Saturday, 26 March 2016

देश की कीमत पर राजनीति

राजनीतिक दलों का यह नैसर्गिक अधिकार माना जाता है कि वे सत्ता में आने का सतत प्रयास करते रहें, आ जाने पर वहां डटे रहें और यदि जनता उन्हें सत्ताच्युत कर दे तो साम, दाम, दंड, भेद के सूत्रों को अपनाते, तोड़ते-मरोड़ते वे फिर कुर्सी हथियाने का प्रयास करें। इस प्रकार से आज की राजनीति में यह महाभारत चलता ही रहता है। इसमें सबसे अधिक प्रहार सत्य तथा नैतिकता पर ही होता है और हर ऐसे प्रयास में व्यक्तिगत और दलगत स्वार्थ लगातार उभरते रहते हैं। परिणामस्वरूप ऐसी स्थिति में देश की प्रगति तथा सामान्य जन के हित पिछड़ते जाते हैं। जिस प्रकार मई 2014 में चुनी गई सरकार के हर जनहितकारी प्रयास में मुख्य विपक्षी दल अड़ंगे लगाता रहा है वह भारत की राजनीति में गहराती जा रही व्यक्तिगत और पारिवारिक स्वार्थपरकता को पूर्णरूपेण से उजागर करता है। कांग्रेस के समक्ष दो चित्र उभरते हैं। उसे राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का निर्देश है, उसका पालन करना है। दूसरा, नरेंद्र मोदी जिस लगन और निष्ठा से समाज के सबसे वंचित वर्ग की ओर ध्यान दे रहे हैं, उसका संदेश उनकी लोकप्रियता को स्थायी रूप से बढ़ा रहा है। इसका सीधा अर्थ है कि कम से कम 2024 के पहले कांग्रेस के लिए यानी राहुल गांधी का कोई भविष्य बचता ही नहीं है। यही स्थिति विपक्ष में बैठे उन सभी महत्वाकांक्षी नेताओं की हो गई है जो प्रधानमंत्री पद सुशोभित करने के लिए व्याकुल थे और तदनुसार जोड़-तोड़ की गणित में प्रवीणता हासिल कर रहे थे। आज विपक्ष तिनके का सहारा ढूंढ़ रहा है।
जिस फुर्ती से राहुल गांधी दो बार रोहित वेमुला के दर्दनाक प्रकरण में राजनीति की रोटी सेंकने हैदराबाद पहुंचे, जैसे वह तथा उनके स्वाभाविक सहयोगी जेएनयू में बिना सोचे समझे पहुंच गए उससे सारे देश के सामान्य जन में संदेश उनके विपरीत ही गया। जेएनयू में राष्ट्रविरोधी नारे खुलेआम लगे, यह तो सभी मानते हैं। कांग्रेस राष्ट्र तथा तथ्यों से कितनी दूर हो गई है, इसका उदाहरण दिग्विजय सिंह जैसे नेता तो प्रतिदिन देते ही रहते है, उसका सबसे बड़ा प्रमाण शशि थरूर ने प्रस्तुत कर दिया। उन्हें भगत सिंह तथा कन्हैया कुमार में कोई अंतर दिखाई नहीं दिया। यह मान पाना मुश्किल है कि जेएनयू में भारत की बर्बादी तक के नारे केवल बाहरी तत्वों ने ही लगाए थे और वह भी अपना चेहरा ढक कर। विपक्ष ने यह मान लिया कि जेएनयू के युवा वास्तव में भुखमरी, शोषण तथा अन्याय से आजादी मांग रहे थे, वे वंचितों तथा दलितों के लिए संघर्ष कर रहे थे और वे अंबेडकर के सपनों को पूरा करने की कसमें खा रहे थे।
