Monday, 28 October 2013

कहानी एक गरीब आदिवासी भारतीय मां की भी

राजस्थान के गांव की आदिवासी बस्ती का एक कच्चा झोंपड़ा। छत पर केल्हू। दीवारें और आंगन मिट्टी का। सम्भवत: ढ़ार्इ हज़ार वर्ष पूर्व इस परिवार के पुरखे भी इसी तरह के मकानों में रहते थे। झोंपड़े के बाहर की जगह भी केल्हू से ढंकी हुर्इ थी। एक दीवार ने उसे अलग कर रखा था। परिवार के वृद्ध दंपति का यह शयन कक्ष था। आधि धोती, नंगा काला बदन। उभरी हुर्इ हड्डीया। पिचका हुआ पेट।  पोपले मुंह पर उगी सफेद दाढ़ी। लग रहा था- भरपेट भोजन किये वर्षों हो गये। वृद्ध खांसने लगा था। बहुत कोशिश करने पर अपनी खांसी पर नियंत्रण नहीं कर पा रहा था। उसकी रस्सी का खाट झूला बन गया था, जो उसके खांसते हुए शरीर को सम्भालने का असफल प्रयास कर रहा था। समीप ही आंगन में चिंथड़ो पर सिकुड़ कर, उसकी वृद्धा अंधी पत्नी सोयी थी। उसकी आंखों में काला पानी आ गया था। इलाज कराने के लिए न तो पैसा था और न ही साम्मर्थय। वह अंधी हो गयी थी। जिंदगी बोझ बन गयी थी। इस जिंदगी को ढ़ोने की हिम्मत अब बची नहीं थी। मोत का इंतज़ार था, पर वह बुलाने पर भी आ नहीं रही थी।
झोंपड़े के अंदर का दृश्य। एक दीया टिमटिमा रहा था, जो घर की निर्धनता की झलक दिखा रहा था। सम्पति के नाम पर इस झोंपड़े में कुछ नहीं था, सिवाय चिंथड़ो और टूटे-फूटे एक आध एल्युमिनियम के बर्तनों के।   आंगन में नो से तीन वर्ष की आयुवर्ग के  चार बच्चे सोये थे। उनकी अवस्था से लग रहा था, इनमें से कोर्इ भी स्कूल नहीं जाता होगा। धूल से सने बाल। हाथ पावं पूरे मिट्टी से पुते हुए। तन ढंकने के कपड़े थे, जो अपना अस्तित्व बनाये रखे हुए थे। पास में सोयी उनकी मां उठ कर बैठ गयी। पैंतीस की वय होगी, परन्तु कठोर हो गये चेहरे की आभा मंद हो गयी थी। आंखों के आंसू सूख गये थे, पर अव्यक्त पीड़ा के भाव झलक रहे थे। वह इस परिवार की मुखिया बन गयी थी। जो स्वयं अपने आपको सम्भाल नहीं पा रही थी, परन्तु  उस पर छ: जिंदगियों को भार आ पड़ा था।
छ: माह पूर्व इस परिवार के मुखिया का देहांत हो गया था। उसे बुखार आया था। गांव में अस्पताल था नहीं। कर्इ देवरों के चक्कर लगाये थे, पर बिमारी ठीक नहीं हो पायी। थक हार कर पत्नी उसे बीस कोस दूर कस्बे के अस्पताल में ले गयी थी। अस्पलात में चार-पांच डाक्टरों के कमरे थे, परन्तु कमरे खुले हुए थे। कुर्सियां खाली थी। मात्र एक डाक्टर के कमरे के बाहर रोगियों की लम्बी कतार लगी हुर्इ थी। डाक्टर दो-दो मिनट में रोगियों को निपटा रहा था। लम्बी प्रतीक्षा के बाद उसका नम्बर आया। डाक्टर के रुखे भाव से उसके पति की ओर देखा। उससे मुहं खुलवाया। कलार्इ पर हाथ रखा। पत्नी बिमारी के संबंध में बोले जा रही थी, परन्तु उसकी बात सुने बिना उसने पर्ची पर दवार्इंये लिख दी और कह दिया-तीन दिन बाद आ कर दिखाना।
