Monday, 11 November 2013

सामंतशाही के प्रति अंधश्रद्धा और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अनास्था

वही लोकतंत्र जीवंत बनता है, जिसकी कमान ऐसे व्यक्तियों के हाथों में होती है, जो जमीन से जुड़े रहते हैं। अपनी विलक्षण प्रतिभा से करोड़ो लोगों का विश्वास जीतते हैं। दिलों को आपस में जोड़ते हैं। सभी को साथ ले कर आगे बढते हैं। कर्म, निष्ठा, लगन और प रिश्रमसे वे शिखर पर पहुंचते हैं। वहां पहुंचाने में उनसे जुड़े जनसमूह की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। वे सदैव उस जनता के ऋणि रहते हैं, जिसने उन्हें शिखर पर पहुंचाया। वे जनता के हितों के प्रति संवेदनशील बने रहते हैं।
भारत की एक शीर्षस्थ राजनीतिक पार्टी, जिसका अपना एक स्वर्णिम इतिहास रहा है और जो अधिकांश समय शासन में रही है, जमीन से जुड़े नेताओं का अकाल भोग रही है। यही कारण है कि इसका आकार निरन्तर सिकुड़ रहा है। देश को कर्इ प्रतिभाशाली राष्ट्रीय नेता देने वाली पार्टी, नेताविहिन हो कर ऐसे मार्ग पर चल रही है, जिस पर यदि आगे बढ़ती रही, तो निश्चय ही एक दिन अपनी पूर्ण आभा खो देगी।  तब राष्ट्रीय पार्टी  नहीं, एक परिवार की निजी धरोहर पार्टी कही जायेगी।
देश व समाज के प्रति नहीं, एक परिवार के प्रति पूरी निष्ठा दर्शाने वाले अति चालाक व धूर्त व्यक्ति, जिनका कोर्इ जनाधार नहीं है, एक ऐतिहासिक राजनीतिक पार्टी, जिसने भारतीय लोकतंत्र को जन्म दिया, उस लोकतांत्रिक पार्टी का पूर्णतया राजतंत्रीयकरण करने पर प्रतिबद्ध दिखार्इ दे रहे हैं। जनता से जुड़ कर आगे बढ़ने के बजाय एक परिवार पर पूर्णतया अपने आपको पराश्रित बना दिया है। जानबूझ कर एक ऐसे घोड़े पर दाव लगा रहे हैं, जिसमें इतनी क्षमता नहीं है कि एक मुश्किल रेस को जीत सकें।
परन्तु ऐसा करने के अलावा उनके पास कोर्इ चारा भी नहीं है। वे जनता से जुड़ कर अपने परिश्रम व कर्म से सत्ता सुख भोगना नहीं चाहते, वरन उन्होंने  एक परिवार से जुड़ कर सत्ता का सुख भोगने का शार्ट कट ढूंढ लिया है। परिवार के प्रति अंधश्रद्धा से ही वे अपना राजनीतिक भविष्य चमकाना चाहते हैं। एक ऐसी पार्टी जिसकी जड़े पूरे देश के प्रत्येक गांव और शहर में हैं, ऐसा हश्र होगा, इसकी किसी ने कल्पना ही नहीं की थी।
जनतंत्र में जननायक वह होता है, जो अपना पूरा जीवन जनसेवा के लिए समर्पित कर देता है। वह जनता के बीच रहता है, जनता से जुड़ा रहता है, उसके सुख-दु:ख में सहभागी बनता है। उसका चिंतन जनता के लिए होता है। उसके कर्म में जन कल्याण का भाव छुपा रहता है। उसके पास तप और त्याग का बल आ जाता है, जिससे उसकी वाणी में ओज आ जाता है। उसकी वाणी से जो विचार प्रकट होते हैं, उसीसे प्रेरित हो कर  जनसमूह भावात्मकरुप से उससे बंध जाता है। जनसमूह मंत्रमुग्ध सा उसके पीछे-पीछे चल पड़ता है। उससे जुड़ा हुआ जनविश्वास उसे असीम शक्तियां देता है, जिससे वह सारी बाधाओं को पार कर  सता के शिखर पहुंच जाता है। वह कष्ट सह कर जमीन से शिखर पर पहुंचता है, वह जमीनी हकीकत से रुबरु होता है। कंकरीली, कंटीली व फिसलनवाली कठिन चढ़ाई से उसे जो अनुभव प्राप्त होता है, वही उसकी सफलता की कहानी होती है। दुर्गम रास्तों से जो शिखर पर पहुंचते हैं, उन्हें शिखर से फिसल कर जमीन पर गिरने का भय नहीं रहता, क्योंकि यदि वे फिसल भी गये, तो फिर चढ़ने की क्षमता रखते हैं।
