Sunday, 29 September 2013

आतंकवाद के जहरीले सांप के फण को शब्दबाणों से नहीं कुचला जा सकता

लगभग दो दसक से अधिक याने एक चौथार्इ शताब्दी से आतंकवाद का दंश झेल रहे हैं। लाखों जिंदगगियों को इसकी पीड़ा सहनी पड़ी है। इस समस्या को झेलने में हम अव्वल है। परन्तु इससे निज़ात पाने का न तो अब तक आत्मबल जुटा पाये हैं और न ही पूरी शक्ति से इस जहरीले से सांप के फण को कुचलने की हिम्मत जुटा पाये हैं। प्रत्येक आतंकी घटना की पुनरावृति के बाद हमारे शासक उन्हीं घिसे-पिटे शब्दबाणों से प्रहार करते हैं,  जैसे यह भी रस्म अदायगी का एक आवश्यक उपक्रम भर रह गया है।
विश्व को हम आतंकवाद के खतरे से अगाह कर रहे हैं और इसकी भयावता से पूरा विश्व पीड़ित है, यह समझा रहे हैं। पर यह कहने हमें क्यों संकोच नहीं होता कि आतंकवाद से निपटने के लिए हम पूरी तरह से असफल रहे हैं ?  आतंकवाद के जनक राष्ट्र के विद्रुप चेहरे को दुनियां को दिखाने की निष्फल कोशिश करते समय हम यह भूल रहे हैं कि जिन्हें सब कुछ मालूम है, उन्हें समझाने की औपचारिकता क्यों निभा रहे हैं ? गिनती कीजिये ऐसा आप अब तक कितनी बार कर चुके हैं। क्या दुनियां इस समस्या से निपटने के लिए हमारे साथ खड़ी हो पायी ? क्या विश्व पाकिस्तान की करतूतो से परिचित नहीं है ? महाशक्तियों ने पाकिस्तान को रोकने की ऐसी कौनसी सार्थक कोशिश की, जिससे वह भयभीत हो गया और उसने अपने घृणि मकसद पर विराम लगा दिया। जबकि वास्तविकता यह है कि अमेरिका की सहायता और कृपा से ही पाकिस्तानी सेना और आइएसआर्इ ने आतंकवाद को वर्तमान शक्ल दी है।
सवा सौ करोड़ भारतीयों के शासक यदि विश्व के सामने अपनी पीड़ा का बखान करें और उनसे मदद के लिए गिड़गिड़ाये, यह हम सभी भारतीयों का अपमान है। हमने आपको अधिकार दियें हैं, उसका प्रयोग करते हुए आप इस समस्या से निपटने का साम्मर्थय रखते हैं, फिर क्यों  बार-बार दुनियां को हमारा दर्द समझाने का प्रयास करते हैं ? भगवान के लिए बंद कीजिये ये सब गोरखधंधे, क्योंकि अब तक इन सबसे हमने कुछ भी नहीं पाया है। अब वक्त समस्या से निपटने के लिए गम्भीरता से विचार करने का है। एक सार्थक रणनीति की पटकथा लिखने का है। पाकिस्तान को हमारी शक्ति और साम्मर्थय का परिचय कराने का है। हर आतंकी धटना के बाद पाकिस्तान को कोंसने, आतंकवाद की निंदा और भत्सर्ना करने का नहीं।
यह सही है कि आतंकवाद से पूरा विश्व पीड़ित है, किन्तु हमारी समस्या अलग है। विश्व में जहां भी आतंकी घटना हुर्इ, उसकी पुनरावृति नहीं हुर्इ, क्योंकि विश्व के शक्तिशाली देशों ने इसे बहुत गम्भीरता से लिया और अपने नागरिकों की रक्षा के लिए पूरी शक्ति लगा दी। किन्तु हमारे देश में एक आतंकी घटना के बाद दूसरी घटना की पुनरावृति शीघ्र हो जाती है। वजह यह है कि हम आतंकवाद को आधे अधुरे मन से दबाने की कोशिश करते हैं। अपनी शक्ति और क्षमता का पूरा उपयोग नहीं कर पाते, इसीलिए बार-बार इसके वीभत्स रुप का सामना करना पड़ता है। पीड़ितों की आंखों से बहते आंसू हमारे शासकों के मन में आक्रोश का भाव नहीं जगा पाये। हमारे शासक अपनी ही धुन में खोये हुए रहते हैं। प्रत्येक आतंकी घटना को वे बहुत हल्के ढंग से लेते हैं। यही कारण है कि आतंक का व्यापार करने वाले निश्चिंत हैं। उन्हें निरन्तर मिल रही सफलता से वे अभिभूत हैं।  उन्हें मालूम हैं- भारत सरकार की दुर्बलताएं क्या हैं। उन्हें अपनी सफलता पूरा भरोसा रहता है। वे जानते हैं, हम सफल होंगे और भारत सरकार विफल। भारत के निरीह नागरिकों के लिए  आतंकवाद की पीड़ा सहने के अलावा कोर्इ चारा नहीं बचा है। क्योंकि अर्कमण्य और दोगले स्वभाव के राजनेताओं के हाथों में देश की सुरक्षा सौंपना कितना जोखिम भरा रहता है, इस सच को जनता ने जान लिया है।
