खामोशी से सब्र करना कोई नैतिक उपदेश नहीं है बल्कि यह जीवन को समझने से उपजा हुआ व्यवहार है।।दर्द होना स्वाभाविक है पर दर्द को कहाँ, कैसे और कितनी बार व्यक्त किया जाए यही व्यक्ति की परिपक्वता तय करता है।।दुनिया सहानुभूति पर नहीं, परिणाम पर प्रतिक्रिया देती है।।लोग आपके संघर्ष को तब तक गंभीरता से नहीं लेते,जब तक वह किसी ठोस निष्कर्ष में न बदल जाए।।
बार-बार अपनी पीड़ा को सार्वजनिक करना
करुणा नहीं,बल्कि जिज्ञासा और आलोचना को जन्म देता है।।दुनिया आँसू नहीं, परिणाम को सम्मान देती है।।
जब कोई व्यक्ति हर मंच पर अपने दुःख का विवरण देने लगता है,तो धीरे-धीरे वही दुःख उसकी पहचान बन जाता है अतः लोग उसे व्यक्ति नहीं,एक समस्या के रूप में देखने लगते हैं।।
यह स्थिति इसलिए खतरनाक है क्योंकि तब लोग मदद नहीं,मूल्यांकन करने लगते हैं।।सब्र ऊर्जा को भीतर संचित करता है,और सार्वजनिक रोना ऊर्जा को बाहर बहा देता है।।
खामोशी व्यक्ति को सोचने का अवसर देती है,अपने निर्णयों को परखने का अवसर देती है,और भावनाओं के स्थान पर रणनीति गढ़ने की क्षमता देती है।।जो व्यक्ति शोर नहीं करता,वह भीतर तैयारी करता है।।सब्र आत्म-सम्मान की रक्षा करता है।।दुःख निजी होता है,पर जैसे ही वह सार्वजनिक होता है,व्यक्ति अनजाने में अपने आत्म-सम्मान को दूसरों के निर्णय पर छोड़ देता है।।
आज लोग सुनेंगे,कल वही लोग तुलना करेंगे,ताने देंगेऔर आपके अतीत को आपके विरुद्ध प्रयोग करेंगे।।खामोशी इस सामाजिक शोषण से रक्षा करती है।।खामोशी कमजोरी नहीं है अपितु यह नियंत्रण का संकेत है।।
जो हर बात कह देता है,वह अपने ऊपर नियंत्रण खो देता है और जो सहकर भी चुप रहता है,वह यह दर्शाता है कि
परिस्थितियाँ उस पर हावी नहीं हैं।।बार-बार रोनासमाधान नहीं देता अपितु आदत देता है।।फिर व्यक्ति समस्या का हल खोजने के बजाय सहानुभूति का आदी हो जाता है।।
सब्र व्यक्ति को उत्तरदायित्व की ओर ले जाता है और उत्तरदायित्व ही जीवन में परिवर्तन लाता है।।इतिहास शोर करने वालों से नहीं बनता बल्किइतिहास उन लोगों से बनता है जिन्होंने चुपचाप सहा,चुपचाप काम कियाऔर सही समय पर परिणाम सामने रखा।।खामोशी तैयारी का काल है और जब तैयारी पूर्ण हो जाती है,तो शब्दों की आवश्यकता नहीं रहती।।अंततः यह व्यक्ति को कमजोर नहीं,अधिक स्थिर बनाता है।।यह समाज से नहीं बल्कि स्वयं से प्रश्न करवाता है।।और यह आँसू नहीं बल्कि समाधान पैदा करता है।।हर पीड़ा दिखाने योग्य नहीं होती।।कुछ युद्ध चुपचाप लड़े जाते हैं और वही युद्ध वास्तव में जीते जाते हैं।।
जितना जान पाया उतना बताने का प्रयास किया शेष सब भगवान शिव के अधीन है क्योंकि आदि से अंत तक अंत से अनंत तक सब शिव हैं।।
सबके अंदर विराजमान भगवान शिव को सादर प्रणाम करता हूं।।
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