Thursday, 31 July 2014

भूखे को आज भोजन चाहिये, चार दिन बाद नहीं

उतराखंड़ की तीनों विधानसभा जीतने पर मृत कांग्रेस को संजीवनी मिल गयी। ऐसा लगा जैसे कृश्काय  कांगे्रस लड़खड़ाते हुए खड़ी हो गयी। कांग्रेसियों के मुरझाये चेहरे यकायक खिल उठे। वे क्षीण आवाज़ में चीख उठे -”मोदी जी के अच्छे दिन अब कभी नहीं आ सकते। हमारे अच्छे दिन आयेगे। हमारी मेड़म जल्दी ही देश की सर्वेसर्वा बनेगी।” वैसे यह उनका ख्याली पुलाव हैं। खैर, अभी न नौ मन तेल जलेगा और न राधा नाचेगी, किन्तु मोदी सरकार के चुनाव परिणामों को चुनौती मान कर अपने कार्यों, नीतियों और फैंसलों से जनता का विश्वास जीतने की कोशिश प्रारम्भ कर देनी चाहिये।
यह माना जा सकता है कि मोदी सरकार अच्छा काम कर रही है। देश के विकास और समृद्धि के जो वादे किये थे, उसे पूरा करने के लिए परिश्रम कर रही है। यह भी सच है कि मोदी सरकार को शांति से काम करने दिया गया, तो देश के अच्छे दिन भी आयेंगे, किन्तु जनता के सब्र का बांध फूट रहा है। उसे अपनी सरकार से बहुत अधिक अपेक्षाएं हैं। केन्द्र में सरकार बन गयी है, उसके परिणाम उसे आज चाहिये, एक वर्ष बाद नहीं, क्योंकि भूख आज लग रही है और आप चार दिन बाद अच्छे व्यंजन बना कर खिलाओंगे, तो व्यंजन थाली में आने के पहले ही भूखा व्यक्ति भूख से दम तोड़ देगा।
केन्द्र में सरकार बदलते ही दालों के भाव यकायक बीस प्रतिशत कम हो गये थे। दूसरे जींसों के भाव भी लुढ़कने लगे थे। व्यापारियों मे सरकार को ले कर अनचाहा भय व्याप्त हो गया था, किन्तु सरकार बनते ही ऐसी कोई कार्यवाही नहीं हुई, जिससे वह भय स्थायी रह पाता। जून माह में मानसून की बेरुखी और इराक संकट को मीडिया द्वारा बढ़ा चढ़ा कर दिखाने से महंगाई फिर बढ़ने लगी। प्रधानमत्री ने मंत्रियों के साथ महंगाई का ले कर कई मीटिंगे की और जमाखोरों को धमकाया, किन्तु परिणाम सिफर ही रहा। क्योंकि व्यपारिपयों ने भांप लिया कि यह सरकार भी नौकरशाही का सहारा ले कर ही चल रही है। नौकरशाही की अकर्मण्यता और भ्रष्टाचार जगजाहिर हैं, जिसका व्यापारियों को कोई भय नहीं है।
बूलेट ट्रेन और स्मार्टसीटी जैसे सपने दिखाने के पहले महंगाई पर अंकुश लगाना आवश्यक था। देश भर के कालाबाजारियों की धड़ पकड़ के लिए अफसरों पर आश्रित रहने के बजाय स्थानीय जनता से सहयोग लेना था। जमाखारी रोकने का काम अपने सांसदों और विधायकों को सौंपा जा सकता था। प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह जंग खा चुकी है, जिससे बेहतर परिणामों की उम्मीद तब तक नहीं की जा सकती, जब तक इसके विरुद्ध सख्त कार्यवाही नहीं की जाय। उसे यह अहसास नहीं कराया जाय कि अब वह सब नहीं चलेगा, जो वर्षों से चल रहा है।
विदेशों से कालाधन लाने के लिए तो सरकार बनते ही कार्यवाही आरम्भ कर दी, परन्तु पूरे देश में काले धन का जो साम्राज्य दिखाई देखा रहा है, उस पर प्रहार करने के लिए अब तक कोई पहल नही की। भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों, राजनेताओं और व्यापारियों ने अपनी अधिकांश काली कमाई प्रोपर्टी में उलझा रखी है। सरकार कोशिश कर साठ दिन में भ्रष्ट- सरोवर के साठ मगरमच्छ ही पकड लेती, तो टीवी चेनलों को टीआरपी बढ़ाने के लिए मसाला मिल जाता और वे अपने सघन प्रचार प्रपोगंड़ा से टमाटर के भाव बढ़ाने में अप्रत्यक्ष सहयोग नहीं देते।
सरकार बदलने के बाद भी पूरे देश में भ्रष्टाचार बदश्तूर जारी है। वे प्रदेश भी अछूते नहीं हैं, जहां भाजपा की अपनी सरकारें हैं। महंगाई के साथ-साथ भ्रष्टाचार को रोकने के लिए भी सरकार के बनते ही पहल की जाती, तो जनता में अच्छा संदेश जाता। सरकार की संकल्प शक्ति से भ्रष्ट सरकारी व्यवस्था सुधारी जा सकती है। यह कोई असम्भव कार्य नही है। केन्द्र व प्रदेशा की सरकारे ठान लें तो भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों का आचरण एक हद तक सुधारा जा सकता है।
जेटली जी ने चिदम्बर की नौकरशाही से ही बजट तैयार करवाया, जिसमें मोदी जी के सपनों को जोड़ दिया। अल्पअवधि में तैयार किये गये बजट से कुछ ज्यादा आशा नहीं की जा सकती, किन्तु बजट में महंगाई पर अंकुश लगाने की गम्भीर कोशिश नहीं की गयी। डिजल और पैट्रोल पर लगा हुआ टेक्स भार कम कर देते तो, महागाई स्वतः ही कम हो जाती । बार-बर सब्सिडी का रोना रोया जाता है, किन्तु इन पदार्थों पर लगाये गये टेक्स का विवरण जनता को नहीं दिया जाता।
पिछली सरकार की खैरात योजनाएं दरअसल खर्चिली योजनाएं हैं जिससे जनता को लाभ के बजाय हानि ज्यादा हो रही है। बजट के कई लाख करोड़ रुपये इन योजनाओं के भेंट चढ़ जाते है, जिसका आधा पैसा भ्रष्टाचारी चट कर जाते हैं। मनरेगा में क्या हो रहा है, इसकी यदि जांच करायी जाय, तो कई चैंकाने वाले तथ्य सामने आयेंगे। इस योजना से ग्रामिण परिवारों के पास जो पैसा गया, उससे अधिक पैसा भ्रश्टाचारियों ने लूट खाया। इसी तरह वोट बटोरने के लिए ताबड़तोड़ में लागू की गयी खा़द्य सुरक्षा योजना में कई खामियां है, जिसका लाभ भूखे लोगों से ज्यादा वे उठा रहे हैं, जिनका पेट भरा हुआ है। आधे से अधिक बीपीएल कार्ड फर्जी बने हुए हैं। हालत यह है कि एक किसान गेहूं पैदा कर बीस रुपया किलों बाजार में बेच रहा है वही किसान दो रुपये किलों में सरकार से गेहूं खरीद रहा है। कई लाख करोड़ की मीड डे मिल योजना को यदि बंद भी कर दिया जाय, तो सरकार के इस निर्णय की कोई आलोचना नहीं करेगा, क्योंकि अधिकांश स्कूलाी बच्चें सरकार द्वारा खिलाया जा रहा खाना नहीं खा रहे हैं।
मोदी जी का यह विचार सही है कि गरीबों का हक नहीं छीना जाना चाहिये, किन्तु गरीबों और वंचितो तक पहुचांयी जा रही सहायता को बीच में लुटा जा रहा है, उस लूट को तो रोका जाना चाहिये। पिछली सरकार ने जो गलतियां की उसे अक्षरशः लागू करना बुद्धिमानी नहीं है। महंगाई बढ़ाने में खैरात योजनाएं भी एक महत्वपूर्ण कारक है। अब भी इन सारी योजनाओं की समीक्षा की जा सकती है। जब तक इनमें सुधार नहीं लाया जाय तब तक इन्हें रोक कर भारी धन राशि बचायी जा सकती है।
ब्यूरौक्रेसी पर सारा काम छोड़ कर निश्चिंत हो जाना, एक लोकप्रिय सरकार के लिए शोभा नहीं देता, क्योंकि महंगाई का जो आज रौद्र रुप दिखाई दे रहा है, उसका मूल कारण पिछली सरकार के घपले-घोटालें और ब्यूरोक्रेसी की संदिग्ध भूमिका रही है। जिन लोगों ने जनता के धन को जम कर लूटा और राजकोषीय घाटा बढ़ा कर महंगाई बढ़ाई है, वे लोग सरकार से हट गये, किन्तु उनके सहयोगी नयी सरकार के साथ अब भी जुड़े हुए हैं, जिनकी नीति और नीयत को सुधारे बिना देश की ज्वलन्त समस्याओं को नहीं सुलझाा जा सकता।
कुशासन, महंगाई, भ्रष्टाचार, कालाधन और महिला उत्पीड़न के विरुद्ध प्रभावी प्रचार अभियान से अभिभूत हो कर पूरे देश की जनता ने नरेन्द्र मोदी के पक्ष में ऐतिहासिक मतदान किया है। अतः सरकार को शीध्रता से उन समस्याओं को सुलझाने में देरी नहीं करनी चाहिये, जिससे जनता आज प्रभावित हो रही है। जनता को वह नेतृत्व कभी नहीं चाहिये, जिसे उसने ठुकरा दिया है, किन्तु ऐसी परिस्थितियां नहीं पैदा होनी चाहिये, जिससे जनता को हताश हो कर फिर उन्हीं घोटालाबाजों और भ्रष्टाचारियों की की शरण में जाना पड़े।

