Thursday, 15 August 2013

क्या भारत में भारतीयों को रहने का अधिकार नहीं है ?

किश्तवाड़ में जो कुछ हुआ उसका पूर्वाभास था। क्यों जान बूझ कर घर और दुकाने जलायी गयी ? इसके कारणों की भी जानकारी थी। वे कौन लोग थे और उन्होंने ऐसा क्यों किया ? यह भी सभी जानते थे।  फिर क्यों ऐसी घटनाओं पर आश्चर्यजनक रुप से चुप्पी छायी हुई है? जो लोग बोलना चाहते हैं, उन्हें चुप क्यों किया जाता है? विदेशी षड़यंत्रकारी सफल हो रहे हैं और हमारा प्रशासन विफल हो रहा है, किन्तु राजधर्म निभाने में असफल राजनेताओं को देश के नागरिकों की कोई चिंता नहीं हैं। विदेशियों के नाकाम इरादों को निष्फल करने का साहस क्यों नहीं कर पा रहे हैं ? क्यों भारतीय नागरिकों की सुरक्षा के लिए सहानुभूति के दो शब्द बोलने से उनकी जुबान को लकवा मार जाता है? क्यों हमारे मोनीबाबा प्रत्येक ज्वलन्त समस्या पर मौन साधे निर्विकार बैठे रहते हैं?
किश्तवाड़ मसले पर गम्भीर होने के बजाय गुजरात याद दिला दिया गया। ऐसा लगता है, प्रशासनिक अक्षमता को छुपाने के लिए बार-बार गुजरात को दोहराना एक फेशन बन गया है। इसी बहाने लोकसभा में शोर मचा कर अपनी दुर्बलता को छुपाने की कोशिश की जाती है। उन्हें अब कैसे याद दिलायें कि गुजरात बारह वर्षों से शांत है। वहां रहने वाले सभी नागरिकों का जीवन सुरक्षित है। किन्तु जम्मू कश्मीर तीस वर्षो से अशांत है। वहां नागरिक जीवन सुरक्षित नहीं है। पाकिस्तान समर्थक देशद्रोही तत्वों की भरमार है। पाकिस्तान कश्मीर को अशांत बनाने की पूरी कोशिश कर रहा है। यदि केन्द्र में एक जवाबदेय और देशभक्त सरकार होती, तो किश्तवाड़ जैसी संवेदनशील घटना को बहुत गम्भीरता से लेती, क्योंकि पाकिस्तान समर्थक तत्व 1990 का इतिहास दोहराना चाहते हैं। वे भारत में ही भारतीय नागरिकों को अपने घरों से बाहर निकालना चाहते हैं, ताकि कश्मीर घाटी के साथ-साथ पूरा जम्मू क्षेत्र भी उनके नियंत्रण में आ जाय। वोट बैंक की राजनीति में उलझी सरकार ऐसी कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती, जिससे भविष्य में हानि उठानी पडे़।
1990 में कश्मीर घाटी के पंड़ितो को योजनाबद्ध तरीके से भगाया गया। तब भी केन्द्र में बैठी एक धर्मनिरपेक्ष सरकार चुप्पी साधे रही। शायद विश्व के इतिहास की पहली ऐसी अनोखी घटना है, जिसमें नागरिकों को अपने ही देश में पिछले पच्चीस वर्षों से शरणार्थी बन कर रहना पड़ रहा है। सब से आश्चर्य की बात यह  है कि एक राजनीतिक दल के अलावा किसी भी अन्य राजनीतिक दल के किसी भी नेता ने इनके प्रति सहानुभूति नहीं दिखाई। कश्मीर घाटी में अपना घर, जमीन और व्यवसाय से बेदखल किये गये कश्मीरी पंड़ित बहुत ही दयनीय अवस्था में केम्पों में रह रहे हैं। केन्द्र व राज्य सरकार ने ऐसी कोई व्यवस्था करने की कोशिश नहीं की इन पंड़ितों को पुन: अपने वतन भेजा जाय।  हर घटना को गुजरात से जोड़ कर अपना बचाव करने वाले राजनेता कश्मीरी पंड़ितों की व्यथा के प्रति सहानुभूति दिखाने मे क्यों कंजूसी करते हैं? क्या इसलिए कि ये हिन्दू है? क्या हिन्दूस्तान में हिन्दू होना ही पाप है? क्या यह सही नहीं है कि हिन्दुओं के वोट बिखरे हुए हैं, इसलिए उन्हें अपने ही देश मे अपमानित हो कर जीना पड़ रहा है?