अस्पताल में मुफ्त दवा की व्यवस्था थी, परन्तु उस दवा को लेने के लिए भी लम्बी लार्इन थी। अंतत: उसे दो तरह की गोलियां दी गयी। बाहर नल लगा था। उसने पानी के साथ दो गोलियां पति को गटकने को दी। उसे तेज ढंड़ लग रही थी। वह बाहर के बरामदे पर सो गया। उठ कर चलने की उसकी हिम्मत नहीं थी। डाक्टर चाहता तो उसे भर्ति कर सकता था। परन्तु नहीं किया। पत्नी के आग्रह पर उठ कर चलने की कोशिश करने लगा। चलते-चलते धड़ाम से गिर पड़ा। बिना इलाज के अस्पताल के बाहर उसने दम तोड़ दिया था। अस्पताल की दीवारों पर गरीबों की सुविधाओं के कर्इ बोर्ड टंगे हुए थे। एक गरीब आदिवासी की मृत्यु ने उसके सारे दावों को भोंथरा कर दिया। सरकार को यह भी नसीसहत दे दी कि बिना प्रशासनिक व्यवस्था सुधारें लोकलुभावन कार्य बेहतर ढंग से सम्पादित  नहीं किये जा सकते।
घर के सभी सदस्यों को मजदूरी कर कमाने वाला मुखिया सभी को अनाथ बना गया। इस वज्रपात को सह कर परिवार को सम्भालने की जिम्मेदारी एक अबला पर आ पड़ी थी। मजदूरी के लिए वह पति मोत के बारह दिन बाद ही बाहर निकल गयी। पर मजदूरी भी रोज कहां मिलने वाली थी। मनरेगा में उसके सौ दिन पहले ही पूरे हो गये थे। मजदूरी मिलने पर अनाज के दाने लाती। ज्यों-त्यों घर के छ: सदस्यों का वह पेट भर पा रही है।
उसने सुना था-गरीबों को दो रुपये किलों में अनाज मिल रहा है। पर उसे बताया गया कि उसका परिवार बीपीएल परिवारों की सूचि में सम्मिलित नहीं किया गया है। वह समझ नहीं पायी कि बीपीएल आखिर किसे कहते हैं ? वह यह जानती है कि वह गरीब है और उसके घर में खाने को कुछ नहीं है। वह रोज गांव के मुखियांओं के घर चक्कर लगाती है। अपना दुखड़ा सुना कर उनसे बीपीएल का प्रमाण-पत्र मांग रही है। सभी की उसके प्रति सहानुभूति है। सभी मानते है कि वह बीपीएल है, परन्तु सरकारी खानापूर्ति में जो गलती हो गयी, उसे सुधारने में वर्षों लग सकते हैं।
एक नेता के मुहं से अपनी मां की बिमारी की कहानी सुनी थी। यह कहानी उससे अलग है। यह गरीब मां की कहानी है। इसका दर्द उसके झोंपड़े तक सिमटा हुआ है, जिसे कौन मुखर कर सकता है ? भाषणों में अपने आपको गरीबों और आदिवासियों का शुभचिंतक और उनकी भलार्इ की बातें करने वाले नेताओं को गरीबों की कहानियां कौन बताएं ? कौन उन्हें समझाये गरीबों की गरीबीं कैसे होती है ?  अभावों की पीडा का दर्द कैसे होता है ? ये लोग रोज जीते हैं और रोज मरते हैं। इनका अपना कोर्इ नहीं है।
राजस्थान में चुनाव होने वाले हैं। नेता वोटों के लिए इस दुखिया गांव भी जायेंगे। उससे वोट मांगेगे। तब वह उनसे बीपीएल का प्रमाण-पत्र मांगेगी। उसकी बात सुनी जायेगी। सम्भवत: उसकी समस्या का समाधान भी हो जायेगा। वह बीपीएल बन भी जायेगी। तब तक वह सरकारी सुविधाओं की मोहताज बनी रहेगी। परन्तु सरकार गीत गाती रहेगी। अपने आपको गरीबों का मसीहा बताती रहेगी। यह देश ऐसे ही चलता रहेगा। गरीब रहेंगे। गरीबी रहेंगे। गरीबों के नाम पर वोट मिलते रहेंगे।