Monday, 2 December 2013

तरुण तेजपाल की तरह भ्रष्टचारियों को जेल भेजने का अब हमे कठोर कानून चाहिये

दिसम्बर 2012 का स्वत:स्फूर्त व नेतृत्व विहीन युवा जन आंदोलन ने भारतीय राजनेताओं अचंभित कर दिया था।  कड़कती ठंड में उन पर डाली गयी पानी की बौछारों को सहते हुए वे रात में भी सड़कों पर डटे हुए थे। युवाओं ने सत्ता के अहंकार और निष्ठुरता को चूर-चूर कर रख दिया था। स्त्री प्रताड़ना को सहने का आदि भारतीय समाज भ्रष्ट पुलिस की निरंकुशता से परिचित था और जानता था कि पुलिस बिक जायेगी और निर्भया का ऐसा लच्चर केस बनायेगी कि कुछ ही दिनों  में अपराधी छूट जायेंगे। युवाओं को  संवेदनाविहीन पुलिस और राजननैतिक व्यवस्था से न्याय की आशा नहीं थी।
अन्ना ह्जारे  और बाबा रामदेव के जनआंदोलन को निष्ठुरता और निर्ममता से दबाने वाला सत्ताधारी राजनीतिक दल पूरे देश में यकायक फैले इस जन आंदोलन से घबरा गया। उसे लगा यदि अगले लोकसभा चुनावों में भारत का युवा वर्ग उसके विरुद्ध हो गया, तो सत्ता उसके हाथ से चली जायेगी। इसी भय से विवश हो कर स्त्री प्रताड़ना के विरुद्ध कड़ा कानून बनाने के लिए बाध्य होना पड़ा। संसद की मंजूरी मिल गयी। भारत के किसी भी राजनीतिक दल ने इस कानून का विरोध नहीं किया।
संयोग से इस कठोर कानून की चपेट में सक ऐसा सख्श आ गया, जो उंचे रसूख वाला था। एक सत्ताधारी दल की राजनीतिक तिकड़म का सहयोगी था। धूर्तता को पत्रकारी पेशे के साथ घालमेल कर उसने अपार धन कमाया था। उसने अपराध किया। अहंकार के साथ इसे स्वीकार किया। इस गलतफहमी में निश्चिंत हो गया कि इस देश में उसका कोर्इ कुछ नहीं बिगाड़ सकता। उससे जो कृत्य हो गया, सो हो गया, अत: जिन्हें उसने उपकृत किया था, वह नेताबिरादरी उसके पक्ष में खड़ी हो जायेगी और आगे आ कर उसे बचा लिया जायेगा। आखिर बड़े और रुतबे वाले लोग थोड़े ही किसी जेल में बंद हो सकते हैं।
इसी भरोसे और गरुर के साथ  भारत के भ्रद समाज का अभद्र जानवर -तरुण तेजपाल हैकड़ी और हैसियत का रंग दिखाता हुआ दिल्ली से गोवा गया था। उसे पूर्ण विश्वास था कि उसका कुछ नहीं बिगड़ेगा, क्योंकि दिल्ली का एक ताकतवर मंत्री उसके बचाव में उतर आयेगा। उसके खिलाप की जा रही कार्यवाही को विरोधी दल का षड़यंत्र माना जायेगा और भारत के शीर्षस्थ राजघराने की ताकत उसे अंतत: बचा लेगी।
तरुण तेजपाल के अहंकार और उनके अजीब आत्मविश्वास को पूरा देश भांप गया। जनमानस उद्वेलित हो गया। चारों तरफ से आवाजे़ उठने लगी- क्या भारत के राजनेताओं के खाने के और दिखाने के दांत अलग-अलग होते हैं ? सभी की जबान को लकवा क्यों मार गया है ? नये राजनीतिक दल के वे महाशय जो निर्भया आंदोलन का लाभ उठाने के लिए युवाओं के साथ सड़को पर उतर गये थे और बहुत जोर-शोर से स्त्री प्रताड़ना के पक्ष में दलिले दे रहे थे, वे भी क्यों चुप हो गये ? सभी की चुप्पी का एक ही कारण था- भाजपा तेजपाल के कृत्य का विरोध कर रही थी। भाजपा याने सांम्प्रदायिक पार्टी। याने हिन्दुत्व की समर्थक पार्टी। इसलिए जिस न्यायोचित प्रकरण का भाजपा समर्थन करेगी, वह मामला कैसा भी हो उसका हम समर्थन नहीं करेंगे, चाहे यह मामला किसी अबला नारी के सम्मान, उसकी आबरु और स्त्री उत्पीड़न के विरुद्ध उठायी गये उसके साहसिक निर्णय  से जुड़ा हो। चाहे वह मामल उस कानून से जुड़ा हो, जिसे भारतीय संसद ने पास किया था।
