Wednesday, 9 October 2013

भारतीय संसदीय इतिहास के सबसे विवादास्पद व कंलकित गृहमंत्री

श्री शिंदिया के दो विवादास्पद आदेशों ने उन्हें गृहमंत्री के पद पर बैठने के लिए सर्वथा अनुपयुक्त व्यक्ति घोषित कर दिया हैं।  क्योंकि उन्होंने जानबूझ कर संविधान की मूल धारणा और उसकी पवित्रता पर चोट पहुंचायी है। भारतीय संविधान ने धर्म, जाति, नस्ल, व लिंग के आधर पर भेद-भाव को पूर्णतया वर्जित किया है और सभी भारतीय नागरिकों को समान अधिकार दिये हैं।
अत: गृहमंत्री द्वारा राज्यों को भेजे गये दो आदेशों ने उन्हें संविधान की परम्पराओं को तोड़ने का दोषी पाया है। उनके दो आदेश हैं- एक: राज्य यह बतायें कि उनके राज्य में कितने साम्प्रदायिक दंगे हुए और उनमें कितने हिंदू और मुस्लिम नागरिक मारे गये। दो: राज्यों की जेलो में बंद मुस्लिम नागरिकों के प्रति पुलिस अमानवीय व्यवहार नही करें और उन्हें प्रताड़ित नहीं करें।
यह सर्वविदित है कि दंगे प्रशासनिक अक्षमता से होते हैं। दंगों में भारतीय नागरिक मारे जाते हैं- हिंदू और मुस्लिम नहीं। धर्म के आधार पर पीड़ितो की गणना करना- साम्प्रदायिक सदभाव को बिगाड़ने की प्रक्रिया है। इस गणना से सामाजिक सदभाव बिगड़ेगा और नागरिक एक दूसरें के प्रति नफरत और वैर का भाव रखेंगे। क्या केन्द्रीय सरकार के महत्वपूर्ण पद बैठे व्यक्ति को ऐसा आदेश देने का अधिकार है ? क्या उन्हें मालूम नहीं है कि दंगो में गरीब और निर्दोष व्यक्ति धोखे से मारे जाते हैं। जो पर्दे के पीछे रह कर दंगे करवाते हैं और इसमे आग लगाते हैं, उनका कुछ नहीं होता। हाल ही उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर  हुए दंगों में प्रदेश सरकार के एक शक्तिशाली मंत्री की  संदिग्ध भूमिका साबित हुर्इ है। क्या उन्हें दोषी मान कर पद से हटाया गया ? इससे इस तथ्य की पुष्टि होती है कि दंगे सियासत करवाती है। मजहब नहीं।  राजनेताओं का मकसद होता हैं-  नागरिकों के मन में विभ्रम की स्थिति पैदा कर चुनावी लाभ उठाना।
राहुल  गांधी उत्तर प्रदेश की रैलियों  में भाषण दे रहें हैं -’ राजनीतिक दल वोटो के लिए हिन्दू और मुसलमानों को  आपस में लड़ा रहे हैं।’ जबकि शिंदे का उक्त आदेश  उनकी स्वयं की पार्टी पर अक्षरश: लागू हो रहा है और गृहमंत्री पद पर बैठा व्यक्ति इसे प्रमाणित कर रहा है। हक़ीकत यह है कि भारत का शहरी मध्यमवर्ग यूपीए की नीतियों से क्षुब्ध है और इसके पक्ष में वोट नहीं देने का मानस बना रखा है। सम्भवत: इसीलिए कांग्रेस मुसलमानों पर डोरे डालने के हर सम्भव प्रयास कर रही है, ताकि मुस्लिम वोटों के आधार पर चुनाव जीता जा सके। इसी क्रम में एक कांग्रेसी मंत्री निर्भिक हो कर वक्तव्य दे बैठे-’ मुसलमानों के पचास लाख तक ऋण माफ कर देने चाहिये। इससे यही लगता है कि वोटों के लिए ये पगला गये हैं।
जिनके स्वंय के शरीर पर वस्त्र नहीं है। वे पूरी तरह निर्वस्त्र है और दूसरों को नंगा बताते हुए उन पर हंस रहे हैं। राजनेता झूठ और तिकड़मी चालों में इतने उलझे हुए हैं कि उनमें शर्म और हया तो बची ही नहीं है। वोटों के जुगाड़ के लिए कुछ भी कहने और कुछ भी करने में नहीं हिचक रहे हैं। उन्हें सत्ता चाहिये और सत्ता के लिए वे बहुत नीचे तक गिर सकते हैं।