Wednesday, 9 July 2014

सोनिया युग का पतन और मोदी युग का प्रारम्भ

अंधेरे सोनिया युग का अवसान हो गया है। नरेन्द्र मोदी भारत के राजनीतिक क्षितिज पर आशा की किरण बन कर उभरे हैं। यह हमारा दुर्भाग्य ही था कि हमने भोलेपन से अपना भाग्य दस वर्षों के लिए एक अभिमानी, रहस्यमय स्वभाव की विदेशी महिला को सौंप दिया। मोदी के प्रति उनकी खीझ जग जाहिर है। उन्हें कभी मौत का सौदागर कहा था, आज वे सत्ता के शीर्ष पर पूर्ण बहुमत के साथ बैठे हैं। शायद ही भारत का कोई ऐसा मुख्यमंत्री होगा, जिसके विरुद्ध इतने अनगिनित अपराधिक मुकदमें दर्ज किये हों । दस वर्षों में एक सरकार ने अपनी सारी शक्तियां, मानवाधिकार आयोग एवं जांच एंजेंसियों का दुरुपयोग कर उन्हें अपराधी घोषित करने की भरसक कोशिश की, किन्तु मोदी साहस के साथ मैदान में डटे रहें। अपने आत्मबल से उनके विरुद्ध किये गये षड़यंत्रों को निष्फल कर दिया।
सोनियां ने मोदी को सत्ता में आने से रोकने के लिए सारी उलटी सीधी चाले चलीं, सभी सेक्युलर राजनीतिक दलों को अपने पक्ष में लामबंद किया, ताकि मोदी को शिकस्त दी जा सके। ऐसा वे इसलिए कर रही थी, क्योंकि वे सत्ता खो कर अपने किये कृत्यों को उजागर नहीं होने देना चाहती थी। एक नंगे सत्य को उन्होंने अपनी प्रशासनिक शक्तियों से छुपा रखा था। अब उनके दस वर्षों के कार्यकाल के घोटालों की परते खुलेगी। जनता एक दिन जान जायेगी कि एक विदेशी के हाथों में सत्ता सौंप कर कितना बड़ा धोका खाया है।
सोनिया हमेशा कम बोलती है, दूसरे का लिखा हुआ पढ़ती है, कभी कभार मुस्कराती है। उन्हें चापलुसी और दरबारी संस्कृति पसंद है, उनका स्वभाव मुखर नहीं है, इसलिए उसके मन की थाह पाना असम्भव है। पर्दे की ओट में रह कर उन्होंने दस वर्षों तक प्रधानमंत्री और मंत्रियों को कठपुतली की तरह नचाया, किन्तु अपनी प्रशासनिक क्षमता का परिचय देने कभी आगे नहीं आयी। भारतीय संस्कृति, सभ्यता और इतिहास के बारें में कभी उन्होंने कोई टिप्पणी नहीं की। भारत को वे कैसा बनाना चाहती है, इस संबंध में कोई विज़न जनता के सामने प्रकट नहीं किया। सोनियां ने भारत की संवैधानिक परम्पराओं को तोड़ने और संवैधानिक संस्थाओं का अवमूल्यन करने में कभी हिचक महसूस नहीं की। किसी भी अप्रिय घटना जैसे पाकिस्तानी सेना द्वारा भारतीय जवानों के सिर काट कर ले जाने वाले प्रकरण को ले कर पूरे देश के साथ वे व्यथीत नहीं दिखी। उनके चेहरे पर कभी देश भक्ति का किंचित भी भाव दिखाई नहीं दिया। निःसंदेह उन्हें भारत और भारतीयता से कोई लेना देना नहीं था। वे एक अघोषित मिशन को ले कर भारतीय लोकतंत्र का उपयोग अपनी स्वार्थ सिद्धी के लिए कर रही थी।
मोदी खुली किताब है, उनके मन में कुछ भी दबा नहीं रहता। जनता के समक्ष बेबाक बोलते हैं। उनकी भाषा सरल, स्पष्ट आम आदमी के दिल को छूने वाली होती है। किसी का लिखा हुआ भाषण वे नहीं पढ़ते, अतः उनके मुहं से निकले हुए शब्द भीतर से निःसृत होते हैं। उन्हें दरबारी संस्कृति से परहेज हैं। उन्हें हमेशा योग्य, कर्मठ और ईमानदार व्यक्ति पसंद आते हैं। मोदी नरम दिल के कठोर प्रशासक है, अपनी प्रशासनिक क्षमता का परिचय वे दे चुके हैं। भारतीय संस्कृति के प्रति श्री मोदी के मन में अटूट श्रद्धा है। नये भारत के बारें में उनका विज़न स्पष्ट है। वे भारत को कैसा बनाना चाहते हैं, इस संबंध में कई बार जनता के समक्ष अपने विचार प्रकट कर चुके हैं। देश के साथ षडयंत्र करने वाली ताकतों के साथ मोदी का कठोर रुख रहा है। वे किसी भी हालत में भारत की सम्प्रभुता के साथ खिलवाड़ पंसद नहीं करेंगे। उनकी देश भक्ति उनके भाषणों में स्पष्ट रुप से प्रकट होती है। मोदी की राष्ट्रभक्ति पर कभी प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया जा सकता।
