Tuesday, 12 November 2013

आम आदमी पार्टी का जन्म और अन्ना के जन आंदोलन की अन्तयेष्टि

भारत की राजनीतिक व प्रशासनिक व्यवस्था भ्रष्टाचार में आंकठ डूबी हुर्इ है। व्यवस्था के प्रति जनता में व्यापक असंतोष है। वह व्यवस्था परिवर्तन के लिए प्रतिबद्ध दिखार्इ देती है। अन्ना का जनआंदोलन वस्तुत: भ्रष्टाचार उन्मूलन के लिए सरकार को बाध्य करना था। जन लोकपाल बिल का मसौदा सरकार को दे कर उन्होंने मांग रखी थी कि ऐसा लोकपाल बिल संसद पास करें, ताकि भ्रष्टाचार पर कुछ हद तक अंकुश लगाया जा सके।
सरकार की हठधर्मिता, अहंकार और छल ने आंदोलन को उग्र रुप दे दिया। पूरे देश का ध्यान अन्ना के जन आंदोलन की ओर आकृष्ट हो गया था। बिना किसी राजनीतिक दल के सहारे खड़ा किया गया यह आंदोलन व्यवस्था के प्रति आम भारतीय के आक्रोश की अभिव्यक्ति का माध्यम बन गया था। वयोवृद्ध गांधीवादी नेता में महात्मागांधी और बाबू जय प्रकाश नारायण की छवि दिखार्इ दी थी। अन्ना की सादगी। उनके सरल व बेबाक विचारो ने भारतीय जनमानस को काफी प्रभावित किया था।  भ्रष्टाचार के विरुद्ध निरन्तर संघर्ष करने वाले अन्ना एक ऐसे योद्धा थे, जो कभी किसी राजनीतिक दल के समक्ष झुके नहीं थे और न ही उन्होंने किसी भी राजनीतिक दल के साथ पक्षपात किया था। इस योद्धा ने हर लडार्इ जीती थी, परन्तु दुर्भाग्य से अपने जीवन की सर्वाधिक महत्वपूर्ण लड़ार्इ हार गया।
प्रश्न उठता है कि अन्ना आंदोलन का ऐसा हश्र क्यों हुआ ? आज अन्ना कहां है ? वे पूरे देश में घूम कर चुपचाप क्यों बैठे हैं ? क्या पूरे देश में भ्रष्टाचार का उन्मूलन हो गया ? क्या बिना लोकपाल बिल के ही भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार आ गया ? क्या देश भर के किसी सरकारी कार्यालय में अब रिश्वत नहीं ली जाती है ? अन्ना अभिशप्त व पीड़ित भारतीय जन की आवाज बने थे, उनकी आवाज यकायक क्यों बंद हो गयी ? उन्हें किसने धोखा दिया ?
इन सभी प्रश्नों का उत्तर एक ही है- कुछ व्यक्तियों का एक समूह जो अन्ना आंदोलन से जुड़ा हुआ था, अन्ना आंदोलन की दिशा बदल दी। अपनी अतृप्त राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए  पवित्र जन आंदोलन को राजनीति के दलदल में घसीट ले गये। ऐसे दलदल में धंसने की अन्ना की इच्छा नहीं थी। इस समूह की गतितिविधयों से क्षुब्ध हो कर देश के प्रतिष्ठित नागरिक अन्ना आंदोलन से अलग हो गये। अन्ना अकेले हो गये। उफान पर पहुंचे अन्ना आंदोलन पर पानी की बौछार डाल कर के उसके अपने ही आदमियों ने ठंड़ा कर दिया। आंदोलन से उन्होंने एक नयी राजनीतिक पार्टी को जन्म दिया और अन्ना आंदोलन की अन्तयेष्टि कर दी।
काश ! अन्ना आंदोलन सत्ता के अंहकार की चोट खा कर तिलमिलाते हुए दिल्ली से भारत के शहरो और गांवो की ओर मुड़ जाता, तो आज भारत की राजनीति की फ़िजा बदल जाती। कुछ नहीं करना था, एक मशाल पहुंचानी थी, जनता तो उस मशाल के पीछे-पीछे चलने को स्वत: ही आतुर दिखार्इ दे रही थी। तीन वर्षों में अन्ना आंदोलन भारत के सभी गांवों और शहरों में अपनी जड़े जमा लेता। सरकारी कार्यलयों का भ्रष्टाचार भयभीत हो जाता। राजनीतिक दल जिस ज़मीन पर खड़े हैं, वह जमीन हिलने लग जाती। 2013 के अंत तक राजनीतिक दलों की स्थिति ऐसी हो जाती कि वे बिना अन्ना की शरण में आयें चुनाव नहीं जीत पातें। उनके समक्ष शर्ते रखी जाती- हम समर्थन करेंगे, बशर्तें उस व्यक्ति को चुनाव में उतारों, जिसकी साफ सुथरी छवि हों। वह व्यक्ति भ्रष्टाचार उन्मूलन का संकल्प लें। यदि हमारा समर्थन मिल जायेगा, तो उसे चुनावों में धन बहाने की जरुरत नहीं पडे़गी। जो राजनीतिक दल हमारा विश्वास जीतेगा, कसौटी पर खरा उतरेगा, प्रदेश में उसकी सरकार बन जायेगी। परन्तु उस सरकार पर जनता का अप्रत्यक्ष नियंत्रण रहेगा।
