Wednesday, 9 July 2014

सोनिया युग का पतन और मोदी युग का प्रारम्भ

अंधेरे सोनिया युग का अवसान हो गया है। नरेन्द्र मोदी भारत के राजनीतिक क्षितिज पर आशा की किरण बन कर उभरे हैं। यह हमारा दुर्भाग्य ही था कि हमने भोलेपन से अपना भाग्य दस वर्षों के लिए एक अभिमानी, रहस्यमय स्वभाव की विदेशी महिला को सौंप दिया। मोदी के प्रति उनकी खीझ जग जाहिर है। उन्हें कभी मौत का सौदागर कहा था, आज वे सत्ता के शीर्ष पर पूर्ण बहुमत के साथ बैठे हैं। शायद ही भारत का कोई ऐसा मुख्यमंत्री होगा, जिसके विरुद्ध इतने अनगिनित अपराधिक मुकदमें दर्ज किये हों । दस वर्षों में एक सरकार ने अपनी सारी शक्तियां, मानवाधिकार आयोग एवं जांच एंजेंसियों का दुरुपयोग कर उन्हें अपराधी घोषित करने की भरसक कोशिश की, किन्तु मोदी साहस के साथ मैदान में डटे रहें। अपने आत्मबल से उनके विरुद्ध किये गये षड़यंत्रों को निष्फल कर दिया।
सोनियां ने मोदी को सत्ता में आने से रोकने के लिए सारी उलटी सीधी चाले चलीं, सभी सेक्युलर राजनीतिक दलों को अपने पक्ष में लामबंद किया, ताकि मोदी को शिकस्त दी जा सके। ऐसा वे इसलिए कर रही थी, क्योंकि वे सत्ता खो कर अपने किये कृत्यों को उजागर नहीं होने देना चाहती थी। एक नंगे सत्य को उन्होंने अपनी प्रशासनिक शक्तियों से छुपा रखा था। अब उनके दस वर्षों के कार्यकाल के घोटालों की परते खुलेगी। जनता एक दिन जान जायेगी कि एक विदेशी के हाथों में सत्ता सौंप कर कितना बड़ा धोका खाया है।
सोनिया हमेशा कम बोलती है, दूसरे का लिखा हुआ पढ़ती है, कभी कभार मुस्कराती है। उन्हें चापलुसी और दरबारी संस्कृति पसंद है, उनका स्वभाव मुखर नहीं है, इसलिए उसके मन की थाह पाना असम्भव है। पर्दे की ओट में रह कर उन्होंने दस वर्षों तक प्रधानमंत्री और मंत्रियों को कठपुतली की तरह नचाया, किन्तु अपनी प्रशासनिक क्षमता का परिचय देने कभी आगे नहीं आयी। भारतीय संस्कृति, सभ्यता और इतिहास के बारें में कभी उन्होंने कोई टिप्पणी नहीं की। भारत को वे कैसा बनाना चाहती है, इस संबंध में कोई विज़न जनता के सामने प्रकट नहीं किया। सोनियां ने भारत की संवैधानिक परम्पराओं को तोड़ने और संवैधानिक संस्थाओं का अवमूल्यन करने में कभी हिचक महसूस नहीं की। किसी भी अप्रिय घटना जैसे पाकिस्तानी सेना द्वारा भारतीय जवानों के सिर काट कर ले जाने वाले प्रकरण को ले कर पूरे देश के साथ वे व्यथीत नहीं दिखी। उनके चेहरे पर कभी देश भक्ति का किंचित भी भाव दिखाई नहीं दिया। निःसंदेह उन्हें भारत और भारतीयता से कोई लेना देना नहीं था। वे एक अघोषित मिशन को ले कर भारतीय लोकतंत्र का उपयोग अपनी स्वार्थ सिद्धी के लिए कर रही थी।
मोदी खुली किताब है, उनके मन में कुछ भी दबा नहीं रहता। जनता के समक्ष बेबाक बोलते हैं। उनकी भाषा सरल, स्पष्ट आम आदमी के दिल को छूने वाली होती है। किसी का लिखा हुआ भाषण वे नहीं पढ़ते, अतः उनके मुहं से निकले हुए शब्द भीतर से निःसृत होते हैं। उन्हें दरबारी संस्कृति से परहेज हैं। उन्हें हमेशा योग्य, कर्मठ और ईमानदार व्यक्ति पसंद आते हैं। मोदी नरम दिल के कठोर प्रशासक है, अपनी प्रशासनिक क्षमता का परिचय वे दे चुके हैं। भारतीय संस्कृति के प्रति श्री मोदी के मन में अटूट श्रद्धा है। नये भारत के बारें में उनका विज़न स्पष्ट है। वे भारत को कैसा बनाना चाहते हैं, इस संबंध में कई बार जनता के समक्ष अपने विचार प्रकट कर चुके हैं। देश के साथ षडयंत्र करने वाली ताकतों के साथ मोदी का कठोर रुख रहा है। वे किसी भी हालत में भारत की सम्प्रभुता के साथ खिलवाड़ पंसद नहीं करेंगे। उनकी देश भक्ति उनके भाषणों में स्पष्ट रुप से प्रकट होती है। मोदी की राष्ट्रभक्ति पर कभी प्रश्न चिन्ह नहीं लगाया जा सकता।
