Thursday, 3 October 2013

राहुलगांधी का यदि हृदय परिवर्तन हो गया है, तो उन्हें जनता के सात सवालों के जवाब देना होगा

दाग़ियों के साथ दग़ाबाजी करते हुए राहुल गांधी ने कांग्रेस के भरोसेबंद साथी लालू यादव के राजनीतिक जीवन को मंझधार में हिचकोले खाने छोड़ दिया है। उनके राजनीतिक स्टंट से नये हमजोली- नीतीश गदगद हो गये। राह का कांटा दूर होने की खुशी में उन्होंने तुरन्त राहुल की प्रंशसा में कसीदे कढ दियें। दरअसल लालू की नींद सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने हराम कर दी थी। परन्तु कांग्रेस पर उन्हें भरोसा था कि वह मुश्किल घड़ी में उनका साथ देगी। अध्यादेश के जरिये कांग्रेस ने उन्हें बचाने की कोशिश भी की थी, परन्तु महामहीम के रुख ने सारा खेल बिगाड़ दिया। अध्यादेश पर राष्ट्रपति की मुहर लगने की सम्भावना नहीं थी, इसीलिए राहुल जी को हीरो बन कर सस्ती लोकप्रियता अर्जित करने  के लिए एक बचकानी नैाटंकी करनी पड़ी।
तीन मिनट के राजनीतिक तूफान के बाद राहुल गायब हो गये और जवाब देने की सारी जिम्मेदारी उन राजनेताओं पर डाल दी, जो अध्यादेश के संबंध में मीडिया के समक्ष लम्बी-चौड़ी दलीले दे रहे थे। अपने नेता के हृदय परिवर्तन से वे सकते में आ गये और मजबूरन उन्हें राहुल के सुर में सुर मिलाना पड़ा। अपना स्वाभिमान और गरुर गवां चुके राजनेता  अध्यादेश के पक्ष में बोलते-बोलते अचानक विरोध में बोलने लगे। गिरगिट की तरह राजनीतिक रंग बदल कर कुछ ही क्षणों में दो तरह की जुबान बोलना भारत की राजनीति का एक बेमिशाल उदाहरण बन गया है। यह जी हजूरी और चापलुसी की पराकाष्ठा है। राजनीतिक मूल्यों का क्षरण और एक परिवार के प्रति स्वामीभक्ति का प्रदर्शन, वस्तुत: लोकतंत्र में राजतंत्र की एक झलक दिखा रहा है। यदि कांग्रेस पार्टी के लोकसभा में दो तिहार्इ से अधिक सांसद हो जाय, तो निश्चय ही यह राजनीतिक दल संविधान में सेशोधन करने के लिए भारतीय लोकतंत्र को राजतंत्र में तब्दील करने का अध्यादेश ला सकता है।
राहुल गांधी के राजनीतिक स्टंट से जब चारों ओर से प्रतिक्रिया आने लगी, तब वे राजप्रासाद में कहीं अदृश्य हो गये और प्रतिक्रिया का जवाब देने की जिम्मेदारी दरबारियों पर डाल दी। जैसी की सम्भावना थी, एक साथ कर्इ दरबारी मैदान में आ गये और अपने स्वामी के प्रति स्वामीभक्ति का प्रदर्शन करने की प्रतिस्पर्धा में लग गये। कुछ भी कह कर, कहीं छुप जाना और जवाब देने की जिम्मेदारी दरबारियों पर ड़ाल देना, लोकतंत्र में राजशाही परम्परा का सुन्दर उदाहरण हैं।
यदि वास्तव में राहुल गांधी को आत्मदर्शन हो गया है और उनके मन में राजनीति का शुद्धिकरण करने की उत्कंठा जगी है, तो उन्हें जनता के समक्ष इसे सिद्ध करना होगा। यदि निम्न सवालों के संबंध में वे स्पष्टीकरण देंगे और इनका पालन करने के लिए प्रतिबद्ध दिखायी देंगे, तो यह समझा जायेगा कि वे अन्तर्मन से राजनीति का शुद्धिकरण चाहते हैं, वरना यह समझा जायेगा कि उनके द्वारा किया गया उपक्रम एक राजनीतिक नौंटकी ही थी, जिसका स्तर बहुत घटिया था।
एक: उन्हें दरबारियों से अपने आपको मुक्त करना होगा। वे जनता के समक्ष जो भी विचार रखेंगे, उसकी जो भी राजनीतिक प्रतिक्रिया होगी, उसका जवाब वे स्वयं ही देंगे, दरबारी नहीं।
दो: अगले विधानसभा और लोकसभा के चुनावों में वे किसी भी दाग़ी उम्मीदवार को पार्टी का टिकट नहीं देंगे।
तीन: लोकतंत्र में बोलने और अपने विचारों को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता होती है। सतारुढ़ दल को अपनी आालोचना सहना पड़ता है। किन्तु आपकी सहनशक्ति जवाब दे देती है। अपने आलोचकों को दबाने के लिए सीबीआर्इ और अन्य सरकारी संस्थाओं की सहायता ली जाती है। यह गलत परम्परा है। क्या आप इसे भविष्य में बंद करना चाहेंगे ?
