Friday, 27 June 2014

कठोर और कडवे फैंसले का चाबुक जनता पर क्यों ? अपराधियों पर क्यों नहीं ?

मानसून कमजोर रहने की सिर्फ भविष्यवाणी की गयी है। मानसून आ कर गया नहीं है। फसल कितनी कमजोर होगी, इसका भी अनुमान नहीं है, फिर यकायक महंगाई क्यों बढ़ गयी ? क्योंकि ज्यादा मुनाफाखोरी के चक्कर में जमाखारी होने लगी। जिन लोगों के लिए सामाजिक हितों के बजाय अपना स्व हित सर्वोपरी होता है, जो अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए समाज का शोषण करते हैं, वे सामाजिक न्याय के अनुसार अपराधी होते हैं, चाहे उन्हें कानून की धाराएं अपराधी घोषित नहीं करती हों।
स्वयं हलवा खाना चाहते है, इसलिए दूसरों के मुहं में जा रहा निवाला छिनेंगे, क्योंकि हम सक्षम है और ऐसा दुस्साहस कर सकते हैं। भारत की सामाजिक व्यवस्था की इस खतरनाक प्रवृति पर जब तक सरकार का अंकुश नहीं लगेगा, तब तक भारतीय समाज के लिए अच्छे दिन आने वाले नहीं है। जमाखारी पर महज बयानबाजी से जमाखोरों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इन अपराधियों पर सरकारी चाबुक की मार चाहिये, ताकि वे यह समझ पाये कि जनता की सरकार क्या होती है और उसके पास क्या अधिकार होते हैं।
वित्तमंत्री ने राज्य सरकारों को निर्देश दे दिया कि जमाखोरी पर अंकुश लगावें। राज्य सरकारों ने इंस्पेक्टरों को भेज दिया। इंस्पेक्टर जमाखाोरों से रिश्वत खा कर घर आ गये। जमाखोरी होती रही। व्यापारी मुनाफा कमाते रहें। वे अमीर होते रहें और जनता गरीब। आज तक ऐसा होता आया है। पिछली सरकारें ऐसा ही करती आयी थी। क्या मोदी जी की सरकार भी इसी औपचारिकता की पुनरावृति करेगी ? बेहतर होता वित्तमंत्री नौकरशाहों द्वारा सुझाये गये सुझावों को जनता के समक्ष परोसने के बजाय स्थिति का अध्ययन करते और फिर बयान बाजी करते।
मोदी सरकार को राज्य सरकारों और उनके इंस्पेक्टर राज पर भरोसा नहीं करना चाहिये। जमाखोरी को गम्भीर समस्या मानते हुए इस समस्या का समाधान खोजने के लिए सरकारी जांच एजेंसियों और सांसदों का सहयोग लेना चाहिये। केन्द्र सरकार जमाखारों की सम्पति भी कुर्क कर सकती है। सरकार के ऐसे फैंसलों को ही कडवे और कठोर फैंसले करहते हैं, जिसकी मार अपराधियों पर पड़े, न कि जनता पर। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने महंगाई के संबंध में जो बयान दिया, वह नौकरशाही द्वारा तैयार किया गया बयान ही था। ऐसे बयानों से वर्तमान सरकार के मंत्रियों को परहेज करना चाहिये। सतारुढ होते ही यदि सरकार जमाखोरों पर चाबुक बरसाती, तो सभी के मन में भय बैठ जाता, जो परिस्थतियां आज बनी है वह नहीं बनती। जमाखोरी कठोर कार्यवाही से रोकी जा सकती है, शाब्दिक बयानों से नहीं।
भारत की सुविधाभोगी और भ्रष्ट बिरादरी वातानुकूलित कमरों में बैठ कर ही जनता की समस्याओं के बारें में सोचती है और उसका निराकरण सरकार को सुझाती है। सरकार के मंत्री यदि बिना समस्याओं का गहन अध्ययन किये ज्यों का त्यों जनता को उसी भाषा में समझाने का उपक्रम करेंगें, तब पिछली सरकार और इस सरकार में अंतर ही क्या रहेगा ? कांग्रेस सरकार से जनता को चिढ़ इसलिए हो गयी, क्योंकि अपराधी मौज मस्ती से जिंदगी गुजार रहे थे और जनता कष्ट भोग रही थी।
