Thursday, 14 November 2013

लोकतंत्र को हमें ही जीवंत बनाना है, ताकि खुशहाल भारत का निर्माण किया जा सके


लोकतंत्र को हमें ही जीवंत बनाना है, ताकि खुशहाल भारत का निर्माण किया जा सके

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यदि आप सार्वजनिक जीवन में हैं, तो अब वह समय आ गया है कि आपको गम्भीरता से सक्रिय हो जाना चाहिये। और यदि आप नहीं है, तो आपको देश हित में सार्वजनिक जीवन में आना चाहिये। यदि आपकी राजनीति में रुचि नहीं है, तो आपको रुचि लेनी चाहिये और जो लोग राजनीति में हैं, उन पर कड़ी नज़र  रखनी चाहिये।  देश की दुर्दशा को देख कर यदि आप मौन है, तो मुखर बन जाईये, क्योंकि आपका मौन देश को काफी क्षति पहुंचा रहा है। आपकी निष्क्रियाता से न केवल आपको हानि हो रही है, वरन इसका प्रभाव आपकी संतति के भविष्य पर भी पड़ रहा है। अत: हमें जागना है और हमारे पास जो सोये हुए हैं, उन्हें भी जगाना है। लोकतंत्र के सुफल तभी मिलते हैं, जब उस देश के नागरिक सजग प्रहरी बन कर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करते हैं। जागरुक नागरिक ही लोकतंत्र को जीवंत बनाते हैं, जिम्मेदार बनाते हैं और जनप्रतिनिधियों को सुशासन देने को बाध्य कर सकते हैं।
विषम राजनीतिक व आर्थिक परिस्थितियों को सुलझाने के लिए नागरिकों की सहभागिता की आवश्यकता महसूस की जा रही है। अब वह समय नहीं रहा है कि देश को पूरी तरह किसी राजनेता, राजनीति दल या गठबंधन के भरोसे छोड़ कर हम निशिंचत बैठे रहे। केवल वोट दे कर अपने कर्तव्य की इतिश्री करना ही पर्याप्त नहीं है। राजनेता और उनकी कलुषित राजनीति ने हमे काफी क्षति पहुंचाई है और पहुंचा रहे हैं। हमें इस कलंक से राष्ट्र को मुक्त कराना है। परन्तु इसके पहले हमें अपनी धार्मिक, जातीय व प्रान्तीय संकीर्णता से ऊपर उठना है। यदि हम अपने आपको रुढिवादी मानसिकता  से मुक्त नहीं कर पायें,  तो राजनीति में भ्रष्ट आचरण वाले लोग आते रहेंगे, प्रभावी होते रहेंगे, हमारी दुर्बलताओं का लाभ उठाते रहेंगे और हमे आपस में बांट कर सता हासिंल करते रहेंगे  और गलत तरीके अपना कर धन कमाते रहेंगे। हम कुछ नहीं कर पायेंगे। हम उनकी करतूतों को असहाय हो कर देखते रहेंगे, क्योंकि हमने ही उन्हें वोट दे कर आगे भेजा है। लोकतंत्र का स्वरुप उस देश की जनता ही बनाती है। यदि जनप्रतिनिधि सुशासन देने में असमर्थ रहते हैं, तो निश्चय ही हमने उन्हें चुनने में गलती की है।
देश को  प्रशासनिक कुशासन का अभिशाप झेलना पड़ रहा है। हमें आज एक ऐसे चमत्कारिक नेतृत्व की जरुरत है, जो सभी को साथ ले कर चल सके। जो राजनीति का शुद्धिकरण कर सकें और ऐसी परिस्थतियां उत्पन्न करें, जिससे अच्छे व्यक्तियों का राजनीति में प्रवेश हो। यह तभी सम्भव है कि हम राजनीतिक दलों को बाध्य करें कि वे ऐसा नेतृत्व खोजें, जो सर्वत्र स्वीकार्य हों,  तपस्वी मनोवृति का हो, देश को सुशासन देने का संकल्प ले। यदि कोई भी राजीनतिक दल ऐसा व्यक्तित्व देने में समर्थ हो जाता है, तो एक बार पूरे देश को उस राजनीतिक दल के साथ जुड़ जाना चाहिये। यदि   राजनीतिक दल ऐसा नहीं कर पाता है, तो देश की जनता को नेतृत्व खोज में लग जाना चाहिये।
राजनेता और सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्ट आचरण से पूरा देश उद्वेलित है। भ्रष्टतंत्र की कब्रो से मरे मुर्दे उखाड़ कर और सड़को पर ढ़ोल नगाडे़ बजाने से भ्रष्टाचार पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है।  