Wednesday, 22 January 2014

कहीं केजरीवाल स्टंट देश के लिए संकट नहीं बन जाय

कहीं केजरीवाल स्टंट देश के लिए संकट नहीं बन जाय


अनीति के खेल में निष्णात कांग्रेस अपने ही कर्मो पर आज शिर्मंदा हो रही है। जो फसल बोई थी, उसके फल इतने जल्दी लग जायेंगे, ऐसी आशा कांग्रेस के उन नेताओं को नहीं थी, जो केजरीवाल को एक तुरुप का इक्का बना कर नरेन्द्र मोदी की बढ़त को रोकने का ख्वाब देख रहे थे। मोदी की लोकप्रियता के रथ को केजरीवाल रोकेंगे या नहीं, यह तो समय ही बतायेगा, किन्तु कांग्रेस की रही सही प्रतिष्ठा इस व्यक्ति ने धूल में मिला दी है। शिंदे को खलनायक बना कर पूरे देश में प्रचारित करने से कांग्रेस की ही किरकिरी हो रही है। कांग्रेसी नेताओं को अब तो समझ आ गया होगा कि जिस व्यक्ति की महत्वाकांक्षाएं पहाड़ जितनी बढ़ गयी हों, उस पर कभी भरोसा नहीं किया जा सकता। दिल्ली के आठो विधायक केजरीवाल को मुख्यमंत्री बनाने के समर्थक नहीं थे, उन्होंने बड़े बे मन से हाईकमान के आदेश को माना था। किन्तु पूरे देश के कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को पार्टी का निर्णय पसंद नहीं आया था, क्योंकि जिस व्यक्ति ने पूरे देश में पार्टी की प्रतिष्ठा बिगाड़ने में कोई कसर बाकी नहीं रखी, उसकी ही सरकार बनाना उन्हें जंचा नहीं था। अब सांप निकल जाने के बाद लाठी पिटने से कुछ हांसिल भी होने वाला नहीं है। सिर पकड़ कर रोने के अलावा कांग्रेस के पास कोई चारा ही नहीं बचा है।
केजरीवाल ने बहुत सोच समझ प्रपोगंड़ा कर रहे हैं। वे शीला दीक्षित के धोटालों में हाथ डालना नहीं चाहते, क्योंकि एक आध महीने में उन्हें कुछ भी हाथ लगने वाला नहीं है। वे जानते हैं कि उनकी सरकार की उम्र छ: माह से ज्यादा नहीं है और वे जांच बिठायेंगे उसके परिणाम आने में देर लगेगी। जनता से किये गये वादे भी पूरे करने में सक्षम नहीं है। प्रदेश की वित्तीय हालत बहुत खराब है, लोकलुभावन वादे पूरे करने के लिए पैसा कौन देगा ? बिजली -पानी की दरे तो आवेश में आ कर घटा दी, परन्तु जो उलझने आ रही है उन्हें सुलझा नहीं पा रहे हैं। भारी टीवी प्रचार के माध्यम से भ्रष्टाचार के विरुद्ध हैल्पलाईन  की घोषणा तो कर दी, परन्तु परिणाम सिफर ही रहा। पूरे देश के किसी भी कार्यालय में कोई भी अफसर कहीं पर भी सीधे रिश्वत नहीं लेता है। सारा काम दलालों के माध्यम से होता है, अत: कानूनों में सुधार किये बिना रिश्वत नहीं रोक सकते। भ्रष्टाचार रोकने का केजरीवाल का दावं भी फैल हो गया है। वे अब तक एक भी भ्रष्टाचार का प्रकरण पकड़ नहीं पाये हैं।
अपने अनुभवहीन नौसिखिये मंत्रियों के बल पर केजरीवाल सरकार चलाने में असमर्थ हैं। दूसरी ओर उन्हें मालूम है कि बिन्नी कांग्रेसी पृष्ठभूमि के व्यक्ति है, जो पार्टी का विभाजन भी कर सकते है। परन्तु सारा खेल लोकसभा के चुनावों के बाद खेला जायेगा, जब केजरीवाल का तिलस्म समाप्त हो जायेगा और चौबेजी से छब्बे जी बनने के लालच के कारण दूबे जी ही बन कर रह जायेंगे। निष्कर्ष यह है कि केजरीवाल सरकार की उम्र अधिक नहीं है। कांग्रेस किसी भी क्षण समर्थन ले सकती है और केजरीवाल की स्वयं की पार्टी टूट सकती है।