चार : गरीब और गरीबों के प्रति आपके मन में बहुत अनुराग उमड़ा हैं। इन दिनों गरीबों के कल्याण की बहुत ही महत्वपूर्ण घोषणाएं कर रहे हैं। आपकी योजनाओं से गरीब लाभान्वित होंगे, परन्तु उनकी गरीबी दूर नहीं होगी। वे स्थायी रुप  से गरीब ही रहेंगे और सरकारी खैरात पाने के लिए सदैव अवलम्बित हो जायेंगे। क्योंकि  गरीबों के लिए अस्थायी रोजगार की व्यवस्था तो कर रहे हैं, किन्तु बेरोजगार युवकों को स्थायी रोजगार उपलब्ध कराने की आपके पास कोर्इ योजना नहीं है।
अब किसी भारतीय गरीब को भूख से नहीं मरने देंगे। आपके विचारों से अब वे भर पेट भोजन करेंगे। उनको बात करने के लिए आप सेलफोन भी बांटने वाले हैं, परन्तु उनके पास रहने को मकान नहीं है। बच्चें स्कूल नहीं जा सकते, क्योंकि उन्हें पढ़ाने के लिए पैसे नहीं है। वे अपना इलाज नहीं करा सकते, क्योंकि अधिकांश गांवों में प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र नहीं है। शहरों में महंगा इलाज कराने की उनकी औकात नहीं है। आपने गरीबों को भूख से नहीं मरने देने की गारन्टी तो ले ली, किन्तु जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं- आवास, शिक्षा, स्वास्थय की व्यवस्था कब करेंगे ? यह सब तब होगा जब भारत पिछड़ा और गरीब राष्ट्र नहीं रह कर विकसित व उन्नत राष्ट्र होगा। उसका तीव्र औद्योगिकरण होगा, जिससे स्थायी रोजगार पैदा होंगे। परन्तु आप यदि इसी तरह खैरात योजनाओं में धन लुटाते रहेंगे, तो यह सब सपना ही बन कर रह जायेगा।
पांच: सरकार की लोकलुभावन योजनाओं में धन लुटाने से राजकोषीय घाटा बढ़ रहा है। महंगार्इ नियंत्रण में नहीं आ रही है।  भविष्य में महंगार्इ अपना और अधिक रौद्र रुप दिखायेगी।  महंगार्इ का प्रभाव प्रत्येक भारतीय नागरिक पर पड़ रहा है। महंगार्इ कम करने के यदि आप के पास कोर्इ उपाय नहीं है, तो क्या सरकारी धन का अपव्यय करना छोड़ सकते हैं ?  निश्चय ही ऐसा आप नहीं करेंगे, क्योंकि आपके लिए देश की आर्थिक बर्बादी की कीमत पर गरीब जनता के वोट ले कर चुनाव जीतना जरुरी है।
छ: भ्रष्टाचार के संबंध में आपने कभी कोर्इ विचार अभिव्यक्त नहीं किये। जबकि देश की अवनति का मूल कारण भ्रष्टाचार है। वर्तमान सरकार के शासनकाल में भ्रष्टाचार ने कर्इ कीर्तिमान स्थापित किये हैं। सारे घोटाले सरकार की नाक के नीचे हुए हैं। सरकार के वरिष्ठ मंत्री और यहां तक प्रधानमंत्री की भी संदीग्ध भूमिका उजागर हुर्इ है। क्या इन घोटालों की निष्पक्ष जांच की आप पहल करेंगे ? सुप्रीम कोर्ट की लताड़ के बाद भी सीबीआर्इ घोटालों की जांच मंथर गति से कर रही है और वह दोषियों को पकड़ने के बजाय उन्हें बचाने की कोशिश कर रही है। भ्रष्टाचार गरीबी और अभाव बढ़ाता है। परोक्ष रुप  से महंगार्इ भी इसका मूल कारण है। देश का प्रत्येक नागरिक इससे पीड़ित है, अत: इस संबंध आपका मौन देशवासियों को अखर रहा है। वैसे भी भारत के गरीबों के प्रति आपके मन में बहुत पीड़ा है। क्या भ्रष्टाचार के बारें मे आप अपने विचार प्रकट करेंगे ?
सात: भ्रष्ट राजनेताओं, नौकरशाहों और उद्योगपतियों का काला धन विदेशी बैंकों में जमा है। इसके संबंध में जो आंकड़े दिये जा रहे है, वे अतिश्योक्तिपूर्ण हो सकते हैं, किन्तु आपकी सरकार ने इस धन को वापस लाने की जानबूझ कर कोर्इ सार्थक कोशिश नहीं की। क्या आप देश की गरीबी दूर करने के लिए छल से गरीब भारतीयों का लूटा हुआ धन वापस लाने के लिए पहल करेंगे ? यदि आप ऐसा करेंगे तो यह समझा जायेगा कि वास्तव में गरीबों के हितैषी हैं। यदि नहीं कर पाये तो यह समझा जायेगा कि आप गरीबों के लिए जो आंसू बहा रहे हैं, वह महज एक ढोंग है। जनता को मूर्ख बना कर उसको ठगने का एक उपक्रम है।
आपके पास इन सातों सवालों का कोर्इ जवाब नहीं है। आप देना भी नहीं चाहेंगे, क्योंकि न तो आपकी लोकतंत्र में आस्था है और न ही भारतीयों के प्रति आपके मन में आदर और सदभाव है। आप केवल भारतीय नागरिकों का उपयोग सत्ता प्राप्ति के लिए करना चाहते हैं। उनकी अहमियत आपके लिए एक मोहरे के अलावा कुछ भी नहीं है।