Wednesday, 12 March 2014

महान नौटंकीबाज अरविन्द केजरीवाल का सम्मान नहीं, तिरस्कार कीजिये

महान नौटंकीबाज अरविन्द केजरीवाल का सम्मान नहीं, तिरस्कार कीजिये !


एक समाचार समूह द्वारा केजरीवाल को अहमदाबाद से दिल्ली लाने के लिए चार्टड़ प्लेन उपलब्ध कराना एक साथ कर्इ प्रश्न उपसिथत करता है-”क्या मीडिया समूह के पास एक व्यकित विशेष का व्यकितत्व चमकाने के लिए अतिरिक्त फंड है ? यदि है, तो यह पैसा कौन दे रहा है ? पूरे देश ने केजरीवाल को स्वीकार नहीं किया है। दिल्ली प्रदेष की अठार्इस विधानसभा सीटें जीतने का मतलब यह नहीं है कि वे पूरे भारत के सर्वमान्य नेता बन गये हैं। फिर किस आधार पर इस समाचार समूह ने केजरीवाल को इतना अधिक महत्व दिया ? भारत के राष्ट्रीय दलों के पास विधानसभाओं की हज़ारो सीटे हैं। कर्इ प्रादेशिक क्षत्रप भी सौ से अधिक सीटे जीतने की औकात रखते हैं। फिर क्यों नहीं भारत के किसी अन्य राजनेता को अपने टीवी स्टूडियों में बुलाने के लिए इस समाचार समूह ने विशेष सुविधा उपलब्ध करायी ?”
अरविन्द केजरीवाल को चार्टड़ प्लेन उपलब्ध कराने पर समाचार समूह मौन है, किन्तु केजरीवाल ने इस विषय पर जिस तरह शरारतपूर्ण जवाब दिया, वह हैरान करने वाला है। वे कहते हैं-ऐसे सवाल राहुल और मोदी से क्यों नहीं पूछते ? भारत की राजनीति को भ्रष्टाचार मुक्त और स्वच्छ बनाने का दावा करने वाले सख्श का ऐसा उद्धण्ड़ता पूर्वक उत्तर यह बताता है कि यह व्यक्ति भारत के सवा सौ करोड़ नागरिकों को मूर्ख समझता है। अपने अपराध को छुपाने के लिए आवश्यक है कि अन्य राजनेताओं के नाम उछाल दो या किन्हीं अन्य उधोगपतियों को गालियां दे दो, जनता उन्हें माफ कर देगी।
निश्चय ही, अरविन्द केजरीवाल र्इमानदार और स्वच्छ छवि के लिए मात्र ढ़ोग करते हैं। वे भी अन्य राजनेताओं की तरह भारतीय राजनीति को व्यावसाय मानते हैं और इसी प्रयोजन को पूरा करने के लिए वे भारतीय राजनीति में कूदे हैं। अन्य राजनेता वर्षों से राजनीति में रहने के बाद जितना धन नहीं कमा पाये, उससे कही अधिक केजरीवाल ने अपनी नौटंकी और स्टंट कला से कुछ महिनों में ही कमा लिये हैं। उनकी राजनीति की दुकान भविष्य में चल पाये या न चल पाये, उनका तिलस्म कायम रह पाये या न पाये, परन्तु उनके पास ज्ञात और अज्ञात स्त्रोंतों से अपार धन एकत्रित करने का मौका हाथ लग गया है। केजरीवाल क्रांतिकारी नहीं, विशु़द्ध व्यावसायिक मनोवृति के व्यक्ति  हैं, जिसे वे सिद्ध कर चुके हैं।
जिस मीडिया समूह ने केजरीवाल को अपने स्टूडियो तक बुलाने के लिए चार्टड़ प्लेन उपलब्ध कराया, उसी समूह ने अपने टीवी चेनल पर अरविन्द केजरीवाल का प्रायोजित इंटरव्यू प्रसारित किया। जानबूझ कर अपने पीछे शहीद भगत सिंह की तस्वीर लगा कर अपने आपको क्रांतिकारी घोषित करने का नया शगूफा छोड़ा। देश में नयी क्रांति लाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की। ऐसा व्यक्ति जो भारत के संविधान में आस्था नहीं रखता, जो झूठ, कपट व छल को राजनीति का एक भाग मानता है, जो अपननी कही बात पर तुरन्त पलटी मारनें में सिद्ध हस्त है, जो अपने थूंक को चाटने में संकोच नहीं करता, जो अपने बच्चों की झूठी कसमें खाता है, जिसके पास अपनी कोर्इ विचारधारा नहीं, कोर्इ सिद्धान्त नहीं, मात्र उद्धण्ड़ता और अशिष्ट्ता ही जिसके स्वभाव में हैं, वह व्यकित कैसे भगतसिंह के आदर्शों को मानने वाला हो सकता है ? जो  व्यक्ति देश का अहित चाहने वाले लोगों से साठगांठ रखता है, जिसकी पार्टी कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग नहीं मानती है, उसे कैसे हम महान देश भक्त का दर्जा दे सकते हैं ?
प्रश्न यह है कि उस टीवी चेनल और अरविन्द केजरीवाल को प्रायोजित इंटरव्यू प्रसारित करवाने की आवश्यक्ता क्यों आ पड़ी ? क्या यह देश की जनता को धोखा देने का प्रयोजन नहीं है ? क्या यह झूठ और फरेब की यह पराकाष्ठा नहीं है ? भाजपा के वोट काटने और मोदी की बढ़त को रोकने के लिए इतने नीचे स्तर तक उतर जायेंगे और इसके लिए मीडिया की विश्वसनीयता दावं पर लगा देंगे, ऐसी आशा किसी को नहीं थी। जो व्यकित मीडिया की लहरों पर बैठ कर घर-घर पहुंचा, आज उसे मीडिया ही लोगों के दिलों से बाहर निकाल रहा है। लोगों के मन में जिस व्यक्ति ने विश्वास जगाया, आज वहीं उन्हें विश्वासघाती लग रहा है। जनता को इस बात पर दुख है कि जिसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने वाला योद्धा माना, वह मात्र चमकते कागज का नकली पूतला निकला।
