Thursday, 29 August 2013

भारतीय लोकतंत्र को एक पाईवेट लिमिटेड़ कम्पनी के नियंत्रण से मुक्त कराने का संकल्प लेना होगा

भारतीय लोकतंत्र को एक पाईवेट लिमिटेड़ कम्पनी के नियंत्रण से मुक्त कराने का संकल्प लेना होगा
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतराष्ट्र एक अभूतपूर्व आर्थिक संकट में फंस गया है। स्थिति पर नियंत्रण पाना असम्भव लग रहा है, क्योंकि इस मुश्किल घड़ी में देश को राह दिखाने वाला कोई नहीं है। नेतृत्व विहिन राष्ट्र उस सेना की तरह दिखाई दे रहा है, जिसके आगे-आगे एक रथ तो चल रहा है, परन्तु उसमें एक निर्जीव मूर्ति रखी हुई है, जो सेना को दिशा-निर्देश देने में अक्षम है।
दुनिया को दिखाने के लिए जिन महाशय को देश का नेतृत्व सौंप रखा है, वह एक छलावा है। देश की जनता को दिया जा रहा निर्लज्ज धोखा है। विपदा की घड़ी में मौन नेतृत्व भारतीय जनता के लिए दुःखद त्रासदी साबित हो रहा है। जबकि ऐसा समय में नेतृत्व के लिए अग्नि परीक्षा होता है। अपनी दृढ़ संकल्प शक्ति और ओजपूर्ण वाणी से नेतृत्व जनता को आश्व्स्त करता है। संकट से बाहर निकलने का रास्ता दिखाता है। जिस तरह शक्तिशाली सेना नेतृत्व विहिन होने पर आत्मविश्वास खो देती है, उसी तरह शाशन व्यवस्था देश को इस संकट से बाहर निकालने के लिए पूर्णतया अक्षम साबित हो रही है। इसका कारण यह है कि एक राजनीति पार्टी, जिसके पास देश की शासन व्यवस्था है, एक पाईवेट लिमिटेड़ कम्पनी बन गयी है। जिसको एक मालिक चला रहा है, उसके अधिनस्त काम करने वाले सारे राजनेता उस पार्टी के प्रबन्धक या कर्मचारी बन गये हैं।
प्राईवेट लिमिटेड कम्पनियां राष्ट्रहित और जनहित के लिए संवेदनशील  नहीं होती। देश के भविष्य के लिए वे चिंतित नहीं रहती। भारी विज्ञापनबाजी से अपने प्रोडक्ट को सेल करने पर अपना पूरा ध्यान केन्द्रीत करती है। इन कम्पनियों का मुख्य लक्ष्य रहता है – अधिकाधिक मुनाफा कमाना । इस रणनीति के तहत कई तरह की योजनाएं बनाती है। दूसरी कम्पनियों के साथ सौदेबाजी करती है। कम्पनी का विस्तार करने के लिए भावी नीतियां बनाती है।
भारत की एक राजनीतिक पार्टी, अब पूरी तरह प्राईवेट लिमिटेड़ कम्पनी बन गयी है, उसका मुख्य लक्ष्य है- किसी भी तरह देश पर नियंत्रण स्थापित करना, ताकि अपने मुनाफे के लिए देश के प्राकृतिक संसाधन और राजस्व को लूटा जा सके। इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए चुनाव जीतने की रणनीति बनायी जाती है, ताकि पार्टी के अधिकाधिक सांसद चुने जा सके।
जो राजनीतिक पार्टी लोकलुभावन योजनाएं अर्थात जनता को लुभा कर वोट प्राप्त करने के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए प्रति वर्ष पांच लाख करोड़ रुपया खर्च करती है, जो कि जीडीपी का दस प्रतिशत है, उस पार्टी से  देश की प्रगति और खुशहाली की आशा नहीं की जा सकती। उसे देश की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए प्रतिबद्ध माना जा सकता है। जबकि विभिन्न प्रकार के करो से मात्र बारह लाख करोड़ राजस्व की ही प्राप्ति होती है। ऐसी परिस्थतियों में मात्र वोट प्राप्त करने का लक्ष्य रख कर नीतियां बनाने का मात्र एक ही कारण है- जनता को मूर्ख बना कर किसी भी तरह उसके वोट प्राप्त किये जा सके और देश पर नियंत्रण बनाये रखा जा सके। बढ़ते राजस्व घाटे और चालू घाटे से इस पार्टी का कोई लेना देना नहीं है। देश की अर्थव्यवस्था पर इसके क्या दुष्प्रभाव पडे़गे, इस बारें में भी उन्हें कोई चिंता नहीं है।