सोनिया युग में प्रधानमंत्री और उनके मंत्री बहुधा अपने कार्यालयों में नहीं आते। मंत्री या तो विदेश दौरे पर रहते थे, या घर में आराम फरमाते थे। इस युग में नौकरशाहों ने विदेश भ्रमण का रिकार्ड बनाया है। मंत्री के कार्यालयों में फाइलों के ढेर लगे रहते थे, इन्हें निपटाने की फुर्सत नहीं थी। सेक्रेटेरियेट में दलालों का स्वच्छन्द विचरण जारी था। दलाल फाइलों को आगे बढ़ाने के उपाय करते थे। सौदेबाजी पूरी होने पर सेक्रेटरी मंत्री के घर जाते। मंत्री महोदया सोनियां से पूछ कर फाइल पर अपनी टिप्पणी लिखते। फाईल ले कर सोनिया दरबार में जाते। पीएमओं आॅफिस के अधिकारी को बुलाया जाता और उन्हें निर्देष दिया जाता कि इस पर प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर करवा दें। आदेशानुसार वे फाइल ले कर प्रधानमंत्री के घर जाते और वे सुप्रीम प्रधानमंत्री के मौखिक आदेष के आधार पर उस पर हस्ताक्षर कर देते। फाइल के कान्टेट को पढ़ने, उस पर टिप्पणी करने या विचार-विमर्श के अधिकार उनके पास नहीं थे। वे डमी प्रधानमंत्री थे, जिन्हें सुप्रीम प्रधानमंत्री के मौखिक आदेशों की पालना करनी थी।
नरेन्द्र मोदी और उनके मंत्री प्रतिदिन समय से पहले अपने कार्यालय में आ कर बैठ जाते हैं। फलतः उनके अधीनस्त कर्मचारी दौड़ते भागते समय पर कार्यालय आने के अभ्यस्त हो गये हैं। मंत्रियों और नौकरशाहों के विदेश दौरों पर लगाम लग गया है। कारपोरेट आॅफिस की तरह भारत सरकार दिन रात काम कर रही है। प्रधानमंत्री स्वयं बारह से चैदह घंटे कार्यालय में बैठे रहते हैं। प्रत्येक ज्वलन्त मुद्धो पर प्रधानमंत्री मंत्रियों के साथ घंटो मीटिंग करते हैं। लम्बित पड़ी सारी फाईलों को त्वरित गति से निपटाया जा रहा है। देश की समस्याओं को सुलझाने के लिए गहन मंथन हो रहा है।
दलालों का सेक्रेटरियेट में स्वच्छन्द भ्रमण बंद हो गया है। भारत सरकार पूरी प्रतिबद्धता और निष्ठा से काम कर रही है। सरकार के मन में जनता के प्रति सेवा की भावना है। सरकार पूर्ण ईमानदार है। जिस ढंग से सरकार काम कर रही है, उसे अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री और उनके सहयोगियों के मन में देश के संसाधनों और सार्वजनिक धन को लुटने की नीयत नहीं है। एक दो महीने के कामकाज को किसी भी तरह से सरकार की क्षमता का पैमाना नहीं माना जा सकता। ईश्वर से यही प्राथना है कि इस सरकार को लम्बी उम्र दें, ताकि गरीब और पिछड़ा भारत खुशहाली के मार्ग पर आगे बढ़ता रहे।
सोनिया युग में बूरी नीयत सेें सार्वजनिक धन और प्राकृतिक संसाधनों की खुली और बेबाक लूट को अंजाम दिया गया। बिजली और इन्फ्रास्ट्रक्चर से संबंधित कई परियोजनाएं बंद हो गयी। बैंकों का अरबों रुपया इन परियोजनाओं में फंस गया। प्रधानमंत्री मूक दर्शक की तरह ऐतिहासिक घोटालों को देखते रहे। अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री अर्थव्यवस्था की बिगड़ी सेहत को सुधारने के लिए कुछ नहीं कर पाये। राजकोषीय घाटा बढ़ने से महंगाई बढ़ती गयी। जनता महंगाई की मार से तड़फती रही, परन्तु सरकार सोयी रही। अलबता अर्थव्यवस्था की हालत और खराब करने के लिए खैरात योजनाओं में सार्वजनिक धन लुटाया गया, ताकि जनता के वोट मिल सके।
सत्ता खोने के बाद सोनियां की हल्ला ब्रिगेड़, महंगाई को ले कर जिस तरह से संसद और सड़को पर उपद्रव कर रही है, उससे यही लगता है, कि खिंसियानी बिल्ली खम्भा नोच रही है। सोनिया को अपनी हार से कोई पछतावा नहीं है। कभी हार पर आत्ममंथन नहीं किया और न ही इसे गम्भीरता से लिया। 129 साल पुरानी पार्टी को दो वर्ष पुरानी विवादास्पद आपपार्टी की शैली से धरना प्रदर्शन करने की क्या आवश्यकता आ पड़ी, इस बात के औचित्य को सोनिया की हल्ला बिग्रेड नहीं समझा सकती है। दरअसल कांग्रेस की विचारधारा कितनी दिवालिया हो गयी है, इसका यह स्पष्ट प्रमाण है। जिन्होंने भारत की जनता को महंगाई की सौगात दी है, वे सत्ता जाने के बाद घडि़याली आंसू बहाते हुए अपने पाप का ठीकरा दूसरों के सिर पर फोड़ रहे हैं। इसे भारत के राजनीतिक इतिहास की विडम्बना ही कहा जा सकता है।