता कि कांग्रेस सुप्रीमों के आदेश से ही दिग्विजय सिंह ने ऐसा बयान दिया था ? इसी तरह बाटला हाऊस आतंकी घटना में आतंकियों के मारे जाने पर वे दुखी हो कर बहुत रोर्इ थी। इस बयान को उन्होंने खंड़न क्यों नहीं किया ? शहीद पुलिसकर्मी के प्रति सहानुभूति क्यों नहीं प्रकट की ?
निश्चय ही कांगेस सुप्रीमों अपने विरोधियों से निपटने के लिए आतंकी संगठनों से मदद ले रही है। यदि ऐसा नहीं है तो उनके दस साल के शासनकाल में पूरा देश आतंकियों के लिए खुला अभयारण्य क्यों बन गया ? पूरे देश में स्लीपर सेल का जाल बिछ गया \ यूपीए सरकार ने इस जाल को क्षत-विक्षत करने का संकल्प क्यों नहीं दोहराया ?
कांग्रेस सुप्रीमों के इशारे पर आज संसद को उडाने वालों का पक्ष लेने वाले जानबूझ कर संसद सत्रों को हंगामें की भेंट चढ़ा रहे हैं। यह इस बात को साबित करती हैं कि कांग्रस सुप्रीमों की भारतीय संसदीय व्यवस्था में आस्था नहीं है। इसे वे अपने घृणित मकसद के लिए इस्तेमाल करना चाहती है। उनके इस दुष्कृत्य पर मीडिया मौन है। भारत के बुद्धिजीवी कुछ भी लिखने बोलने से सकुचा रहे हैं। किन्तु भारत की जनता यदि देशद्रोही शख्सियत के विरुद्ध विद्रोही हो जायेगी तब भारत की राजनीति से उनका निष्कासन सम्भव हो पायेगा।
Thursday, 11 February 2016
एक परिवार से नहीं हारेगा भारतीय लोकतंत्र
सतालोलुप उद्धण्ड़ परिवार और उसकी चाटुकार मंड़ली भारतीय लोकतंत्र को पुन: नियंत्रण में ले कर इसे राजतंत्र में परिवर्तित करने के लिए मचल रही है। एक परिवार को सत्ता से हटा कर भारतीय लोकतंत्र मजबूत हो कर उभरा है। संसद में और सड़को पर निरर्थक चीख पुकार का कोर्इ असर भविष्य में होने वाला नहीं है। परिवार और उनके अनन्य भक्त चाहे जितनी कोशिश कर लें, अब भारत की जनता एक परिवार की दासता स्वीकार नहीं करेगी। उन्मादग्रस्त हो जो जनता की सरकार पर अनावश्यक प्रहार कर लोकतंत्र की जड़े काटने का प्रयास कर रहे हैं, वे शायद भूल रहे हैं कि उनके प्रहार से लोकतंत्र का मजबूत वृक्ष कटेगा नहीं।
देश की समस्याओं पर कभी गहन मंथन नहीं किया। अपना कोर्इ चिंतन राष्ट्र के समक्ष नहीं रखा। जनता को गरीबी, बैरोजगारी और पिछड़ेपन से कैसे मुक्ति दिलार्इ जा सके, ऐसी किसी कार्ययोजना पर काम नहीं किया। अकर्मण्यता और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी प्रशासनिक व्यवस्था को र्इमानदार और चुस्त दुरुस्त करने का कभी प्रयास नहीं किया। वर्षों तक राजनीति में रहे, किन्तु जो भारत को समझने में नितांत असफल रहें, वे भारत पर शासन करने का अपना अधिकार समझते हैं। उनके अनुयायी जनादेश को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। वे यह मानने के लिए भी तैयार नहीं है कि भारत पर शासन का अधिकार एक परिवार से बाहर का व्यक्ति भी कर सकता है।
उद्धण्ड़ता, आक्रामकता, स्वामीभक्ति से लबोलुआब एक परिवार अपने झूठ और फरेब से जनता को भ्रमित करने का प्रयास कर रहा है, ताकि जनता इनके बहकावा में आ कर फिर परिवार की दासता स्वीकार कर लें। जनता द्वारा चुनी हुर्इ सरकार को ये लोग एक व्यक्ति और चंद उद्योगपतियों की सरकार बता रहे हैं, पर न तो इनके पास अपनी बात को साबित करने के लिए तर्क है और न ही अपनी कही गर्इ बात के कोर्इ अकाट्य प्रमाण ।
छिछोरापन और असंगत अभद्र शब्दावली अपरिपक्कता मानसिकता की निशानी है। जबकि हकीकत यह है कि दस वर्षों तक भारत पर एक लुटेरे परिवार ने शासन किया था और शासन और प्रशासन की सारी शक्तियों को अपने पास केन्द्रित कर रखा था। देश के संसाधनो को जम कर लूटा था, जिसके प्रमाण देश के पास हैं। न्यायालय ने भी इस पर अपनी मुहर लगा रखी है। फिर क्यों अपनी कीचड़ से सनी सूरत को आर्इने में देखने के बजाय दूसरों पर कीचड़ उछाल रहे हैं? क्या एक परिवार और उसके भक्त यह मानते हैं कि भारत की जनता ने उनके पापों को भुला, उन्हें क्षमादान दे दिया है ?