कानून की लाख बाजीगरी दिखाने के बाद भी तरुण तेजपाल की जमानत याचिका खारिज कर दी गयी। उन महाशय को हवालात में दिन गुजारने पड़ रहे हैं। पंच सितारा संस्कृति के जीव के चेहरे के रंग तब उडे़ हुए थे, जब उन्हें निर्णय सुनाया गया था। वे ऐसी जगह कैसे रह सकते हैं, जहां का जीवन स्तर उनके लिए नारकीय हो। शायद उस अभद्र पुरुष ने दुस्साहस करते हुए स्वपन में भी नहीं सोचा था कि उसे ऐसे दिन भी देखने पड़ सकते हैं। उसे ऐसा अहसास था  कि वह अपने रुतबे और ताकत से एक प्रताड़ित अबला नारी की आवाज वह दबा देगा। सम्भवत: पूर्व में भी उसने ऐसा किया होगा और किसी युवती की दुर्बलता का लाभ उठा कर समर्पण के लिए बाध्य किया होगा। क्योंकि ऐसे दुष्कर्म वही व्यक्ति करता है, जो आदतन ऐसे कृत्य करने का  अनुभवी होता है।
तरुण तेजपाल प्रकरण से हमें एक नसीहत मिलती है- क्या स्त्री उत्पीड़न के विरुद्ध बनाये गये कानून की तरह भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए भारतीय संसद ऐसा कोर्इ कठोर कानून बना सकती है, जिससे बड़े-बड़े तीसमार खां अपराधियों को जेल की सलाखों के भीतर ठूंसा जा सके।  वर्तमान भारतीय संसद का जो स्वरुप है, उससे   तो ऐसी आशा नहीं की जा सकती, क्योंकि इसमें एक से बढ़ कर एक भ्रष्टाचार में आंकठ डूबे व्यक्ति बैठे हुए हैं।
भारतीय संसद का स्वरुप बदला जा सकता है- यदि 2014 के लोकसभा चुनावों के पूर्व एक ऐसा युवा जनआंदोलन पूरे देश में फैले, जो यह मांग रखे कि हम उसी राजनीतिक दल और उसके नेता को समर्थन करेंगे, जो भारत में भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए कठोर कानून बनायेगा। हम ऐसा कानून चाहते हैं, जिसके अनुपालन से उन सफेदपोश राजनेता और नौकरशाह कानून के लपेटें में आ कर जेल भेजे जा सकें, जिन्होंने बेबाक हो कर देश के अरबों रुपये लूटे हैं।
भारतीय संसद ऐसा कानून बनाये जिससे विदेशों में जमा काला धन वापस लाया जा सके और जिन अपराधियों ने यह कृत्य किया है, उन्हें कठोर दंड़ से दंड़ित किया जाय। पूरे देश में फैली भ्रष्टाचारियों की  बैमानी संपति को जब्त किया जा सके।
भारत आर्थिक ताकत तभी बन सकता है, जब भ्रष्टाचार पर पूर्ण अंकुश लगाया जा सके, क्योंकि भ्रष्टाचार के उन्मूलन से ही निर्धनता का अंधकार मिटाया जा सकता है। देश का तीव्र औद्योगिक विकास कर उसे समृद्धिशाली राष्ट् बनाया जा सकता है। भारतीय युवा शक्ति अपनी ताकत भारत से सारे राजनीतिक समीकरण को बदल सकती है। जो राजनीतिक दल जातिगत समीकरणों के सहारे चुनाव जीतते हैं और भ्रष्टाचार को सींचते हैं, उन सभी राजनीतिक दलों का राजनीति से अवसान हो जायेगा। इन राजनीतिक दलों से जुडे़ अपराधी वृति के व्यक्ति चुनाव हार जायेंगे। ऐसा सम्भव होने पर ही भारतीय संसद का स्वरुप बदला जा सकता है।
अत: निर्भया आंदोलन की तर्ज पर ही अब पूरे देश में भ्रष्टाचार उन्मूलन का आंदोलन खड़ा किया जा सकता है। इस आंदोलन का नारा होगा – हम भारतीय हैं, भारतीयता ही हमारी जाति है। भारतीयता ही हमारा धर्म हैं। हर भारत की राजनीति का शुद्धिकरण करने के लिए सब एक हैं। हमें ऐसी संसद चाहिये जो भ्रष्टाचार उन्मूलन के कठोर कानून बना सकें। हमारा समर्थन उसी राजनीतिक दल को होगा, जो शपथ ले कर यह घोषणा करें कि यदि हमारा दल सत्ता में आया और उसे जनता ने पूर्ण बहुमत दिया, तो हम भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोर कानून बनायेंगे और सभी अपराधियों को जेल भेजेंगें।
यदि ऐसा सम्भव हो पायेगा तो भारत की तकदीर बदल जायेगी। तरुण तेजपाल की तरह सारे अपराधी चाहे वो कितने ही ताकतवर क्यों न हो, अपनी बची हुर्इ जिंदगी जेलों में गुजारेंगे।