सोनिया युग में प्रधानमंत्री और उनके मंत्री बहुधा अपने कार्यालयों में नहीं आते। मंत्री या तो विदेश दौरे पर रहते थे, या घर में आराम फरमाते थे। इस युग में नौकरशाहों ने विदेश भ्रमण का रिकार्ड बनाया है। मंत्री के कार्यालयों में फाइलों के ढेर लगे रहते थे, इन्हें निपटाने की फुर्सत नहीं थी। सेक्रेटेरियेट में दलालों का स्वच्छन्द विचरण जारी था। दलाल फाइलों को आगे बढ़ाने के उपाय करते थे। सौदेबाजी पूरी होने पर सेक्रेटरी मंत्री के घर जाते। मंत्री महोदया सोनियां से पूछ कर फाइल पर अपनी टिप्पणी लिखते। फाईल ले कर सोनिया दरबार में जाते। पीएमओं आॅफिस के अधिकारी को बुलाया जाता और उन्हें निर्देष दिया जाता कि इस पर प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर करवा दें। आदेशानुसार वे फाइल ले कर प्रधानमंत्री के घर जाते और वे सुप्रीम प्रधानमंत्री के मौखिक आदेष के आधार पर उस पर हस्ताक्षर कर देते। फाइल के कान्टेट को पढ़ने, उस पर टिप्पणी करने या विचार-विमर्श के अधिकार उनके पास नहीं थे। वे डमी प्रधानमंत्री थे, जिन्हें सुप्रीम प्रधानमंत्री के मौखिक आदेशों की पालना करनी थी।
नरेन्द्र मोदी और उनके मंत्री प्रतिदिन समय से पहले अपने कार्यालय में आ कर बैठ जाते हैं। फलतः उनके अधीनस्त कर्मचारी दौड़ते भागते समय पर कार्यालय आने के अभ्यस्त हो गये हैं। मंत्रियों और नौकरशाहों के विदेश दौरों पर लगाम लग गया है। कारपोरेट आॅफिस की तरह भारत सरकार दिन रात काम कर रही है। प्रधानमंत्री स्वयं बारह से चैदह घंटे कार्यालय में बैठे रहते हैं। प्रत्येक ज्वलन्त मुद्धो पर प्रधानमंत्री मंत्रियों के साथ घंटो मीटिंग करते हैं। लम्बित पड़ी सारी फाईलों को त्वरित गति से निपटाया जा रहा है। देश की समस्याओं को सुलझाने के लिए गहन मंथन हो रहा है।
दलालों का सेक्रेटरियेट में स्वच्छन्द भ्रमण बंद हो गया है। भारत सरकार पूरी प्रतिबद्धता और निष्ठा से काम कर रही है। सरकार के मन में जनता के प्रति सेवा की भावना है। सरकार पूर्ण ईमानदार है। जिस ढंग से सरकार काम कर रही है, उसे अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री और उनके सहयोगियों के मन में देश के संसाधनों और सार्वजनिक धन को लुटने की नीयत नहीं है। एक दो महीने के कामकाज को किसी भी तरह से सरकार की क्षमता का पैमाना नहीं माना जा सकता। ईश्वर से यही प्राथना है कि इस सरकार को लम्बी उम्र दें, ताकि गरीब और पिछड़ा भारत खुशहाली के मार्ग पर आगे बढ़ता रहे।
सोनिया युग में बूरी नीयत सेें सार्वजनिक धन और प्राकृतिक संसाधनों की खुली और बेबाक लूट को अंजाम दिया गया। बिजली और इन्फ्रास्ट्रक्चर से संबंधित कई परियोजनाएं बंद हो गयी। बैंकों का अरबों रुपया इन परियोजनाओं में फंस गया। प्रधानमंत्री मूक दर्शक की तरह ऐतिहासिक घोटालों को देखते रहे। अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री अर्थव्यवस्था की बिगड़ी सेहत को सुधारने के लिए कुछ नहीं कर पाये। राजकोषीय घाटा बढ़ने से महंगाई बढ़ती गयी। जनता महंगाई की मार से तड़फती रही, परन्तु सरकार सोयी रही। अलबता अर्थव्यवस्था की हालत और खराब करने के लिए खैरात योजनाओं में सार्वजनिक धन लुटाया गया, ताकि जनता के वोट मिल सके।
सत्ता खोने के बाद सोनियां की हल्ला ब्रिगेड़, महंगाई को ले कर जिस तरह से संसद और सड़को पर उपद्रव कर रही है, उससे यही लगता है, कि खिंसियानी बिल्ली खम्भा नोच रही है। सोनिया को अपनी हार से कोई पछतावा नहीं है। कभी हार पर आत्ममंथन नहीं किया और न ही इसे गम्भीरता से लिया। 129 साल पुरानी पार्टी को दो वर्ष पुरानी विवादास्पद आपपार्टी की शैली से धरना प्रदर्शन करने की क्या आवश्यकता आ पड़ी, इस बात के औचित्य को सोनिया की हल्ला बिग्रेड नहीं समझा सकती है। दरअसल कांग्रेस की विचारधारा कितनी दिवालिया हो गयी है, इसका यह स्पष्ट प्रमाण है। जिन्होंने भारत की जनता को महंगाई की सौगात दी है, वे सत्ता जाने के बाद घडि़याली आंसू बहाते हुए अपने पाप का ठीकरा दूसरों के सिर पर फोड़ रहे हैं। इसे भारत के राजनीतिक इतिहास की विडम्बना ही कहा जा सकता है।