आक्रामक तेवर अपना कर बात बात पर जो लोग मोदी सरकार को कटघरें में खड़ा करते हैं, वे इस बारें में आक्रामक हो कर अपनी सफार्इ क्यों नहीं देते कि टूजी स्पेक्ट्रम और कोलगेट जैसे कर्इ ऐतिहासिक घोटालें उनके शासन के दौरान नहीं हुए थे ? इस बात का खण्ड़न क्यों नहीं करते कि लाखों करोड़ के घोटालों में उनकी कोर्इ भागीदारी नहीं थी ? भूमिका नहीं थी ? गबन किये गये सरकारी धन का एक ढेला भी उनके पास नहीं है ? भारत की सत्ता पाने के लिए बावले हो रहे लोग राष्ट्र को यह क्यों नहीं समझा पा रहें है कि घोटाले किन लोगों ने किये थे ? घोटालों का धन किस के पास है ? यदि इस बारें में बोलने के लिए उन्होंने अपने होंठ सी सखें हैं तो उन्हें किसी अन्य मामलें में बोलने का कोर्इ नैतिक अधिकार नहीं है।
आक्रामक तेवर अपना कर बात बात पर जो लोग मोदी सरकार को कटघरें में खड़ा करते हैं, वे इस बारें में आक्रामक हो कर अपनी सफार्इ क्यों नहीं देते कि टूजी स्पेक्ट्रम और कोलगेट जैसे कर्इ ऐतिहासिक घोटालें उनके शासन के दौरान नहीं हुए थे ? इस बात का खण्ड़न क्यों नहीं करते कि लाखों करोड़ के घोटालों में उनकी कोर्इ भागीदारी नहीं थी ? भूमिका नहीं थी ? गबन किये गये सरकारी धन का एक ढेला भी उनके पास नहीं है ? भारत की सत्ता पाने के लिए बावले हो रहे लोग राष्ट्र को यह क्यों नहीं समझा पा रहें है कि घोटाले किन लोगों ने किये थे ? घोटालों का धन किस के पास है ? यदि इस बारें में बोलने के लिए उन्होंने अपने होंठ सी सखें हैं तो उन्हें किसी अन्य मामलें में बोलने का कोर्इ नैतिक अधिकार नहीं है।
नेशनल हैरल्ड़ प्रकरण पर परिवार के चाटुकार वकील भोंथरे तर्कों से यह बात देश की जनता को समझाने का प्रयास कर रहे हैं कि कम्पनियें बना कर एक अखबार की अरबों रुपये की सम्पति हडप्पने में एक पैसे का भी घोटाला नहीं हुआ। परन्तु पारिवारिक पार्टी मामले को न्यायालय में जाने से क्यों भयभीत हो रही है ? क्यों अपनी खीझ संसद के कामों में व्यवधान डाल कर प्रकट कर रही है ? क्या यह छल की पराकाष्ठा नहीं हैं ? चोरी भी करेंगे और उत्पात मचा कर चोरी को साबित नहीं होने देंगे, ऐसी कपटपूर्ण नीति को क्या कहेंगे ? हम उनकी बेतुकी बातें सुन रहे हैं, यह हमारी सहनशीलता हैं, परन्तु वे इस बात पर क्यों आश्वस्त है कि जो कुछ हम कहेंगे, देश की जनता स्वीकार कर लेगी ?