पिछली सरकार से मोदी सरकार को दिवालियां अर्थ व्यवस्था उपहार में मिली है। अर्थ व्यवस्था को पटरी पर लाने का काम चुनौतीपूर्ण है। सरकार अर्थव्यवस्था को तभी सुधार सकती है, जब आर्थिक अपराधियों की धड़पकड़ तेज हो। सरकारी खजाने में आने वाले धन को रोकने और सरकारी खजाने से जाने वाले धन को लुटने पर जब तक प्रतिबंध नहीं लगेगा, तब तक सरकार की काई भी नीति सफल नहीं होगी। जो लोग सरकारी खजाने से वेतन लेते हैं, किन्तु हानि सरकार को ही पहुंचाते हैं, ऐसे अपराधियों को चुन चुन कर जेल सिंकजों के पीछे नहीं भेजा जायेगा, तब तक पूरे देश में वित्तीय अनुशासन नहीं आयेगा।
नराजनेता, नौकरशाह और उद्योगपतियों के शक्तिशाली त्रिगुट के अवैध संबंधों की प्रगाढ़ता ही भारत की सारी समस्याओं की जड़ है। विश्व में भारत को दरिद्रतम और भ्रष्टतम देश होने का तमगा भी इसी त्रिगुट ने दिलाया है। इस त्रिगुट की प्रगाढ़ता को समाप्त करने के लिए मोदी सरकार ने अब तक कोई पहल नहीं की है, जबकि सरकार बनते ही उसकी पहली प्राथमिकता यही होनी चाहिये। यदि वाजपैयी सरकार त्रिगुट के अवैध संबंधों को समाप्त करने का किंचित भी प्रयास करती, तो उसकी लोकप्रियता बहुत अधिक बढ़ जाती। कांग्रेस संस्कृति से परहेज करने के बजाय आत्मसात करने के परिणामस्वरुप ही वाजपैयी सरकार फिर सत्ता में नहीं लौटी। आशा है मोदी सरकार इतिहास की पुनरावृति नहीं करेगी।
काले धन के उत्पादन और बाजार में इसके उत्पात पर सरकार को कडी नजर रखनी होगी, अन्यथा काले धन का भारतीय अर्थव्यवस्था में समानान्तर प्रवाह उसके सारे दावों और वादों को खारिज कर देगा। देश भर में बेईमानों की बैमानी सम्पति को चिंहित करने का कार्य प्रारम्भ कर देना चाहिये। यह कार्य ज्यादा जटिल नहीं है। सारी काली कमाई जमीनों और मकानों में फंसी हुई है, इस कमाई का आंकलन सरकार अपनी इच्छा शक्ति से कर सकती है। एक साथ पूरे देश में छापे मारे जा सकते हैं। सरकार का यह संकल्प देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर ले आयेगा। देश में एक ऐसा वातावरण बन जायेगा, जिससे बेइ्र्रमान खोप खायेगें। भ्रष्ट आचरण पर अंकुश लग जायेगा। ऐसा होना ही अच्छे दिन की शुरुआत माना जायेगा।
यदि वास्तव में सरकार के मन में देश भर में फैली काली कमाई का आंकलन करने की इच्छा है, तो वह दिल्ली को ही प्रयोग के रुप में ले सकती है। सरकार को अल्प समय में ही अरबो रुपये की काली सम्पति का पत्ता लग जायेगा। यदि इसी प्रयोग को देश भर में दोहराया जाय, तो जनता को चकित कर देने वाली सम्पति का विवरण मिल जायेगा। आज़ादी के बाद जो राजनीतिक व्यवस्था बनी है, उसने देश को सेवा देने के बजाय काले धन के उत्पान और उपयोग में ज्यादा रुचि दिखाई है। गरीब जनता की गाढ़ी कमाई को लूट कर पैदा किया गया काला धन विदेशी बैंकों में तो जमा ही है, देश के अधिकांश बड़े और छोटे शहरों में इसका जलवा दिखाई दे रहा है। यह भारतीय अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर रहा आर्थिक आतंकवाद है, जो गोलियों से जनता की जान नहीं लेता, अपितु छुप कर उसके पेट पर लात मारता है, जिससे वह जीवित तो रहता है, किन्तु तड़फ-तडफ कर दम तोडता है। मोदी सरकार ने इन आर्थिक अपराधियों के विरुद्ध यदि नरमी का व्यवहार किया तो देश की जनता कभी माफ नहीं करेगी।
पिछली सरकार सीबीआई का उपयोग अपने घोटालों पर लिपापोती करने और विपक्ष को धमकाने के लिए प्रयोग करती थी। मोदी सरकार सीबीआई का उपयोग काले धन का पत्ता लगाने और बड़े-बड़े आर्थिक अपराधियों को पकड़ने में कर सकती है। यह सुझाव बुरा नहीं है। पूरे देश की जनता इसकी समर्थक है। यदि ऐसा किया जाता है तो अच्छे दिन आने वाले हैं, महज एक नारा या भविष्य का मजाक बन कर नहीं रह जायेगा।