Friday, 27 June 2014

सरकार पूर्ण प्रतिबद्धता से काम कर रही है और विरोधी अपनी खीझ छिपा नहीं पा रहे हैं

केन्द्र सरकार भारत की जनता की अपनी सरकार है। जनता ने बहुत सोच समझ कर राजनीतिक अराजकता मिटाने के लिए एक ऐसी शख्सियत पर विश्वास किया है, जिसे उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मौत का सौदागर, राक्षस, कसाई, रावण आदि अलंकारों से अलंकृत करते थे। सभी इस जननेता की राह में अवरोध खड़े करने के लिए एक हो गये थे, किन्तु उस समय उनके दिलों पर सांप लौट गया, जब संसद में उन्होंने सुना था, ‘ मैं नरेन्द्र दामोदर मोदी, ईश्वर की शपथ लेता हूं कि प्रधानमंत्री के रुप में, मै………………’ वे यह सुन कर तिलमिला गये थे। कई दिनों तक ये शब्द उनके कानों में गर्म शीशे की तरह उतरते रहे। उन्हें किसी भी तरह यह स्वीकार्य नहीं था कि नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बन जाय। राजनीतिक नफरत की यह पराकाष्ठा थी। लोकतंत्र में किसी की व्यक्तिगत उपेक्षा, तिरस्कार और घृणा का कोई स्थान नहीं होता। सता पर किसी पार्टी और व्यक्ति का विशेषाधिकार नहीं रहता। जनता जिसे चाहेगी सता सौंपेंगे। जनता के निर्णय को शिरोधार्य करने के अलावा कोई विकल्प ही शेष नही रहता।
जो शासक बन कर भारत पर राज कर रहे थे और भविष्य में किसी की भी चुनौती जिन्हें स्वीकार नहीं थी, उनके अभिमान को जनता ने चूर-चूर कर दिया। तुष्टीकरण, धर्मनिरपेक्षता और जातीय संकीर्णता का सहारा ले, जो राजनीतिक रोटियां सेक रहे थे, उनकी रोटियां जल गयी। जनता ने उन्हें आकाश से उठा कर जमीन पर पटक दिया। जनादेश ने स्पष्ट संकेत दे दिया- हमे शासक नहीं, सेवक चाहिये। धर्म और जाति की राजनीति नहीं, सुशासन चाहिये। सरकार कुछ नेताओं और अफशरों की निजी धरोहर नहीं होती, लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार जनता की होती है, जनता ही मालिक होती है, जनता के लिए कार्य करना ही सरकार का दायित्व रहता हे।
बहरहाल अजगर की तरह अपनी कुडली में सारी फाईलें दबा निश्चेष्ट पड़़ी सरकार के स्थान पर कठोर परिश्रम करने वाली सरकार काम कर रही है। भारत को पहला ऐसा प्रधानमंत्री मिला है, जो अठारह घंटे काम करता है। उनके पास अपना निजी कुछ नहीं है। उन्होंने अपना सारा समय और शक्ति देश को समर्पित कर दी है। सारे मंत्रालय के कार्यालय प्रातः जल्दी खुलते हैं और देर रात तक काम होता है। एक कारपोरेट आॅफिस की तरह सिर्फ काम को ही अब पूजा जाता है। जो कार्यालय पहले भ्रष्टाचार के अड्डे थे, जहां बड़े-बड़े घोटाले करने की रणनीति बनायी जाती थी, वहां अब देश की जनता की भलाई के लिए नीतियां बनायी जा रही है। पहले मंत्री और नौकरशाह इस बात का चिंतन करते थे कि कैसे अपने लिए अकूत धन का जुगाड़ किया जा सके, किन्तु अब यह चिंतन किया जा रहा है कि कैसे देश की खस्ता हालत को सुधारा कर अर्थव्यवस्था को पटरी पर ला, विकास के पथ पर आगे बढ़ाया जा सके।
जब वे सत्ता में थे या सत्ता से जुडे़ हुए थे, नरेन्द्र मोदी की बातों की खिल्ली उड़या करते थे, किन्तु अब वे सत्ता से बाहर हैं, तो मोदी सरकार के देश हित में लिये गये निर्णयों के विरुद्ध जनता को आक्रोशित करने का प्रयास कर रहे हैं। उदाहरण के लिए दस सालों में पिछली सरकार यदि प्रतिवर्ष दो प्रतिशत रेल किराया बढ़ाती, तो बीस प्रतिशत रेल किराया वैसे भी बढ़ जाता। अब यदि नयी सरकार ने एक साथ चैदह प्रतिशत किराया बढ़ा दिया, तो इसमें इतना हाय तौबा करने की कहां आवश्यकता है ? क्या उन्हें यह मालूम नहीं है रेलवे को यदि छब्बीस हजार करोड़ का घाटा हो रहा है, उसका भार भी तो भारत की जनता को ही उठाना पड़ रहा है, जबकि सिद्धान्तः सारा भार रेल में यात्रा करने वाले यात्रियों पर ही डाला जाना चाहिये, पूरे देश के नागरिकों पर नहीं, जो रेल में यात्रा ही नहीं करते हैं।  जो सिर्फ अपने राजनीतिक स्वार्थ को ही ज्यादा महत्व देते हैं, उनकी कोई नीति नहीं होती। वे देशहित के बजाय अपने हित पर ज्यादा ध्यान देते हैं। सरकार के विरुद्ध बौखलाहट और खीझ जताने के लिए वे जनता को जानबूझ कर भ्रमित करते हैं।
जबकि पिछली सरकार ने रण छोड़ कर भाग रही सेना की तरह सब कुछ तबाह कर दिया है। सड़ी हुई व्यवस्था नयी सरकार को विरासत में मिली है। इस पूरी व्यवस्था को सुधारना और उसे चुस्त-दुरुस्त करना काफी चुनौतीपूर्ण काम है। पूर्व प्रधानमंत्री का कार्यालय भ्रष्टाचार की गंगोत्री बन गया था, तब कैसे उस सरकार से आशा कर सकते थे कि पूरे देश में फैले भ्रष्टचार को समाप्त करने के लिए सरकार गम्भीर नीतियां बनायेगी ?
एक भ्रष्ट सरकार की जो सूत्रधार थी, उनकी बौखलाहट इसलिए बढ़ रही है, क्योंकि सरकार बदल जाने से उनके हाथ में कुछ नहीं रहा है। अब उनके पापों को छुपाने के लिए सीबीआई जैसी संस्था पर उनका नियंत्रण नहीं रहा है। गंदगी साफ करते-करते नयी सरकार को ऐसे तथ्य हाथ लग सकते हैं, जिससे देश को चलाने का अधिकार लें, जो उसे गर्त में गिराने का उपक्रम कर रहे थे, उनकी असली सूरत जनता के सामने आ जायेगी।
जिस सरकार को बने जुम्मे-जुम्मे चार दिन हुए हैं, उस सरकार के निर्णयों पर जनता को उकसाना, टीवी के चेनलों पर आ कर दरबारियों द्वारा एक जवाबदेय और ईमानदार सरकार पर व्यंगात्मक लहजे से बयान देना, दरअसल पिछली सरकार के संचालकों की खीझ और हताशा को प्रकट कर रहा है। देशहित जिनके लिए सर्वोपरी नहीं है, वे किसी बहाने अपनी खाल बचाने का प्रयास कर रहे हैं। यदि अल्पमत सरकार बनती तो उस पर वे आसानी से अंकुश लगा सकते थे, किन्तु पूर्ण बहुमत वाली सरकार का वे कुछ बिगाड़ भी तो नहीं सकते।
नयी सरकार को टीवी चेनलों की संदिग्ध भूमिका की भी जांच करनी चाहिये। देश के वातावरण को दूषित करने में टीवी चेनल महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। केजरीवाल को हीरो इन्हीं चेनलों ने बनाया था, जिससे उन्हें देश विदेश की भारत विरोधी ताकतों से भारी भरकम चंदा मिला था। कुछ टीवी चेनल नरेन्द्र मोदी को सत्ता में नहीं आने देने के दुष्प्रचार में पूर्व सत्ताधारी पार्टी के सहयोगी बने हुए थे। ये टीवी चेनल अब भी नही सुधरें हैं। सरकार को अलोकप्रिय बनाने की नीति अपनाये हुए हैं। रेल किराये में बढ़ात्तरी पर जनता के समक्ष स्वस्थ चिंतन प्रस्तुत करने के बजाय बात का बतंगड़ करने और सरकार को बदनाम करने के लिए उन पिटे हुए राजनेताओं के बयान बार-बार टीवी पर दोहरा रहे हैं, जिन्हें जनता ने पूर्णतया तिरस्कृत कर दिया है। सरकार देशद्रोही टीवी चेनलों के मालिकों के विरुद्ध शिकंजा कसे, उसके पहले जनता को भी इन्हें बहिस्कृत करना चाहिये, ताकि ये अपने मन की इस भ्रांति को निकाल दें कि भारत मूर्खों का देश है, जनता को झूठे प्रचारतंत्र के सहारे आसानी से मूर्ख बनाया जा सकता है।

कठोर और कडवे फैंसले का चाबुक जनता पर क्यों ? अपराधियों पर क्यों नहीं ?