शताब्दियों से भारत को विदेशी आक्रान्ताओं ने हमारी दुर्बलताओं का लाभ उठा जम कर लूटा। इतिहास के हर मोड़ पर लुटेरों को जयचंद मिले, जिन्होंने अपने स्वार्थ के लिए देश की सम्प्रभुता के साथ सौदा किया। विदेशी आक्रान्ताओं ने हमारी आपसी फूट का खूब लाभ उठाया। अब विदेशी लुटेरे हमें जाति और धर्म के आधार पर बांट कर हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर नियंत्रण स्थापित कर लूट को अंजाम दे रहे हैं। क्या हम एकजुट हो कर इस दुर्भाग्यजनक स्थिति को बदल नहीं सकते ?
यह हक़ीकत है कि एक पारिवारिक पार्टी के संचालाकों ने दस वर्ष तक देश के संसाधनों को जम कर लुटा। दुर्भाग्य से इस पार्टी पर एक विदेशी महिला का नियंत्रण है और पार्टी के भीतर से कोर्इ भी पदाधिकारी उन्हंं चुनौति देने की स्थिति में नहीं है। यह पार्टी अब सत्ता से बाहर है, किन्तु हमारी दुर्बलता का लाभ उठा कर फिर सत्ता पाना चाहती है, ताकि निर्बाध लूट के क्रम को जारी रखा जा सके। निश्चय ही इनकी नीति और नीयत सही नहीं है। परिवार के भक्तों की चाटुकार मंड़ली इनकी अधीनता स्वीकार कर रही है, पर भारतीय लोकतंत्र ऐसा नहीं कर पायेगा।
निरर्थक प्रपंच और बतंगड़ के जरिये पारिवारिक पार्टी संसद को ठपप कर रही है और जब तक इनके संचालाकों के हाथ में सत्ता नहीं आती, ये अपने उपक्रम को जारी रखेंगे। परन्तु हम क्यों मौन हो कर इनके कपट को मान्यता दे रहे हैं ? एक सरकार को पांच वर्ष के लिए जनता ने चुना है और इसे जनता ने ही काम करने का अधिकार दिया है, फिर एक विदेशी को क्या अधिकार है कि अपने चाटुकारों के जरिये ससंसद में उत्पात मचायें ? हम इन उत्पादियों को यह क्यों नहीं बताने का प्रयास करते कि भारतीय लोकतंत्र एक परिवार के समक्ष आपकी तरह नतमस्तक हो कर नहीं खड़ा है ? दरअसल हमारे मौन से इनका साहस बढ़ रहा है। हम इन्हें पूरी तरह तिरस्कृत कर यह साबित कर सकते हैं कि अपने स्वार्थ के लिए भारतीय लोकतंत्र को बंदी बनाने का प्रयास मत करो। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की संचालक जनता होती है कोर्इ व्यक्ति या परिवार नहीं।
Monday, 1 February 2016
मोदी सरकार को हटाने के लिए क्यों बेताब है-पाकिस्तानी सेना और भारत की कांग्रेसी जमात ?
मोदी सरकार को हटाने के लिए क्यों बेताब है-पाकिस्तानी सेना और भारत की कांग्रेसी जमात ?
नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते ही पाकिस्तानी सेना और भारत की कांग्रेसी जमात की बौखलाहट एक साथ बढ़ गर्इ, क्योंकि उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए नरेन्द्र मोदी स्वीकार्य नहीं थे। दोनों ने ही भारत की जनता द्वारा दिये गये जनादेश को क्रोधित हो कर अस्वीकार्य किया। पाकिस्तानी सेना ने अपनी सहायक संस्थाएं – आर्इएसआर्इ और आतंकी संगठनों की मदद से दहशतगर्दी तेज कर मोदी सरकार को ललकार रही है। वहीं सोनिया और राहुल ने मोदी सरकार के विरुद्ध संसद में और सड़कों पर कोहराम मच रखा है। असहिष्णुता और दलित अत्याचार जैसे मुद्ध अनेक हैं, पर सभी का सारांश एक है- सत्ता से हट जाओ, इस पर हमारा अधिकार है !