भारत की राजनीति में दोगले और धोखेबाज नेताओं की भरमार है, किन्तु उन सभी को पीछे छोड कर अरविन्द केजरीवाल सबसे आगे निकल गया है। कांग्रेस की खार्इ खोदी और अब उस खार्इ में कांग्रेस के सहयोग से भाजपा को धकेलने का प्रयास चल रहा है। कांग्रेस के भ्रष्टाचार और अर्कमण्यता का नारा लगा कर दिल्ली विधान सभा का चुनाव जीता और कांग्रेस के सहयोग से ही सरकार बना लीं । सरकार बना कर काम कम किये, नौटंकिया ज्यादा की। नौटंकी करते हुए सत्ता में आये और नौटंकी करते हुए सत्ता को छोड़ कर भाग खड़े हुए। 50 दिन तक एक प्रदेश की जिम्मेदारी ओढ़ने में अक्षम साबित हुए, किन्तु पंद्रह वर्ष से सरकार चला रहे गुजरात के मुख्यमंत्री के प्रशासन की कमजोरियां ढूंढने गुजरात चले गये।
मीडिया में बने रहने के लिए गुजरात की एक सामान्य घटना को अनावश्यक तुल दे कर दिल्ली के भाजपा कार्यालय के बाहर हिंसक भीड़ ले कर उनके नेता आक्रमण करने पहुंच गये। आचार संहित के उल्लंघन करने पर गुजरात पुलिस ने केजरीवाल को पूछताछ के लिए रोका था, उन्हें जेल में ठूंस कर प्रताडि़त नहीं किया था, जिससे आवेशित हो कर उनके नेताओं को ऐसा उद्धण्ड़ उपक्रम करना पड़ा। सबकुछ जान बूझ कर मीडिया में चर्चित होने के लिए किया गया था, किन्तु पास उल्टा पड़ गया। जनता के हीरो बनने चले थे, विलेन बन गये। फिर भी हार नहीं मानी। गुजरात के कांग्रेसी नेताओं को टोपियां पहना कर केजरीवाल हाय-हाय! के नारे लगवाये। उसी भीड़ से रोड़ शो किये। अपने ही लोगों से मनीष सीसोदिया की कार पर पत्थर फिंकवाये। फिर मोदी को गालियां देते हुए, उनसे मिलने की इच्छा जतार्इ। मिलने की अनुमति नहीं मिली, तो मीडिया में सुर्खियां बटोरने के लिए बवडंर किया।
पर इससे बात कुछ बनी नहीं। जनता पर अपना प्रभाव छोड़ने में असफल रहें। मीडिया के पास चुनावों की घोषणा के बाद समाचार की भरमार हो गयी थी, इसलिए एक ही व्यक्ति को महत्व देना सम्भव नहीं था। फिर कैसे अपनी राजनीति चमकार्इ जाय। ऐसा क्या करें, जिससे मीडिया घास डालने लगे। सम्भवत: इसी प्रयोजन को ध्यान में रखते हुए अपने चहेते टीवी चेनल के साथ मिल कर प्रायेजित इंटरव्यू प्रसारित करने का षडयंत्र रचा गया। परन्तु छल से तैयार किया गया इंटरव्यू के वे महत्वपूर्ण भाग लीक हो गये, जिन्हें छुपाया जाना था। सारे किये धरे पर पानी फिर गया। अब चारों ओर प्रशंसा के बजाय किरकिरी हो रही है। श्रीमान नौटंकीबाज अरविन्द केजरीवाल को सफार्इ देते नहीं बन रहा है। मोदी के रथ को रोकने के प्रयास में स्वयं घायल हो गये। पार्टी में खलबली मची हुर्इ है। अच्छे-अच्छे नेताओं का मोहभंग हाने लगा है। चार-पांच प्रबुद्ध व्यकित ही अब पार्टी में रह गये हैं, बाकि सब धीरे-धीरे किनारा कर रहे हैं।
परन्तु दुखद बात यह है कि भारत का एक प्रमुख समाचार समूह जिसने काफी प्रतिष्ठा अर्जित की है, केजरीवाल के साथ किसी राजनीतिक षडयंत्र में समिमलित हो जाय, यह व्यथीत करता है। मीडिया की विश्वसनीयता घटाता है। ऐसा आभास होता है कि कहीं देश के दुश्मन, जो भारत को निरन्तर असिथर करने में लगे हैं, अपने धन के प्रभाव से किसी मीडिया समूह और राजनेता को मोहरा बना कर अपने घृणित उद्धेश्यों की पूर्ति में तो नहीं लगे हैं ?
अरविंद केजरीवाल मात्र भाजपा के वोट काटने की ही राजनीति कर रहे हैं। उन्हें न तो चुनाव जीतना है और न ही सरकार बनानी है। वे किसी के मोहरे हैं। छल-प्रपंच की राजनीति करना ही उनका प्रमुख ध्येय है। भारत की जनता को ऐसे लोगों की बातों में आ कर भ्रमित नहीं होना चाहिये। इनका पूर्णतया तिरस्कार करने से ही भविष्य में ऐसाी घृणित और निकृष्ट राजनीति पर विराम लगाया जा सकता है।