Thursday, 12 December 2013

भारत की राजनीति में विष घोल कर पुन: सत्ता पाने की अभद्र कोशिश

राजनीति में अत्यधिक विष घोल कर वातावरण को विषाक्त बनाने से उन्हें आखिर क्या हांसिल हो जायेगा ? क्या ऐसा करने से उनके सारे पाप छुप जायेंगे ? क्या वातावरण के प्रभाव से जनता मूर्छित हो कर उनके पक्ष में मतदान कर देगी ? नहीं ऐसा सम्भव नहीं होगा। हवा के रुख को बदला नहीं जा सकता। सवेरा निश्चित रुप से होगा, क्योंकि आकाश पर चढ़ कर सूर्य को उदय होने से नहीं रोका जा सकता। समय को अपनी मुट्ठी में बंद नहीं किया जा सकता।
मनुष्य हांड़-मांस का पुतला ही है, उसकी शक्तियां अजेय नहीं होती। वह कभी अजातशत्रु नहीं बन सकता। युद्ध में विजय मिल जायेगी, किन्तु पराजित भी होना पड़ सकता है, क्योंकि प्रतिद्वंद्वी भी विजयी होने के लिए ही रण में उतरा है। किन्तु कोर्इ यह समझ बैठे कि हमे पराजित करने का किसी के पास अधिकार नहीं है, तो यह उसका अहंकार है। अहंकार व्यक्ति को हिरणाकस्यप, रावण, कंस और दुर्योधन बना देता है, जिसका अंतत: विनाश निश्चित है।
लोकतंत्र में रक्तपात से सत्ता का हस्तांतरण नहीं होता, क्योंकि किसी को स्थायी रुप से शासन करने का अधिकार नहीं दिया जाता। जो योग्य है, उपयुक्त है, कसौटी पर खरा उतरता है, उसे सेवा का अवसर दिया जाता है। उसे राष्ट्र का मालिकाना हक नहीं सौंपा जा सकता। परन्तु कोर्इ सेवा को ही मालिकाना हक मान बैठता है, इसका मतलब यह हुआ कि वह देश की जनता का मालिकाना हक छीनना चाहता है। क्योंकि लोकतांत्रिक गणराज्य में जनता ही उस गणराज्य की मालिक होती है। जो राजनीतिक दल ऐसा करने की चेष्टा करता है, उसे लोकतंत्र में आस्था नहीं हैं। वह जनता को सत्ता प्राप्ति का माध्यम समझता है, साध्य नहीं मानता । वह जनता की शक्ति को स्वीकार नहीं करता। उसे इस बात का गरुर हो जाता है कि देश पर शासन करने का अधिकार हमारा ही है। यह अधिकार हमसे छीना नहीं जा सकता।
सम्भवत: इसीलिए भारत के एक राजनीतिक दल के नेता देश की जनता को यह समझा रहे हैं कि अमूक व्यक्ति हमे नापसंद है, हम इससे घृणा करते हैं, अत: जनता इसे स्वीकार नहीं करें। शायद ऐसा कहते हुए वे यह भूल जाते हैं कि लोकतंत्र में जनता से आदेश लिया जाता है, जनता को निर्देश नहीं दिया जाता। कौन सही है और कौन गलत, इसका निर्णय लेने का अधिकार जनता के पास है। आप जनता के अधिकार और उसके विवेक को चुनौती नहीं दे सकते।
एक प्रदेश की यदि करोड़ो जनता किसी व्यक्ति के प्रति विश्वास जताते हुए, उसे अपना नेता स्वीकार करती है, तब स्वत: ही उस व्यक्ति का कद विराट हो जाता है। वह सम्मान पाने का अधिकारी है। उसका तिरस्कार व अपमान करना उस प्रदेश की करोड़ो जनता का अपमान करना है, जिसने उसे अपना नेता स्वीकार किया है। किन्तु इस हकीकत को स्वीकार करने में काफी कष्ट होता है। वे यह मानना ही नहीं चाहते कि अमूक व्यक्ति एक प्रदेश का नेता है और उसे यह पद प्रदेश की जनता ने संवैधानिक परम्परा के आधार पर सौंपा है। इस पद को उन्होंने हथियाया नहीं है।
और क्या एक राजनीतिक दल, जिसके पक्ष में देश के करोड़ो मतदाता, मतदान करते हैं, यह अधिकार नहीं है कि देश के प्रधानमंत्री पद के लिए अपना एक उम्मीदवार घोषित करें ? करोड़ो मतदाता वाला राजनीतिक दल यदि किसी व्यक्ति विशेष को अपने दल की  ओर से अधिकृत प्रत्यासी मानता है, उसे जनता से निर्देश लेने की अनुमति देता है, तो इसमें गलत क्या है ? क्या ऐसा करना उस राजनीतिक दल का संवैधानिक अधिकार नहीं है ? क्या एक स्वर में उस व्यक्तित्व को अशोभनयी शब्दावली से संबोधित करना करोड़ो जनता का अपमान करना नहीं है, जो उस पार्टी के साथ जुड़ी हुर्इ है और उसके पक्ष में मतदान करती है ? क्या  एक राजनीतिक दल के नेताओं की ओछी मनोवृति अप्रत्यक्षरुप से देश की जनता को यह समझाने की कोशिश नहीं करती कि देश पर शासन करने का अधिकार हमारा ही है। हम यह अधिकार किसी ओर को नहीं लेने देंगे।
