Thursday, 25 June 2015

गांधी परिवार की देशभक्ति संदेह के घेरे में

गांधी परिवार ने भारतीय योग का मुखर विरोध ही नहीं किया एक समुदाय के मन में भ्रान्तियां पैदा कर इससे दूर रहने की नसीहत दी है। सरकार की किसी नीति से असहमति जायज है, किन्तु भारत की जिस प्राचीन विधा से विश्व का जनमानस अभिभूत है, ऐसी विधा के प्रचार की सरकारी नीति का विरोध करना अनुचित है। विश्व के अधिकांश देश योग में आस्था प्रकट कर रहे है, फिर गांधी परिवार और कांग्रेस का इसमें अनास्था प्रकट करने का औचित्य क्या है ? सिर्फ इसलिए कि यह मोदी सरकार का आयोजन है और नरेन्द्र मोदी को गांधी परिवार ने अपना दुश्मन नम्बर एक मान रखा है। यदि विरोध का यही एक कारण है तो यह अलोकतांत्रिक मन:स्थिति को प्रकट करता है, क्योंकि लोकतंत्र में सत्ता कोर्इ व्यक्ति नहीं छीनता, जनता छीनती है। जनता ने गांधी परिवार से सत्ता छीन कर नरेन्द्र मोदी को सौंपी है । ऐसा होने पर क्या भारत की जनता को भी गांधी परिवार अपना दुश्मन नम्बर एक मानता है ?
योग को ले कर गांधी परिवार ने जो रवैया दर्शाया है, उससे यही साबित होता है कि इस परिवार की भारतीय संस्कृति और इसके मूल्यों में कोर्इ आस्था नहीं है। एक विदेशी की तरह गांधी परिवार भारतीयता को हेय दृष्टि से देखता है। अत: जिन लोगों के मन में भारत और भारतीयता के प्रति श्रद्धा नहीं हैं, उन्हें भारतीय की जनता पर शासन करने का हक भी नहीं है। अंगे्रजो की तरह उसकी नीति भी यही है कि भारत के दो समुदायों के बीच किसनी न किसी बहानें फूट डालों और उन्हें एक दूसरे से अलग करो, ताकि उनके मन में परस्पर अविश्वास की खार्इ गहरी होती जाय। कांग्रेस ने योग का भी इसी नीति की तरह विरोध किया है, जो उसकी कपटपूर्ण मंशा को दर्शाता है।
सोनिया गांधी लम्बे समय तक भारत में रहने के बाद भी अपने आपको भारतीय परिवेश में नहीं ढाल पार्इ है। भारत और भारतीयों पर वे सिर्फ और सिर्फ हुकूमत करना चाहती है, भारतीयों के दिलों से जुड़ने और भारतीयता के प्रति आस्था प्रकट करने के लिए उन्होंने अपने दीर्घ राजनीतिक जीवन में कोर्इ उदाहरण प्रस्तुत नहीं किया। भारतीयता के प्रति कभी अपने आंतरिक मनोभावों को प्रकट नहीं किया। सार्वजनिक जीवन में रहने के बाद उनकी रहस्यमय चुप्पी हमेशा चुभती है। उनकी निजी विदेश यात्राएं यह संदेह प्रकट करती है कि लूट के कारोबार से कमार्इ गर्इ धन राशि को कहीं व्यवस्थित करने के लिए तो वे विदेश नहीं जाती है। यदि ऐसा नहीं है तो वे अपनी यात्रा के मकसद को हमेशा गोपनीय क्यों रखती है ? उनके निकटस्थ कांग्रेसियों के पास भी इस बात की जानकारी नहीं होती कि वे कहां गर्इ है और किस उद्धेश्य को ले कर विदेश गर्इ है ? इस प्रश्न को यह कह कर नहीं टाला जा सकता कि निजी यात्रा की जानकारी देश को रखना आवश्यक नहीं है। क्या कांग्रेसी यह बता सकता है कि जो लोग सार्वजनिक जीवन में होते हैं, उनका निजी क्या होता है ? उन्हें अपना निजी जीवन इतना ही प्रिय है, तो सार्वजनिक जीवन छोड़ क्यों नहीं देते ?
