Tuesday, 3 September 2013

भारतीय युवाओं को व्यवस्था परिवर्तन की जिम्मेदारी लेनी होगी- जन क्रांति –

सड़ांध मार रही व्यवस्था को परविर्तन करना हमारा दायित्व है। विशेष कर भारतीय युवाओं का, जिन्हें अपना पूरा जीवन बिताना है। यदि इस व्यवस्था को आत्मसात किया जाता रहा, तो पूरा जीवन कष्टमय हो जायेगा। अत: उठो, जागो ! अपने पास सोये हुए को जगाओ। आपस में जुड़ो। और व्यवस्था परिवर्तन के उपाय  सोचो। जन क्रांति का मतलब ही है- जन चेतना। अपने अधिकारों के प्रति जागरुकता। सब कुछ बदल देने की तीव्र उत्कंठा। क्योंकि  व्यवस्था को ले कर हमारे मन में उद्वेलन है। आक्रोश  है। हमे वह सब कुछ स्वीकार्य नहीं है, जो हम पर थोपा जा रहा है। हम अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करेंगे,  किन्तु इसके लिए बंदूक नहीं उठायेंगे। हमारे शांत प्रयास हमे मंजिल तक पहुंचायेंगे।
यदि आप युवा है। आपकी उम्र 18 से 35 के बीच की है। भारत के अस्सीं करोड़ मतदाताओं में आप पचपन करोड़ है। आप भारत के सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व है। आपके पास इस देश के भविष्य की चाबी है।  आपकी सम्मिलित शक्ति का यदि सोच समझ कर  प्रयोग किया जाय, तो सब कुछ स्वत: ही बदल जायेगा। किन्तु यह तभी सम्भव है जब आप भ्रमित हो कर अपनी शक्ति का अपव्यय नहीं करें। इसके लिए आपको अपनी क्षमता को पहचानना होगा। अपने भीतर की ऊर्जा के समुचित उपयोग करने के उपाय सोचने होंगे। क्योंकि आप यदि संगठित हो जायेंगे, तो भारत की सारी राजनीतिक पार्टियों को अपनी औकात याद आ जायेगी। पार्टियों के नेताओं को अपना मिजाज बदलना होगा। उन्हें अपनी शैली बदलनी होंगी, अन्यथा वे आंधी के तीव्र प्रवाह में तिनको की तरह उड़ जायेंगे। उनका अस्तित्व समाप्त हो जायेगा।
जन क्रांति का बिगुल आपको बजाना है। परन्तु व्यवस्था के प्रति आक्रोश की अभिव्यक्ति के लिए सड़को पर उतरने की जरुरत नहीं है। आपको अपने घर में, पड़ोस में, मोहल्ले में और गांव और शहर में रहने वाले युवाओं के साथ सिर्फ जुड़ना है। अपने विचारों का आदान प्रदान करना हैं। इसके लिए आपके अपने  मोहल्ले, गांव, नगर और महानगरों में छोटे-छोटे युवा संगठन बना, इन्हें  आपस में जोड़ना होगा। इनके मध्य आपस में  संवाद स्थापित करना होगा। यह विचार मंथन ही जन- क्रांति है। जन संगठन जितने मजबूत होंगे, वे व्यापक रुपसे स्वीकार्य किये जायेंगे। इनकी स्वीकार्यता ही राजनैतिक दलों के मालिकों की चिंताएं बढ़ा देगा।
युवाओं को आपस में जोड़ने के निम्न प्रमुख आधार होगा- हम सभी भारतीय नागरिक एक है। हमारा समाज एक है। हमारा धर्म ओैर जाति भारतीयता है। राजनीतिक दलों ने अपने राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए हमे आपस में विभाजित कर रखा है। आज से हम विभाजित नहीं है, सारे आवरण को हटा कर व्यवस्था परविर्तन के लिए एक हो गये हैं। हमे आपस मिल बैठ कर इस बात पर मंथन करना होगा कि हम इस देश की व्यवस्था को कैसे बदल सकते हैं ? परिवर्तन से ही बहुत सारी समस्याओं का समाधान हो जायेगा। क्योंकि परिवर्तन में ही देश की प्रगति, खुशहाली और समृद्धि का रहस्य छुपा हुआ है।
भारत के युवा संगठन समाज में जागृति पैदा करेंगे, जिससे उन राजनेताओं के कलुषित प्रयास निष्फल हेा जायेंगे, जो अपने राजनीतिक स्वार्थ के कारण समाज में विभ्रम की स्थिति पैदा कर भारतीय समाज को आपस में बांटते हैं। अपने मतलब के लिए हमें बार-बार हमारी जाति और धर्म का अहसास कराने का प्रयास करते हैं, जबकि हक़ीकत यह है कि राजनीतिक  का कोर्इ धर्म और जाति नही होती। स्वार्थ ही राजनेताओं की जाति है और धनार्जन का उद्धेश्य ही उनका धर्म है। वे किसी के अपने नहीं है। उनके मन में छल-कपट भरा हुआ है। धूर्तता, तिकड़म व चालाकी उनकी फितरत में है। वे इन सारे शस्त्रों का प्रयोग चुनाव जीतने के लिए करते हैं। उनका लक्ष्य रहता है – सिर्फ सता पर नियंत्रण स्थापित करना।