गुजरात में दंगे इसलिए हुए क्योंकि उसके पहले गोधराकांड हुआ था। किन्तु किश्तवार में दुकाने और घर जानबूझ कर इसलिए जलायें क्योंकि वहां रह रहे हैं अल्पसंख्यक हिन्दुओं को भयभीत कर भगाना था। दोनों घटनाओं की तुलना कैसे की जा सकती है? किश्तवार प्रकरण सोची समझी रणनीति का एक भाग है। पाकिस्तानी सेनाएं इसी रणनीति के तहत गोलाबारी कर रही है, ताकि आतंकवादियों को घाटी में प्रवेश दिलाया जा सके। किश्तवार की घटना पांच जवानों का सिर काटने के बाद घटी है, जिससे यह साबित होता है कि पाकिस्तान एक खतरनाक खेल खेलने की तैयारी कर रहा है। उसे मालूम है कि भारत में चुनाव होने वाले हैं और सभी राजनीतिक दलों को अपने वोट बैंक की चिंता है, अत: अपनी करतूत को बेहतर ढंग से अंजाम दिया जा सकता है।  पाकिस्तान जानता है -जब तक केन्द्र में एक कमज़ोर सरकार रहेगी, उनके मनसूबे सफल होते रहेंगे।
केन्द्र और राज्य सरकार का जो रवैया दिखाई दे रहा है, इससे यही आभास हो रहा है कि पाकिस्तान 1990 का इतिहास दोहराने में सफल हो जायेगा।  वह कश्मीर घाटी की तरह जम्मू के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से हिन्दू नागरिकों का पलायन चाहता है। इसका मतलब यह हुआ है कि यदि भारतीय नागरिक हिंदू है तो उन्हें अपने ही देश में जहां वह हज़ारों वर्षों से रह रहे हैं, रहने का अधिकार नहीं है। एक गम्भीर और बेहद संवेदनशील घटना की तुलना 2002 के गुजरात दंगों से कर के केन्द्र व राज्य सरकार ने अपनी नीयत साफ कर दी है। पूरा देश एक पार्टी की नीयत को देख रहा है। यदि किश्तवार घटना के बाद एक समुदाय के बिखरे हुए वोट जुड़ गये, तो अधिकांश राजनीतिक दलों का भविष्य अंधकारमय हो जायेगा। यह आज की परिस्थितियों में बहुत आवश्यक हैं। यदि ऐसा नहीं हो पाया तो राजनेता इस देश के नागरिकों का जीवन बेहद कष्टमय बना देंगे।
आज की परिस्थितियों में यह जरुरी है कि हम भारतीय नागरिक आपस में जुड़ कर एक गम्भीर समस्या का हल खोजने की पहल करें।  हमें ऐसी राजनीति से क्या मतलब जिसमें अपने देश के नागरिकों को पड़ोसी देश के एजेंट भगाने का प्रयास करें और सरकारे चुपचाप तमाशा देखती रहें? क्या वोट बैंक को सुरक्षित करने के लिए नागरिकों का जीवन असुरक्षित करना ही राजनीतिक पार्टिंयों की नीति रह गयी है?  दुर्भाग्य से भारत में भारतीय सुरक्षित नहीं हैं, किन्तु आतंकी पूरे देश में बैखोप घूम रहे हैं। कभी भी, कहीं भी वे अपने घृणित मनसूबों को पूरा करने में स्वतंत्र हैं। अब तक जो आतंकी कारनामें को अंजाम दे चुके हैं, वे पकड़े नहीं गये। न तो उन्हें धरती ने निगला और न ही उन्हें आकाश खा गया। फिर वे कहां गये? क्या सही नहीं है कि जिन-जिन प्रदेशों में धर्मनिरपेक्ष दलों की सरकारें काम कर रही है, वहां इन देशी-विदेशी आतंककारियों ने अभयारण्य बना रखे हैं, जहां उन्हें पूर्ण सुरक्षा दी जाती है? इन्हें पकड़ने की कोशिश नहीं की जाती। कोई ईमानदार पुलिस अधिकारी ऐसा करता है, तो उन्हें रोक दिया जाता है। ऐसी ही कोशिश राजस्थान के एक पुलिस अधिकारी ने गाजी फकीर का कच्चा चिठा खोलने की,  तो उसे लताड़ पड़ी। उसे रोक दिया गया।
चुनाव जीतने के लिए एक पार्टी लुभावनी योजनाएं और नारों को ले कर आयेगी। परन्तु जनता एक हो कर उनसे सवाल पूछ सकती है- हमें खाद्य सुरक्षा नहीं, जीवन सुरक्षा चाहिये। देश में छुपे हुए देशद्रोही तत्वों को पहले पकड़ो, फिर हमारे वोट लों। क्योंकि हम भारतीय नागरिकों को अपने ही देश में सुरक्षित हो कर जीने का अधिकार हैं।