मानसून कमजोर रहने की सिर्फ भविष्यवाणी की गयी है। मानसून आ कर गया नहीं है। फसल कितनी कमजोर होगी, इसका भी अनुमान नहीं है, फिर यकायक महंगाई क्यों बढ़ गयी ? क्योंकि ज्यादा मुनाफाखोरी के चक्कर में जमाखारी होने लगी। जिन लोगों के लिए सामाजिक हितों के बजाय अपना स्व हित सर्वोपरी होता है, जो अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए समाज का शोषण करते हैं, वे सामाजिक न्याय के अनुसार अपराधी होते हैं, चाहे उन्हें कानून की धाराएं अपराधी घोषित नहीं करती हों।
स्वयं हलवा खाना चाहते है, इसलिए दूसरों के मुहं में जा रहा निवाला छिनेंगे, क्योंकि हम सक्षम है और ऐसा दुस्साहस कर सकते हैं। भारत की सामाजिक व्यवस्था की इस खतरनाक प्रवृति पर जब तक सरकार का अंकुश नहीं लगेगा, तब तक भारतीय समाज के लिए अच्छे दिन आने वाले नहीं है। जमाखारी पर महज बयानबाजी से जमाखोरों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इन अपराधियों पर सरकारी चाबुक की मार चाहिये, ताकि वे यह समझ पाये कि जनता की सरकार क्या होती है और उसके पास क्या अधिकार होते हैं।
वित्तमंत्री ने राज्य सरकारों को निर्देश दे दिया कि जमाखोरी पर अंकुश लगावें। राज्य सरकारों ने इंस्पेक्टरों को भेज दिया। इंस्पेक्टर जमाखाोरों से रिश्वत खा कर घर आ गये। जमाखोरी होती रही। व्यापारी मुनाफा कमाते रहें। वे अमीर होते रहें और जनता गरीब। आज तक ऐसा होता आया है। पिछली सरकारें ऐसा ही करती आयी थी। क्या मोदी जी की सरकार भी इसी औपचारिकता की पुनरावृति करेगी ? बेहतर होता वित्तमंत्री नौकरशाहों द्वारा सुझाये गये सुझावों को जनता के समक्ष परोसने के बजाय स्थिति का अध्ययन करते और फिर बयान बाजी करते।
मोदी सरकार को राज्य सरकारों और उनके इंस्पेक्टर राज पर भरोसा नहीं करना चाहिये। जमाखोरी को गम्भीर समस्या मानते हुए इस समस्या का समाधान खोजने के लिए सरकारी जांच एजेंसियों और सांसदों का सहयोग लेना चाहिये। केन्द्र सरकार जमाखारों की सम्पति भी कुर्क कर सकती है। सरकार के ऐसे फैंसलों को ही कडवे और कठोर फैंसले करहते हैं, जिसकी मार अपराधियों पर पड़े, न कि जनता पर। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने महंगाई के संबंध में जो बयान दिया, वह नौकरशाही द्वारा तैयार किया गया बयान ही था। ऐसे बयानों से वर्तमान सरकार के मंत्रियों को परहेज करना चाहिये। सतारुढ होते ही यदि सरकार जमाखोरों पर चाबुक बरसाती, तो सभी के मन में भय बैठ जाता, जो परिस्थतियां आज बनी है वह नहीं बनती। जमाखोरी कठोर कार्यवाही से रोकी जा सकती है, शाब्दिक बयानों से नहीं।
भारत की सुविधाभोगी और भ्रष्ट बिरादरी वातानुकूलित कमरों में बैठ कर ही जनता की समस्याओं के बारें में सोचती है और उसका निराकरण सरकार को सुझाती है। सरकार के मंत्री यदि बिना समस्याओं का गहन अध्ययन किये ज्यों का त्यों जनता को उसी भाषा में समझाने का उपक्रम करेंगें, तब पिछली सरकार और इस सरकार में अंतर ही क्या रहेगा ? कांग्रेस सरकार से जनता को चिढ़ इसलिए हो गयी, क्योंकि अपराधी मौज मस्ती से जिंदगी गुजार रहे थे और जनता कष्ट भोग रही थी।
पिछली सरकार से मोदी सरकार को दिवालियां अर्थ व्यवस्था उपहार में मिली है। अर्थ व्यवस्था को पटरी पर लाने का काम चुनौतीपूर्ण है। सरकार अर्थव्यवस्था को तभी सुधार सकती है, जब आर्थिक अपराधियों की धड़पकड़ तेज हो। सरकारी खजाने में आने वाले धन को रोकने और सरकारी खजाने से जाने वाले धन को लुटने पर जब तक प्रतिबंध नहीं लगेगा, तब तक सरकार की काई भी नीति सफल नहीं होगी। जो लोग सरकारी खजाने से वेतन लेते हैं, किन्तु हानि सरकार को ही पहुंचाते हैं, ऐसे अपराधियों को चुन चुन कर जेल सिंकजों के पीछे नहीं भेजा जायेगा, तब तक पूरे देश में वित्तीय अनुशासन नहीं आयेगा।
नराजनेता, नौकरशाह और उद्योगपतियों के शक्तिशाली त्रिगुट के अवैध संबंधों की प्रगाढ़ता ही भारत की सारी समस्याओं की जड़ है। विश्व में भारत को दरिद्रतम और भ्रष्टतम देश होने का तमगा भी इसी त्रिगुट ने दिलाया है। इस त्रिगुट की प्रगाढ़ता को समाप्त करने के लिए मोदी सरकार ने अब तक कोई पहल नहीं की है, जबकि सरकार बनते ही उसकी पहली प्राथमिकता यही होनी चाहिये। यदि वाजपैयी सरकार त्रिगुट के अवैध संबंधों को समाप्त करने का किंचित भी प्रयास करती, तो उसकी लोकप्रियता बहुत अधिक बढ़ जाती। कांग्रेस संस्कृति से परहेज करने के बजाय आत्मसात करने के परिणामस्वरुप ही वाजपैयी सरकार फिर सत्ता में नहीं लौटी। आशा है मोदी सरकार इतिहास की पुनरावृति नहीं करेगी।
काले धन के उत्पादन और बाजार में इसके उत्पात पर सरकार को कडी नजर रखनी होगी, अन्यथा काले धन का भारतीय अर्थव्यवस्था में समानान्तर प्रवाह उसके सारे दावों और वादों को खारिज कर देगा। देश भर में बेईमानों की बैमानी सम्पति को चिंहित करने का कार्य प्रारम्भ कर देना चाहिये। यह कार्य ज्यादा जटिल नहीं है। सारी काली कमाई जमीनों और मकानों में फंसी हुई है, इस कमाई का आंकलन सरकार अपनी इच्छा शक्ति से कर सकती है। एक साथ पूरे देश में छापे मारे जा सकते हैं। सरकार का यह संकल्प देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर ले आयेगा। देश में एक ऐसा वातावरण बन जायेगा, जिससे बेइ्र्रमान खोप खायेगें। भ्रष्ट आचरण पर अंकुश लग जायेगा। ऐसा होना ही अच्छे दिन की शुरुआत माना जायेगा।
यदि वास्तव में सरकार के मन में देश भर में फैली काली कमाई का आंकलन करने की इच्छा है, तो वह दिल्ली को ही प्रयोग के रुप में ले सकती है। सरकार को अल्प समय में ही अरबो रुपये की काली सम्पति का पत्ता लग जायेगा। यदि इसी प्रयोग को देश भर में दोहराया जाय, तो जनता को चकित कर देने वाली सम्पति का विवरण मिल जायेगा। आज़ादी के बाद जो राजनीतिक व्यवस्था बनी है, उसने देश को सेवा देने के बजाय काले धन के उत्पान और उपयोग में ज्यादा रुचि दिखाई है। गरीब जनता की गाढ़ी कमाई को लूट कर पैदा किया गया काला धन विदेशी बैंकों में तो जमा ही है, देश के अधिकांश बड़े और छोटे शहरों में इसका जलवा दिखाई दे रहा है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर रहा आर्थिक आतंकवाद है, जो गोलियों से जनता की जान नहीं लेता, अपितु छुप कर उसके पेट पर लात मारता है, जिससे वह जीवित तो रहता है, किन्तु तड़फ-तडफ कर दम तोडता है। मोदी सरकार ने इन आर्थिक अपराधियों के विरुद्ध यदि नरमी का व्यवहार किया तो देश की जनता कभी माफ नहीं करेगी।
पिछली सरकार सीबीआई का उपयोग अपने घोटालों पर लिपापोती करने और विपक्ष को धमकाने के लिए प्रयोग करती थी। मोदी सरकार सीबीआई का उपयोग काले धन का पत्ता लगाने और बड़े-बड़े आर्थिक अपराधियों को पकड़ने में कर सकती है। यह सुझाव बुरा नहीं है। पूरे देश की जनता इसकी समर्थक है। यदि ऐसा किया जाता है तो अच्छे दिन आने वाले हैं, महज एक नारा या भविष्य का मजाक बन कर नहीं रह जायेगा।