जिस राजनीतिक पार्टी के नेताओं ने अनुमानित पांच लाख करोड़ रुपयों का घोटाला कर के राजस्व की हानि की हो, उससे कैसे यह आशा रख सकते हैं कि इस पार्टी के नेता देश भक्त है और देश हित के लिए चिंतित रहते हैं। घोटालों के कारण कई रोड व पावर पे्राजेक्ट अधुरे पड़े हैं। कोयला व स्पात की खानों से उत्पादन रुका हुआ है। बैंको के लाखों करोड़ रुपये इन योजनाओं में फंस गये है। किन्तु घोटालों को दबाने के लिए जिस तरह सरकारी जांच एंजेसियों का उपयोग किया जा रहा है उससे यही लगता है कि राजनीति का पूर्णतया व्यावसायिकरण हो गया है। राजनीति में घुस आये व्यवसायियों ने पार्टियों को पाईवेट लिमिटेड कम्पनियों में तब्दील कर दिया है, जो भारी मुनाफा कमाने का लक्ष्य ध्यान में रख कर राजनीति का व्यवसाय कर रहे हैं।
जिस तरह पाईवेट लिमिटेड़ कम्पनियां अपने व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करने के लिए दूसरी कम्पनियों के साथ व्यापारिक समझौते करती है, उसी तरह एक राजनीति पार्टी सरकार बचाने के लिए और अपना राजनीतिक हित साधने वाली नीतियों को लागू करने का उद्धेश्य ले कर बहुमत जुटाने के लिए दूसरी पार्टियों के साथ सौदेबाजी करती है। सौदेबाजी में या तो आर्थिक पैकेज का प्रलोभन दिया जाता है या उसकी दुखती नब्ज को दबा कर जांच एंजेंसियों से जांच कराने की अप्रत्यक्ष धमकी दी जाती है, ताकि वह सरकार को अपना समर्थन जारी रखें।
इसी तरह कम्पनियां अपना प्रोडक्ट सेल करने के लिए धुआंधार प्रचार करती है, उसी तरह एक पार्टी चुनाव जीतने के लिए धुआंधार प्रचार करने में लगी हुई है, ताकि उसकी कलंकित छवि को उजली बना कर जनता को प्रभावित किया जा सके। ऐसा करने वाले व्यक्तियों को इस बात की जरा भी परवाह नहीं है कि करोड़ो रुपये की राजस्व हानि से राजकोषीय घाटा और बढ़ेगा।
यदि यह सरकार वास्तव में देश की विकट आर्थिक स्थिति को ले कर चिंतित होती, तो खाद्य सुरक्षा योजना को इन विकट परिस्थितियों में लागू करने के लिए अपनी पूरी शक्ति नहीं लगाती। मनरेगा जैसी बेहद खर्चिली योजनाओं को कुछ समय के लिए स्थगित कर देती। किन्तु जो पार्टी अपने राजनीतिक हितो को देश हित से ज्यादा तवज्जो देती हों, उससे ऐसी आशा रखना बेकार है।
राजनीतिक इच्छाशक्ति विहिन नेतृत्व के दुष्परिणाम राष्ट्र को भोगने पड़ रहे हैं। आर्थिक संकट के कारण महंगाई की विभीषिका झेलने के लिए जनता को तैयार रहना होगा। औद्योगिक उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ने से बैरोजगारी बढ़ेगी। नये रोजगार सृजन के आसार समाप्त हो जायेंगे। भारतीय युवाओं के भविष्य के समक्ष अंधेरा कर दिया है, जिसमें उन्हे ठोकरे ही खाना है। चुनाव जीतने के लिए लैपटाप देने वाली और बैरोजगारी भत्ते का प्रलोभन देने वाली सरकारे कभी युवाओं को स्थायी रोजगार नहीं दिला सकती।
अब एक ही आशा बची है- देश के नागरिक इन ठगों की असली सूरत पहचान लें। इनके छलावें में नहीं आयें। इनकी लुभावनी योजनाओं से भ्रमित नहीं हो। ये पूरी ताकत से पुनः सता पर नियंत्रण की कोशिश करेंगे, किन्तु जनता अपनी पूरी ताकत से इन्हें ठुकरा दें। इन्हें स्पष्ट रुप से कह दें- हम लोकतांत्रिक गण राज्य के नागरिक हैं, इस्ट इंडिया जैसी प्राईवेट लिमिटेड कम्पनी के अधिनस्त गुलाम भारतीय नागरिक नहीं।
अब हम सभी भारतीयों को अपने आपसी मतभेद भुला कर तथा जातीय और धार्मिक संकीर्णता त्याग कर, भारतीय लोकतंत्र और भारतीय संसद को एक प्राईवेट लिमिटेड़ कम्पनी के नियंत्रण से मुक्त कराने का संकलप लेना होगा। क्योंकि हमे योग्य और देशभक्त शाशक चाहिये, पाईवेट कम्पनी के मैनेजर नहीं। हमे ऐसे शाशक चाहियें, जो देश हित में नीतियां बनायें अपने राजनीतिक हित की पूर्ति के लिए नहीं। जो देश को विकट आर्थिक स्थिति से बाहर निकलाने का प्रयास करें, देश को कंगाली के कगार पर नहीं धकेलें। जो युवाओं को प्रलोभन दे कर ललचायें नहीं, वरन उनके भविष्य को ध्यान में रख कर सार्थक नीतियां बनायें।