भारत विभाजन का सर्वाधिक लाभ पाकिस्तानी सेना के अफसरो और कांग्रेसी नेताओं ने उठाया है। कांग्रेसी नेताओं को सत्ता क्या मिली जैसे सोने की खान मिल गर्इ। जब भी सत्ता से दूर होते हैं, बैचेन हो कर तड़फ उठते हैं। फकीर गांधी से अमीर राहुल गांधी के युग तक आते आते कांग्रेस पार्टी भ्रष्टाचार का दलदल बन गर्इ हैं, जिसमें दुर्गन्ध आ रही है। देश भर में सत्ता का लुत्फ उठा चुके या उठा रहे कांग्रेसी नेता आज भारत के सर्वाधिक धनी राजनेता हैं। यदि चिराग ले कर ढूंढा जाय तो आपको देश भर में एक भी र्इमानदार और गरीब कांग्रेसी नेता नहीं मिलेगा। अर्थात गांधी की कांग्रेस को दफनाया जा चुका है। सोनियां-राहुल की विचारशून्य, अनैतिक व भ्रष्ट कांग्रेस खड़ी है, जो किसी भी तरह फिर सत्ता पाने के लिए मचल रही है। ऐसी आंशका है कि यदि भविष्य में कांग्रेस को सत्ता पाने के लिए देश के दुश्मनों का साथ ही क्यों न लेना पड़े, वह हिचकिचायेगी नहीं।
पाकिस्तान क्या बना जैसे पाकिस्तानी सेना के अफसरों के भाग्य ही खुल गये। सत्ता और ताकत का असली मजा पाकिस्तान में सेना के अफसर लूट रहे हैं। लोकतंत्र बैचारा सहमा-सहमा, डरा-डरा सेना के सामने लाचार हो कर नतमस्तक खड़ा है। सेना ऐसी परिस्थतियां पैदा करती रही है, जिससे भारत-पाक के बीच दुश्मनी बढ़ती रहे। कभी दोनों देशों की आवाम नज़दीक नहीं आ पाये, क्योंकि ऐसा होगा तो सेना द्वारा तैयार किया गया तिलस्म टूट जायेगा। पाकिस्तान का वजूद खत्म हो जायेगा। दहशतीगर्दी और नशे का व्यापार चौपट हो जायेगा। पाकिस्तानी सेना और आर्इएसआर्इ के अफसर मालामाल है। अरबों कमा रहे हैं और करोड़ो बांट रहे हैं। ड्रग्स की कमार्इ दहशतगर्दी के व्यापार में लगा रखी है। पाकिस्तान में चल रही कर्इ आतंकी फैक्ट्रीयों की पाकिस्तानी सेना मालिक है। फैक्ट्रीयों के मालिक आतंकी आका है, जो सेना और आर्इएसआर्इ के शार्गिद हैं। कमीशन के तौर पर इन आकाओं को भी भारत में दहशतगर्दी बढ़ाने के एवज में करोड़ो रुपये मिलते हैं, जिसका आधे से अधिक भाग अपनी जेबों में रखते हैं और बचा हुआ दहशतगर्द तैयार करने में लगाते हैं। भारत में भी इन आकाओं ने अपने अंधे अनुयायियों की जमात तैयार कर रखी है, जिन्हें धन के प्रलोभन और मजहबी उन्माद से उकसा कर भारत राष्ट्र के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए उकसाय जाता है।
भारत के सेकुलर राजनीतिक दल पाकिस्तानी सेना के गोरखधंधे के अप्रत्यक्ष मददगार हैं, क्योंकि पाकिस्तानी सेना जिन्हें मोहरा बना कर खेल खेलती है, वे सेकुलर राजनीतिक दलों के वोट बैंक हैं। सत्ता पाने के लिए वोट चाहिये, क्योंकि चुनाव जीतने के लिए एक समुदाय विशेष के थोक वोटों का उनके लिए बहुत अधिक महत्व हैं। सेकुलर राजनीतिक दलों के लिए देशहित गौण है, तुष्टीकरण महत्वपूर्ण हैं। अत: सेकुलर जमात ने पाकिस्तान सेना द्वारा प्रायोजित नशे और आतंक के व्यवसाय को बंद करने का कभी गम्भीर प्रयास नहीं किया। आतंकी घटना को अंजाम देने के बाद आतंकी आसानी से भाग जाते। उनके छुपने के ठिकानों को ढूंढ़ा नहीं जाता। उन्हें पकड़ा नहीं जाता। यूपीए शासन के दस वर्षों में अनेकों आतंकी घटनाएं घटी। सैकड़ो निर्दोष नागरिकों की जाने गर्इ, पर कुछ ही आतंकी पकड़े गये।