राहुल गांधी को कांग्रेस ने अपना नेता स्वीकार कर लिया हेै और उनके कंधे पर पार्टी पूरा भार डालने की रणनीति बना रही है। अपरिपक्क और छिछोरी मानसिकता वाले व्यक्ति पर इतनी भारी जिम्मेदारी डालना युक्तियुक्त नहीं लगता, किन्तु कोर्इ भी कांग्रेसी इसका विरोध नहीं कर सकता, क्योंकि पार्टी सुप्रीमो की यही आंतरिक इच्छा है, जिसका विरोध करना अलोकतांत्रिक पार्टी की नियति में नहीं है। राहुलगांधी ने भारतीय संस्कृति और भारतीय इतिहास का अध्ययन नहीं किया। भारतीय राजनीति और संवैधानिक व्यवस्था पर भी उन्होंने कभी अपने विचार प्रकट नहीं किये। देश की प्रगति और खुशहाली के लिए क्या आर्थिक नीतियां बनानी चाहिये ? इसं संबंध में उन्होंने अपना कोर्इ निजी चिंतन नहीं प्रस्तुत किया। उनकी मन: स्थिति और राजनीतिक विचारों का परिचय कभी-कभी अपनी निकृष्ट,तथ्यहिन और बेतुकी भाषण शैली से देते रहते हैं। उनका राजनीतिक विचार और दर्शन यही है कि जनता द्वारा चुनी गर्इ एक सरकार का विरोध करते रहों। सरकार के प्रति तिरस्कार व अपमानित करने वाली शब्दावली का प्रयोग कर भाषण देते रहो।
प्रश्न उठता है कि क्या कांग्रेस के पास एक अपरिपक्क मानसिकता वाले व्यक्ति के अलावा कोर्इ नेता नहीं है ? क्या राहुल एक विदेशी महिला – के पुत्र है, इसीलिए कांग्रेस उन्हें कांग्रेस अपना नेता मान रही है और भारत पर शासन करने का हक दिलाना चाहती है। क्या यह गुलाम मानसिकता नहीं है ? दस वर्षों तक मां-पुत्र की भ्रष्ट नीतियों से देश बर्बाद हो गया। पूरे राष्ट्र ने अपमानित कर कांग्रेस को ठुकरा दिया, फिर भी कांग्रेसी नेताओं के मन मे इस परिवार के प्रति अंध श्रद्धा में कोर्इ कमी नहीं आर्इ है। कर्इ राज्यों की सरकारे हाथ से गर्इ। कर्इ प्रदेशों से लोकसभा के चुनावों में शून्य हाथ लगा। बड़े-बड़े प्रदेशों से दो चार सीटे हाथ लगी। कांग्रेसी नेताओं के मन में अपनी इस अपमानित करने वाली पराजय से कोर्इ ग्लानि नहीं है। वे आत्मचिंतन क्यों नहीं करना चाहते ? क्यों वे उस परिवार के साथ जोंक की तरह चिपके रहना चाहते हैं, जिनकी देश भक्ति संदेह के घेरे में है। जिनके भ्रष्ट आचरण से पूरा देश क्रोधित है।
शासद कांग्रेसी नेताओं के मन में यह धारण है कि चाहे उनके पास चवांलिस सांसदों की पूंजी हों, किन्तु उनके गांधी परिवार के पास सम्भवत: चवांलिस हजार करोड़ की पूंजी होगी। अपनी धनशक्ति के बल पर यह परिवार भारतीय लोकतंत्र पर पुन: नियंत्रण कर लेगा। एक न एक दिन इस परिवार की कृपा से हमारा शासन फिर आयेगा। वे मौज मस्ती वाले दिन लौट आयेंगे। इसलिए यह परिवार अपने धन के प्रभाव से जो भी राजनीतिक प्रपंच रच रहा है, चाहे वह गलत हो उससे जुड़े रहो। एक चुनी हुर्इ लोकप्रिय सरकार पर जितने शाब्दिक प्रहार किये जाये, करते राहे। चाहे वे सही हो या गलत हो, उनके साथ अपने आपको जोड़े रहो।
भारतीय योग का विरोध कर गांधी परिवार ने अपने आपको भारतीयता से अलग कर दिया है। यह साबित कर दिया है कि वे ऐसे किसी आयोजन के समर्थक नहीं है, जिससे भारत को विश्व में प्रतिष्ठा मिले। इस वििश्ष्ट आयोजन के समय पूरा परिवार देश छोड़ कर चला गया, जिससे परिवार की राष्ट्र भक्ति संदेह के घेरे में आ गर्इ हैं। अतीत में ऐसे कर्इ कृत्य इस परिवार ने किये हैं, जिससे उनकी राष्ट्रभक्ति पर प्रश्न चिन्ह लगे थे। परन्तु अब यह साबित हो रहा है कि यह विदेशी परिवार भारत पर शासन करने की मंशा सिर्फ इसलिए रखता है, ताकि किस न किसी तरह भारत की संवैधानिक व्यवस्था पर नियंत्रण कर अपने लूट के कारोबार को जारी रखा जा सके।
नरेन्द्र मोदी ही उस जीवट ऊर्जा वाले व्यक्ति हैं, जिन्होंने एक विदेशी परिवार को सत्ता से दूर किया है। अपनी छल विधा से यह परिवार साम्प्रदायिक शक्तियों को सत्ता से दूर रखने के राजनीतिक षड़यंत्र के तहत मोदी सरकार का विरोध करता रहेगा और सारे विरोधी दलों को एक जुट करता रहेगा। लोकसभा में सरकार प्रभावी काम नहीं कर पाये, उसके लिए अवरोध डालता रहेगा।