Thursday, 18 July 2013

हमे खाद्य सुरक्षा के नाम पर भिक्षा नहीं, सम्मान से जीने का हक चाहिये

क्या हम अस्सीं करोड़ भारतीय इतनी भी हैसियत नहीं रखते कि पेट भरने के लिए अनाज खरीद सकें ? सरकार ने कैसे अनुमान लगाया कि भारत की एक तिहाई  आबादी को सरकार से भिक्षा चाहिये? जो लोग सरकार चला रहे हैं, उनकी नीयत में खोट हैं। वे वोट पाने के लिए भारतीय जनता की मन:स्थिति को समझ नहीं पा रहे है। हम भारतीय कर्म में विश्वास करते है।  हमारे मन में खैरात पाने की ललक नहीं रहती। हम संतोषी जीव है। हम सम्मानपूर्वक जीवन जीना पसंद करते  है। यदि हमारी आमदनी  कम हैं, तो हम रुखी सूखी ही खा लेंगे, परन्तु किसी के आगे हाथ नहीं फैलायेंगे।
प्रश्न उठता है कि सरकार के पास ऐसी क्या मजबूरी है, जो बिना सोचे समझे, संसद में व्यापक विचार-विमर्श किये, जल्दबाजी में एक आत्मघाती बिल लाने पर तुली हुई है। जानबूझ कर संसद का सामना करने से क्यों बचना चाहती है? यदि सरकार की नीयत साफ होती, तो संसद का विशेष अधिवेशन बुला सकती थी। मानसूत्र सत्र को समय से पूर्व आरम्भ कर इसकी अवधि बढ़ायी जा सकती थी। परन्तु वह बहस से बचना चाहती है। इस बिल को पास कराने के बाद इसका व्यापक प्रचार कर राजीतिक लाभ उठाना चाहती है। इसीलिए उसे संसदीय परम्पराओ पर विश्वास नहीं है। उसे नीतीश कुमार जैसे अवसरवादी और स्वार्थी राजनेता का साथ मिल गया है, जिससे वह आश्वस्त है। वह बहस से बच जायेगी, परन्तु बहुमत का जुगाड़ कर लेगी और बिल पास हो जायेगा।
इस बिल के पास होने पर पूरे देश में प्रशासनिक अफरा-तफर मच जायेगी। निकम्मी और भ्रष्ट प्रशासनिक व्यवस्था को एक ऐसा असम्भव कार्य करना होगा, जिसमें भ्रष्टाचार की पूरी सम्भावना होगी। यह कार्य जल्दबाजी में किया जायेगा, जिससे अनाज जनता में बंटेगा कम, गायब ज्यादा होगा, क्योंकि भारत की सार्वजनिक व्यवस्था इतनी ईमानदार व सक्षम नहीं है, जो इतने महत्वपूर्ण कार्य को कर पायेगी। दूसरा अनाज को एक दूसरे स्थान पर पहुंचाने के लिए जो परिवहन व्यवस्था की जायेगी, वह बेहद खर्चिली होगी। राजकोष पर इसका अतिरिक्त भार पडे़गा।
नाम कमाने के लिए सरकार जो कवायद कर रही है, उसका भार जनता को ढ़ोना पडे़गा। महंगाई पहले से ही नियंत्रण में नहीं है और राजकोष पर पड़ने वाले इस अतिरिक्त भार से उसका भयवाह रुप जनता के सामने आयेगा। पर सरकार को इसकी कोई चिंता नहीं है। उन्हें पुन: सता में आना है, इसलिए सरकार चलाने वाले लोग बावले हो रहे हैं। उनका एक ही मकसद है- किसी भी तरह प्रलोभन दे कर जनता को मूर्ख बनाओं और वोट लों।
परन्तु उन्हें शायद यह मालूम नहीं है कि जिंदा रहने के लिए केवल गेंहूं और चावल ही नहीं चाहिये और भी बहुत कुछ चाहिये। जीवन गुजारने के लिए एक आवश्यक वस्तु को सुलभ बना दिया जायेगा, किन्तु इसके परिणामस्वरुप यदि दस वस्तुऐं दुर्लभ हो जायेगी, तो इससे लाभ के अलावा हानि ज्यादा होगी। उदाहरण के लिए गेंहूं सस्ता दिया जायेगा, पर बिजली महंगी हो जायेगी, तो उसका भार कौन ओढ़ेगा? क्या वह अनाज को कच्चा चबायेगा?
