Monday, 2 September 2013

भारतीय राजनीति के शुद्धिकरण के लिए एक जनक्रांति की आवश्यकता

लोकसभा और कुछ विधानसभाओं के चुनाव नज़दीक ही होने के कारण भारत के सभी राजनीतिक दल अपनी शक्ति बढ़ाने मे जुटे हैं। वर्तमान सत्ताधारी दल और उसका गठबंधन किसी भी हालत में पुन: शासन पर अपना नियंत्रण चाहता हैं। वहीं प्रमुख विपक्षी दल और उसका गठबंधन दस वर्ष बनवास भोगने के बाद सत्ता पाने के लिए व्यग्र है। प्रादेशिक दल अपनी शक्ति इसलिए बढ़ना चाहते हैं, ताकि उनके समर्थन के बिना कोर्इ भी गठबंधन सरकार नहीं बना सके।
राजनीतिक दल यह सारी कवायद भारतीय जनता को केन्द्र में रखते हुए कर रहे हैं। परन्तु भारतीय जनता उनकी राजनीति को मूक दर्शक बन कर देख रही हैं। जनता को अपनी शक्ति का अहसास है, किन्तु वह संगठित नहीं है, जिससे वह अपनी सम्मिलित शक्ति के बल पर राजनीतिक दलो को अपने समक्ष झुकाने के लिए बाध्य कर सके। उसकी बिखरी हुर्इ शक्ति का लाभ उठा कर अतिस्वार्थी तत्व  भारतीय राजनति में प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं। इन तत्वों ने न केवल भारतीय राजनीति को प्रदुषित किया है, वरन भारत राष्ट्र को दरिद्र व समस्याग्रस्त राष्ट्र बना दिया है।
सता के शीर्ष पर यदि गलत लोगों का जमावाड़ा हो जाता है, तो इसके दुखद परिणाम देश के प्रत्येक नागरिक को भोगने पड़ते हैं। उनकी नीतियों का प्रभाव देश की आंतरिक व बाह्य सुरक्षा, आर्थिक स्थिति, विदेश नीति पर तो पड़ता ही है, किन्तु इसका व्यापक प्रभाव नागरिकों के भविष्य पर भी पड़ता है। अत: देश के प्रत्येक नागरिक को राजनीति को बहुत ही हल्के ढंग से नहीं ले कर इसे गम्भीरता से लेना चाहिये। जातीय, प्रांतीय और धार्मिक संकीर्णता को त्याग कर आपस में जुड़ जाना चाहिये।
लोकतंत्र में वे ही व्यक्ति राजनीति में आने चाहिये,  जिनके मन में सेवा भाव हो तथा जो पूर्ण मनोयोग से जनता की सेवा करना चाहते हों।  शासन करने का व जनता का मालिक बनने का उद्धेश्य ले कर यदि व्यक्ति राजनीति में प्रवेश कर जाते  हैं, तो जनता  को प्रजातंत्र का प्रहरी बन कर उनको राजनीति से बाहर निकालने का अधिकार है। परन्तु यह तभी सम्भव है जब जनता अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रभावी ढंग से प्रयोग कर सके।
आज की परिस्थितियों में भारतीय राजनीति का शुद्धिकरण आवश्यक है। यह तभी सम्भव है जब भारतीय जनता आपस में जुड़ कर अपनी सम्मिलित शक्ति का प्रयोग करें। यद्यपि अब चुनावों में बहुत कम समय रह गया  है और पूरे देश की जनता को भारतीय राजनीतिक का शुद्धिकरण करने के लिए जोड़ना सम्भव नहीं है, किन्तु इसके लिए प्रयास तो प्रारम्भ तो कर देना चाहिये। निश्चय ही शतप्रतिशत सफलता नहीं मिलेगी, किन्तु थोड़ी सी सफलता से ही भारी लाभ की सम्भावना बनती है।
राजनीति के शुद्धिकरण के लिए जनक्रांति की आवश्यकता है। यहां क्रांति का तात्पर्य राजसत्ता के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल बजाना नहीं है, क्योंकि लोकतंत्र में हथियारों से नहीं, मताधिकार से सत्ता परिवर्तन सम्भव है। क्रान्ति का यह भी मतलब नहीं है कि भारी भीड़ एकत्रित कर  रैलियां निकाली जाय और अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया जाय। या जुलूस, बंद, धरने से अपने आपको प्रचारित करने के प्रयास किये जाय।