Tuesday, 20 May 2014

129 साल पुरानी कांग्रेस की मृत्यु हो गयी है- अधिकृत घोषणा सुनने का इंतजार है

129 साल पुरानी कांग्रेस की मृत्यु हो गयी है। बंदरिया के मरे हुए बच्चे की तरह कांग्रेसी अपनी पार्टी को छाती से चिपकाये रो रहे हैं। उसकी विधिवत अन्तयेश्टि भी नहीं करने दे रहे हैं। वे इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं है कि जो पार्टी कांग्रेस होने का दावा कर रही है, वह दरअसल एक मां और उनके पुत्र की पार्टी है, जिसके पास अपने दरबारियों का हुजूम हैं। इस पार्टी का नामकरण मदर एण्ड सन पार्टी कर दिया जाना चाहिये, पर जानबूझ कर किया नहीं जा रहा है। सामंती विचारधारा वाली पार्टी को कांग्रेसी विचारधारा से कोई मतलब नहीं है। पार्टी में न तो लोकतंत्र है और न ही इस पार्टी के मुखिया को लोकतंत्र में कोई आस्था है। दस वर्ष तक एक परिवार ने सारी शक्तियों को केन्द्रीत कर लोकतंत्र को भारी आघात पहुंचाया है। विडम्बना यह है कि देश को जिस हालत में आज पहुंचाया है, उसकी पूरी जिम्मेदारी इस परिवार की ही है। किन्तु न तो इस बात को यह परिवार स्वीकार करता है और न ही अपनी करतूतों के कारण लोकसभा में पार्टी की भारी पराजय के लिए अपने आपको जिम्मेदार मानता है।
19 मई 2014 को सायं चार बजे हुई कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक के बाद कांग्रेस की मृत्यु की पुष्टि हो गयी, किन्तु इसकी घोषणा से परहेज किया जा रहा है। मीटिंग समाप्त होने पर बाहर निकले सभी दरबारियो के मायूस चेहरे लटके हुए थे । उनके होंठ सिये हुए थे। ऐसा लग रहा था, जैसे ये सभी किसी का दाहसंस्कार करने के बाद लौट कर आ रहे हों। किन्तु आश्चर्य इस बात का है कि उन्हें कांग्रेस की मृत्यु का कोई शाोक नहीं है। उन्हें इस बात का मलाल है कि उनके राजघराने के हाथों से सत्ता चली गयी। शक्तिहीन पार्टी महारानी और राजकुमार के आश्रितों के लिए यह बहुत बड़ा सदमा था, क्योंकि वे इस राज परिवार के आश्रय के बिना राजनीति कर ही नहीं सकते। इन चाटुकारों के लिए परिवार की परिक्रमा से ही राजनीति का सफर प्रारम्भ होता है और यहीं आ कर समाप्त होता है।
किन्तु देश भर में फैले कांग्रेसी कार्यकर्ता और मतदाता अपनी प्रिय पार्टी की मृत्यु से शोक संतप्त हैं। उनके मन में गहरा विक्षाभ हें। उन्हें आशा थी कि लोकसभा में भारी पराजय के बाद मरणाशन्न कांग्रेस को जीवनदान देने का अंतिम प्रयास किया जायेगा। एक परिवार, जो पार्टी की इस दुर्दशा का जिम्मेदार है, उससे पार्टी को मुक्त किया जायेगा। मां-बेटे से पराजय के संबंध में तीखे सवाल पूछे जायेंगे। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। दरबारियों ने एक सोची समझी रणनीति के तहत मां-बेटे को उनके पाप से मुक्त कर दिया और सारा पाप पूरी पार्टी पर डाल दिया, जब कि दुनियां देख रही है कि कांग्रेस की जो दुर्दशा हुई है, उसकी शतप्रतिशत जिम्मेदारी मां-पुत्र की जोडी ही हैं ।
कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं और जमीन से जुड़े नेताओं के समक्ष धर्मसंकट आ गया है कि वे अब क्या करें ? वे न तो उन दरबारियों को बदल सकते हैं न ही उनसे सवाल कर सकते हैं, क्योंकि दरबारियों को राजपरिवार ने ही वर्षों पहले कांग्रेस वर्किंग कमेटी में चुन कर बिठाया है और उसमें वे कोई तब्दीली नहीं कर रहे हैं। ये सारे दरबारी राजपपरिवार से पूरी तरह जुड़े हुए हैं किन्तु आम कांग्रेस जन से कटे हुए हैं। उन्हें मालूम है, कांग्रेस का नेतृत्व नहीं बदला गया तो अगले चुनावों में 44 का आंकड़ा शून्य तक पहुंच सकता है। हां यदि अपने अपने राज्यों का कोई प्रभावी नेता नेतृत्व के प्रति आंध्रा की तर्ज पर विद्रोह कर दें, तो कई प्रान्तीय कांग्रेस का जन्म हो सकता है। प्रान्तीय कांग्रेस एम एण्ड एस पार्टी को चुनौती दे सकती हैं। उनके नेतृत्व को अस्वीकार कर सकती है। दरबारिययों के आदेश को मानने से इंकार कर सकती है।
पार्टी महारानी और राजकुमार तो अपने दंभ में इतने डूबे हुए हैं कि उन्हें यह आभास ही नहीं हो रहा है कि लोकतंत्र में पार्टियां जनता बनाती है और नेतृत्व का भार उन्हें ही सौंपा जाता है, जो जननेता होता है। जो जमीन से जुड़ा होता है और जनता के लिए संघर्ष करता है। राजनीतिक पार्टियां आकाश में नहीं बनती और न ही उनका नेता आकाश से टपकता है। मोदी जन नेता हैं। मोदी सुनामी ने कांग्रेस मुक्त भारत का नारा सार्थक कर दिया है। एम एण्ड एस पार्टी के संचालक और उनके दरबारी जन समर्थन खो चुके हैं, क्योंकि जनता का उन पर भरोसा और विश्वास उठ चुका है। यदि मोदी जन आंकाक्षाओं पर खरे उतरते हैं और सुशासन से जनता को दिल जीत लेते हैं, तो एम एण्ड एस पार्टी का अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा।
एम एण्ड एस पार्टी की हालत उस वस्त्रविहिन राजा की तरह है, जिसे देख कर राह से गुजरता हुआ हर व्यक्ति हंसता है, किन्तु जब राजा दरबारियों से हंसने कारण पूछता है तो वे सिर झुकाये बड़े अदब के साथ कहते हैं- हुजूर आप बहुत सुन्दर लग रहे हैं। ये जो लोग आपको देख कर हंस रहे हैं, सब पागल हैं। किन्तु देश भर में फैले हुए कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता और जमीन से जुड़े हुए नेता चिल्ला कर कह सकते हैं- आप पूर्णतया नंगे हो। आप को देख कर धिन्न आ रही है। हमारे सामने से हट जाओं, अन्यथा हम धक्के मार कर आपको हटा देंगे।
जिस दिन देश भर में कांग्रेस के कार्यकताओं और नेताओं की जबान से यह स्वर फूटेगा तब नयी कांग्रेस का पुर्नजन्म होगा। किन्तु पूरे देश में कांग्रेस को पुर्नजीवन देने वाला कोई नेता दिखाई नहीं दे रहा है। सभी नेताओं की हालत उस सरोवर की मछलियों की तरह हो गयी है, जिसका पानी सुख जाने के बाद उसी में पड़े-पड़े तड़फ-तडफ कर मरने के अलावा उनके पास कोई चारा ही नहीं है। राजपरिवार ही उनका सरोवर है, इसके आगे की दुनियां से वे पूरी तरह अनजान है।
यद्यपि कांग्रेस पार्टी की मृत्यु की अधिकृत घोषणा नहीं की गयी है, किन्तु राष्ट्र ने उसकी मुत्यु को स्वीकार कर लिया है। पूरा राष्ट्र शोक संतप्त है। एक महान पार्टी, जिसका भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान रहा है, जिसने देश को कई प्रभावशाली नेता दिये हैं, उस पार्टी के प्रति पूरी सहानुभूति हैं। इस दुख की घड़ी में ईश्वर से यही प्रार्थना करते हैं कि अपना स्वाभिमान और आत्माभिमान खो चुके कांग्रेसी नेताओं को सम्बल दें। उन्हें इतनी शक्ति दें कि वे अपनी आंखों के पर्दे के आगे छायी हुई एक राजपरिवार की छवि को ओजल कर दें। उनकी परतंत्रता और अधिनता अस्वीकार कर दें। एक पारिवारिक पार्टी को तिरस्कृत कर दें और जनता से जुड़ी, जनता के लिए सदैव संघर्ष करने वाली एक नयी पार्टी को जन्म दें। दरबारी संस्कृति से मुक्त कांग्रेस पार्टी को एक नयी ऊर्जा और क्षमता दें। यदि वे ऐसा कर पायेंगे, तो भारतीय लोकतंत्र पर उनका बहुत बड़ा उपकार होगा, किन्तु दुर्भाय से ऐसा होने के आसार कम ही दिखाई दे रहे हैं।

Saturday, 17 May 2014

क्या मरणासन्न कांग्रेस को फिर जीवनदान मिलेगा ?