अन्ना आंदोलन की व्यापकता से भारत की राजनीति का शुद्धिकरण सम्भव था। जो लोग यह सोचते हैं कि सारे राजनीतिक दल भ्रष्ट हैं, इसलिए हम नया राजनीतिक दल बना कर भारत की राजनीति का शुद्धिकरण कर देंगे, एक छलावा है। राजनीति का शुद्धिकरण नये राजनीतिक दल बनाने से नहीं होता है, अपितु जन जागृति के समक्ष राजनीतिक दलों के सर्मपण से होता है। राजनीतिक दलों को भारत की जनता ने बनाया और मजबूत किया है, उन्हें समाप्त नहीं किया जा सकता। राजनीतिक दलों को समाप्त करने का अधिकार उस जनता के पास है, जो उन्हें वोट देती हैं, कुछ लोगों के पास नहीं,  जो अपनी पार्टी के पक्ष में वोट पाने के लिए सारी पार्टियों  के अस्तित्व को नकारते हैं।
अन्ना का जन आंदोलन राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में छेड़ा गया था, उसका उद्धेश्य एक छोटे से प्रदेश को भ्रष्टाचार से मुक्त करना नहीं था। अन्ना ने अपना जनलोकपाल बिल भारतीय संसद को पास कर उसे कानून का रुप देने का अनुरोध किया था। उनका जनलोकपाल बिल मात्र दिल्ली प्रदेश की जनता के लिए नहीं था। फिर अन्ना के आंदोलन से निकले लोगों ने सिर्फ दिल्ली प्रदेश के लिए ही राजनीति पार्टी क्यों बनायी ? सिर्फ इसलिए नहीं कि दिल्ली विधानसभा का क्षेत्र बहुत छोटा है और उसमे सिर्फ सत्तर विधान सभा की सीटें हैं ? इस लघु प्रदेश को अपना कर्मक्षेत्र बनाने से आसानी से चुनाव जीता जा सकता है, क्योंकि प्रदेश के अधिकांश वोटर पढ़े लिखे और मध्यमवर्गीय परिवार से संबंध रखते हैं। अति चुतर लोगों ने बहुत चतुरार्इ से दिल्ली की जनता को लुभाने की रणनीति बनायी है।
पानी और बिजली की समस्या से पूरा देश पीड़ित है, फिर क्यों मात्र दिल्ली में ही इसे प्रभावी ढंग से उठाया गया ? भाजपा का प्रभाव कर्इ प्रदेशों में हैं। कुछ प्रदेशों में उसकी सरकारें भी है। फिर मात्र दिल्ली में ही भाजपा का विरोध करने का आखिर क्या मकसद है ? विगत पंद्रह वर्षों से दिल्ली में कांग्रेस की सरकार काम कर रही है। निश्चय ही जनता की समस्याओं के लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार है, भाजपा नहीं। फिर भाजपा का तीव्र विरोध किस आधार पर किया जा रहा है ? क्या इसलिए नहीं कि सरकार के कामकाज से असंतुष्ट जनता के वोटों को भाजपा की ओर जाने से रोका जाय और उन्हें अपने पक्ष में मोड़ा जाय ? सारी राजनीतिक पार्टियां भ्रष्ट है,  इसलिए हमें चुनों, क्योंकि हम भ्रष्ट नहीं है। आपने र्इमानदारी का प्रमाण-पत्र का कहां से प्राप्त कर लिया, जब कि आपने कभी शासन ही नहीं किया है ?
एक पार्टी का जन्म भ्रष्टाचार के विरुद्ध छेड़े गये जन आंदोलन के गर्भ से हुआ है। अत: उस पार्टी को जनता से वोट मांगने के लिए भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था का ही नारा देना चाहिये। इनके नेताओं को तुष्टिकरण की पैंतरेबाजी अपनाने की कहां जरुरत पड़ रही है ? किसी विवादास्पद मुस्लिम नेता के शरण में जाने की कहां जरुरत पड़ गयी ? क्या दिल्ली प्रदेश की मुस्लिम जनता भ्रष्टाचार और कुशासन से पीड़ित नहीं है ?
पार्इ का पार्इ का हिसाब वेबसार्इट पर देख लेने का दावा करने वाली पार्टी के नेताओं को विदेशियों से चंदा ले कर कानून तोड़ने की कहां जरुरत आ पड़ी ? जो यह दावा करते हैं कि हमारा हिसाब किताब बहुत साफ सुधरा है, उन्हीं लोगों द्वारा दिया गया एक करोड़ का चेक अन्ना ने क्यों लौटाया ? यह धन राशि अन्ना के आंदोलन के दौरान एकत्रित की गयी थी। अन्ना को इसमें कोर्इ गड़बड़ दिखार्इ दे रही थी, इसलिए उसे लौटाया । सरकारी महकमे में ऊंचे ओहदे पर काम करने वाले सरकारी अफसर को हिसाब दिखाने और छुपाने में महारथ हांलिस होता है।
एक नयी जन्मी पार्टी को जनता वोट देगी। दिल्ली विधानसभा की सीटे उपहार में दे देगी। समय इनकी असली सूरत और नीयत से देश को परिचय करा देगा। किन्तु एक जन आंदोलन के उफान को शांत करने का जो इन्होंने अक्षम्य अपराध किया, उसे जनता कभी क्षमा नहीं करेगी।