किन्तु राजतंत्र में जन नायक बनने के लिए जनता से जुड़ना आवश्यक नहीं रहता। जनता का विश्वास जीतने की जरुरतत नहीं रहती।  क्योंकि राजतंत्र में जनता पर शासन करने का वे अपना अधिकार समझते हैं। वे हमेशा दरबारियों से गिरे रहते है। वे जन नायक नहीं होते, परन्तु दरबारी उसे जन नायक बना देते है। जनता उसके पीछे-पीछे नहीं चलती। जनता को उसके पीछे-पीछे चलने के आदेश दिये जाते हैं। वे राजप्रसाद में बैठ कर अपने दरबारियों से जनता के बारें में जानकारी जुटाते है। वे स्वयं विचारक नहीं होते। उनका कोई चिंतन नहीं होता। उसे दरबारी विचार उपलब्ध करा देते हैं, जिन्हें वे आवश्यकता अनुसार जनता के समक्ष प्रकट कर देते है। चाटुकारिता में निष्णात दरबारी हमेशा उनका यशगाण करते रहते हैं। उन्हें कई तरह के शाब्दिक अलंकारों से सुशोभित करते हैं। उनके साधारण व्यक्तित्व को भी विराट बना कर प्रचारित करते हैं। दरबारी उनकी हमेशा जयजयकार करते रहते हैं और जनता को उनका अनुशरण करने की अपेक्षा रखते है। सता के शिखर पर इन्हें जमीन मार्ग से नहीं, अपितु आकाश मार्ग से सीधा उतारा जाता है। इस प्रयास को महान उपलब्धि मान कर प्रचारित किया जाता है। किन्तु इस तरह आकाश से जमीन पर उतारे गये व्यक्ति यदि शिखर से फिसल गये तो सीधी जमीन पर ही गिरते हैं।  फिर कभी शिखर पर नहीं पहुंच पाते। दरबारियों का साथ भी जब तक रहेगा, जब तक वे उनके काम के रहेंगे। यदि वे क्षमता खो देंगे, तब दरबारी स्वत: उनसे दूर हो जायेंगे।
भारतीय जनतंत्र को राजतंत्र बनाने के लिए एक राजनीतिक पार्टी प्रयासरत है। इस पार्टी के सारे के सारे नेता चाटुकारिता की प्रतिस्पर्धा में लगे हुए हैं। एक परिवार के प्रति इतनी अंधश्रद्धा की अभिव्यक्ति कर रहे हैं, जैसे एक सौ बीस करोड़ का देश उनके बिना पूर्णतया अनाथ है। एक अति साधारण व्यक्तित्व को विराट व्यक्तित्व बनाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रख रहे हैं। उन्हें जमीन से शिखर पर चढ़ने के प्रेरित नहीं किया जा रहा, वरन प्रायोजित रुप से धुमधड़ाके के साथ आकाश मार्ग से शिखर पर उतारने की कवायद की जा रही हैं। जनता को समझाया जा रहा है कि अब ये ही आपके भाग्य निर्माता है। ये ही आप पर शासन करने का अधिकार रखते हैं।
जनतंत्र में जनता अपना नेता चुनती है। शासक चुनती है। जो जनता का विश्वास जीतता है- वही उसका नायक होता है।  मीडिया का सहारा ले कर प्रायोजितररुप से किसी व्यक्तित्व को महान बनाने की कोशिश करना, वस्तुत: लोकतांत्रिक परम्पराओं और मूल्यों के प्रति अनास्था का भाव प्रकट करना ही है। यदि कोई राजनीतिक पार्टी एक सोची समझी रणनीति के तहत ऐसा करती है, तो यह उसके आत्मविश्वास की कमी को प्रकट करता है। यह भी दर्शाता है कि एक पार्टी के पास जुझारु, कर्मठ और जनता से जुड़े हुए राजनेताओं का पूर्णतया अभाव हो गया है। उनके पास चुनावी वैतरणी पार करने के लिए एक व्यक्तित्व को महिमामंडित करना ही एक मात्र उपाय रह गया है। सामंतशाही के प्रति ऐसी अंध श्रद्धा अंतत: एक ऐतिहासिक पार्टी के पतन का कारण बन जाय, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।