यहां जनक्रांति का तात्पर्य है- जनता जागरुक हो कर अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग करने के लिए आपस में जुड़ जाय।  यह एक शांत प्रक्रिया होगी । क्योंकि उसका बाह्य रुप दिखार्इ नहीं देगा। इस क्रान्ति को ठंड़ी या शांत क्रांति नाम दिया जा सकता है। इसमें न आग जलेगी, न लपटे उठेगी। अर्थात आक्रोश अभिव्यक्ति के लिए न तो हिंसा का सहारा लिया जायेगा और न ही उग्र पदर्शन किये जायेंगे। हां, राख में दबे अंगारों में तप कर कुछ तपस्वी व्यक्ति बाहर निकलेंगे जो भारतीय राजनीति का शुद्धिकरण करने में समर्थ होंगे।
स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व और बाद में भारत में हुर्इ दो जनक्रांतियों ने जनता को आपस में जोड़ा। उन्हें जागरुक किया। एक क्रांति ने  औपनिवेशिक साम्राज्य से भारत को मुक्त कराया। वहीं दूसरी क्रांति ने भारतीय लोकतंत्र को अधिनायकतंत्र में तब्दील करने के प्रयास को निष्फल किया। दोनों ही क्रांतियां सफल रही। किन्तु भारतीय समाज को सदैव एकजुट रह कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के उपाय नहीं सुझा पायी। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि इन दोनों ही क्रान्तियों के महानायक अपनी भूमिका निभाने के बाद संसार से कूच कर गये।
एक तीसरी जनक्रांति का आभास देश की जनता को 2011 में हुआ था। जनता इससे जुड़ी भी थी। किन्तु यह क्रांति प्रारम्भ होते ही समाप्त हो गयी। इस क्रांति  के नायक अपने साथियों पर नियंत्रण स्थापित नहीं कर पाये, फलत: जनता का मोहभंग हो गया। यदि इस क्रांति की ज्वाला मंद नहीं होती तो दो वर्षों की समयावधि के बाद  भारत की राजनीतिक परिस्थितियां ही आज दूसरी होती। देश का हर गांव और शहर इससे जुड़ जाता। निश्चय ही भ्रष्ट व्यवस्था के विकराल रुप से जनता आहत है और इससे निज़ात पाने के लिए वह व्यग्र हैं। उद्धेश्य पवित्र था, किन्तु एक व्यक्ति की राजनीतिक महत्वाकांक्ष ने सार्थक जनआंदोलन का  अकारण ही रास्ता बदल दिया।
राजनीति की प्रदुषित गंगा को पवित्र करने के लिए आवश्यक नहीं है कि इसमें कूद जाओं और इसकी  सफार्इ का प्रयास करो।  गंदगी की व्यापकता को देख कर यही लगता है एक व्यक्ति या उससे जुड़ा समूह इस कार्य को करने में नितांत असमर्थ है। ऐसा दुस्साहस करने वाले काफी समझदार लोग हैं और  यह भी जानते थे कि एक आंदोलन, जिसे व्यापक जनसमर्थन प्राप्त था, उसे प्रतिकूल दिशा में मोड़ने से क्या परिणाम प्राप्त होंगे। यह भी जानते थे कि राजनीति के कीचड़ में छलांग लगाने से पानी की सफार्इ तो नहीं होगी, किन्तु स्वयं ही कीचड़ से भर जायेंगे। निश्चय ही उनके मन में यह भाव रहा होगा कि एक जनआंदोलन का लाभ उठा कर राजनीति में आंशिक हैसियत ही प्राप्त कर ली जाय, जो राजनीतिक भविष्य बनाने में सार्थक होगी।
जनआंदोलन को नया रुप भी दिया जा सकता है। यह आवश्यक नहीं की कोर्इ एक व्यक्ति या एक समूह ही इसका नेतृत्व करें। देश भर में फैला हुआ युवा समुदाय भी तो इस जनआंदोलन का नेतृत्व कर सकता है। राजनीति से देश का युवावर्ग सवाधिक प्रभावित हो रहा है, क्योंकि उसका भविष्य देश की राजनैतिक परिस्थतियों से जुड़ा हुआ है। अत: भारत का युवा, जो देश के हर गांव, शहर और महानगर में रहता है-नये भारत के निमार्ण के लिए आपस में जुड़ जाय। युवावर्ग यदि आपस में जुड़ गया तो वह देश के सभी नागरिकों को आपस में जोड़ सकता है।
जन आंदोलन का मुख्य उद्धेश्य है- राजनीति का पूर्णतया शुद्धिकरण करना। राजनीति में उन व्यक्तियों का प्रवेश निषेध करना, जो किसी घृणित उद्धेश्य को पूरा करने के लिए राजनीति में आते हैं। अगले चुनावों के पूर्व जनता संगठित हो कर उन्हीं राजनीतिक दलों और उनके प्रत्यासियों का समर्थन करेगी, जो जनता द्वारा निर्धारित किये गये मापदंड़ पर खरे उतरेंगे।