पाकिस्तान के उन शासकों से वार्ता करना महज औपचारिकता निभाने से ज्यादा कुछ नहीं हैं, जिन्होंने जहरीले सांपों को संरक्षण दिया और एक गलत मकसद के लिए इन्हें दूध पिलाया। अब ये जहरीले सांप उनके नियंत्रण में नहीं हैं। ये सांप इन्हें ही डस रहे हैं, फिर ये हमे क्या बचायेंगे ? पाकिस्तानी शासक जानते हैं कि यदि उन्होंने आतंकवाद के जहरीले सांप के फण को कुचल दिया, तो पाकिस्तान खत्म हो जायेगा। पाकिस्तान का अस्तित्व बनाये रखने के लिए उन्हें आतंकवाद को पोषित करना आवश्यक है। पाकिस्तानी शासक दुविधा में हैं। वे अपने राजनीतिक भविष्य को दावं पर लगा कर आतंकवाद को कुचलने का जोखिम नहीं उठा सकते।
अत: पाकिस्तानी शासकों के साथ शांति वार्ता का कोर्इ औचित्य नहीं है। यह समय बर्बाद करने का उपक्रम भर है। अतीत में ऐसी निष्फल कोशिश कर्इ बार कर चुके हैं और इससे कोर्इ सुखद परिणाम हमे प्राप्त नहीं हुए हैं। इस हक़ीकत से हम अच्छी तरह परिचित हैं कि पाकिस्तानी शासकों के नियंत्रण में सेना और आइएसआर्इ नहीं हैं। न ही पाकिस्तानी शासक इन पर नियंत्रण करने की शक्ति और साम्मर्थय रखते हैं। ऐसी परिस्थितियों में हमें वार्ता के बजाय इस समस्या से निपटने के लिए  अन्य उपाय खोजने आवश्यक हैं।
निश्चय ही अन्य समस्याओं की तरह ही आतंकवाद भी हमारे देश की प्रमुख समस्या बन गया है। जनता अपने शासकों से ठगी जा चुकी है।  अब भारत की जनता उन्हें ही अपना शासक चुनेंगी, जो आतंकवाद से निपटने के लिए जनता के समक्ष कोर्इ सार्थक नीति घोषित करेंगे। उन्हें जनता को भरोसा दिलाना होगा कि हमे यदि जनता सत्ता सौंपेगी, तो वे आतंकवाद को कुचलने में अपनी पूरी शक्ति लगा देंगे। बहुत हो चुका, अब और अधिक सहने की ताकत नहीं बची है। जनता के साथ छल करने के बाद भी जिनके मन में किंचित भी अफसोस नहीं है, उन्हें फिर से चुनने की जोखिम लेना भी जनता के लिए  कोर्इ आवश्यक नहीं है।
जनता बार बार अपने शासकों से यही सवाल पूछेगी कि हमारी सुरक्षा एजेंंसियां दुश्मनों के  घृणित इरादों को सफल हो जाने में क्यों सहायक बनती है ? क्यों उन्हें चुस्त -दुरुस्त नहीं किया जाता ? पूरे देश में सुदृढ़ आतंकी नेटवर्क कैसे स्थापित हो गया ? क्या हमारी पुलिस और राज्य सरकारों की इसकी जानकारी नहीं थी ? और यदि नहीं थी, तो निश्चय ही जनता के प्रति अपनी जवाबदेयी निभाने में चुक हो रही है। अब भी इस नेट वर्क को छिन्न-भिन्न करने और अपराधियों को पकड़ने की कोर्इ सार्थक कोशिश नहीं हो रही है। ऐसा क्यों किया जा रहा है, इसका जवाब क्या हमारे शासकों के पास है ?  आतंकवादियों के पास हथियारों का जखिरा, विस्फोटक पदार्थ और धन कहां से आता है, इसे न तो हम रोक पाये हैं और न ही इस संबंध में पहल कर पा रहे हैं।
सुदृढ़ आतंकवाद निरोधक कानून बनाया जाना आवश्यक है, ताकि अपराधियों को शीघ्र दंड़ मिल सके। वोटबैक और तुष्टिकरण राजनीति यदि इस पहल में अवरोध बनती है, तो यह हमारे देश का दुर्भाग्य है। दुनियां के सामने अपना दर्द बयान करने और आंसू बहाने के बजाय हम अपने आपको सुधार लें, तभी आतंकवाद की समस्या से निपटा जा सकता है। शब्दोंबाणों, निरर्थक शांति वार्ताओं से एक गम्भीर समस्या को हल्के ढंग से लेना ही दर्शाता है।