लेकतंत्र को राजतंत्र में तब्दील करने का स्वपन भंग हुआ। सारी संवैधानिक शक्तियों का दुरुपयोग करने के बाद भी अपने पुत्र का औपचारिक राज्याभिषेक करने में कांग्रेस की महारानी असफल रही। अब निश्चित रुप से पांच वर्ष इंतज़ार करना होगा, क्योंकि अब किसी चमत्कार के होने की आशा नहीं बची है। महारानी को इस बात का अहंकार था कि कोई पार्टी अपने बल पर सरकार नहीं बना पायेगी और थक हार कर सत्ता की चाबी उनके पास ही आयेगी। विधानसभाओं के चुनाव जीतने के मतदाताओं को लुभाने के लिए खैरात योजनाएं ले आयी, पर कामयाबी नहीं मिली। मोदी का रथ रोकने के लिए शिखंड़ी केजरीवाल को आगे किया। मुसलमानों को मोदी से भयभीत करने के लिए सेक्युलिरिजम के नाम पर मुस्लिम कार्ड़ खेला, पर पास उलटा पड़ गया। इन नादानियों से कांग्रेस का सफाया हो गया।
मोदी के विरुद्ध जी भर कर जहर उगलने, उन्हें तरह -तरह के अशोभनयी और अभ्रद अलंकारों से अलंकृत करने के लिए उकसाने वाली महारानी भारतीय जनता को समझ नहीं पायी। उसका यह भ्रम टूट गया कि भारतीय मूर्ख और अज्ञानी होते हैं, उन्हें आसानी से अपने वश में किया जा सकता है। लोकसभा चुनावों में पराजय भी इतनी जबरदस्त मिली कि सारे के सारे चापुलस दरबारी चुनाव हार गये। थोड़े बहुत शूरमा ही अपनी इज्जत बचा पायें। मां तो चुनाव जीत गयी, पर पु़त्र को लोहे के चने चबाने पड़े। परन्तु मुस्लिम बहुल उत्तर प्रदेश को जीतने की सारी तिकडम निष्फल हो गयी। शिखंड़ी भी उतरा मुहं ले कर दिल्ली कूच कर गया है।
कांग्रेस की शह पर दिल्ली की जिम्मेदारी से भागे भगोड़ो की वाराणसी जीतने की ख्वाहिश पूरी नहीं हो पायी, अलबता टोपी पहन की कई बार नमाज पढ़ी, मोदी को हराने के लिए विदेशों से भारी भरकम चंदा ले आया, पर वोटों का जुगाड़ नहीं कर पाया। अब जनाब को खोयी इज्जत बचाने और दिल्ली विधानसभा में पार्टी के विधायाकों को सम्भालना मुश्किल हो रहा है। कांग्रेसी नेताओं को केजरीवाल दुखान्तिका से यह सबक लेना चाहिये कि युद्ध सार्थक रणनीति और अपनी क्षमता को बढ़ाने से जीता जाता है, शिखंडियों को आगे कर के नहीं जीता जाता।
दो दिन पहले अच्छे दिन आने वाले हैं, नारे को व्यंगात्मक शैली में लेने वाले प्रमुख दरबारी जो आजकल चरित्रहीनता के सिरमौर बन कर कांग्रेस की नाक कटवा रहे हैं, कह रहे थे- अच्छे दिन तो निर्मल बाबा भी लाते हैं। दो दिन बाद देख लेना किस के अच्छे दिन आने वाले हैं। अब ये व्यभिचारी नेता, जो बिना शादी रचाये एक ब्याहता स्त्री, जिसका तलाक नहीं हुआ है, पता नहीं इस समय किस कन्द्रा में जा कर अय्यासी कर रहे हैं ? पूरा देश इनकी जबान से दो कडवे शब्द सुनने की प्रतीक्षा कर रहा है। दरअसल वो मीडिया, जो मोदी को ले कर बात का बतंगड़ बनाता था, इन महाशय का जलवा ही नहीं दिखा रहा है। टीवी के कई समाचार चेनल, जो शिखंडी केजरीवाल, दराबारी कांग्रेसियों के पेरोकार थे, वक्त बदलने पर अपने आप इनसे दूरियां बना कर अपनी खैर मना रहे हैं।
दुर्भाग्य से महात्मा गांधी और पटेल की कांग्रेस को व्यभिचारी प्रवक्ता ही मिलें। मनु सींघवी भी व्यभिचार के आरोप से बरी नहीं हो पायें अब दिग्विजय सिंह बेशर्मी से व्यभिचार को निजी मामला बता रहे हैं। कांग्रेस की आज हालत हुई है, उसका कारण भी बिना पैंदें के ऐसे नेता ही है, जो बराबर अर्नगल बोल कर पार्टी की इमेज बिगाड़ रहे हैं। पार्टी को मरणासन्न अवस्था में पहुंचाने का पूरा श्रेय पार्टी राजमाता, उनके पुत्र और दरबारियों की जमात को जाता है। कांग्रेस पार्टी को यदि पुनः जीवनदान देना है, तो जमीन से जुड़े राजनेताओं को राजवंशीय परम्परा के विरुद्ध विद्रोह करना होगा। भाजपा 2009 में पाये 18 प्रतिशत वोटों को 48 प्रतिशत तक पहुंचा सकती है, तो कांग्रेस भी पांच सालों में अपनी स्थिति सुधार सकती है।
परन्तु यदि अब भी कांग्रेसी नेता एक परिवार की पूंछ पकड़ कर नैया पार करना चाहते हैं, तो अब नये भारत में यह सम्भव नहीं होगा। क्योंकि अब भारतीय जनता एक परिवार की दासता को अस्वीकृत कर चुकी है। कांग्रेसी नेताओं को भी साहस कर हार की जिम्मेदारी का ठीकरा मां-पुत्र पर फोड़ना पडे़ेगा। जो हकीकत है, उसे स्वीकार करना होगा। कांग्रेस की जो गत इसी परिवार की कृपा से बनी है। अब राजवंशीय परम्परा से चुनाव जीतना सम्भव नहीं होगा। अब चुनाव सेक्युलिरिजम का राग गाने से भी नहीं जीते जा सकेंगे। जातीय समीकरण बिठाने और मुस्लिम वोटों के भरोसे भी चुनाव जीतना सम्भव नहीं होगा। चनाव जीतने के लिए जनता का दिल जीतना होगा। जनता के मन में अपने कार्य और क्षमता के प्रति विश्वास बिठाना होगा।
कांग्रेसी नेता अब भी यदि एक परिवार की परिक्रमा करने के बजाय अपने-अपने क्षेत्र में जा कर बिना सांसद और विधायक बने ही जनता के दुख-दर्द में भागिदारी निभायेंगे और उनकी आवाज उठायेंगे, तो वे मरणासन्न अवस्था में पहुंची कांग्रेस को जीवन दान दे सकते हैं। किन्तु एक परिवार की स्तुति गान करने में ही लगे रहे, तो कांग्रेस मुक्त भारत के नारे को सार्थक बना देंगे। तीन बार मर कर वापस जीवित हुई पार्टी की हमेशा के लिए मौत हो जायेगी। वे सारे कांग्रेसी अनाथ हो जायेंगे, जिनकी अब भी अपनी पार्टी के प्रति आस्था जुड़ी हुई है।

