Tuesday, 6 January 2026

मन

मन भटकने के तमाम संसाधनों के बीच यह पोस्ट आपको भटकाव से उबारने के लिए है।।
जीवन का आनंद भोग नहीं त्याग में है।
कोई कितना महान है इसका पैमाना है कि वह कितना संयमित है। संयमी ही पराक्रमी होता है। देहबल से शक्तिशाली प्राणबल है।
प्राणबल से शक्तिशाली मनोबल है।
मनोबल से शक्तिशाली बुद्धिबल है।
आत्मबल सबसे अधिक बलशाली होता है।
मध्यकाल में एक एक यौद्धा, एक एक परिवार, भीड़ बनकर आ चुके लुटेरों से लड़ रहे थे।
एक तरफ उत्सर्ग की परंपरा का गौरव था दूसरी तरफ भुक्खड़ और नंगे लुटेरों की सेना थी।
यह भोग और संयम की लड़ाई थी।
शरीरबल से आत्मबल जीत जाता था।
जिनका अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण है, उन्हीं महात्माओं ने संसार को कुछ दिया है।
त्यागपूर्वक भोग ने ही संसार की सुव्यवस्थाओं का नियमन कर रखा है।
ब्रह्मचर्य संयम की ही देन है। मन मारकर मुदित रहना और भोग के संसाधनों से विरक्त रहना आपके मानसिक शांति के मार्ग का अवलम्बन है।
भोगेच्छाओं के दमन का पश्चाताप न करना आपकी सक्रियता को बनाये रखता है। यही सक्रियता सृजन का द्वार है।
यह अकर्मण्यता से दूर रखती है।
परोपकार का संचार करती है।
कृषि और पशुपालन, गौपालन जैसे कुछ व्यवसाय स्वाभाविक रूप से धैर्य और संयम की शिक्षा देते हैं।
मनुष्य को संवेदनशील और परोपकारी बनाते हैं।
स्वयं के अंतःकरण को प्रकृति से जोड़ते हैं और वहाँ से मोक्ष का द्वार, किंवा न्यूनतम अध्यात्म समझने योग्य बुद्धि देते हैं।
यही तो पुरुषार्थ है।
पुरुषार्थ केवल परिश्रमशीलता नहीं है।
पुरुषार्थ मन के दमन की सामर्थ्य है।
पुरुषार्थ इच्छाओं पर नियंत्रण है।
वही संयमी पुरुष पुरूष है बाकी सब तो पशुवत कीड़े मकोड़े का जीवन जी रहे हैं।
भोग और इंद्रियों के पीछे खिंचता मन, विषयों की तरफ बार बार उन्मुख होती वृत्तियां मनुष्य को अंततः तबाह करती हैं।
मन को #कोमलशिशु की तरह धीरे धीरे फुसलाकर साधो।
छोटे छोटे आश्वासन देकर बार बार उसके साथ छल करो।
उसे यह आश्वासन दो कि तेरा सोचा होगा पर अभी नहीं, अभी मुझे यह करने दो।
घनघोर शोक, दुश्चिंता और श्मशान में मन दुर्बल हो जाता है।
वैसी वैराग्य वृत्ति बनाये रखिये।
फिर मन को कहिए, चलो कुछ और करते हैं।
सृजनात्मक बनते हैं।
धन व्यय न करके संचय करते हैं।
स्वयं के लिए नहीं, पुत्र पुत्रियों के लिए। परिवार के लिए। कुटुंब के लिए। क्रमशः विस्तार करो। परोपकार तक ले जाओ।
मन को धन्यवाद दो। तूने साथ दिया। तू साथ था तो यहाँ तक की यात्रा सम्पन्न हुई।
धन्यवाद मन। धन्यवाद शरीर।

