Tuesday, 1 December 2015

भारतीय लोकतंत्र पर मंड़राती राहुल-केजरीवाल की अशुभ छाया

भारतीय राजनीति में राहुल और केजरीवाल ऐसी दो शख्सियतों का प्रभाव बढ़ रहा है, जिन्हें सिद्धान्तों, आदर्शों और राजनीतिक विचारधारा से कोर्इ लेना देना नहीं हैं। इनकी देशभक्ति भी संदिग्ध है। ये निरर्थक विवादों को जन्म देते हैं। प्रचार माध्यमों का सहारा लें, उन्हें हवा देते हैं और उससे राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश करते हैं।  राजनीतिक षड़यंत्रों के जरिये एक लोकतांत्रिक सरकार के कामों में जानबूझ कर व्यवधान उपस्थित कर रहे हैं। दोनों व्यक्ति सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने के लिए मचल रहे है। राहुल के पास तो एक पार्टी का केडर है, जिसकी जड़े पूरे भारत में हैं, किन्तु केजरीवाल के पास तो भाड़े पर रखे हुए कुछ ही लोग हीं बचे हैं, जो अपनी कुटिल बुद्धि और धूर्तता से भारतीय लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को अपने रंग में रंगना चाहते हैं।
यह अजीब विडम्बना है कि कांग्रेस के निर्लज्ज और बेबाक भ्रष्टााचार के विवरुद्ध किये गये जन आंदोलन से केजरीवाल का राजनीतिक जीवन प्रारम्भ हुआ,  किन्तु उसी कांग्रेस के सहयोग से वे मुख्यमंत्री बन गये। राहुल-केजरीवाल के किसी गुप्त षड़यंत्र के कारण ही केजरीवाल मुख्यमंत्री  पद छोड़, बनारस में नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध चुनाव लड़ने बनारस चले गये। पर्दे के पीछे की गर्इ किसी गुप्त संधि से  ही उन्हें दिल्ली विधानसभा में रिकार्ड़ तोड़ बहुमत मिला, क्योंकि राहुल गांधी  ने जानबूझ कर अपना वोट बैंक तश्तरी में रख कर केजरीवाल को भेंट कर दिया था। निश्चित रुप से भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए दिल्ली विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस ने आत्महत्या की थी, जिसे स्वस्थ लोकतांत्रिक परम्परा नहीं कह सकते। अपने को मिटा कर भाजपा को रोकना कहां तक उचित हैं, इसका मर्म तो राहुल गांधी ही समझा सकते हैं।
केजरीवाल ने चुनाव जीतने के लिए सारे अनैतिक आचरण अपनाएं। मसलन पाकिस्तान में बैठे एक डॉन से उन्होंने सहयोग और धन लिया। उन्हें मुस्लिम समुदाय के शतपतिशत वोट दिलाने के लिए पूरे देश से लोग प्रचार करने आये। जनता को लुभाने के लिए उन्होंने असम्भव वादे किये। सारे आदर्शों और सिद्धान्तों को ताक में रख कर संदिग्ध व्यक्तियों को उम्मीदावार बनाया। वस्तुत: केजरीवाल को भारतीय राजनीति में स्थापित करने का सारा श्रेय भाजपा को जाता है, क्योंकि सरकार के पास सारे प्रशासनिक अधिकार होते हुए भी वह केजरीवाल की देशद्रोही गतिविधियों पर नज़र नहीं रख पार्इ। केजरीवाल और डॉन के प्रगाढ़ रिश्तों को साबित नहीं कर पायी । सरकार यह सच भी नहीं जान पार्इ कि केजरीवाल, जो विध्वंसात्मक राजनीति कर रहे है, उसके पीछे डॉन की मोदी सरकार के विरुद्ध रची जा रही कोर्इ व्यूह रचना तो नहीं है। ऐसा संदेह इसलिए होता है, क्योंकि कर्इ प्रदेशों में विरोधी दलों की सरकारें हैं, परन्तु किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री केन्द्र सरकार के विरुद्ध इतना मुखर नहीं है, जितना अरविंद केजरीवाल है। शासन का अधिकार मिलने के प्रत्येक मुख्यमंत्री अपने प्रशासनिक कार्यों से जनता का दिल जीततना चाहता है, ताकि जनता उसे दुबारा जनादेश दें, किन्तु केजरीवाल के मन में ऐसा कुछ है ही नहीं। मुख्यमंत्री बनते ही केजरीवाल ने संवैधानिक संस्थाओं और केन्द्र सरकार के विरुद्ध घोषित युद्ध छेड़ रखा है।