गृहमंत्री का यह आदेश कि जेलों में बंदी मुस्लिम नागरिकों को पुलिस प्रताड़ित नहीं करें। इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि पुलिस अपराधियों को धर्म के आधार पर पकड़ती है- अपराध के आधार पर नहीं। क्या यह पुलिस की कार्यप्रणाली पर आघात नहीं है ? क्या राज्यों की पुलिस वास्तव में धर्म के आधार पर नागरिको के बीच भेद-भाव करते हुए उन्हें प्रताड़ित कर रही है ? गृहमंत्री यदि निष्पक्ष होते तो ऐसे राज्यों और जेल/ पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध जांच करवा सकते थे। उन्हें नियमानुसार दंड़ित करवा सकते थे, परन्तु ऐसा नहीं किया और उन्होंने एक विवादास्पद आदेश दे ड़ाला। मंशा स्पष्ट है- धर्म विशेष के नागरिकों को लुभाने के हर सम्भव प्रयास किये जाय।
यह सही है कि भारतीय जेलों में कर्इ निर्दोष नागरिक बंदी है। वे जेलों से बाहर इसलिए नहीं आ पा रहे हैं, क्योंकि कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के लिए उनके पास पैसे नहीं है। उनकी जमानत देने वाला कोर्इ नहीं है। वे इतने निर्धन है कि वर्षों से जेलो में सड़ रहे हैं और बाहर नहीं आ पा रहे हैं। इनमें हिन्दू और मुस्लिम दोनो हैं। अच्छा होता गृहमंत्री कानूनी प्रक्रिया में सुधार की पहल करते, ताकि अनावश्यक रुप से निर्धन नागरिकों को प्रताड़ित होने से बचाया जा सके।
गृहमंत्री के आदेश का स्पष्ट भाव है कि अपराधियों को पकड़ने और उन्हें जेल में यातना देने के लिए भेदभाव करें। अर्थात हिंदू नागरिकों के साथ कठोर व्यवहार किया जा सकता है,  किन्तु मुसलमानों के प्रति नरम रुख अपनाया जाय। इसका यही आशय है कि आपको अपराध करने की छूट हैं। आप हमे वोट देते रहों। हमारी सरकार बनाते रहों और हम आपको बचाते रहेंगे। यह एक खतरनाक नीति है, जिसके भविष्य में कर्इ दुष्परिणाम प्राप्त हो सकते हैं।
बेहतर है मुस्लिम भार्इ एक भ्रष्ट सरकार की कुत्सित चालों में नहीं उलझे। इस सरकार की प्रमुख उपलब्धि – महंगार्इ और भ्रष्टाचार से सभी प्रभावित हो रहे हैं। ये दोनों समस्याएं धर्म के आधार पर भेद भाव नही करती और सभी को समान रुप से प्रभावित करती है। अत: हमे एक हो कर ऐसी सरकार से छुटकारा पाना है, जो अपने पापों को छुपाने के लिए मुसलमानों को ढाल बनाना चाहती है।
छिंयासठ वर्षों में से सतावन वर्षों तक कांग्रेस पार्टी ने भारत पर शासन किया है। मुसलमानों की माली हालत के लिए यही पार्टी जिम्मेदार है। यह सही है कि मुस्लिम समुदाय निर्धन और पिछड़ा हुआ है। मुस्लिम युवकों ज्यादा पढ़ नहीं पाते और घर की हालत देखते हुए उन्हें बचपन से ही छोटे-मोटे काम में लगना पड़ता है। गरीबी उन्हें अपराधी बनाने में भी सहायक होती हैं और अनजाने में गलत राह पकड़ लेते हैं। भारतीय जेलों में ऐसे कर्इ अपराधी बंदी है, जो छोटे-मोटे अपराध करते हुए पकड़े गये थे और निर्धनता के कारण छूट नहीं पा रहे हैं। परन्तु इस समस्या से लाभ उठाने के बजाय ऐसी कार्यवाही की जाती, जिससे सभी बंदियों को लाभ मिलता। सरकार का यह आदेश तो अपरोक्ष रुप से  आतंकवादियों के साथ भी नरम रुख अपनाने की बात कहता है। यदि सरकार की मंशा यही  है तो यह एक राष्ट्र के साथ दगाबाजी है। यदि एक राष्ट्र का गृहमंत्री ऐसा करता है तो ऐसा व्यक्ति पद की गरिमा को ठेस पहुंचा रहा है। उसे उस पद पर बैठने का कोर्इ नैतिक अधिकार नहीं है।
भारतीय मुसलमानों को सियासत ने बहुत ठगा है। अब उन्हें इनके गड़बड़झाल में नहीं उलझ कर उस राजनीतिक दल  को सशर्त समर्थन देना चाहिये, जो उनकी आर्थिक हालत सुधारने के लिए और उनके बच्चों की पढ़ार्इ के लिए सार्थक नीतियों की धोषणा कर सकें, ताकि मुस्लिम बच्चे अच्छी तालिम ले कर बेहतर नौकरियां पा सके और अपने परिवार और समाज को निर्धनता और अभावों के अंधकार से मुक्ति दिला सकें।