सब्र

खामोशी से सब्र करना कोई नैतिक उपदेश नहीं है बल्कि यह जीवन को समझने से उपजा हुआ व्यवहार है।।दर्द होना स्वाभाविक है पर दर्द को कहाँ, कैसे और कितनी बार व्यक्त किया जाए यही व्यक्ति की परिपक्वता तय करता है।।दुनिया सहानुभूति पर नहीं, परिणाम पर प्रतिक्रिया देती है।।लोग आपके संघर्ष को तब तक गंभीरता से नहीं लेते,जब तक वह किसी ठोस निष्कर्ष में न बदल जाए।।
बार-बार अपनी पीड़ा को सार्वजनिक करना
करुणा नहीं,बल्कि जिज्ञासा और आलोचना को जन्म देता है।।दुनिया आँसू नहीं, परिणाम को सम्मान देती है।।
जब कोई व्यक्ति हर मंच पर अपने दुःख का विवरण देने लगता है,तो धीरे-धीरे वही दुःख उसकी पहचान बन जाता है अतः लोग उसे व्यक्ति नहीं,एक समस्या के रूप में देखने लगते हैं।।
यह स्थिति इसलिए खतरनाक है क्योंकि तब लोग मदद नहीं,मूल्यांकन करने लगते हैं।।सब्र ऊर्जा को भीतर संचित करता है,और सार्वजनिक रोना ऊर्जा को बाहर बहा देता है।।
खामोशी व्यक्ति को सोचने का अवसर देती है,अपने निर्णयों को परखने का अवसर देती है,और भावनाओं के स्थान पर रणनीति गढ़ने की क्षमता देती है।।जो व्यक्ति शोर नहीं करता,वह भीतर तैयारी करता है।।सब्र आत्म-सम्मान की रक्षा करता है।।दुःख निजी होता है,पर जैसे ही वह सार्वजनिक होता है,व्यक्ति अनजाने में अपने आत्म-सम्मान को दूसरों के निर्णय पर छोड़ देता है।।
आज लोग सुनेंगे,कल वही लोग तुलना करेंगे,ताने देंगेऔर आपके अतीत को आपके विरुद्ध प्रयोग करेंगे।।खामोशी इस सामाजिक शोषण से रक्षा करती है।।खामोशी कमजोरी नहीं है अपितु यह नियंत्रण का संकेत है।।
जो हर बात कह देता है,वह अपने ऊपर नियंत्रण खो देता है और जो सहकर भी चुप रहता है,वह यह दर्शाता है कि
परिस्थितियाँ उस पर हावी नहीं हैं।।बार-बार रोनासमाधान नहीं देता अपितु आदत देता है।।फिर व्यक्ति समस्या का हल खोजने के बजाय सहानुभूति का आदी हो जाता है।।
सब्र व्यक्ति को उत्तरदायित्व की ओर ले जाता है और उत्तरदायित्व ही जीवन में परिवर्तन लाता है।।इतिहास शोर करने वालों से नहीं बनता बल्किइतिहास उन लोगों से बनता है जिन्होंने चुपचाप सहा,चुपचाप काम कियाऔर सही समय पर परिणाम सामने रखा।।खामोशी तैयारी का काल है और जब तैयारी पूर्ण हो जाती है,तो शब्दों की आवश्यकता नहीं रहती।।अंततः यह व्यक्ति को कमजोर नहीं,अधिक स्थिर बनाता है।।यह समाज से नहीं बल्कि स्वयं से प्रश्न करवाता है।।और यह आँसू नहीं बल्कि समाधान पैदा करता है।।हर पीड़ा दिखाने योग्य नहीं होती।।कुछ युद्ध चुपचाप लड़े जाते हैं और वही युद्ध वास्तव में जीते जाते हैं।।

जितना जान पाया उतना बताने का प्रयास किया शेष सब भगवान शिव के अधीन है क्योंकि आदि से अंत तक अंत से अनंत तक सब शिव हैं।।
सबके अंदर विराजमान भगवान शिव को सादर प्रणाम करता हूं।।