दिल्ली में सरकार बनाने से उन्हें इतना मजा नहीं आया, जितना उन्होंने सोचा था। मीडिया भी अब धीरे-धीरे दूर होने लगा था। सभी चेनल उनके समाचारों को कम दिखा रहे थे। जो व्यक्ति मीडिया के भरोसे ही पूरे देश में अपनी छवि चमकाने को व्यथित नज़र आ रहा था, उसे यह सब कुछ सहन नहीं हुआ और अंतत: नये स्टंट की आवश्यकता आ पड़ी। सड़क स्टंट में सफल रहते हैं, क्योंकि सड़कों पर मीडिया के केमरे आ ही जाते हैं। मीडिया के केमरे के सामने झूठ बोलना, अपनी बात पर पलट जाना और कांग्रेस और बीजेपी को मिला हुआ बताने में उन्हें कभी संकोच नहीं होता। आज उन्होंने कुछ मीडिया के समाचार चेनलों को मोदी और कांग्रेस का एजेंट भी बता दिया, क्योंकि उनके झूठ को पकड़ कर वे सबूत दे रहे थे। जबकि उनके चहेते चेनल उनके झूठ को महिमामंडित कर रहे थे।
पूरे देश की जनता केजरीवाल के स्टंट से बोर होने लगी है। वे उन चेनल को बदल देते हैं, जिसमें केजरीवाल से संबंधित खबरे ही आती है। अत: आंदोलन के समर्थन और विपक्ष में जो आंकड़े चेनल जुटाते हैं, वे सभी इन्हीं के लोगो द्वारा भेजे जाते हैं। पूरे देश की जनता उसमें भाग नहीं लेती। समाचार चेनल यदि निरन्तर पूरे देश में घटित हो रहे समाचारों को उपेक्षित कर केजरीवाल के ही समाचार देंतें रहेंगे, तो उनकी टीआरपी बढ़ने के बजाय घटने लगेगी। वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया में इस पार्टी की अत्यधिक सक्रियता है। कई लोग इसी काम में लगे हुए हैं, जो निरन्तर भ्रम और झूठी खबरे देश भर में फैला रहे हैं।
केजरीवाल झूठ, स्टंट, नौटंकी और प्रपोगंड़ा में सिद्धहस्त हो गये हैं। समाचार मीडिया और सोशल मीडिया में अपने प्रचार के लिए भारी धन राशि खर्च कर रहे हैं। फलत: देश विदेश से भारी धन राशि चंदे के रुप में उनके पास आ रही है। यह भी सम्भव है कि जो देश भारत की प्रगति पसंद नहीं करते तथा जो भारत के साथ परम्परागत दुश्मनी निभा रहे हैं, वे भारत में स्थिर और सुदृढ़ सरकार नहीं चाहते है। वे यह भी नहीं चाहते हैं कि कोई योग्य प्रशासक भारत की सरकार का संचालन करें। ऐसी भी आशंका व्यक्त की जा रही है कि उन देशों से इस व्यक्ति को अपनी राजनीति चमकाने के लिए भारी धन राशि दी जा सकती है।
यदि ऐसा होता है, तो यह बहुत ही दुर्भाग्यजनक स्थिति होगी। क्योंकि जो व्यक्ति जिममेदार पद पर बैठ कर अपने स्वार्थ के लिए संवैधानिक संस्थाओं और लोकतांत्रिक परम्पराओं को तोड़ने में बिल्कुल भी संकोच नहीं कर रहा है, हर सांस में झूठ बोल रहा है, उस पर किसी भी तरह से भरोसा नहीं किया जा सकता। अत: देश की सभी राजनीतिक पार्टियों के नेताओं को केजरीवाल के राजनीतिक स्टंट को बहुत गम्भीरता से लेना पहोगा, क्योंकि अब वे सारी हदे पार कर चुके हैं। देश हित में इस व्यक्ति के प्रपोगंड़ा का विरोध करना चाहिये। कहीं ऐसा नहीं हो कि अपने झूठ और स्टंट के बल पर भारतीय जनता को मूर्ख बनाने में सफल हो जाय, जिसका खामियाजा राष्ट्र की सार्वभौमिकता और सुरक्षा को चुकाना पड़े। अभी तो दिल्ली प्रदेश की सरकार को संकट झेलना पड़ रहा है, किन्तु केन्द्र सरकार पर केजरीवाल का नियंत्रण हो गया तो क्या होगा ? इसकी कल्पना से कंप-कंपी छूट जाती है। अच्छा है, कांग्रेस नेताओं की अपनी अनीति जिसे कूटनीति समझ रहें है, उसके दुष्परिणामों को भांप कर इस बिगडै़ घोड़े पर दावं नहीं लगायेंगे। बिगड़े घोड़े निश्चय ही बीच में पटक देते हैं। भारी दुर्घटना से अपने अस्तित्व पर संकट खड़ा करने की जोखिम कांग्रेस नेताओं को नहीं लेनी चाहिये।