Saturday, 28 September 2013

तुम दिन को अगर रात कहो, हम रात कहेंगे राहुल जी !

सुप्रिम कोर्ट की अवमानना करते हुए दाग़ियों को बचाने के लिए अध्यादेश लाने की प्रक्रिया दो माह से चल रही थी। राहुलगांधी की सहमति लिए बिना कांग्रेसियों के पास इतना साहस कहां कि वे एक कदम भी आगे चल सके। निश्चय ही राहुल सहमत थे, इसीलिए मौन थे। परन्तु  अध्यादेश के संबंध में राष्ट्रपति के अडिग रुख से उन्हें अचानक आत्मज्ञान हुआ और प्रतिद्वंद्वी पार्टी को राजनीतिक लाभ नहीं मिले, इसलिए बहुत ही नाटकीय ढंग से उन्होंने एक प्रेस कान्फे्रस में आ कर अध्याधेश को कोरा बकवास बताते हुए इसे फाड़ कर फैंक देने का कह कर चले गये।
पार्टी नेता जो अध्यादेश के संबंध मे दलीले दे रहे थे, उनके एक वाक्य से तर्कविहिन हो कर पलट गये और पार्टी नेताओं ने राहुल की हां में हां मिलाते हुए कह दिया, ये जो कह रहें हैं, वही सही है। ये यदि दिन को रात कहेंगे, हम रात कहेंगे। ये हमारे मालिक हैं, ये जो कहेंगे हम आंख बंद कर स्वीकार  करेंगे। इनके एक बयान ने हमारे सारे तर्क भोतरें कर दिये। हम तर्क और तथ्य प्रस्तुत करने का साम्मर्थय खो चुके हैं।
राहुल गांधी कितनी अपरिपक्क मानसिक स्थिति के मालिक हैं, इसका परिचय उन्होंने दे दिया। साथ ही, इन तथ्यों की भी पुष्टि हो गयी कि  प्रधानमंत्री की हैसियत एक कठपुतली से अधिक नहीं है। उनकी कोर्इ अहमियत नहीं है। प्रधानमंत्री के मंत्रीमंड़ल ने जो प्रस्ताव पास किया, उसे एक सांसद और पार्टी उपाध्यक्ष ने बकवास बता कर अस्वीकृत कर  दिया, इसलिए मंत्रीमंडल के पास उसे खारिज करने के अलावा कोर्इ चारा नहीं है। अर्थात प्रधानमंत्री और मंत्रीमंडल की सामुहिक शक्ति से उस व्यक्तित्व की शक्ति सर्वोच्च है। उस सांसद और पार्टी उपाध्यक्ष का कद और शक्तियां, जिन्हें भारतीय संविधान ने नहीं दी है, किन्तु एक सरकार और एक राजनीतिक पार्टी ने अपरोक्ष रुप से दे रखी है, सर्वोच्च है।  इससे साबित होता है  कि पूरी पार्टी और उसकी सरकार  एक परिवार की महज अनुचर मंडली है। राहुल गांधी पार्टी के बिगड़े नवाब है, जिनकी हर आज्ञा को शिरोधार्य करना पार्टी के लिए आवश्यक है। भारतीय लोकतंत्र, एक अलोकतंत्रीय परिवार के पास गिरवी पड़ा है।
परन्तु प्रश्न यह है कि देश को इस परिवार का  बोझ ढोना क्यों आवश्यक है ? हमारे सामने ऐसी क्या विवशता है कि चाहें इस परिवार की करतूतो से हम कष्ट भोंगे, परन्तु फिर भी इसे झेलने की विवशता झेले ? जिस व्यक्ति ने राजनीति की सारी परम्परा और आदर्श को बदल कर एक झटके से अपनी पार्टी को नसीहत देने के लिए एक गलत मंच चुन लिया, वह व्यक्ति देश को कैसे चला पायेगा ? क्या किन्हीं अपरिहार्य परिस्थितियों में मंत्रीमंड़ल की बैठक बुलाने और संसद में अपनी बात रखने के बजाय सीधा प्रेस कान्फे्रस में जा कर अपने विचारों को रखेगा ? क्या तब वह व्यक्ति मंत्रीमंडल और संसद की सर्वोच्चता की अवमानना नहीं करेगा ? लोकतंत्र सिद्धान्तों और संविधान के निर्देशों के आधार पर चलता है, किसी एक व्यक्ति की तुनकमिजाजी के आधार पर नहीं।
किन्तु चिंता का विषय यह है कि कैसे उनके गलत कदम को पार्टी सही कदम बता कर उनके सुर में सुर मिला रही है। इसका सीधा मतलब है, पूरी पार्टी एक परिवार पर अवलम्बित हो गयी है। पार्टी का लोकतांत्रिक अस्तित्व समाप्त हो गया है। एक परिवार ही पार्टी के मार्इं बाप हैं और पार्टी के नेताओं का अपना कोर्इ अस्तित्व नहीं हैं। क्या एक राजनीतिक पार्टी इसी मानसिकता के आधार पर देश पर शासन करने का अधिकार रखती है ?
किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए यह एक अशोभनीय स्थिति है। यदि देश के नागरिक ऐसी स्थिति को स्वीकार करते हुए उस पार्टी के पक्ष में मतदान करते हैं, तो वे अप्रत्यक्ष रुप से लोकतंत्र के बजाय एक सामंतशाही को स्वीकार कर रहे हैं। एक राजनीतिक पार्टी के साथ-साथ  पूरे देश ने भी उस परिवार की अधीनता स्वीकार कर ली है। यदि ऐसा होता है तो यह एक दुर्र्भाग्यजनक स्थिति होगी। लोकतंत्र की समाप्ति की प्रक्रिया में यह मील का पत्थर साबित होगी।
निश्चय ही, भारत की सभी लोकतंत्र की पक्षधर पार्टियों को देश को ऐसी अपरिहार्य स्थिति से बचाने के लिए एक हो जाना चाहिये। क्योंकि लोकतंत्र, एक व्यक्ति से नहीं चलता। लोकतंत्र सामुहिक शक्ति और परस्पर विचार विमर्श, तर्क-विर्तक और सर्वानुमति के सिद्धान्त पर चलता है। लोकतांत्रिक शासन प्रणाली पूरी तरह से एक व्यक्ति पर अवलम्बित नहीं होती, वरन उसकी पूरी शक्तियां संसद, सांसद, और मंत्रीमण्डल के पास सुरक्षित होती है। यदि कोर्इ व्यक्ति इतना शक्तिशाली हो जाता है कि वह अपने आपको संसद, प्रधानमंत्री और मंत्रीमण्डल से भी ऊपर समझता है, तो निश्चय ही यह लोकतंत्र के लिए खतरें की घंटी है और अधिनायकतंत्र की आहट का संकेत है।
अभी पानी सिर से ऊपर नहीं गुजरा है। जनता चाहे तो ऐसी परिस्थितियों से देश को बचा सकती है। उसके पास मतदान का अधिकार है। अपने इस अधिकार से वह एक अलोकतंत्रीय पार्टी को अस्वीकार कर सकती है। क्योंकि जनता के लिए यह आवश्यक नहीं है कि एक व्यक्ति यदि दिन को रात बतायेगा, तो जनता भी उसके सुर में सुर मिला देगी। जनता कहेगी, जो व्यक्ति देश की धड़कनों को समझेगा, धड़कनों के साथ अपना सुर मिलायेगा, वही इस देश पर राज करने का अधिकार रखेगा। भारतीय लोकतांत्रिक शासन व्यवसथा  का संचालन करने के लिए जनता के सेवक चाहिये। तुनकमिजाजी और अहंकारी व्यक्तित्व नहीं ।
सुप्रिम कोर्ट ने दाग़ियों के संबंध में जो निर्णय दिया, वह पूरे  देश की आवाज थी। उस निर्णय को पलटने के लिए  अध्यादेश लाया जाना, वस्तुत: न्यायालय की अवमानना करना और देश की आवाज़ को दबाना था। यदि कोर्इ पार्टी अपने नेता के एक बयान से पीछे हट सकती है, इसका मतलब यह है कि सर्वोच्च न्यालय के निर्णय के विरोध में  अध्याधेश लाने के लिए भी उस पार्टी के नेता से अवश्य ही सहमति ली गयी थी, जो इसे आज कोरी बकवास बताते हुए फाड़ने का निर्देश दे रहा है और पार्टी उसके आदेश को स्वीकार कर रही है।
निश्चय ही ऐसी पार्टी और उसके नेता के हाथों में देश को सौंपना खतरे से खाली नहीं है। क्योंकि ऐसे व्यक्ति कभी भी कुछ भी कह सकते हैं और कर सकते हैं। इनके विचार और तर्क विश्वसनीय नहीं कहे जा सकते है। सवा सौ करोड़ आबादी वाले देश को चलाने के लिए नेताओं की कोर्इ कमी नहीं हैं, फिर हमारे पास ऐसी क्या विवशता है कि हम एक अलोकतांत्रिक पार्टी और उसके तुनकमिजाजी और अहंकारी  नेता को झेले और आंख बंद कर उसका नेतृत्व को स्वीकार कर लें ?