पाकिस्तानी सेना को मोदी सरकार पर भरोसा नहीं हैं, क्योंकि सरकार बनते ही नरेन्द्र मोदी ने सबका साथ, सबका विकास का नारा दिया था। वे सब को साथ ले कर चलना चाहते हैं। एक समुदाय विशेष के थोक वोटों का उन्हें लालच नहीं है। वे तुष्टीकरण को महत्व नहीं देते, इसलिए पाकिस्तानी सेना को अपने ड्रग्स और आतंक के कारोबार के चौपट होने की आशंका बढ़ गर्इ है। इसीलिए आर्इएसआर्इ ने पठानकोट के आतंकी हमले का षड़यंक रचा। इसका मूल मकसद भारी तबाही कर मोदी सरकार के प्रति जनता का मोह भंग करना था। पठानकोट में जब विशेष कामयाबी नहीं मिली तो गणतंत्र दिवस के दिन पूरे देश को आतंक से दहला देने का षड़यंत्र रचा, पर सुरक्षा बलों ने सुदृढ़ चौकसी से दहशतगर्दों को देश में घुसने नहीं दिया। गुप्तचर एजेंसियों से पूरा देश सतर्क हो गया और पुलिस ने उन लोगों को ढूंढ निकाला जो आर्इएसआर्इ के इशारें पर देश भर में तबाही मचाने की योजना बना रहे थे।
पाकिस्तानी सेना नरेन्द्र मोदी को हटाना चाहती है, क्योंकि उन्हें भय है कि कहीं वे नवाज से दोस्ती के बहाने पाकिस्तानी जनता का दिल नहीं जीत लें। जनता ने यदि सेना के विरुद्ध विद्रोह कर दिया तो सेना उसे दबा नहीं पायेगी। पाकिस्तान -टूकड़ो में बंट जायेगा, क्योंकि पाकिस्तान के कर्इ प्रान्तों में असतांष सुलग रहा है, जिसे सेना ने ताकत से दबा रखा है। इसीलिए सेना को नरेन्द्र मोदी जैसा प्रधानमंत्री नहीं चाहिये, जिसका ज़मीर बिकाऊ नहीं हो। सेना को कांग्रेसी सरकारें पंसद है, जो लूट के कारोबार में व्यस्त रहती है उसके कारोबार पर अंकुश लगाने के लिए पूरे शिद्दत के साथ खड़ी नहीं होती।
पाकिस्तानी सेना नरेन्द्र मोदी को हटाने के लिए वीभत्स आतंकी षड़यंत्रों को अंजाम देने में लगी है, ताकि भारत में अराजकता फैलायी जा सके। उधर कांग्रसी नेता असहिष्णुता के बहाने अल्पसंख्यक समुदाय के मन में जानबूझ कर असुरक्षा का भाव भर रहे हैं, ताकि वे अराजक बन जाये। दलितों का सरकार से मोहभंग करने के लिए उनके मन में यह बात बिठार्इ जा रही है कि मोदी सरकार दलित विरोधी और अत्याचारी है। अप्रत्यक्ष रुप से पाकिस्तानी सेना और कांग्रेसी नेता सरकार के विरुद्ध मिल कर काम कर रहे हैं। दोनो के अपने अपने स्वार्थ हैं, पर इस स्वार्थ में देानों देशों की जनता पीस रही है। हमे पाकिस्तानी सेना और कांग्रेसी नेताओं की नीति और नीयत संदिग्ध लग रही है। ये दोनो अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सकते, यदि भारत की जनता मोदी सरकार के पीछे दृढ़ता से खड़ी हो जाय।
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