यदि आप सत्ता में हैं,  तो आपके कार्यों की आलोचना करने के आधार पर ही विपक्ष जनता से वोट मांगेगा और जनता से निवेदन करें कि आप एक बार हमें भी सेवा का अवसर दें, हम आपकी कसौटी पर खरे उतरेंगें। क्या ऐसा करना राजनीतिक अपराध की श्रेणी में आता है ? क्या  विपक्ष की आलोचना का सारगर्भित शब्दावली में जवाब देने के बजाय, उस पर कटाक्ष करना उचित है ? क्या उसके नेता को तरह-तरह के अशोभनीय अलंकारों से अलंकृत कर उनकी छवि को जानबूझ कर विद्रूप  करना सही है ? सिद्धान्त: यदि सत्ता पक्ष पुन: सत्ता में आना चाहता है, तो किये गये कार्यों का प्रमाणित विवरण जनता को  दे, अपनी उपलब्धियों के आधार पर जनता से पुन: सेवा का अवसर मांगे । विपक्ष के नेता के विरुद्ध अर्नगल व नींदनीय शब्दावली का प्रयोग करना, उनकी कुत्सिक मन:स्थिति को दर्शाता है, जो यह साबित करता है कि भारत की राजनीति को इन्होंने अपने स्वार्थ के लिए कितनी विषैली बना दिया है।
एक पार्टी के अधिकांश नेता, एक घृणित रणनीति के तहत एक व्यक्ति विशेष की आलोचना करना और उनके द्वारा कहे गये एक -एक शब्द का पोस्टमार्टम कर उन्हें नीचा दिखाने की धूर्त कोशिश करना, क्या यह नहीं दर्शाता कि उनका लोकतंत्र, भारत के सवं​िधान और संवैधानिक संस्थाओं में कोर्इ विश्वास नहीं हैं। वे किसी भी तरह सत्ता पर नियंत्रण चाहते हैं और इसके लिए वे एक हद तक गिर सकते हैं।
मनुष्य सर्वगुण सम्पन्न नहीं होता। जनता के समक्ष बोलते समय कुछ त्रुटियां होना स्वाभिक ही है। इतिहास के बारें में कोर्इ गलत  तथ्य प्रस्तुत करने का मतलब यह नहीं होता कि यह व्यक्ति निकृष्ट है। उसके सारे संवैधानिक अधिकार समाप्त हो गये हैं। पहाड़ सी गलती वह कहलाती है, जब व्यक्ति संवैधानिक पद का दुरुपयोग करते हुए देश के प्राकृतिक संसाधनों को लूटता है। अपने अपराध को स्वीकार नहीं करता हैं। अपराध को छुपाने और दबाने के लिए जांच एंजेसियों का सहयोग लेता है। ऐसे क्षुद्रतम अपराध करने वाले व्यक्ति या उस राजनीतिक दल को पुन: जनता से सत्ता का अधिकार मांगना, किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता।
किसी भी संवैधानिक पद पर नहीं रहने के उपरांत भी किसी व्यक्ति विशेष या एक परिवार के प्रति एक लोकतांत्रिक पार्टी के नेताओं द्वारा अत्यधिक स्वामीभक्ति का सार्वजनिक प्रदर्शन, यह दर्शाता है कि इस पार्टी का लोकतंत्र के बजाय राजतंत्र में ज्यादा आस्था है। ऐसे परिवार के एक सदस्य के लिए शहजादा संबोधन गाली नही कहा जा सकता। इसे लोकतंत्र में राजतंत्र की परम्परा निभाने पर कटाक्ष ही समझा जा सकता है। किन्तु प्रतिकार में  बोले गये रावण, दैत्य, भष्मासुर आदि अनेक अलंकारों को क्या उपयुक्त और शोभनीय कहा जा सकता है ?
यदि कोर्इ राजनेता अपने व्यक्तित्व के बल पर जनता में भरोसा जगाने में समर्थ लगने लगता है, तो उसे रोकने एक ही उपाय है- उसके समक्ष अपने किसी प्रभावशाली व्यक्तित्व को मैदान में उतारना। किन्तु आपके पास ऐसा कोर्इ व्यक्तित्व है ही नहीं और यदि है तो वह बहुत बौना है, अत: एक अन्वेषण टीम बना कर प्रतिद्वंद्वी व्यक्तित्व की छोटी सी गलती को पहाड़ बता कर मीडिया के माध्यम से खूब प्रचार करना, एक तरह से युद्ध आरम्भ होने के पहले ही हार स्वीकार करना ही है, जिसे खीझ और बौखलाहट कहा जा सकता है।