Monday, 18 May 2015

भारत की राजनीति में आये भूचाल के एक वर्ष बाद

एक वर्ष पहले भारत की राजनीति में भूचाल आया था। परिवार पार्टी के मजबूत गढ़ ढह गये। कहीं-कहीं तो शून्य हाथ लगा और कहीं से मात्र एक आध सांसद जीत कर लोकसभा पहुंचे। अपनी पार्टी के सांसदों से भरा रहने वाला सदन एक छोटे से कोने में सिमट कर रह गया। कुछ क्षत्रपों के मनसूबों पर भारी वज्रपात हुआ। अपने संख्या बल से केन्द्र की सरकारों को ब्लैकमेल करने और समर्थन देने के बदलें भारी कीमत वसूलने के सपने धरे रह गये। दलित महारानी अपने प्रदेश में हाथ मसल कर रह गर्इ और प्रधानमंत्री बनने की हसरते सीने में दबाये एक सूबे के सूबेदार सिर्फ अपनी लाज बचा पायें। अतृप्त महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए बिहार के क्षत्रप इतने बैचेन हो गये कि जिनके सहारे सत्ता के शिखर पर पहुंचे, उसी को लात मार दी। उनके सपने ताश के पत्तों की तरह बिखर गये। धड़ाम से जमीन पर गिरते ही आंखों के सामने अंधेरा छा गया। बैचारें को रोते हुए अपने पूराने राजनीतिक बैरी को गले लगाना पड़ा।
एक वर्ष तक गहरे सदमें की पीड़ा के दंश से छटपटा रहे राजनेता अपने सुनहरे दिन फिर लौट आने की आशा में उठ खड़े हुए हैं। सभी मिल कर ऐसी रणनीति बनाने में जुट गये हैं, जिससे पूराने दिन लौट आयें। महारानी अपने हाथों में सत्ता की डोर थामने के लिए मचल रही है। अब वे चाहती हैं कि किसी पुतले कों नहीं, अपने बेटे को सिंहासन पर बिठा कर भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर पुन: अपना अधिकार जमा लें। प्रादेशिक क्षत्रपों का मौन समर्थन उन्हें मिल रहा है, क्योंकि भारत के इस राजनीतिक परिवार के हाथों में फिर सत्ता आने से ही उनका राजनीतिक भविष्य सुरक्षित हैं। गठबंधन सरकारों से ही उनका राजनीतिक भविष्य संवरता है। चार वर्ष बाद फिर ऐसा ही कोर्इ भूचाल आ गया तो उनके तम्बू पूरी तरह उखड़ जायेंगे। वे कहीं के नहीं रहेंगे। राजनीति की दुकान बंद कर और कोर्इ नया धंधा शुरु करना होगा।
सभी हारे हुए खिलाड़ियों ने अब यह ठान लिया है कि अपना अस्तित्व बचाने के लिए सरकार के हर उस काम का विरोध करेंगे, जो देश के विकास से जुड़ा हुआ हो। वे देश के विकास की कीमत पर अपना विनाश नहीं चाहते। जनता को खुशहाल बनाने की कीमत पर वे स्वयं बदहाल होना नहीं चाहते। अत: सरकार कोर्इ भी विधेयक लाएगी, उस पर लोकसभा में शोर मचाएंगे और राज्यसभा में अपने बहुत के बल पर उसे पास नहीं होने देंगे।
चाहे भारत की जनता ने सरकार को बहुमत से चुना हों, पर हम भारत की जनता के निर्णय सही नहीं मानते। दरबारी पार्टी तो अपनी महारानी को अब भी भारत की भाग्य विधाता मानती है और उनके युवराज को भारत का भावी सम्राट। ऐसा इसलिए हैं, क्योंकि रस्सी जल गयी, पर एंठ नहीं गर्इ। सभी जगह पीट गये पर यह मानने को तैयार नहीं है कि हमारी औकात अब छोटी हो गर्इ है। हमारे पास सत्ता नहीं है। हमारे इशारे पर देश का प्रधानमंत्री और उसके मंत्री काम नहीं करते। हम चाहे जो बोल सकते, पर हम चाहे जो कर नहीं सकते। हम सरकार को चोर कहने में नहीं हिचकिचाते, क्योंकि चोरों को सारे चोर नज़र आते हैं।