अरविंद केजरीवाल की नीयत पर इसलिए संदेह होता है, क्योंकि गुजरात में जो पटेल आरक्षण का कार्ड़ खेला गया है, उसके पीछे भी केजरीवाल की कुटिल बुद्धि और किन्हीं अज्ञात स्त्रोंतों से इस आंदोलन को फैलाने के लिए उडेला गया धन है। बिहार चुनावों में भाजपा को हराने के लिए केजरीवाल ने लालू और नीतीश का पूरा समर्थन किया था। वे ही अज्ञात स्त्रोत जिन्होंनें केजरीवाल की मदद की थी, उन्होने बिहार चुनाव में भी धन से और प्रचार माध्यमों से महागठबंधन की मदद की है।  महागठबंधन को एक करोड़ साठ लाख वोट मिले थे और भाजपा गठबंधन को एक करोड़  करोड़ तीस लाख। महागठबंधन को मुस्लिम समुदाय के शतप्रतिशत वोट मिले हैं, जो  दिल्ली की तरह बिहार में भी भाजपा की करारी हार का मुख्य कारण है। दादरी कांड़ को अतिरंजित रुप से हर मुस्लिम मतदाता तक पहुंचाने का प्रभावी कार्य केजरीवाल ने किया। यह बात अब भी रहस्य है कि भ्रष्ट लालू के गठबंधन को जीताने के लिए केजरीवाल ने इतना उत्साह क्यों दिखाया ? क्या किसी आका के साथ की गर्इ अपवित्र संधि का तो यह परिणाम नहीं है। केन्द्र सरकार अपनी प्रशासनिक ताकत से केजरीवाल की संदिग्ध गतिविधियों को नहीं भांप पार्इ, जिससे इस व्यक्ति के होंसले बहुत बुलंद है।
पंजाब में राहुल, केजरीवाल और पाकिस्तान मिल कर जो खेल खेल रहे हैं, उस खतरनाक खेल पर भाजपा की आत्ममुग्धता अंकुश नहीं लगा पा रही है।  बादल सरकार की दुर्बलता का लाभ यह त्रिगुट उठा रहा है और भाजपा तमाशबीन दर्शक की तरह तमाशा देख रही है। देशहित में विध्वंसकारी राजनीति को रोकना भाजपा का कर्तव्य और धर्म दोनों है, जिसे उसे गम्भीरता से लेना होगा।
केजरीवाल और राहुल दोनो विध्वंसात्मक शैली की राजनीति करते हैं, जो लोकतंत्र के लिए अशुभ संकेत है। सहिष्णुता राहुल द्वारा तैयार किया गया एक प्रायोजित कार्यक्रम है, जिसकी सफल परणिति  बिहार चुनाव में भाजपा के पराजय के साथ हुर्इ है। राहुल अब इसी मुद्धे को उठा कर संसद की कार्यवाही बाधित करना चाहते हैं। उन्हें इस बात की जरा भी चिंता नहीं है कि एक झूठे मामले को बहुत ज्यादा तुल देने से उनकी पार्टी बहुसंख्यक समाज के वोटो की मोहताज हो जायेगी, जो उसके लिए बहुत घातक होगा। परन्तु जिस व्यक्ति के स्वभाव में छिछोरापन हो, राजनीतिक समझ का अभाव हो, वो राजनीतिक षड़यंत्रों से ही राजनीतिक लाभ उठाना चाहता हो,  ऐसे लोगों की  बुद्धि पर तरस आता है। क्योंकि राहुल को इस बात का जरा सा भी अहसास नहीं है कि षड़यंत्र हमेशा सफल नहीं होते। जनता का विश्वास जीतने के लिए सभी समुदाय के हितों की बात सोचनी रहती है।  केवल एक ही समुदाय के वोट बटोरने के लिए निरन्तर षड़यंत्र रचने से पासा पलट भी सकता है।
भारतीय राजनीति में अरविंद केजरीवाल का जन्म एक अभिशाप है। इस अभिशाप से मुक्ति मिल जाती यदि भाजपा दिल्ली का चुनाव जीतने के लिए सफल रणनीति बनाती और केजरीवाल के पाकिस्तान प्रेम का सच जान पाती।  राहुल के विदेशी खातों को खंगालने में सरकार सक्रियता दिखाती तो अब तक राहुल की बोलती बंद हो जाती। संसद का सत्र छोड़ कर सोनिया गांधी विदेश भागी है, इसका रहस्य भी सरकार यदि जान लें, तो असिहष्णुता के विरुद्ध छेड़ा गया प्रायोजित युद्ध समाप्त हो जायेगा। मोदी सरकार के पास प्रशासनिक अधिकार है, जिसके जरिये भारतीय लोकतंत्र को केजरीवाल और राहुल गांधी की अशुभ छाया से मुक्ति दिला सकती है। यदि सरकार इनके प्रति सहिष्णु बनी रही, तो इन दोनों की ताकत बढ़ती जायेगी, जिसके अशुभ परिणाम पूरे राष्ट्र को भोगने पड़ेंगे।