Tuesday, 22 April 2014

भाजपा और मोदी को देश सौंपने के अलावा आज हमारे पास कोई विकल्प नहीं है

क्या दस वर्ष तक प्रधानमंत्री पद और संवैधानिक संसधाओं की अवमानना करने वाले एक निरंकुश, अभिमानी सत्ता केन्द्र को फिर राष्ट्र सौंप दे, जिनकी निष्ठा अब संदेहास्पद बन गयी है ? दस वर्ष पूर्व सत्ता सौंपते समय जो आशंका जाहिर की गयी थी, वह सच साबित हुई है। भारत राष्ट्र की सम्प्रभुता को आघात पहुंचाया गया है। देश की निर्धन जनता के साथ दगाबाजी हुई है। इस्ट इंडिया कम्पनी का ही एक प्रतिरुप धीमे कदमों से चलता हुआ, हमें आपस में बांट, चापलुस दरबारियों की शह से सत्तासीन हो गया। पुतले को प्रधानमंत्री बना कर शासन की सभी शक्तियों को छीन लिया। देश के संसाधनों को जम कर लूटा। विरोध को ताकत से और स्वाभ्मिानी, राष्ट्रभक्तों जन सेवकों की आवाज को सत्ता के दम्भ से कुचलने की अनेको बार कोशिश की गयी। न्यायाल की अवमानना को कई बार दोहराया गया। एक लोकतांत्रिक पार्टी को पूरी तरह प्राइवेट लिमिटेड कम्पनी में तब्दील कर दिया गया और पार्टी नेता आज्ञाकारी अनुचर की तरह मालिक की हर आज्ञा को शिरोधार्य करते रहे।
क्या साम्प्रदायिक शक्तियों को सत्ता से दूर करने के बहाने फिर उसी संदेहास्पद व्यक्तित्व को भारत सौंप दें, जिसने भारत को दुनियां का भ्रष्टतम और दरिद्रतम राष्ट्र बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी ? जिसने भारत की गरीब जनता को मात्र भिखारी समझा, जिन्हें सरकारी कृपा की खैरात बांट कर लुभाया जा सकता है। लालच दे कर उनके वोट खरीदे जा सकते हैं। उन्हें नहीं, तो क्या उन राजनीतिक पार्टी के क्षत्रपो को शासन सौंप दे, जिसके पास तीस से अधिक सांसद नहीं होंगे और जो प्राइवेट लिमिटेड पार्टी की कृपा से ही सरकार चला सकेंगे ? क्या एक पुतले को हटा कर दूसरे पुतले को शासन सौंपना आज की परिस्थितियों में उपयुक्त होगा ? क्या ऐसी सरकार स्वतंत्र और निष्पक्ष हो कर देश की समस्याओं का समाधान खोज सकती है ?
जनता द्वारा किसी पार्टी या व्यक्ति के पक्ष में दिये गये एक-एक वोट का महत्व होता है। इसी वोट से देश की सेवा का अधिकार मिलता है, जिसे राजनीतिक पार्टियां सत्ता के उपभोग करने का अधिकार समझती है। इसी वोट के आधार पर देश की बाह्य और आंतरिक सुरक्षा, प्राकृतिक संसाधान, खजाना, उद्याोग, व्यापार, न्याय व्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थय की जिम्मेदारियों को सही ढं़ग से निष्पादन करने का अधिकार दिया जाता है। क्या अपने बहुमूल्य वोट की कीमत समझे बिना भावुक या भ्रमित हो कर फिर उन्हीं लुटेरो के पक्ष में वोट दें दे, जो जिम्मेदारियों को ओढ़ने में पूर्णतया अक्षम साबित हुए हैं। जिनके भ्रष्ट आचरण के कारण पूरी व्यवस्था भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी है। जिनके माथे पर देश की अर्थव्यवस्था को बरबाद करने का कलंक लगा हुआ है। जिन लोगों का मकसद शासन की शक्तियां प्राप्त कर अपने लिए मात्र धन कमाना हैं और उन देशी और विेदेशी कम्पनियों को उपकृत करना हैं, जिनका मकसद प्रदत्त कानूनों का उल्लघंन कर अत्यधिक मुनाफा बटोरना है।
छल-कपट, धनबल, तिकड़म और जनता को भ्रमित करने के सारे उपक्रम कर पुनः सत्ता में आने के लिए लुटेरे व्यग्र दिखाई दे रहे हैं। अपने कुचक्र को सफल होने में उन्होंने पूरी ताकत झोंक दी है। भारत की अधिकांश राजनीतिक पार्टियां उनके कुचक्र में सहयोगी बनी हुई। समाचार मीडिया ने राजनीति से जुड़े सारे समाचारों का व्यावसायिकरण कर दिया है। गम्भीर मुद्धो से कन्नी काटना और छिछली, बेतुकी और भद्दी बातों को उछालना ही उन्होंने अपना मकसद बना लिया है। मीडिया चेनल बातो का बतंगड़ बना कर टीआरपी बढाने में लगे हैं। कुछ चेनल तो राजनीतिक पार्टियों के अघोषित प्रचारक बन गये हैं।
राजनेता मोदी विरोध के नाम पर नैतिकता और शिष्टाचार की सारी सीमाएं लांघ गये हैं। तरह-तरह की शब्दावली से एक व्यक्तित्व को भयावह वह घृणास्पद बनाना ही अनेको राजनेताओं का मूल उद्धेश्य  रह गया है। बारह वर्ष पूर्व हुए गुजरात दंगो के नाम अपने राजनीतिक स्वार्थ की रोटियां सेकने वाले यह भूल जाते हैं कि न्यायालय ने मोदी को तो दोष मुक्त कर दिया है, किन्तु जिन्होंने एक सौ पच्चीस करोड़ जनता के साथ छल कर देश के संसाधनों और सरकारी खजाने को लूटा हैं, उन्हें न्यायालय ने निर्दोष साबित नहीं किया हैं। गुजरात मामले में सरकारी जांच एंजेसिंयों की पूरी ताकत झोंकने के बाद भी मोदी को अपराधी घोषित नहीं कर पाये, किन्तु प्रशासनिक शक्तियों का दुरुपयोग करते हुए उन्हीं सरकारी एजंसियों से आर्थिक अपराधों को लाख छुपाने की कोशिश करने पर भी छुपा नहीं पाये। यदि सत्ता पर नियंत्रण हट गया, तो इन्हें डर है कि सारे रहस्यों पर से पर्दा उठ जायेगा। जनता के सामने नंगे हो जायेंगे। फिर कभी जनता के सामने जा कर वोट नहीं मांग पायेंगे।
यूपीए गठबंधन ने अपने दस वर्षों की उपलब्धियों को गिना कर, जनहित में भावी नीतियों की घोषणा कर जनता को लुभाने का उपक्रम छोड़ दिया है। बस एक ही नीति रह गयी है- मोदी को रोको। बताया यह जा रहा है कि इस व्यक्ति के सत्ता में आने से अनर्थ हो जायेगा, किन्तु वास्तविकता यह है कि ये भीतर ही भीतर डरे हुए हैं, क्योकि इन्होंने जो अरबों रुपयों का गबन किया है, उससे इनकी रातों की नींद उड़ गयी हैं। वे जानते हैं कि सत्ता नहीं रही, तो वे कहीं के नहीं रहेंगे। और जो राजनेता मोदी को रोकने के लिए सुर में सुर मिला रहे हैं, वे भी मोदी को इसलिए रोकना चाहते हैं, क्योंकि वे यदि सत्ता में आ गये, तो प्रान्तों में उनका सारा खैल चौपट हो जायेगा। सत्ता पर उनका नियंत्रण ढि़ला पड़ जायेगा। उनकी सरकारों पर संकट मंड़राने लगेगा। अधिकांश राजनेता और राजनीतिक दल देश हित के बजाय अपना स्व हित ज्यादा देख रहे हैं और मोदी के नाम से जनता को डराने की भरसक कोशिश में लगे हुए हैं।
इस समय भारत की अर्थव्यवस्था की हालत बहुत खराब है। उ़द्याोगों पर मंदी की काली छाया मंडरा रहीं है। सरकार की घपलों-घोटालों की नीति के कारण कई महत्वपूर्ण बिजली और सड़क परियोजनाएं अधुरी पड़ी हुई है। महंगाई विस्फोटक रुप से बढ़ी है और इस पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं रहा है। देश के करोड़ो नौजवान बैरोजगार हो कर घर बैठे हैं। पूरे देश में देशी-विदेशी आतंकवादियों ने अपना सुदृढ़ नेटवर्क बिछा दिया है। वोट बैंक और तुष्टीकरण की राजनीति के कारण प्रान्तीय सरकारें व केन्द्र इनकी गतिविधियों पर अंकुश नहीं लगा पा रहा है। पाकित्सतान अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। अफगानिस्तान से अमरीकी सेना हटने के बाद भारत आतंकवादियों का बहुत बड़ा हब बन जायेगा।
मोदी को रोकने के लिए राजनेता चाहे जो उपक्रम करें, जनता यदि ठान लें तो उन्हें कोई नहीं रोक पायेगा। क्योंकि आज की दुरुह परिस्थितियों में देश के सामने दूसरा कोई विकल्प नहीं है। हमे आसन्न चुनौतियों से निपटने के लिए केन्द्र में सुदृढ़, जवाबदेय और भरोसे वाली सरकार चाहिये, जो सुशासन दे सके। जो पूर्ण प्रतिबद्धता से देश के विकास का संकल्प ले सकें। जिसकी ईमानदारी, कर्मठता और प्रशासनिक क्षमता पर कोई प्रश्न चिन्हें नहीं लगे हों। लोकतंत्र में किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल को सत्ता में आने से रोकने का अधिकार सिर्फ जनता को हैं,  किन्तु किसी को रोकने का नारा देने वाले राजनेता यह भूल जाते हैं कि भारत की जनता अब परिपक्क हो गयी है, उसे भ्रमित करने के दिन  अब लद रहे हैं। जनता का दिल जनता की समस्याओं को हल करने और सुशासन दे कर ही जीता जा सकता है।