अत: हमे सर्व प्रथम व्यवस्था परिवर्तन के लिए भारतीय राजनीति का शुद्धिकरण करना है। हमारे युवासंगठन यह निर्धारित करेंगे कि जो व्यक्ति हमारा जन प्रतिनिधि होगा, उसके मापदंड क्या होंगे ? राजनीतिक दलों के समक्ष वे मापदंड़ रखेंगे, जिनका होना एक जनप्रतिनिधि में  आवश्यक होगा। इस तरह हम राजनीतिक दलों को बाध्य करेंगे कि वे हमारे मापदंड़ो को मान्यता दें, अन्यथा हम उनके पक्ष में मतदान नहीं करेंगे।
किस दल को भारत का शासन सौंपा जाय, इसका निर्धारण हमारे युवा संगठन करेंगे। परन्तु इसके लिए उस राजनीतिक दल को भारत के युवा संगठनों द्वारा रखी गयी शर्तों को स्वीकार करना होगा। उदाहरण के लिए कुछ शर्तों को रखा जा रहा है, किन्तु इसमें कर्इ और शर्तें भी जोड़ी जा सकती हैं।
हम किसी राजनीतिक दल को इस आधार पर देश नहीं सौंपेंगे कि उस दल ने अपने पिछले कार्यकाल में जनता को खुश करने के लिए कर्इ उपाय किये। राजकोष के धन से प्रलोभन बांटने का मकसद जनता को खुश कर उनके वोट प्राप्त करना माना जायेगा। यह घृणित उद्धेश्य हैं। इसे जनता स्वीकार नहीं कर रही है। हम इस तरह की प्रथा की समाप्ति चाहते हैं। क्योंकि हमारा सोच यह है कि शासन ऐसी नीतियां बनाये जिससे दबे हुए और निर्धन वर्ग को स्थायी रोजगार मिले, ताकि वह स्वावलम्बी बन सके। हम भारतीय नागरिकों  को राज व्यवस्था पर पूर्णतया पराश्रित नहीं देखना चाहते।
खैरात बांटने को पैमाना मान कर  उस दल को पुन: सत्ता नहीं सौंपेंगे।  हमारी शर्त यह होगी आप उन नीतियों का उल्लेख करें, जिससे पूरे देश को लाभ हुआ। परन्तु आपको सारे तथ्यों की सप्रमाण सार्वजनिक व्याख्या करनी होगी। यदि आपकी सरकार पर भ्रष्टाचार के कर्इ आरोप लगे हैं और वे न्यायालय में लम्बित है, तब आपको जनता के समक्ष यह स्पष्टीकरण देना होगा कि आप पाक साफ हैं और आप पर लगाये गये आरोप झूठे थे।  हमारा संघर्ष व्यवस्था परिवर्तन के लिए हैं। भ्रष्टाचार व्यवस्था परिवर्तन का मुख्य आधार है। अत: हम भ्रष्टाचार को किसी भी तरह से मान्यता नहीं देंगे।
हमारी दूसरी शर्त यह होगी कि आपके कार्य काल में प्रशासनिक व्यवस्था चुस्त दुरुस्त थी और जनता को प्रशासन से कोर्इ परेशानी  नहीं हुर्इ ? आपको इस शर्त के जवाब के लिए सार्वजनिक बहस में भाग लेना होगा। जनता आपके तर्कों से संतुष्ट होगी जब आप सारे तथ्यों के तार्किक व सारगर्भित उत्तर देंगें।
तीसरी शर्त  होगी – यदि आपकी नीतियों से महंगार्इ- बैरोजगारी बढ़ी और देश की अर्थव्यवस्था की हालत अच्छी नहीं रही, तो इसकी जानकारी देश की जनता को दें।  और उन कारणों का स्पष्टीकरण प्रस्तुत करें।
आपको जनता द्वारा उठाये गये सवालों का और शर्तो का तार्किक व तथ्यपूर्ण विवरण देना होगा। हमे यह नहीं जानना है कि अमूक राजनीतिक दल कैसा है और उसके नेताओं में क्या देाष है? कौन कैसा है और किसमें क्या गुण दोष है- इसका फैंसला जनता करेगी। हमे सिर्फ यह जानना है कि आपने क्या किया था? और आपकी नीतियों से देश को क्या लाभ पहुंचा था या कितनी हानि उठानी पड़ी थी।
यह आलेख जारी रहेगा। पूर्व में इस संदर्भ में दो आलेख- एक राजनीतिक पार्टी नहीं, हम भारतीय नये भारत का निमार्ण करेंगे तथा भारतीय राजनीतिक के शुद्धिकरण के लिए जनक्रांति की आवश्यकता, प्रकाशित हो चुका है। इस आलेख पर अपनी प्रतिक्रिया भेजें। एक महत्वपूर्ण कार्य के लिए आपका सहयोग अपेक्षित हैं।