Sunday, 6 March 2016

शिवत्व

संसार सुख और दुख, दोनों का मिला-जुला रूप है। कोई इसे अपनी सोच से सुखदाई बनाता है तो कोई दुखदाई। सच देखा जाए तो दोनों स्थितियां सिक्के के चित-पट की तरह है। सिक्के को किसी तरह रखा जाए, उसकी कीमत नहीं घटती। इसी तरह जीवन को भी लेना चाहिए। हमारे आध्यात्मिक ग्रंथों में शिव को बहुत सरल देवता के रूप में दर्शाया गया है। लोकहित के लिए समुद्रमंथन के वक्त वे खुद आगे बढ़कर विष पीते हैं। जब व्यक्ति सहजता से विसंगतियों के जहर को आत्मसात करता है तो उससे भयाक्रांत नहीं होता और जब विपरीत हालात को सच में जहर मान लेता है तो वह घबरा जाता है। विपरीतता प्राय: असफलता, धोखा आदि से आती है। यदि कोई छल-छद्म करे, अप्रिय स्थिति उत्पन्न करे और उसे जहर की तरह पीने की स्थिति बन जाए तब उस जहर को भगवान शंकर की तरह कंठ में ही रोक लेना चाहिए। यदि जहर हृदय में उतरा तो मन क्षुब्ध होगा, बदला लेने का भाव जाग्रत होगा, जिसका अंततोगत्वा नुकसान उसी का होगा। इतने बड़े त्याग के बावजूद भगवान शंकर सिर्फ एक लोटा जल चढ़ाने से प्रसन्न हो जाते हैं। जीवन में जो भी प्राप्त हो रहा है, वह मनुष्य के प्रयत्न का परिणाम है। इससे संतुष्ट होने की आदत डालनी चाहिए।
भगवान शिव की स्तुति करते समय हमारे ऋषियों ने लिखा है कि काले पत्थर को स्याही, समुद्र को दवात, कल्पद्रुम को लेखनी और पूरी पृथ्वी को कागज बनाकर साक्षात् माता सरस्वती उनकी महिमा लिखें तब भी भगवान की महिमा नहीं लिखी जा सकेगी। इसके निहितार्थ पर ध्यान देना होगा कि हमें भी जिंदगी की विसंगतियों को काले पत्थर की स्याही, सकारात्मक चिंतनधारा को समुद्र की तरह दवात, दृढ़ संकल्पों को कल्पद्रुम की लेखनी, जीवनपथ को धरती की तरह कागज बनाकर बुद्धि रूपी सरस्वती भी महाकाल की व्याख्या करें तो जीवन में आनंद के इतने अवसर हैं कि उनकी व्याख्या नहीं हो सकती। इस बात को हमेशा याद रखना चाहिए कि जब व्यक्ति नकारात्मक जीवन जीता है, तो अज्ञात भय चुपके से उसके जीवन में प्रवेश कर जाता है और यह भय मन को कमजोर करने के साथ शरीर के अवयवों को क्षतिग्रस्त करता है।