मन भटकने के तमाम संसाधनों के बीच यह पोस्ट आपको भटकाव से उबारने के लिए है।।
जीवन का आनंद भोग नहीं त्याग में है।
कोई कितना महान है इसका पैमाना है कि वह कितना संयमित है। संयमी ही पराक्रमी होता है। देहबल से शक्तिशाली प्राणबल है।
प्राणबल से शक्तिशाली मनोबल है।
मनोबल से शक्तिशाली बुद्धिबल है।
आत्मबल सबसे अधिक बलशाली होता है।
मध्यकाल में एक एक यौद्धा, एक एक परिवार, भीड़ बनकर आ चुके लुटेरों से लड़ रहे थे।
एक तरफ उत्सर्ग की परंपरा का गौरव था दूसरी तरफ भुक्खड़ और नंगे लुटेरों की सेना थी।
यह भोग और संयम की लड़ाई थी।
शरीरबल से आत्मबल जीत जाता था।
जिनका अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण है, उन्हीं महात्माओं ने संसार को कुछ दिया है।
त्यागपूर्वक भोग ने ही संसार की सुव्यवस्थाओं का नियमन कर रखा है।
ब्रह्मचर्य संयम की ही देन है। मन मारकर मुदित रहना और भोग के संसाधनों से विरक्त रहना आपके मानसिक शांति के मार्ग का अवलम्बन है।
भोगेच्छाओं के दमन का पश्चाताप न करना आपकी सक्रियता को बनाये रखता है। यही सक्रियता सृजन का द्वार है।
यह अकर्मण्यता से दूर रखती है।
परोपकार का संचार करती है।
कृषि और पशुपालन, गौपालन जैसे कुछ व्यवसाय स्वाभाविक रूप से धैर्य और संयम की शिक्षा देते हैं।
मनुष्य को संवेदनशील और परोपकारी बनाते हैं।
स्वयं के अंतःकरण को प्रकृति से जोड़ते हैं और वहाँ से मोक्ष का द्वार, किंवा न्यूनतम अध्यात्म समझने योग्य बुद्धि देते हैं।
यही तो पुरुषार्थ है।
पुरुषार्थ केवल परिश्रमशीलता नहीं है।
पुरुषार्थ मन के दमन की सामर्थ्य है।
पुरुषार्थ इच्छाओं पर नियंत्रण है।
वही संयमी पुरुष पुरूष है बाकी सब तो पशुवत कीड़े मकोड़े का जीवन जी रहे हैं।
भोग और इंद्रियों के पीछे खिंचता मन, विषयों की तरफ बार बार उन्मुख होती वृत्तियां मनुष्य को अंततः तबाह करती हैं।
मन को #कोमलशिशु की तरह धीरे धीरे फुसलाकर साधो।
छोटे छोटे आश्वासन देकर बार बार उसके साथ छल करो।
उसे यह आश्वासन दो कि तेरा सोचा होगा पर अभी नहीं, अभी मुझे यह करने दो।
घनघोर शोक, दुश्चिंता और श्मशान में मन दुर्बल हो जाता है।
वैसी वैराग्य वृत्ति बनाये रखिये।
फिर मन को कहिए, चलो कुछ और करते हैं।
सृजनात्मक बनते हैं।
धन व्यय न करके संचय करते हैं।
स्वयं के लिए नहीं, पुत्र पुत्रियों के लिए। परिवार के लिए। कुटुंब के लिए। क्रमशः विस्तार करो। परोपकार तक ले जाओ।
मन को धन्यवाद दो। तूने साथ दिया। तू साथ था तो यहाँ तक की यात्रा सम्पन्न हुई।
धन्यवाद मन। धन्यवाद शरीर।
यह विचार पढ़कर अच्छा लगा कि आपने संयम, आत्मबल और परोपकार को जीवन का आधार माना है। आज जब मन को भटकाने वाले साधन हर ओर मौजूद हैं, तब आत्मसंयम और सृजन की राह दिखाना सचमुच सार्थक प्रयास है। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.
ReplyDeleteअधिक जानकारी आपको यहाँ मिल जाएगी - HindiDiscussionForum dot com
धन्यवाद!