Monday, 28 March 2016

सत्य का आश्रय

सच-झूठ का खेल निराला है। जो है, जिसका अस्तित्व है, उसे सच कहते हैं और जो नहीं है, पर जिसके अस्तित्व को गढ़ा जाता है वह झूठ है। सच एक घटना है और झूठ विचारों का प्रवाह। घटना प्रकृति के अंत:स्थल में गहराई से अपना निशान छोड़ जाती है, जिसे कभी भी उकेरकर, उभारकर देखा-परखा और सत्यापित किया जा सकता है, परंतु झूठ मात्र विचारों का उमड़ता-घुमड़ता एक संजाल है। झूठ को प्रमाणित करना कठिन है, क्योंकि आज जिस विचार को घटना का रूप दिया गया, उसे उसी रूप में सत्यापित करना आसान नहीं। ऐसा इसलिए, क्योंकि विचारों के प्रवाह क्षण-क्षण बदलते रहते हैं। इसलिए झूठ पकड़ा जाता हैै। सच प्रकृति में घटता है तो प्रकृति-सच कहलाता है, परंतु यह जीवन में घटता है तो समूचे अस्तित्व में आंदोलन-उद्वेलना होने लगती है। पर झूठ से जीवन का अस्तित्व प्रभावित नहीं होता है, क्योंकि यह विचारों का प्रायोजित प्रवाह मात्र होता है। झूठ कृत्रिम है, प्राकृतिक नहीं। कृत्रिम है, इसलिए विनिर्मित किया जाता है। इंसान के द्वारा बनाई चीजें और प्रकृतिप्रदत्त प्राकृतिक उपहार में ऐसा अंतर होता है। जैसे कागज का पुष्प और गुलाब का पुष्प। सच जैसा घटता है वैसा ही होता है, उसे कोई और कहीं भी, वैसा ही बताएगा जैसा होता है, पर झूठ के लिए ऐसी कोई शर्तें नहीं हैं, वह समय और परिस्थिति के अनुरूप परिवर्तित हो जाता है।
झूठ द्वंद्व है, झूठ मुखौटा है। इस आवरण को ओढ़े रखने में बड़ी समस्या है, पर जब आदत हो जाती है तो यह आवरण बड़ा ही डरावना, किंतु आकर्षक दिखता है। आकर्षक इसलिए कि झूठ बोलने वाला व्यक्ति बड़ी चालाकी से अपनी बातों को प्रस्तुत करता है और डरावना, इसलिए कि कहीं असलियत का पता न चल जाए। झूठा व्यक्ति स्वयं को और औरों को धोखा देता है। अपने को धोखा देने का तात्पर्य है अपने अस्तित्व को नकारना और दूसरों को ठगने का मतलब है अपनी मनगढ़ंत बातों के लिए समाज में वैसी ही भूमिका का निर्वाह करना। अंतर का उहापोह और अपनों के अविश्वास से झूठे व्यक्ति की सभी सृजनशील सामथ्र्य चुक जाती है, ऊर्जा नष्ट हो जाती है। परिस्थितिवश किसी का भला करने के लिए बोला गया झूठ भी सच के समान होता है, परंतु किसी को नुकसान पहुंचाने के लिए बोला गया झूठ सच से भी बड़ा नुकसानदेह माना जाता है।