महारानी को दिलासा देने के लिए दरबारी कहते हैं- साले को पूरा बहुमत मिल गया, इसलिए प्रधानमंत्री बन गया। यदि दस-बीस सीटे कम आती, तो कभी इसकी सरकार नहीं बनने देते। यदि ऐसा होता तो गठबंधन सरकार का दौर चलता रहता। सरकार बनती और गिरती या गिरा दी जाती और अंतत एक वर्ष बाद आज देश मध्यावधी चुनावों की तैयारी में लगा होता। युवराज की राह आसान हो जाती। भारतीय लोकतंत्र फिर राजतंत्र में तब्दील हो जाता। पर भारत की जनता का यह सौभाग्य ही था कि ऐसा हादसा नहीं हुआ, वरना अनर्थ हो जाता।
एक चुनी हुर्इ सरकार के वैधानिक निर्णयों को राजनीतिक षड़यंत्र के तहत रोकना जनमत का अपमान करना है, जिसने सरकार को कार्य करने के अधिकार दिये हैं। लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च होती है, राजनीतिक दल नहीं। किसी दल के नेता का अहंकार नहीं। लोकसभा में बहुमत से पास हुए बिल को राज्यसभा में रोकने की परम्परा अलोकतांत्रिक हैं, क्योंकि लोकसभा के सांसदों को जनता सीधा चुनती है। राज्यसभा के बहुमत का लाभ उठाना दरअसल जनता की अवमानना करना है, जिसने लोकसभा के सांसदों को चुन कर संसद में भेजा है।
भारत की जनता ने राहुल गांधी को अस्वीकृत कर दिया है, किन्तु आजकल उन्हें सरकार की खिल्ली उड़ाने का काम सौप रखा है। तथ्यहीन, अतार्किक, बेहुदे जुमलों के तहत वे सरकार को कठघरे में खड़े करने का प्रयास कर रहे हैं। झूठ और प्रपंचपूर्ण बकवास करते हुए वे सोच रहें हैं कि उनकी ऐसी ओछी हरकतों से भारत की जनता पर गहरा प्रभाव पड़ेगा और अंतत: वह उन्हें अपना नेता स्वीकार कर लेगी। पर उन्हें शायद मालूम नहीं है कि ऐसा कर वे अपनी अपरिपक्क व ओछी मानसिकता का परिचय पूरे देश को दे रहे हैं। क्या एक सौ पच्चीस करोड़ की जनसंख्या में राहुल से ज्यादा समझदार व गम्भीर कोर्इ नेता ही नहीं बचा है, जो जनता उन्हें ही प्रधानमंत्री के रुप में स्वीकार कर लें ? राहुल कभी भारत के प्रधानमंत्री नहीं बन सकते। जो लोग इस नासमझ बछड़े की पूंछ पकड़ कर भवसागर पार करना चाहते हैं, वे अपना इरादा छोड़ दें, क्योंकि बछड़ा निश्चित रुप से पानी में डूबेगा और साथ में उन्हें भी ले डूबेगा।
जब तक राज्यसभा में सरकार का बहुमत नहीं हैं, देश के विकास के लिए क्रांतिकारी निर्णय नहीं लिये जा सकते। अत: सरकार को अपनी रणनीति बदलनी होगी। संसद में अपनी बात रखने के बाद जनता से सीधा संवाद करना होगा। जनता को अपनी बात सरल शब्दों में समझाने के लिए व्यापक जनसम्पर्क अभियान छोड़ना होगा। जनता का साथ रहेगा, तो सरकार सारी बाधाएं पार कर लेगी। सरकार के पास अड़तालिस महीने हैं, इन महीनों का यदि समझदारी से पूरा उपयोग किया जाय तो राज्यसभा में भी बहुमत आ जायेगा और चार चाल बाद फिर ऐसा भूकम्प आने की सम्भावा बन जायेगी, जिससे भारतीय राजनीति पूरी तरह साफ-सुथरी हो जायेगी। वे सारे राजनीतिक चरित्र कहीं गुम हो जायेंगे, जो देश के लिए नहीं अपने लिए जीते हैं। जो जनता को अपने राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए मात्र सीढ़ी समझते हैं। जिनके मन में संवैधानिक अधिकार प्राप्त कर जनता की सेवा करने का भाव नहीं है। वे सत्ता चाहते हैं और सत्ता का भरपूर उपयोग कर अपनी आर्थिक सेहत सुधारना चाहते हैं।
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