जब सता के सर्वोच्च शिखर पर बैठे व्यक्ति ही भ्रष्ट हैं और उन्हें भ्रष्ट आचरण से कोई परहेज नहीं है, तो हम चाहें जितना शोर करें, उनकी सेहत पर  असर पड़ने वाला नहीं है। व्यवस्था परिवर्तन के लिए किया गया सार्थक जन आंदोलन ही इस समस्या का एक मात्र उपाय है। परन्तु आंदोलन को सफल बनाने के लिए राजनीतिक दलों को जोड़ने से परहेज नहीं करना चाहिये। जिस राजनीतिक दल में भ्रष्ट हाथियों की भरमार है, वे तो वैसे भी जुडे़गे ही नहीं, किन्तु जिनमे छोटी-छोटी चिंटियां ही हो, उन्हें अपने साथ लेने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिये। भारतीय राजनीतिक दलों और उसके नेताओं का देश भर में व्यापक प्रभाव है, इनको साथ लिये बिना कोई आंदोलन खड़ा नहीं किया जा सकता। हां, यह अवश्य है कि हमें उन्हीं दलों को साथ लेना चाहियें, जो सुधरने का संकल्प लें और अपना पूर्ण शुद्धिकरण कर दें।
जीवंत लोकतंत्र वह होता है, जिसमें खुलापन हो। वैचारिक द्वंद्व हो। यदि कोई सोच लोकतंत्र को संकीर्ण बना देती है और सच्चाई से उसे अलग कर देती है, तो यह त्रासद स्थिति होती है। किसी राजनीतिक दल में चाटुकारों की भरमार हो  और दुर्भाग्य से ऐसे दल के नेता के पास सता की कमान आ जाती है, तो स्वत: ही  असामन्य परिस्थितियां निर्मित हो जाती है। लोकतंत्र में विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व विचारधारा महत्वपूर्ण होती है। विचारों का आदान-प्रदान होता है। विचारों का मंथन और विश्लेषण होता है। सार्थक बहस होती है। इस बहस के आधार पर सामुहिक सहमति से जो निर्णय लिया जाता है, वहीं सिद्धान्त बनता है। लोकतंत्र में किसी व्यक्ति विशेष का कोई महत्व नहीं होता और उसका कोई विचार या निर्णय तब तक सिद्धान्त नहीं बनता, जब तक कि वह उक्त प्रक्रिया से नहीं गुजरता है। लोकतंत्र में कभी आज्ञा नहीं दी जाती। आज्ञाकारी अनुचर प्रवृति को निषेद्ध माना जाता है।
यदि किसी लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में राजशाही जैसी शैली मान्यता प्राप्त कर लेती है, तब समझ लेना चाहिये कि यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है और देश को कई अप्रिय व असमान्य परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। इस समय भारत की सता एक परिवार के हाथों में केन्द्रीत हो गयी है।  इस परिवार के सदस्यों की बोद्धिक क्षमता का परिचय हमें उनके द्वारा दिये गये भाषणों में मिलता है। सता के केन्द्रीयकरण से कई दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं, जो लोकतांत्रिक शासन प्रणाली के लिए शुभ नहीं कहे जा सकते।
सरकार से जुड़े नेताओं के आचरण पर और सरकार की नीतियों पर पूरा देश व मीडिया ध्यान रखता है। भारतीय संविधान ने नागरिकों को विचारों की अभिव्यक्ति का मौलिक अधिकार दे रख है। अत: कोई भी नागरिक किसी भी राजनेता के आचरण के संबंध में प्रश्न पूछने अधिकार रखता है। इसे किसी भी तरह से अपराध नहीं ठहराया जा सकता।  सामान्यत: जिस व्यक्ति के आचरण को ले कर प्रश्न किया जाता है, उसे स्वयं ही शालिनता से तार्किक आधार पर उत्तर दे कर, उस नागरिक को संतुष्ट करना चाहिये।  परन्तु जिससे प्रश्न किया जाता है, वह व्यक्ति तो  अपनी ओर से कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता है, किन्तु उसके समर्थन में कई व्यक्ति दौड़े आते हैं और आक्रामक शैली में सार्वजनिक रुप से धमकाते हैं, जैसे उसने कोई संगीन अपराध कर लिया हो। उनकी भाव-भंगिमा यही दर्शाती है कि उनके नेता भगवान है और उनके  भगवान के विरुद्ध कुछ भी कहने की जो हिम्मत करेगा, उसे हम देख लेंगे।
विश्व में जहां भी लोकतांत्रिक शासन प्रणाली है, वहां ऐसी असामान्य स्थिति नहीं है। इसे किसी भी तरह से लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं कहा जा सकता। देश की जनता को आगे बढ़ कर लोकतंत्र को राजशाही में परिवर्तित करने के कुत्सित प्रयास को निष्फल करना चाहिये, अन्यथा हम स्वस्थ लोकतांत्रिक परम्पराओं के स्थान पर अप्रत्यक्षरुप से राजतंत्रीय परम्पराओं को मान्यता दे देंगे।