आज जब गुलाम नबी आजाद या ओवैसी 'जेएनयू-जनित-आजादीÓ का अपने ढंग से विवेचन और उपयोग करते हैं तब वे भारत की आजादी पर प्रहार कर रहे होते हैं, उसके सामाजिक ताने-बाने के धागों को कमजोर कर रहे होते हैं और पारस्परिक साव की जड़ें खोद रहे होते हैं। ऐसे लोग जब बाबा साहब का नाम लेते है तब उन पर तरस ही खाया जा सकता है। जो स्थिति बनी है वह अपेक्षित ही है। इसे डॉ. अंबेडकर का संविधान सभा में दिया गया समापन भाषण सहज मगर अत्यंत गहराई से स्पष्ट कर देता है। यह भाषण ऐतिहासिक है और भारत की आज की राजनीति को समझने के लिए इसके निहितार्थ को जानना आवश्यक है। उन्होंने कहा था, 'इस संविधान की निंदा अधिकतर दो क्षेत्रों से की जाती है। साम्यवादी पक्ष द्वारा और समाजवादी पक्ष द्वारा। वे क्यों इस संविधान की निंदा करते हैं? क्या इसलिए कि यह संविधान वास्तव में खराब है? मैं यह कहने का साहस करता हूं कि नहीं है। साम्यवादी श्रमिकों की तानाशाही के सिद्धांत पर आधारित संविधान चाहते हैं। वे संविधान की इस कारण निंदा करते हैं कि यह संसदीय लोकतंत्र पर आधारित है। समाजवादी दो बातें चाहते हैं। पहली बात यह कि यदि उनके हाथ में शक्ति आ जाएगी तो बिना प्रतिकर दिए सारी निजी संपत्ति का राष्ट्रीयकरण करने या समाजीकरण करने की स्वतंत्रता संविधान द्वारा उन्हें मिलनी चाहिए। दूसरी बात समाजवादी यह चाहते हैं कि संविधान में वर्णित मूलाधिकार बिना किसी परिसीमा के होने चाहिए जिससे कि यदि उनके पक्ष के हाथ में शक्ति आ जाए तो उन्हें आलोचना करने के लिए ही नहीं वरन राज्य को उलटने तक के लिए पूरी-पूरी आजादी मिल जाए।' आज आजादी के नारे लगाने वालों के साथ खड़े वामपंथी तथा समाजवादी केवल चुनावी गणित तक सीमित होकर रह गए है। वे न तो संविधान का सम्मान करते हैं न ही इन्हें दलितों तथा वंचितों के हित की कोई चिंता है। यह लोग जब डॉ. अंबेडकर का नाम लेते हैं तब यह याद करना आवश्यक है कि बाबा साहब स्वयं इन्हें कितनी गहराई से समझते थे। जब यह वर्ग अफजल या कसाब का महिमामंडन करता है तब उनका अंतर्निहित उद्देश्य तो संविधान को तहस-नहस करने का ही होता है। संविधान निर्माण के समय जो कुछ इन लोगों ने किया था उसे बाबा साहब ने झेला था। वह तो उनका अप्रतिम व्यक्तित्व था जिसके प्रभाव में इनकी दाल नहीं गली।
अंबेडकर के मर्मस्पर्शी शब्द बहुत कुछ कहते हैं, 'भारत एक स्वतंत्र देश होगा। उसकी स्वाधीनता का क्या परिणाम होगा? क्या वह अपनी स्वाधीनता की रक्षा कर सकेगा या उसको फिर खो देगा?' इसी भाषण में आगे डॉ. अंबेडकर अपनी इस आशंका के पैदा होने के ऐतिहासिक कारणों का विश्लेषण करते हैं। यह विश्लेषण आज के अनेक नेताओं का मार्गदर्शन कर सकता है बशर्ते वे ईमानदारी से इसमें निहित मंतव्य को समझने और आत्मसात करने का प्रयत्न करें। डॉ. अंबेडकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि लोकतंत्र को यथार्थ रूप देने के लिए यह आवश्यक है कि सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हम संविधानिक रीतियों को दृढ़तापूर्वक अपनाएं। भारत में इस समय यही सर्वोत्तम तथा सर्वमान्य मार्ग है।