निश्चय ही राजकोष का घाटा पूरा करने के लिए डिजल, पैट्रोल के भाव बढाये जायेंगे, जिससे प्रत्येक वस्तुएं महंगी हो जायेगी। अत: आपकी थाली में जो रोटी आयेगी, वह तो सस्ती होगी, परन्तु खाद्यतेल, मसाले, दालें और सब्जी महंगी हो जायेगी, जिससे थाली की कीमत पहले से ही बढ़ जायेगी। अर्थात आपको मूर्ख बना कर एक बार आपके चेहरे पर मुस्कान लायी जायेगी, परन्तु थोड़ी देर बाद ही मुस्कान गायब हो जायेगी। जब आप हक़ीकत से रुबरु होंगे, तब तक आप ठगे जा चुके होंगे। आपको ठग कर आपका बहुमूल्य वोट ले लिया जायेगा। उन्हे सता मिल जायेगी, परन्तु आपके कष्ट घटने के बजाय और बढ़ जायेंगे।
जो राजनेता जनता के हितो की चिंता के बजाय अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए ज्यादा संवेदनशील होते हैं, उनसे कभी सुफल की आशा नहीं की जा सकती। ऐसे कुटिल मनोवृति वाले राजनेताओं के भ्रम जाल में फंसने के पहले जनता को जागरुक होना पड़ेगा। जनता को भयावह दुष्परिणाम देनी वाली खाद्यसुरक्षा नीति का जम कर विरोध करना होगा। क्योंकि सरकार जोड़-तोड- कर के इसे पास भी करवा लेगी और पास होते ही सरकार का प्रचारतंत्र इस बिल को लागू करने के बाद इतने प्रभावशाली ढंग से प्रचार करेगा, ताकि जनता सरकार की दयालुता से गदगद हो जाये।
परन्तु जनता को जागरुक हो कर सरकार से सवाल पूछना होगा कि आखिर अपने कार्यकाल के अंत में ताबड़तोड तरीके से ऐसा महत्वपूर्ण बिल लाने की क्या आवश्यकता आ पड़ी? क्या यह कार्य चार वर्ष पूर्व नहीं किया जा सकता था? क्या सरकार इस बात की गारन्टी देगी कि इस बिल के प्रभावी होने के बाद महंगाई नहीं बढ़ेगी? यदि महंगाई बढ़ जायेगी, तो फिर इससे लाभ कहां होगा? एक जेब में पैसे रखने और दूसरी जेब से निकालने को चालाकी या धूर्तता नहीं कहेंगे?
देश को एक कठिन आर्थिक स्थिति का सामना करना पड़ रहा है। रुपये के अवमूल्यन ने अर्थव्वयस्था को भयावह आर्थिक संकट में डाल दिया है। ऐसी परिस्थतियों में अपने राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए देश की अर्थव्वस्था को बरबाद करने की कीमत पर खाद्यसुरक्षा जैसा आत्मघाती कानून बनाना, किसी भी तरह देश में हित में नहीं होगा। इससे देश की गरीब जनता का हित होने के बजाय अहित ज्यादा होगा। अत: सरकार यदि संसद में बहस नहीं करेगी, तो जनता सड़को पर उससे सवाल पूछेगी। इस देश की जनता को सिर्फ खाद्य सुरक्षा ही नहीं, जीवन सुरक्षा की गारन्टी चाहिये। शीघ्र और सस्ता न्याय चाहिये। बेहतर जीवन स्तर भी चाहिये। सम्मान से जिने का हक चाहिये। शिक्षा, स्वास्थय और रोजगार की गारन्टी चाहिये। भ्रष्ट व्यवस्था और महंगाई से निज़ात चाहिये। अत: जो चालाक और धूर्त राजनेता भारत की जनता को मूर्ख बना कर खाली अनाज बांट कर ही जनता को वोट पाना चाहते हैं, वे इस भ्रम में नहीं रहें कि भारत की जनता इतनी ही मूर्ख और भोली है, जो आपकी नाकामियों को माफ कर वोट दे देगी। जनता को आपने बहुत छला है, अब और अधिक छलने के नाटक बंद कीजिये। सता चाहिये तो पहले अपनी नाकामियों और आप पर लगे भ्रष्टाचार का जवाब दीजिये, फिर हमारे वोट लीजिये।
जब देश में अनाज का पर्याप्त उत्पादन हो रहा हो। सरकारी कुप्रबन्ध के कारण भंड़ारो मे अनाज सड़ रहा हो, तब यदि लोग भूख से मरते हैं, तो इसकी दोषी वह सड़ी हुर्इ व्यवस्था है, जो भारत के नागरिकों के जीवन की रक्षा करने में अक्षम है। परन्तु इसी बहाने एक तिहाई आबादी को अनाज बांटने की क्या आवश्यकता आ पड़ी, यह तर्क समझ से परे हैं। वैसे भी उन्हें शायद मालूम नहीं है- भारत में लोग भूख से नहीं मरते, कुपोषण और बीमारी से मरते हैं। गरीबी ने उनका जीना मुश्किल कर दिया है, क्योंकि महंगार्इ ने हर आवश्यक वस्तु को उनकी पहुंच से बाहर कर दिया है। अत: जिन राजनेताओं और राजनीतिक पार्टियों को भारत पर शासन करने का अधिकार चाहिये, वे ऐसी नीतियों की घोषणा करें, जिससे जनता को लाभ मिले, हानि नहीं। खाद्य सुरक्षा योजना, एक छलावा है, इससे लाभ कम, हानि ज्यादा है।